मौर्यकालीन कला और स्थापत्य

भूमिका

कलात्मक दृष्टि से सैंधव सभ्यता और मौर्यकाल के मध्य लगभग १,५०० वर्षों का अंतराल हैं। इस समयान्तराल के कलात्मक अवशेष में निरंतरता नहीं है। महाकाव्यों और बौद्ध साहित्यों में हाथीदाँत, मिट्टी और धातुओं के काम का विवरण मिलता है। परन्तु मौर्यकाल से पूर्व वास्तुकला और मूर्तिकला के अवशेष बहुत कम मिलते हैं। इसका कारण यह है कि मौर्य-युग के पूर्व कलात्मक वस्तुओं के निर्माण में लकड़ी, मिट्टी की ईंटों तथा घास-फूस इत्यादि का प्रयोग होता था। इसी कारण ये कलाकृतियाँ आज हमें प्राप्त नहीं होतीं। मौर्यकालीन कला में ही सर्वप्रथम पाषाण का प्रयोग किया गया जिसके परिणामस्वरूप कलाकृतियाँ चिरस्थायी हो गयीं। कुल मिलाकर कला और स्थापत्य के क्षेत्र में मौर्य-युग (३२३-१८४ ई०पू०) में ही सुसंगठित क्रिया-कलाप या इतिहास के दर्शन होते हैं।

मौर्यकालीन कलाकृतियों को दो भागों में विभाजित किया जा सकता है :-

१. राजकीय (दरबारी) कला जिसमें राजतक्षाओं द्वारा निर्मित स्मारक मिलते हैं; जैसे — राजप्रासाद, स्तम्भ, गुहा-विहार, स्तूप आदि।

२. लोककला जिसमें स्वतंत्र कलाकारों द्वारा लोक-अभिरुचि की वस्तुओं का निर्माण किया गया; जैसे — यक्ष-यक्षिणी प्रतिमायें, मिट्टी की मूर्तियाँ आदि।

मौर्यकालीन कला

दरबारी अथवा राजकीय कला

राजप्रासाद

मौर्यकाल के अधिकांश अवशिष्ट स्मारक सम्राट अशोक के समय के है। अशोक के पूर्व मौर्ययुगीन वास्तुकला का ज्ञान हमें मुख्यतः यूनानी लेखकों के विवरण से प्राप्त होता है।

आचार्य चाणक्य कृत अर्थशास्त्र में ‘दुर्ग विधान’ के अन्तर्गत वास्तुकला के जिन लक्षणों की चर्चा करता है उनके अनुसार नगर के चतुर्दिक गहरी परिखा (खाई), ऊँचे वप्र (चबूतरा) पर बना हुआ प्राकार, प्राकार में यथास्थान द्वार, कोष्ठ तथा अट्टालिका (बुर्ज) बने होने चाहिए। कहा जा सकता है कि यह विवरण काल्पनिक न होकर वास्तविकता पर आधृत है और मौर्य शासकों का नगर विन्यास इसी के अनुरूप रहा होगा। आचार्य चाणक्य के इस विवरण की पुष्टि यूनानी-रोमन लेखकों के विवरण से भी हो जाती है। इन लेखकों ने चन्द्रगुप्त मौर्य की राजधानी पाटलिपुत्र तथा वहाँ स्थित उसके भव्य राजप्रासाद का विवरण दिया है।

स्ट्रैबो पाटलिपुत्र का वर्णन इस प्रकार करता है — “पोलिब्रोथा (पाटलिपुत्र) गंगा और सोन के संगम पर स्थित था। इसकी लम्बाई ८० स्टेडिया तथा चौड़ाई १५ स्टेडिया थी। यह समानान्तर चतुर्भुज के आकार का था। इसके चारों ओर लगभग ६०० फीट चौड़ी खाईं थी। नगर के चतुर्दिक् लकड़ी की दीवार बनी हुई थी जिसमें बाण छोड़ने के लिये सुराख बनाये गये थे। इसमें ६४ द्वार तथा ५७० बुर्ज थे।”

“The  greatest city in India is that which is called Palibothra, in the Dominican of the Prasians, where the Erannoboas and the Ganga unite — … … Megasthenes says further of this city the inhibited part of it stretched on either side to an extreme length of eighty stadia, and that its breadth was fifteen stadia, and that a ditch encompassed it all round, which was six plethra in breadth and thirty cubits in depth, and that the wall was crowned with five hundred and seventy towers and had four-and-sixty gates.” — P. 204-205, Ancient India as Described By Megasthenes and Arrian.

  • Plethra ≈ 97 to 100 feet
  • Stadia ≈ 150 to 210 feet

इस नगर में सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य का भव्य राजप्रासाद स्थित था। यह वस्तुतः एक विशाल भवन-समूह था जिसमें अनेक बड़े-बड़े कमरे थे। इनके चमकते स्तम्भों में सोने की लतापत्रावली तथा चाँदी को चिड़िया बनी हुई थीं। इनमें सर्वप्रमुख भवन अनेक स्तम्भों वाला मण्डप था जो लकड़ी के ऊँचे घरातल पर टिका हुआ था। यह राजप्रासाद एक बड़े पार्क के मध्य स्थित था। इसमें छायादार एवं हरे-भरे वृक्ष लगे हुए थे। यहाँ अनेक सरोवर थे जिनमें विविध आकार-प्रकार की मछलियाँ पाली गयी थीं। सूसा तथा एकबतना के राजप्रासाद भी भव्यता में इसको बराबरी नहीं कर सकते थे।

पटना के समीप बुलन्दीबाग तथा कुमराहार में की गयी खुदाई में लकड़ी के विशाल भवनों के अवशेष प्रकाश में आये है। उन्हें प्रकाश में लाने का श्रेय स्पूनर महोदय को है। बुलन्दीबाग से नगर के परकोटे (Palisade) के अवशेष तथा कुमराहार से राजप्रासाद के अवशेष प्राप्त हुए हैं।परकोटे की लम्बाई ४५० फुट तक है। इसमें दोनों ओर लकड़ी के लट्ठों की विशाल दीवारें हैं। प्रत्येक लठ्ठा १९ फुट ऊँचा तथा एक फुट चौड़ा है। लठ्ठ को दोनों दीवारों को १४ फुट के बड़े लठ्ठों से जोड़ा गया है। उनके बीचों बीच कूटी हुई मिट्टी भरी गयी है।

कुमराहार के प्रासाद-अवशेष से पता चलता है कि यह एक भवन समूह था। एक भवन के अवशेष में पत्थर के विशाल स्तम्भ खड़े है जो किसी विशाल स्तम्भ-मण्डप की छत के आधार रहे होंगे। यही सम्भवतः चन्द्रगुप्त मौर्य का विशाल सभाभवन था। यह ऐतिहासिक काल का पहला विशाल अवशेष है जो एक मण्डप के रूप में है। मण्डप के मुख्य भाग में दस-दस स्तम्भों को आठ कतारे पूर्व से पश्चिम की ओर बनी है। इसके पूर्व की ओर दो और स्तम्भ खण्डित अवस्था में मिलते है। मण्डप के एक ओर काष्ठ-मंच मिले हैं जिन्हें काष्ठशिल्प का अ‌द्भुत उदाहरण माना जा सकता है। खुदाई में अशोक के स्तम्भ से मिलता-जुलता एक स्तम्भ का निचला भाग पूर्ण अवस्था में प्राप्त हुआ है।

यह राजप्रासाद चौथी शताब्दी ईस्वी में ज्यों-का-त्यों विद्यमान था और फाहियान को यह देखकर आश्चर्य हुआ था कि “इसे संसार के मनुष्य नहीं बना सकते, अपितु यह देवताओं द्वारा बनाया गया लगता है।”

इस प्रकार मौर्यकाल में काष्ठकला अपने विकास की पराकाष्ठा पर पहुँच गयी थी। एरियन के अनुसार “सूसा तथा एकबतना के राजप्रासाद भी भव्यता में पाटलिपुत्र के राजप्रासाद की बराबरी नहीं कर सकते थे।” मौर्य राजप्रासाद की समता कुछ विद्वान् पर्सिपोलिस से प्राप्त हुए सौ स्तम्भों वाले हखामनी प्रासाद से करते हैं।

Arrian described the palace in these terms, where the greatest of all kings of India resided, was a marvel of workmanship with which neither Memnomian Susa with all its costly splendour, nor Ekbatana with all its magnificence, can vie.”

सम्भवतया यह राजप्रासाद और काष्ठ प्राचीर अग्निकांड से नष्ट हुआ क्योंकि इसके जले हुए ढाँचे के राख कुमराहार से मिले हैं। साथ ही सभा मंडप में शिला स्तम्भों का प्रयोग एक नयी प्रथा थी।

सम्राट अशोक कालीन कलाकृतियाँ

सम्राट अशोक के समय तक आते-आते मौर्यकला के बहुसंख्यक स्मारक हमें मिलने लगते हैं। इस समय को कला-कृतियों को हम चार भागों में विभक्त कर सकते हैं –

  • स्तम्भ
  • स्तूप
  • वेदिका
  • गुहा विहार

इनका विवरण इस प्रकार है :-

स्तम्भ

स्तम्भ मौर्ययुगीन वास्तुकला के सर्वोत्कृष्ट उदाहरण हैं। जॉन मार्शल, पर्सी ब्राउन, स्टेला कैम्रिश जैसे विद्वान् इन्हें ईरानी स्तम्भों की अनुकृति बताते हैं। स्तम्भों की (विशेष रूप से सारनाथ स्तम्भ की) — चमकीली पॉलिश, घंटाकृति, शीर्ष पर पशु की मुर्ति आदि के कारण इन पाश्चात्य विद्वानों एकाश्मक स्तम्भ की कलाकृतियाँ पर ईरानी (हखामनी) प्रभाव मानते हैं। इसी तरह चौकी पर हंसों की उकेरी हुई आकृतियों और अन्य सज्जाओं में यूनानी प्रभाव भी बताया गया है।

किन्तु यह समीचीन नहीं है क्योंकि हमें ईरानी तथा अशोक के स्तम्भों में कई मूलभूत अन्तर दिखायी देते हैं। इनमें कुछ इस प्रकार है :-

अशोक के स्तम्भ ईरानी स्तम्भ
अशोक के स्तम्भ एकाश्मक अर्थात् एक ही पत्थर से तराशकर बनाये गये हैं। ईरानी स्तम्भों को कई मण्डलाकार टुकड़ों को जोड़कर बनाया गया है।
अशोक के स्तम्भ बिना चौकी या आधार के भूमि पर टिकाये गये है। ईरानी स्तम्भों को चौकी पर टिकाया गया है।
इसके विपरीत अशोक के स्तम्भ स्वतंत्र रूप से खुले आसमान में स्थापित हैं। ईरानी स्तम्भ विशाल भवनों में लगाये गये थे।
अशोक स्तम्भों के शीर्ष पर पशुओं की आकृतियाँ हैं। ईरानी स्तम्भों पर मानव आकृतियाँ हैं।
अशोक के स्तम्भों के शीर्ष पर लगी पशु मूर्तियों का एक विशेष प्रतीकात्मक अर्थ है जिसकी समुचित व्याख्या भारतीय परम्परा में ही सम्भव है। ईरानी स्तम्भ शीर्षकों में कोई प्रतीकात्मकता नहीं है।
अशोक के स्तम्भ सपाट है। ईरानी स्तम्भ गड़ारीदार या नालीदार (Fluted) हैं।
अशोक के स्तम्भ नीचे से ऊपर की ओर क्रमशः पतले होते गये हैं। ईरानी स्तम्भों की चौड़ाई नीचे से ऊपर तक एक जैसी है।

इस प्रकार हम अशोक स्तम्भों को ईरानी स्तम्भों की नकल न होकर भारतीयता से ओतप्रोत हैं। एकाश्मक स्तम्भों की पशु-मूर्तियाँ; यथा सारनाथ का सिंह शीर्ष स्तम्भ, रामपुरवा का वृषभ शीर्ष स्तम्भ प्राचीन सैंधव सभ्यता के प्रवाहमान परम्परा के अनुकूल ही है। रामपुरवा अशोक स्तम्भ का वृषभ वस्तुतः मोहनजोदड़ो की मुहरों पर उकेरे हुए बैंलों सा लगता है। और तो और सारनाथ के “धर्मचक्र” की कल्पना नितांत भारतीयता से ओतप्रोत है।

स्पूनर का विचार है कि मौर्य स्तम्भों पर जो ओपदार पॉलिश है वह ईरान से ही ग्रहण की गयी है। लेकिन वासुदेव शरण अग्रवाल ने आपस्तम्भ सूत्र तथा महाभारत से ऐसे उदाहरण खोज निकाले है जिनसे स्पष्ट होता है कि यह पॉलिश भारतीयों को यह ईरानियों से पहले ज्ञात थी। उनके अनुसार आपस्तम्भसूत्र में मृद्भाण्डों को चमकीला बनाने की विधि के प्रसंग में ‘श्लक्षणीकरणै’ तथा ‘श्लक्षणी-कुर्वन्ति’ (चिकना करने के मसालों से उसे चिकना किया जाता था) शब्द प्रयुक्त किया गया है जो ओपदार पॉलिश की प्राचीरता का सूचक है।

पिपरहवा बौद्ध स्तूप की धातुगर्भ-मंजूषा, पटना की यक्ष प्रतिमायें, लोहानीपुर से प्राप्त जैन तीर्थंकरों के धड़ आदि सभी में चमकीली पॉलिश लगायी गयी है।

इस सम्बन्ध में एक उल्लेखनीय तथ्य यह है कि पूर्व-मौर्य-काल के उत्तर भारत के विभिन्न स्थलों से काले रंग के चमकीले भाण्ड मिलें है जिनका समय ६००-२०० ई०पू० निर्धारित है। इन्हें एन० बी० पी० (NBPW – Northern Black Polished Ware) कहा जाता है। यह बर्तनों पर पॉलिश करने की प्राचीनता को ईसा पूर्व छठी शताब्दी में ले जाता है। ऐसी दशा में स्तम्भों पर पॉलिश करने का ज्ञान ईरान से लेने की भारतीयों को कोई आवश्यकता ही नहीं थी।

यहाँ पर एक महत्त्वपूर्ण तथ्य यह है कि धौलावीरा (गुजरात, सैंधव सभ्यता) से पॉलिशदार श्वेत प्रस्तर खण्ड (Polished stone blocks) बड़ी संख्या में मिले हैं। इससे ज्ञात होता है कि सैंधव सभ्यता के लोग पत्थरों पर पॉलिश करने की कला से परिचित थे।

अतः मौर्यकालीन स्तम्भ तथा उनकी पॉलिश पूर्णतया भारतीय है। अग्रवाल के शब्दों में “मौर्य स्तम्भों की परम्परा को लौरियानन्दनगढ़ के काष्ठ यूपों में ढूँढ़ना अधिक समीचीन होगा जो हमारे यहाँ ही मौजूद है। बौद्ध साहित्य और महाभारत में ऐसे स्तम्भों का उल्लेख है जो धार्मिक एवं सार्वजनिक स्थानों में लगाये जाते थे।”

यहाँ पर एक तथ्य और महत्त्वपूर्ण है कि “ओपदार पॉलिश” की तकनीक राजशिल्पियों तक ही नहीं सीमित थी। पिपरहवा स्तूप से मिली स्फटिक मंजूषा, पाटलिपुत्र से मिली यक्ष व दीदारगंज की यक्षों में भी यह पॉलिश पायी गयी है।

स्तम्भों की संख्या

सम्राट अशोक के स्तम्भों की संख्या निश्चित नहीं है।

चीनी यात्री फाहियान (३९९-४१३ ई०) ने छः स्तम्भों का विवरण दिया है।

  • श्रावस्ती के जेतवन विहार के द्वार पर दो स्तम्भ थे। इसमें से एक पर धर्मचक्र था और दूसरे के शार्ष पर वृषभ था।
  • एक संकिस्सा में विहार के पृष्ठभाग में स्थित था। इसका शीर्ष सिंह आकृति से अलंकृत था। यह लेखयुक्त था।
  • कुशीनगर से वैशाली के मार्ग में उसने चौथा स्तम्भ स्तम्भ था जिसकी पहचान लौरिया अरराज से की गयी है।
  • पाटलिपुत्र का जम्बूद्वीप स्तम्भ। सम्राट अशोक ने जंबूद्वीप अर्थात् अपने महालक विजित का दान दे दिया और धन से पुनः प्राप्तकर लिया। ऐसा तीन बार हुआ। इस कारण पाटलिपुत्र का वह स्तम्भ जम्बूद्वीप के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
  • पाटलिपुत्र में ही छठा स्तम्भ फाहियान ने देखा।

हुएनसांग (७वीं शताब्दी) ने पन्द्रह स्तम्भों का उल्लेख किया है।

  • “कपित्थस्तम्भ” जो सांकाश्य में था। इस पर बैगनी रंग की चमकीली ओप थी। इस पर सिंह शीर्ष था। परन्तु वस्तुतः वहाँ हाथी का शीर्ष पाया गया। यह स्तम्भ स्तूप के सोपान के ऊर्ध्व भाग में था। स्तूप और स्तम्भ दोनों की रचना अशोक ने की थी। यह भी लिखा है कि स्तम्भ की मध्य यष्टि पर चारों ओर उकेरी है।
  • द्वितीय और तृतीय स्तम्भ, श्रावस्ती में हुएनसांग ने देखा। ‘जेतवन विहार के पूर्वी द्वार के दोनों ओर स्तम्भ थे। ये ७० फुट ऊँचे थे। बाईं ओर के स्तम्भ पर चक्र और दाहिनी ओर वृषभ था।’
  • चौथा स्तम्भ, कपिलवस्तु में एक स्तम्भ जो क्रकुछन्द बुद्ध के स्तम्भ के सामने था। उसके मस्तक पर सिंह शीर्ष था और उस पर उसके अभिलेख में परिनिर्वाण की कथा थी। यह ३० फुट ऊँचा था।
  • पाँचवाँ, कपिलवस्तु में कनकमुनि बुद्ध का स्मारक स्तम्भ। ऊँचाई २० फुट से अधिक। इस पर सिंह शीर्षक था और लेख में कनकमुनि के परिनिर्वाण का उल्लेख था। निग्लीवा गाँव में प्राप्त अशोक स्तम्भ यही है जो कपिलवस्तु से उत्तर-पूर्व की ओर है। इसके स्तम्भलेख में लिखा है कि कनकमुनि के स्तूप को बढ़ाकर दुगुना किया गया। इस ‘शिलापथ’ की स्थापना अशोक के राज्याभिषेक के २०वें वर्ष में हुई।
  • छठा, लुम्बिनी उद्यान (वर्तमान रुम्मिनदेई) का स्तम्भ – “इस पर अश्व शीर्षक था।” युवानच्वांग के अनुसार यह बिजली गिरने से बीच में टूट गया था। उसने स्तम्भ लेख का वर्णन नहीं किया। फाहियान ने कहा है कि उसमें बुद्ध के जन्म का उल्लेख था। यह अशोक का सबसे अधिक सम्मानित स्तम्भ था जिसे उसने बुद्ध के जन्मस्थान पर स्थापित करते हुए लेख में बताया कि “यहाँ भगवान् शाक्य- मुनि का जन्म हुआ था” (हिद बुधे जाते सक्य-मुनि-ति)। सम्राट् ने स्वयं यहाँ आकर पूजा की थी और स्तम्भ खड़ा किया [सिला-विगड-भीचा कालापित सिला-थमे (-थभे) च उसपापिते।]। उसने एक शिला प्राकार या वेदिका भी स्तम्भ के चारों ओर बनवाई थी।
  • सातवाँ, कुशीनगर का स्तम्भ – यह बुद्ध के परिनिर्वाण का स्तम्भ था और उसके लेख में भी यह बात लिखाई गई थी। अभी तक यह मिला नहीं है। हिरण्यवती (गंडक) और अचिरावती (राप्ती) के संगम के निकट कुशीनगर वर्तमान कसिया है।
  • आठवाँ, कुशीनगर में दूसरा स्तम्भ – जो उसी स्थान पर था जहाँ बुद्ध की धातुओं का आठ भागों में विभाजन उनके लिए किया गया था जो उसके दावेदार अर्थी थे। यह अभी तक नहीं मिला है।
  • नौवाँ, सारनाथ के मार्ग में एक स्तम्भ जिसकी पहचान स्मिथ ने संस्कृत विश्वविद्यालय में खड़ी हुई लाट भैरों से की थी। १९०८ के दंगे में उसे तोड़-फोड़ दिया गया। यह लाट चमकदार हरे पत्थर की बनी थी जिस पर दर्पण की सी दमक थी। उसमें बुद्ध की परछाईं बरावर दिखाई देती थी।
  • दसवाँ, सारनाथ का स्तम्भ – यह ७० फुट से अधिक ऊँचा था। यह यशब जैसा सुकुमार, मृदुस्पर्शी और चमकीली ओप से युक्त था। इस स्थान पर बुद्ध ने सबसे पहले धर्मोपदेश किया था। युवानच्वांग ने जो ऊँचाई लिखी है वह तथ्य से मेल नहीं खाती क्योंकि वर्तमान टूटे खंडों के आधार पर इसकी ऊँचाई ४९/ फुट आँकी गई है। यह सुप्रसिद्ध महाधर्मचक्र स्तम्भ था जो आर्तल को मिला था।
  • ११वाँ, महाशाल में सिंह शीर्ष युक्त एक स्तम्भ जो अशोक स्तूप के सम्मुख था। वहीं युवानच्वांग ने नारायण प्रासाद भी देखा था जिस प्रासाद में सुन्दर मंडप और वेदियों और सुन्दर कलात्मक मूर्तियाँ भी थीं। स्तम्भ लेख में यह भी लिखा था कि वहाँ बुद्ध ने एक यक्ष को वश में किया था। यहीं अशोक का एक स्तूप भी था जिसके सामने स्तम्भ को खड़ा किया। अशोक शैली का यह लक्षण था कि स्तूप और स्तम्भ दोनों एक साथ बनाए जाते थे ।
  • १२वाँ, वैशाली स्तम्भ – ऊँचाई लगभग ५० फुट, सिंह शीर्षक युक्त जो अशोक निर्मित स्तूप के बराबर खड़ा किया गया था। कनिंघम ने इसकी पहिचान बखिरा गाँव (कोल्हुआ) के बिना लेख वाले स्तम्भ से की थी।
  • १३वाँ, पाटलिपुत्र स्तम्भ ऊँचाई लगभग ३० फुट। यह फाहियान का जम्बूद्वीप स्तम्भ था। इस स्तम्भ के टूट-फूट के टुकड़े मिले हैं।
  • १४वाँ, पाटलिपुत्र का दूसरा स्तम्भ – यह कई दहाई फुट ऊँचा स्तम्भ वहाँ स्थित था जहाँ अशोक का ‘रमणीयबन्धन’ नामक नरकतुल्य कारागार था।
  • १५वाँ, राजगृह स्तम्भ – ऊँचाई ५० फुट। यह कलन्दक निवाप या सरोवर के निकट निर्मित स्तूप के पास था। इसके ऊपर हाथी का शीर्षक था। इसके लेख में स्तूप की स्थापना का कथन था।

परन्तु वास्तविक संख्या इससे अधिक थी। यह लगभग तीस रही होगी। इनमें से पन्द्रह सुरक्षित है। अन्य नष्ट हो गये है।

अब तक मिले स्तम्भ

१. सारनाथ स्तम्भ जिस पर चार सिंहों का शीर्ष है

२. साँची स्तम्भ

३. रामपुरवा स्तम्भ जिस पर सिंह शीर्ष है

४. रामपुरवा स्तम्भ जिस पर वृषभ शीर्ष है (लेख रहित)

५. लौरिया नन्दनगढ़ स्तम्भ जिस पर सिंह शीर्ष है

६. लौरिया अरराज स्तम्भ

७. कोसम (कौशाम्बी) स्तम्भ; वर्तमान में यह प्रयागराज में अकबर के दुर्ग में स्थापित है

८. कौशाम्बी स्तम्भ (लेख रहित)

९. रुम्मिनदेई या लुम्बिनी स्तम्भ

१०. निग्लीवा स्तम्भ

११. बखिरा या कोल्हुआ स्तम्भ जिस पर सिंह शीर्ष है

१२. सांकाश्य स्तम्भ जिस पर गज शीर्ष है (लेख रहित)

१३. मेरठ स्तम्भ जो वर्तमान में दिल्ली में फिरोजशाह तुग़लक़ ने स्थापित कराया

१४. टोपरा स्तम्भ जो वर्तमान में दिल्ली में फिरोजशाह तुग़लक़ ने स्थापित कराया

इन चौदह स्तम्भों में १० पर लेख हैं और चार पर नहीं। इसी सूची में निम्नलिखित को और जोड़ना आवश्यक है जो हाल में मिले हैं –

(१) पटना की सदर गली से प्राप्त वृषशीर्षक युक्त स्तम्भ खंड।

(२) पटना संग्रहालय में सुरक्षित ओपदार सिंहशीर्षक जो अशोक स्तम्भ का भाग था। इस पर कंटकारि के पत्ते हैं और इसकी बनावट कुछ अनगढ़ है। यह आरा के मसाढ़ गाँव में मिला था।

(३) पटना संग्रहालय में सुरक्षित चार वृषों के संघाट युक्त स्तम्भ शीर्षक। इसके ऊपर बीचों-बीच एक चूल है जो संभवतः धर्मचक्र के लिए थी। इस पर भी चमकीली मौर्य ओप है।

ये दो प्रकार के हैं-

  • एक, वे स्तम्भ जिन पर धम्म-लिपियाँ खुदी हुई है।
  • द्वितीय, वे स्तम्भ जो बिल्कुल सादे है।

पहले प्रकार में दिल्ली-मेरठ, दिल्ली-टोपरा, प्रयागराज, लौरियानन्दनगढ़, लौरिया अरराज, रामपुरवा (सिंह-शीर्ष), संकिस्सा, साँची, सारनाथ, लुम्बिनी, निगाली सागर आदि के स्तम्भ आते हैं।

दूसरे प्रकार में रामपुरवा (वृषभ-शीर्ष), बसाढ़, कोसम आदि प्रमुख है। सभी स्तम्भ चमकदार, लम्बे, सुडौल तथा एकाश्मक (एक ही पत्थर के बने हुए) हैं। ये नीचे से ऊपर की ओर क्रमशः पतले होते गये है।

इन स्तम्भों की शैली अध्ययन करने से इनके तिथिक्रम पर भी कुछ प्रकाश पड़ता है —

१. इनमें सबसे पहले बाखिरा या कोल्हुआ का सिंह स्तम्भ था। तदनन्तर संकिसा का गज- शीर्षक युक्त स्तम्भ बनाया गया।

२. दूसरे वर्ग में इनके बाद रामपुरवा का वृषशीर्षक स्तम्भ रचा गया। उसके ठीक पीछे लौरियानन्दनगढ़ का सिंह शीर्षक स्तम्भ बना। इन दोनों में आरम्भिक अपरूपता की जगह नया पाटव या कृतित्व-सौन्दर्य आने लगा। अब स्तम्भ के विभिन्न अंगों में स्तम्भ और उनके प्राकृतिक सौन्दर्य का विकास हो गया।

३. रामपुरवा के सिंहशीर्षक स्तम्भ और साँची के सिंह स्तम्भ तक पहुँचते-पहुँचते शिल्पियों के हाथ मँज गये थे। उसके अनन्तर सारनाथ के सिंह स्तम्भ में शिल्पियों ने अपनी कला की पराकाष्ठा प्राप्त कर ली। इस समय वे अपनी कला के सौष्ठव के शिखर पर थे।

स्तम्भ के मुख्य भाग है —

  • यष्टि या लाट
  • यष्टि के ऊपर अधोमुख कमल (घण्टे) की आकृति
  • फलक (Abacus)
  • स्तम्भ को मण्डित करने वाली पशु-आकृति

मौर्यकालीन कला

स्तम्भों की यष्टि एक ही पत्थर को तराश कर बनाया गया है। इन पर इतनी बढ़िया पॉलिश है कि वे आज भी शीशे के समान चमकते हैं। यष्टि के सिरे पर उल्टे कमल की आकृति है। कुछ विद्वान् इसकी तुलना पर्सिपोलिस (हखामनी सम्राटों की राजधानी) के घण्टाशीर्ष (Bell-capital) से करते हैं।

डॉ० वासुदेव शरण अग्रवाल ने इसे भारतीय ‘पूर्णघट’ या ‘मंगलकलश’ का प्रतीक बताया है। इसे ‘अवांगमुख कमल’ (Inverted Lotus) भी कहा गया है। इसके ऊपर फलक ताँबे की कीलों द्वारा स्थापित है। यह कुछ स्तम्भों में चौकोर तथा कुछ में गोल और अलंकृत है। फलक पर भिन्न-भिन्न पशुओं की आकृतियाँ; जैसे – हंस, सिंह, हाथी, वृषभ आदि मिलती है।

लौरिया अरराज का स्तम्भ-शीर्ष नष्ट हो गया है। आर० पी० चन्दा महोदय के अनुसार उस पर गरुड़ की आकृति रही होगी। बसाढ़ के स्तम्भ के ऊपर सिंह, संकिसा के ऊपर हाथी, रामपुरवा पर वृषभ, लौरिया नन्दनगढ़ पर सिंह तथा साँची और सारनाथ के स्तम्भों के ऊपर एक साथ चार सिंहों को आकृतियाँ मण्डित की गयी है।

अशोक स्तम्भ वास्तु तथा तक्षण दोनों ही दृष्टियों से विलक्षण है। ये स्तम्भ बिना किसी सहारे के खुले आसमान के नीचे खड़े हैं। साथ ही ये सभी स्तम्भ अपने-आप में पूर्ण स्वतंत्र है। ये सभी चुनार के बलुये पत्थर से बने हैं। ऐसा प्रतीत है कि चुनार (मिर्जापुर) में स्तम्भों के निर्माण का कार्यशाला रहा होगा। इन स्तम्भों की लम्बाई ३५ से ५० फीट तथा प्रत्येक का वजन लगभग ५० टन (≈५०,००० किलोग्राम) है। चुनार की खानों से इन पत्थरों को काटकर निकालना, शिल्पकला में इनको एकाश्मक स्तम्भों का रूप देना, इन स्तम्भों को देश के विभिन्न भागों में पहुँचाना तत्कालीन शिल्पकला और अभियांत्रिकी कौशल का अनोखा उदाहरण है।

स्तम्भों में निम्नलिखित विशेष रूप से उल्लेखनीय है —

  • बखिरा सिंहशीर्ष स्तम्भ
  • संकिसा गजशीर्ष स्तम्भ
  • बसाढ़ सिंहशीर्ष स्तम्भ
  • रामपुरवा वृषभशीर्ष स्तम्भ
  • रामपुरवा सिंहशीर्ष स्तम्भ
  • लौरिया नन्दनगढ़ सिंहशीर्ष स्तम्भ
  • साँची चतुर्सिंह शीर्ष स्तम्भ
  • सारनाथ चतुर्सिंह स्तम्भ

मौर्यकालीन कला

बखिरा सिंहशीर्ष स्तम्भ इसकी डंडी भारी और अनुपात से अधिक मोटी और ठिंगनी है। ऊपर सिंह की मूर्ति अनगढ़ शैली की है। सिंह को चौकी पर क्लिष्ट आसन में दबकी मुद्रा में बैठे बड़े बिलौटे जैसा मानों टाँग दिया गया है। उसकी मुद्रा कृत्रिम और काष्ठशिल्प की भाँति विजड़ित है। यद्यपि तक्षक ने पत्थर के बड़े ढोके को गढ़ा है पर उसके विभिन्न भागों को वह ऊर्ध्व छन्द के अन्तर्गत नहीं ला सका, जैसा अशोक कालीन उत्तम कला में पाया जाता है।मौर्यकालीन कला

संकिसा का गजशीर्ष स्तम्भ इसके शीर्षक के तीन भाग हैं, ऊपर गज, बीच में अंड और नीचे कमलयुक्त पूर्णघट। अंड पर मुचकुंद, कमल के पुष्प और कलियों की बेल है जिनके बीच-बीच त्रिरत्न चिह्न हैं। अंड के नीचे चकली और चक्र के अलंकरण को माला है। चौकी की बनावट और मुड़ी पत्तियों वाला पद्म अधिक विकसित और सुन्दर है।

मौर्यकालीन कला

 

रामपुरवा वृषभशीर्ष स्तम्भ इसके तीन भाग हैं, अर्थात् ऊपर पशुरूप, बीच में गोल अलंकृत अंड भाग और नीचे अवाङ्मुखी कमल। यह नटुवा बैल जिसके शरीर पर मांस के लेबड़े चढ़े हैं भारतीय पशुओं की तक्षण कला में बहुत ही विशिष्ट बन पड़ा है। यह अपनी चौकी पर ललित मुद्रा में खड़ा है जिसमें किसी प्रकार का आयास नहीं है। शिल्पी को यष्टि और मस्तक के ऊर्ध्व छन्द का तक्षण करने में पूरी सफलता मिली है।

मौर्यकालीन कला

रामपुरवा सिंहशीर्ष स्तम्भ – यह लौरियानन्दनगढ़ सिंहशीर्ष स्तम्भ के सदृश है। इसमें भी वही तीन अंग हैं अर्थात् सिंह, हंस पंक्ति और अवांगमुख कमल। सिंहमूर्ति चौकी पर स्वाभाविक मुद्रा में आसीन है और उसके अंगों में परस्पर अनुपातगत साम्य या समविभक्तता है। कुछ लोग इसे सारनाथ के सिंहों से भी अधिक लययुक्त मानते हैं।

मौर्यकालीन कला

लौरियानन्दनगढ़ सिंहशीर्ष स्तम्भ इस शीर्षक पर उकड़ूँ या उठंग मुद्रा में बैठा हुआ सिंह दिखाया गया है। इसकी गोल चौकी पर हंसपंक्ति अंकित है जैसी रामपुरवा सिंहशीर्ष स्तम्भ पर है। इस पर अंड के नीचे अवांगमुख कमल है। मौज पत्तियों के ऊपर मेखला बंधन है और नीचे के भाग में दुहरी काँधनी (कायबंधन) है। सिंह की आकृति बलिष्ठ और प्रभावशाली है, तो भी इसका भाव कुछ रूढ़िग्रस्त है।

मौर्यकालीन कला

साँची सिंह शीर्ष स्तम्भ – साँची का सिंह शीर्ष स्तम्भ सारनाथ के सिंह शीर्ष स्तम्भ से मिलता-जुलता है। दोनों पर चार सिंह हैं जो पीठ से पीठ सटाये हुए बैठे हैं। ये एक गोल फलक (अंड) पर विराजमान है। इस फलक पर चुगते हुए हंसों की पंक्ति है जो कि रामपुरवा सिंह शीर्ष के फलक सदृश है। साथ ही यह भी ध्यान देने की आवश्यकता है कि साँची की उकेरी अधिक रूढ़िग्रस्त है इसलिये विद्वानों के अनुसार साँची का चतुर्सिंह शीर्ष स्तम्भ सारनाथ चतुर्सिंह शीर्ष स्तम्भ का परवर्ती है।

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सारनाथ सिंहशीर्ष स्तम्भ – इन सभी स्तम्भशीर्षों में सारनाथ के स्तम्भ का सिंहशीर्ष (Lion-Capital) सर्वोत्कृष्ट है। इस स्तम्भ के निम्नलिखित भाग हैं :—

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१- बिना माठा हुआ नीचे का बुनियादी पत्थर जिसके ऊपर स्तम्भयष्टि खड़ी की गयी। इसके चौकोर छेद में स्तम्भ का कुछ भाग बैठाया गया था ।

२- स्तम्भ की यष्टि या ऊँची गावदुम लाट (Tapering shaft)।

३- पूर्णघट जिसमें बड़ा और प्रफुल्लित पद्मकोष है जिसकी लहराती हुई पंखुड़ियाँ या मौजपत्ते बाहर की ओर लहरा रहे हैं।

४- गोल अंड या चौकी जो दिक्मंडल या चक्रवाल की आकृति की है। उस पर चार महा आजानेय पशु और चार छोटे चक्र अंकित हैं। ये चारों पशु दक्षिणावर्त (clockwise) दिशा में चलते हुए दर्शाये गये हैं। भारतीय राजचिह्न में में हमें दो पशु दिखायी देते है – वृषभ और अश्व। इन चार पशुओं का दक्षिणावर्त दिशा में क्रम है — वृषभ, अश्व, सिंह और गज। इन चार चक्रों में से प्रत्येक चक्र में २४ तीलियाँ हैं।

५- चार सिंह जो पीठ सटाए उकड़ूँ बैठे हैं।

६- महाचक्र। यह चक्र खंडित है। इसकी पुनर्निर्मित रूप प्रदर्शित है। इस महाचक्र में ३२ तीलियाँ हैं।

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इसके फलक पर चार सिंह पीठ से पीठ सटाये हुए तथा चारों दिशाओं की ओर मुँह किये हुए दृढ़तापूर्वक बैठे हैं। सिंहों के तने हुए शरीर की मांसपेशियों, लहराते हुए अयाल (केश) तथा गठीले अंग-प्रत्यंग अत्यन्त सूक्ष्मता एवं चतुरता के साथ बनाये गये हैं। ये चक्रवर्ती सम्राट अशोक की शक्ति के प्रतीक हैं। इनसे चारों दिशाओं में उसके राज्य तथा धर्म के प्रचार की सूचना मिलती है अथवा इन्हें शाक्य-सिंह महात्मा बुद्ध की शक्ति का प्रतीक माना जा सकता है जो जन्मना चक्रवर्ती थे।

सिंहों के मस्तक पर “महाधर्मचक्र” स्थापित था जिसमें मूलत ३२ तीलियाँ (Spokes) थीं। यह शक्ति के ऊपर “धर्म की विजय” का प्रतीक है जो बुद्ध तथा अशोक दोनों के व्यक्तित्व में दिखाई देता है।

सिंहों के नीचे के फलक पर चारों दिशाओं में चार चक्र बने हुए हैं जो “धर्मचक्रप्रवर्तन” के प्रतीक है। इसी पर चार पशुओं — गज, अश्व, वृषभ तथा सिंह की आकृतियाँ उत्कीर्ण की गयी हैं जिन्हें चलती हुई अवस्था में दिखाया गया है।

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इन चार पशुओं के प्रतीकात्मक अर्थ के विषय में अनेक मत दिये गये हैं।

  • वोगेल का विचार है कि ये अलंकरण की वस्तु मात्र हैं जिनका कोई प्रतीकात्मक अर्थ नहीं है।
  • ब्लाख ने इन्हें चार हिन्दू देवताओं — इन्द्र, सूर्य, शिव तथा दुर्गा का प्रतीक माना है क्योंकि हिन्दू धर्म में हाथी इन्द्र का, अश्व सूर्य का, वृषभ शिव का तथा सिंह दुर्गा का वाहन माना गया है। उनके अनुसार इनके अंकन के पीछे शिल्पी का उद्देश्य यह था कि इन्हें बुद्ध के वशवर्ती दिखाया जाय।
  • फूशे की धारणा है कि ये पशु महात्मा बुद्ध के जीवन की चार महान् घटनाओं का प्रतिनिधित्व करते हैं। तदनुसार —
    • हाथी उनके गर्भस्थ होने जिसमें उनकी माता माया ने एक श्वेत हाथी को स्वर्ग से उतर कर अपने गर्भ में प्रविष्ट होते हुए देखा था।
    • वृषभ जन्म का (बुद्ध की राशि वृष थी)।
    • अश्व गृह-त्याग का।
    • सिंह बुद्ध का प्रतीक है (जो स्वयं में शाक्य सिंह थे)।
  • वी० एस० अग्रवाल की मान्यता है कि इन पशुओं को किसी संकीर्ण दायरे में सीमित करना उचित नहीं प्रतीत होता क्योंकि इनकी परम्परा सिन्धु घाटी से लेकर वर्तमान शती तक मिलती है। भारत के बाहर लंका, बर्मा, श्याम, तिब्बत आदि में भी इनका अंकन मिलता है।
  • महावंश में इन्हें “चतुष्पद पक्ति” कहा गया है।
  • वाल्मीकि रामायण में इनकी गणना उन मांगलिक द्रव्यों में की गयी है जिन्हें भगवान श्रीराम के अभिषेक के अवसर पर मँगाया गया था।
  • रीतिकालीन कवि केशवदास (सत्रहवीं शती) ने राम के राजमहल के चार द्वारों के रक्षक के रूप में इन पशुओं का उल्लेख किया है।

इस प्रकार यह स्पष्ट हो जाता है कि लोक भावना में इन चार पशुओं को मंगल सूचक माना जाता था और अब भी माना जाता है। हिन्दू तथा जैन परम्परा में भी इन चारों पशुओं को मांगलिक द्रव्यों में स्थान दिया गया है।

बौद्ध परम्परा में ये चारों पशु ब्रह्माण्ड के प्रतीक अनवतप्त सरोवर, जिसमें बुद्ध ने स्नान किया था, के चार द्वारों के रक्षक कहे गये है जहाँ से चार महानदियाँ निकलती हैं। प्रत्येक पशु का सम्बन्ध एक-एक चक्र से है। चक्र प्राणरूपी पुरुष है। इस प्रकार प्रत्येक युग्म ‘पुरुष-पशु’ का प्रतीक है। प्रथम दैवी शक्ति तथा द्वितीय भौतिक तत्व का प्रतीक है।

इस प्रकार ये सभी चित्र अत्यन्त आकर्षक एवं सुन्दर है। मार्शल के शब्दों में “सारनाथ का सिंहशीर्ष यद्यपि अद्वितीय तो नहीं है तथापि तृतीय शताब्दी ईसा पूर्व में संसार में कला का जितना विकास हुआ था, उसमें यह सर्वाधिक विकसित कलाकृति है। इसके शिल्पी को पीढ़ियों का अनुभव प्राप्त था।”*

“The Sarnath capital, though by no means a masterpiece, is the product of the most developed art of which the world was cognizant in the third century B.C. — the handiwork of one who had generations of efforts and experience behind him.”* —THE CAMBRIDGE HISTORY OF INDIA, VOLUME I, P. 562.

इसी तरह स्मिथ ने इनकी प्रशंसा में लिखा है “शिल्पी की निपुणता सबसे अधिक पूर्णता को प्राप्त हो गयी तथा आज बीसवीं शती में भी कला का ऐसा प्रदर्शन असंभव है। तीस-चालीस फुट ऊँचे स्तम्भों की यष्टियाँ ऐसी प्रभा से मण्डित है जिसका रहस्य आज भी विश्व का कोई देश नहीं जानता।”

स्तूप

स्तूप का विकास :-

महात्मा बुद्ध के महापरिनिर्वाण के बाद उनकी अस्थियों को आठ भागों में बाँटा गया तथा उन पर समाधियों का निर्माण किया गया। सामान्यतः इन्हीं को स्तूप कहा जाता है। स्तूप के निर्माण की प्रथा बुद्ध काल के पूर्व से चली आ रही थी।

‘स्तूप’ संस्कृत के ‘स्तुप्’ धातु से बना है जिसका अर्थ है एकत्र करना या ‘ढेर’ लगाना। इसके लिये प्राकृत शब्द ‘थूप’ मिलता है। ‘स्तुप’ का शब्दिक अर्थ होता है ‘ढेर’ अथवा ‘थूहा’।

चूँकि यह चिता के स्थान पर बनाया जाता था, अतः इसका एक नाम ‘चैत्य’ भी हो गया। ‘चैत्य’ शब्द ‘चि’ धातु से निकला है जिसका अर्थ है चयन करना। इसमें पत्थर या ईंट चुनकर भवन तैयार किये जाते थे (चीयते पाषार्णादिना इति चेत्यम्)। इस शब्द का सम्बन्ध ‘चित्’ तथा ‘चिता’ से भी है।

स्तूप तथा चैत्य में मुख्य भेद यह दिखायी देता है कि चैत्य पर्वत गुफाओं में खोदा जाता था। इसमें स्तूप का आकार वर्तमान रहता था तथा उसमें अवशेष नहीं रखे जाते थे। इसके विपरीत स्तूप के भीतरी भाग में पात्र में अवशेष रखकर भवन बनाया जाता था। स्तूप समतल भूमि में ईंट-पत्थर की सहायता से बनाये जाते थे।

‘स्तूप’ का उल्लेख सर्वप्रथम ऋग्वेद में प्राप्त होता है जहाँ अग्नि की उठती हुई ज्वालाओं को स्तूप कहा गया है। शुक्ल यजुर्वेद में समाधि के चारों ओर मिट्टी का ऊँचा टीला बनाने की बात कही गयी है। इसका उद्देश्य श्मशान की पवित्रता बनाये रखना था। शतपथ ब्राह्मण से पता चलता है कि मृत व्यक्ति की शरीर धातु पर मिट्टी का चौकोर तथा गोल थूहा बनाया जाता था। सूत्र काल में अस्थिकलश में शरीर धातु को रखकर जमीन में गाड़ने तथा उसके ऊपर ऊँचा टीला बनाने की प्रथा थी। रामायण से ज्ञात होता है कि महापुरुषों तथा सम्राटों की स्मृति में चैत्य (स्तूप) निर्मित किये जाते थे।

अस्तु गौतम बुद्ध के पहले ही स्तूप का सम्बन्ध महापुरुषों के साथ जुड़ गया था। महात्मा बुद्ध ने स्वयं महापुरुषों की शरीर धातु पर समाधि बनाने को कहा था। उन्हें चक्रवर्ती राजाओं की समाधि का ज्ञान था। इसी कारण उन्होंने अपने प्रिय शिष्य आनन्द को चौराहे पर स्तूप निर्मित करने का आदेश दिया था।

ऐसा प्रतीत होता है कि अपने मौलिक स्वरूप में स्तूप का सम्बन्ध मृतक-संस्कार से था। शव-दाह के बाद बची हुई अस्थियों को किसी पात्र में रखकर मिट्टी से ढँकने की प्रथा से स्तूप का जन्म हुआ। कालान्तर में बौद्धों ने इसे अपनी संघ-पद्धति में अपना लिया। इन स्तूपों में महात्मा बुद्ध अथवा उनके प्रमुख शिष्यों को धातु रखी जाती थी, अतः वे बौद्धों की श्रद्धा और उपासना के प्रमुख केन्द्र बन गये।

स्तूप के प्रकार :- स्तूप चार प्रकार के बताये गये हैं —

  • एक; शारीरिक : इनमें महात्मा बुद्ध अथवा उनके प्रमुख शिष्यों की अस्थियाँ तथा उनके शरीर के विविध अंग (दन्त, नख, केश आदि) रखे जाते थे।
  • द्वितीय; पारिभौगिक : इनमें बुद्ध द्वारा उपयोग में लायी गयी वस्तुयें (भिक्षा पात्र, चरण-पादुका, आसन आदि) रखी जाती थीं।
  • तृतीय; उद्देशिक : इनमें वे स्तूप आते थे जिन्हें महात्मा बुद्ध के जीवन की घटनाओं से संबन्धित अथवा उनकी यात्रा से पवित्र हुए स्थानों पर स्मृति रूप में निर्मित किया जाता था। ऐसे स्थान बोधगया, लुम्बिनी, सारनाथ, कुशीनगर आदि है।
  • चतुर्थ; संकल्पित : ये छोटे आकार के होते थे और इन्हें बौद्ध तीर्थ स्थलों पर श्रद्धालुओं द्वारा स्थापित किया जाता था। बौद्ध धर्म में इसे पुण्य का काम बताया गया है।

स्तूप के अंग :-

स्तूप का प्रारम्भिक रूप अर्ध-गोलाकार (Hemispherical) मिलता है। इसमें एक चबूतरे (मेधि)) के ऊपर उल्टे कटोरे की आकृति का एक थूहा बनाया जाता है जिसे ‘अंड’ कहते हैं। स्तूप की चोटी सिरे पर चपटी होती थी जिसके ऊपर ‘धातु-पात्र’ रखा जाता था। इसे ‘हर्मिका’ कहते हैं। यह स्तूप का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण भाग होता था। हर्मिका का अर्थ देवसदन अथवा देवताओं का निवास स्थान होता है। हर्मिका के बीच में एक यष्टि लगायी जाती थी। यष्टि के ऊपरी आष्टन सिरे पर तीन छत्र लगाये जाते थे। स्तूप को चारों ओर से बाड़ अथवा दीवाल से घेर दिया जाता था। इसे वेदिका या वेष्टिनी (Railing) कहते हैं। स्तूप तथा वेदिका के बीच परिक्रमा करने के लिये जो खाली स्थान होता था उसे ‘प्रदक्षिणापथ’ कहा जाता था। कालान्तर में वेदिका के चारों दिशाओं में प्रवेशद्वार बनाये गये। प्रवेशद्वार पर मेहराबदार तोरण बनाये जाते थे।

मौर्यकालीन कला

इस प्रकार मेधि, वेदिका, अंड, प्रदक्षिणापथ, हर्मिका, युष्टि, क्षत्र, तोरण इत्यादि स्तूप वास्तु के प्रमुख अंग होते थे। बी० एस० अग्रवाल ने स्तूप को त्रिलोक का प्रतीक बताया है। उनकी मान्यता है कि प्रदक्षिणापथ, मेधि और हर्मिका की वेदिकायें क्रमशः पृथ्वी, अन्तरिक्ष तथा द्युः (आकाश) की घोतक है। अग्रवाल महोदय स्तूप वास्तु की तुलना वैदिककालीन यज्ञीय यूप-वास्तु से करते हुए इसे विविध अंगों; यथा – मेधि, अण्ड, हर्मिका तथा छत्र को क्रमशः पितृ लोक, मनुष्य लोक, देवलोक तथा साध्य देवों के प्रतीकात्मक अंगों से समीकृत करते हैं जो कालान्तर में हिन्दू मन्दिरों के चार अंगों — जंगली, गर्भगृह, शिखर तथा आमलक के रूप में व्यक्त हुई है।

मौर्य युग के पूर्व महात्मा बुद्ध के शरीर धातु पर निर्मित कराये गये आठ स्तूपों में से एकमात्र ‘पिपरहवा स्तूप’ के अवशेष ही प्राप्त हुए हैं। स्तूप निर्माण का वास्तविक कार्य अशोक के समय में प्रारम्भ हुआ तथा स्तूपों का विस्तार सम्पूर्ण देश में किया गया। बौद्ध परम्परा सम्राट अशोक को ८४,००० स्तूपों के निर्माण का श्रेय प्रदान करती है।

  • धर्मराजिका स्तूप, सारनाथ
  • धर्मराजिका स्तूप, तक्षशिला
  • साँची का स्तूप, रायसेन
  • भरहुत का स्तूप, सतना

सातवीं शताब्दी ईस्वी के चीनी यात्री ह्वेनसांग ने तक्षशिला, श्रीनगर, थानेश्वर, मथुरा, कन्नौज, प्रयाग, कौशाम्बी, श्रावस्ती, वाराणसी, सारनाथ, वैशाली, गया, कपिलवस्तु आदि स्थानों में इन स्तूपों को देखा था। परन्तु दुर्भाग्यवश आज ये सभी नष्ट हो चुके हैं।

प्रारम्भिक स्तूपों में साँची का स्तूप-समूह प्रसिद्ध है। साँची की पहाड़ी, मध्य प्रदेश के रायसेन जनपद मुख्यालय से २५ किलोमीटर की दूरी पर ऐतिहासिक नगरी विदिशा के समीप स्थित है। १८१८ ई० में सर्वप्रथम जनरल रायलट ने यही के स्मारकों की खोज की थी। १८८८ ई० में मेजर कोल ने पहाड़ी के ऊपर का जंगल साफ करवाया तथा स्तूप संख्या-१ को भरवाने के साथ ही उसके दक्षिणी-पश्चिमी तोरण द्वारों तथा स्तूप के तीन गिरे हुए तोरणों को पुनः खड़ा करवाया था। यहाँ से एक बड़ा तथा दो छोटे स्तूप मिले है। मार्शल के अनुसार महास्तूप का निर्माण सम्राट अशोक के शासनकाल में हुआ था। यह ईंटों का बना था जिसके चारों ओर लकड़ी का बाड़ (Railings) लगायी गयी थी।

इसके अतिरिक्त सारनाथ तथा तक्षशिला स्थित ‘धर्मराजिका स्तूप’ का निर्माण भी मूलतः सम्राट अशोक के समय में ही करवाया गया था जिन्हें परवर्ती शासकों ने सम्वर्धित करवाया। मौर्यकालीन स्तूप ईंटों के बने थे। सारनाथ स्थित ‘धर्मराजिका स्तूप’ के चारों ओर छोटे-छोटे पूजा के लिये स्तूप बनवाये गये थे जिनके ध्वंसावशेष मिलते हैं। उसी के पास सम्राट अशोक का सिंह-शीर्ष स्तम्भ लेख है। दोनों स्तूपों के ध्वंसावशेष यह सूचित करते है कि इनका आकार काफी विशाल रहा होगा।

भरहुत के स्तूप (सतना, म०प्र०) का निर्माण भी मूलतः सम्राट अशोक ने करवाया था।

पाषाण वेदिका

मौर्यकालीन स्तूप तथा विहार वेदिकाओं (Railings) से घिरे होते थे। इनमें से कुछ के भग्नावशेष प्राप्त हुए हैं। सम्राट अशोक अपने रुम्मिन्देई (लुम्बिनी) स्तम्भ लेख में स्वयं कहते हैं कि उसने पत्थर की विशाल दीवार (शिला विगड भीचा) बनवायी थी। ‘घोसुण्डी लेख’ में इस प्रकार के बाड़े को ‘प्रकार’ कहा गया है। बोधगया से एक वेदिका के अवशेष मिले हैं। इनका निर्माण सम्राट अशोक के समय में हुआ था। इसे ‘बोधिमण्ड’ कहा जाता है। वेदिका के खम्भों तथा उनके जोड़ने वाली लम्बी पाषाण शिलापट्टिकाओं पर कमल की आकृति बनी है। कहीं-कहीं अश्व, हाथी, मकर आदि की आकृतियाँ भी उत्कीर्ण मिलती है।

सारनाथ से भी सम्राट अशोक के समय की एक पाषाण वेदिका मिली है। इसे एक ही पत्थर में काटकर चौकोर बनाया गया है। इसके दो स्तम्भों के बीच में तीन सूचियाँ है तथा स्तम्भों के ऊपर उष्णीश हैं। यह आकर्षक, सुन्दर एवं चिकनी है।

पाटलिपुत्र को खुदाई से तीन वेदिकाओं के टुकड़े मिले है जो अपनी चमकीली पॉलिश के कारण मौर्यकालीन माने जाते हैं।

साँची से मौर्ययुगीन स्तूप की ईंटों के अतिरिक्त पाषाण का एक खण्डित छत्र भी प्राप्त होता है। पाषाण वेदिकाओं के अवशेष इस बात के प्रमाण है कि इस समय वास्तु में पत्थर का प्रयोग प्रारम्भ हो गया था।

गुहा-विहार

सम्राट अशोक ने वास्तुकला के क्षेत्र में एक “नयी शैली” का आरम्भ किया जिसके तहत चट्टानों को काटकर ‘कंदराओं’ का निर्माण किया गया। सम्राट अशोक और उनके पौत्र दशरथ के समय में बराबर तथा नागार्जुनी की पहाड़ियों को काटकर आजीविकों के लिये आवास बनाये गये थे। इन गुफाओं को छतों और दीवारों पर चमकीली पॉलिश है।

बराबर-नागार्जुनी समूह की गुफाएँ (जहानाबाद, बिहार)

बराबर पहाड़ी

  • सुदामा की गुफा
  • विश्व झोपड़ी की गुफा या विश्वकर्मा की गुफा
  • कर्ण चौपड़ की गुफा
  • लोमश ऋषि की गुफा

नागार्जुनी पहाड़ी

    • गोपी की गुफा
    • वहियक की गुफा
    • वडियक की गुफा

सम्राट अशोक के समय बराबर पहाड़ी की गुफाओं में ‘सुदामा की गुफा’ (न्यग्रोथ गुफा) तथा ‘कर्ण चौपड़ की गुफा’ सर्वप्रसिद्ध है। ‘सुदामा की गुफा’ का निर्माण अशोक ने अपने शासन-काल के १२वें वर्ष में तथा ‘कर्ण चौपड़ की गुफा’ का १९वें वर्ष में करवाया था।

‘सुदामा की गुफा’ में दो कोष्ठ है। इनकी छत ढोलाकार है। दोनों कोष्ठों की दीवारों तथा छतों पर शीशे के समान चमकीली पॉलिश है। इससे सूचित होता है कि इस गुफा का निर्माण सम्राट अशोक के समय में ही की गयी थी।

सम्राट दशरथ के समय बनी गुफाओं में ‘लोमश ऋषि’ नाम की गुफा उल्लेखनीय है। यह बराबर-समूह की सबसे प्रसिद्ध गुफा है जिसका वास्तु-विन्यास सुदामा की गुफा के ही समान है। अन्तर केवल यही है कि इसका आन्तरिक कोष्ठ वर्गाकार न होकर अण्डाकार है। इसका निर्माण कार्य बड़ी सावधानी से हुआ है तथा यह कालान्तर के चैत्यगृहों के अग्रभाग को सुसज्जित करने वाले अलंकरणों की वृहद् योजना के प्रारम्भ का प्रतिनिधित्व करने की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है।*

“The façade of the Lomasa Rishi cave at Barabar has been finished with great care and is important as representing the beginnings of the elaborate scheme of ornamentation that characterised the decoration of the façades in the chaitya halls of later days. Possibly it is copied from structural examples.”* — P. 297-298; THE AGE OF IMPERIAL UNITY.

‘लोमश ऋषि की गुफा’ का प्रवेशद्वार सर्वोत्तम है। दोनों पंखों पर तिरछे खड़े दो स्तम्भ है जिनके ऊपर गोल मेहराब बने हुए है। इनके बीचों-बीच एक स्तूप तथा दोनों किनारों पर हाथियों की आकृतियाँ उत्कीर्ण है। हाथी स्तूप की पूजा करते हुए दिखाये गये हैं।

बराबर पहाड़ी की चौथी गुहा को ‘विश्व झोपड़ी’ कहा जाता है। इसका निर्माण भी सम्राट अशोक के शासन काल के १२वें वर्ष हुआ था। इसमें दो कोष्ठ हैं। इसकी दीवारों पर चमकीली पॉलिश मिलती है।

नागार्जुनी पहाड़ी पर कुल तीन गुफायें खोदी गयी है। नागार्जुनी समूह में “गोपिका गुफा” महत्त्वपूर्ण है जिसे सम्राट दशरथ ने अपने राज्याभिषेक के वर्ष में बनवाया था। यह सुरंग के आकार की है जिसके दोनों सिरों पर दो गोल-मण्डप बने हुए हैं। इनमें एक गर्भगृह तथा दूसरा मुखमण्डप जान पड़ता है। इसमें मौर्यकालीन गुहा स्थापत्य को सभी विशेषतायें प्राप्त होती है। दूसरी “वहियक” तथा तीसरी “वडघिक” या “वडियक” नाम से जानी जाती है।

वहियक में केवल एक ही प्रकोष्ठ हैं जिसके सम्मुख छोटा मुखमण्डप बना है।

तीसरी अर्थात् वडघिक गुफा भी लम्बाई में वहियक के समान हैं किन्तु इसकी दीवारें वक्राकार हैं।

इन सभी तीनों गुफाओं (गोपिका, वहियक और वडियक) का निर्माण दशरथ के समय में करवाया गया था।

इनके अतिरिक्त राजगृह से १३ मील (≈ २१ किलोमीटर) की दूरी पर स्थित “सीतामढ़ी गुफा” है। यह किसी पहाड़ी पर नहीं है अपितु इसे स्वतंत्र रूप से ग्रेनाइट पत्थर को भीतर खोदकर बनाया गया है। इसमें आयताकार कक्ष तथा दो द्वार स्तम्भ हैं। इसे भी मौर्यकालीन माना जाता है।

इस प्रकार मौर्य युग में गुहा-स्थापत्य का पूर्ण विकास हुआ। कालान्तर में इन्हीं गुफाओं के अनुकरण पर पश्चिमी भारत में अनेक चैत्यगृहों का निर्माण किया गया।

मूर्ति-कला

मौर्ययुगीन मूर्तिकला के सर्वोत्तम नमूने अशोक स्तम्भों को मण्डित करने वाली विभिन्न पशुओं की आकृतियों में दर्शनीय है।

उड़ीसा की धौली चट्टान को काटकर बनायी गयी हाथों की आकृति पाषाण मूर्तिकला की उत्कृष्टता को सूचित करती है। हाथी अत्यन्त विशाल आकार का है जिसके अग्रभाग को उकेरा गया है। उसके सूँड़, पैर आदि की गढ़न अत्यन्त स्वाभाविक है। ऐसा प्रतीत होता है कि यह अपनी सूँड़ में कोई वस्तु लपेट कर उठा रहा है। हाथी चट्टान से बाहर निकलते हुए जान पड़ता है।

इसी प्रकार कालसी (देहरादून, उत्तराखंड) की चट्टान पर एक हाथी की आकृति खुदी हुई मिलती है। हाथी के पैरों के बीचों-बीच मौर्यकालीन ब्राह्मी लिपि में ‘गजतमे’ (गजोत्तमः) अर्थात् सर्वोत्तम हाथी खुदा हुआ है। हाथी को दोनों ही आकृतियाँ उत्कीर्ण (Relief) मूर्तिकला का सुन्दर उदाहरण प्रस्तुत करती हैं।

मौर्यकालीन कला

लोककला

जहाँ एक ओर राजकीय संरक्षण में कला का विकास हुआ वहीं दूसरी ओर मौर्ययुगीन कलाकारों ने लोकरुचि की वस्तुओं का भी निर्माण किया। इनका तत्कालीन सामाजिक-धार्मिक जीवन में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण स्थान था। लोककला के अन्तर्गत हम सर्वप्रथम विभिन्न स्थानों से मिली हुई पाषाण निर्मित विशालकाय यक्ष-यक्षिणी प्रतिमाओं का उल्लेख कर सकते हैं। इनका विवरण इस प्रकार है-

  • मथुरा जनपद के परखम ग्राम से मिली यक्ष मूर्ति जिसे ‘मणिभद्र’ कहा गया है। इसकी चौकी पर एक लेख है, जिसमें इसे [म]निभद (=मणिभद्र) संज्ञा दी है।
  • मथुरा जनपद के बड़ोदा ग्राम से मिली यक्ष-प्रतिमा।
  • मथुरा के झींग-का-नगरा ग्राम से प्राप्त यक्षी की प्रतिमा।
  • मथुरा से प्राप्त यक्ष प्रतिमा।
  • भरतपुर जनपद में नोह ग्राम से प्राप्त यक्ष या जाख।
  • पद्‌मावती (ग्वालियर, मध्य प्रदेश) से प्राप्त यक्ष-प्रतिमा।
  • पटना नगर में दीदारगंज से प्राप्त चामर ग्राहिणी यक्षी की प्रतिमा।
  • पटना से प्राप्त दो यक्ष प्रतिमायें।
  • बेसनगर (विदिशा) से प्राप्त यक्षी की प्रतिमा जिसका स्थानीय नाम ‘तोलन’ है।
  • वेसनगर में बेस और बेतवा (वेत्रवती) के संगम से प्राप्त यक्ष प्रतिम।
  • राजघाट (वाराणसी) से प्राप्त त्रिमुख यक्ष की प्रतिमा।
  • विदिशा से प्राप्त यक्ष-प्रतिमा।
  • सूर्पारक से प्राप्त यक्ष की प्रतिमा।
  • शिशुपालगढ़ (ओडिशा) से प्राप्त यक्ष प्रतिमायें।
  • कुरुक्षेत्र में आमींन से प्राप्त यक्ष-प्रतिमा।
  • मेहरौली से प्राप्त यक्षी की प्रतिमा।

मौर्यकालीन कला

शैली

  • ये मूर्तियाँ महाकाय या महाप्राण हैं और मांसपेशियों की बलिष्ठता और दृढ़ता उनमें प्रत्यक्ष है।
  • ये मूर्तियाँ चतुर्मुख दर्शन के आधार पर बनायी गयी हैं। वे पृथक रूप से खड़ी हैं। परन्तु उनके दर्शन का प्रभाव सम्मुखीन है मानो कि उनको ‘सम्मुख-दर्शन’ के लिये ही निर्मित गया हो।
  • इन मूर्तियों का भेस है — सिर पर पगड़ी, कन्धों और भुजाओं पर उत्तरीय जिसका बन्धन छाती पर भी दिखाया जाता है, नीचे धोती पहिने जो कटि में कायबन्धन या मेखला से बँधी है।
  • इनके आभूषण हैं — कानों में भारी कुंडल, गले में भारी कंठा (ग्रैवेयक), छाती पर चपटा तिकोना हार, बाहुओं पर अंगद।
  • मूर्तियों को थोड़ा स्थूल या घटोदर दिखाया है; जैसे परखम और पवैया की मूर्तियों में।

उपर्युक्त सभी प्रतिमायें विशाल आकार-प्रकार की है जिन्हें सभी ओर से तराशकर तैयार किया गया है। इनके शरीर पर वस्त्र तथा आभूषण अत्यन्त मनोहर हैं। ये मूतियाँ महाकाय या अतिमानवीय हैं और मांसपेशियों की बलिष्ठता और दृढ़ता उनमें जीवंत रूप में व्यक्त हुई है। वे पृथक् रूप से खड़ी हैं पर उनके दर्शन का प्रभाव सम्मुखीन हैं, मानो शिल्पी ने उन्हें सम्मुख दर्शन के लिये ही बनाया हो।

इन मूर्तियों का वेश है सिर पर पगड़ी, कंधों और भुजाओं पर उत्तरीय, नीचे धोती जो कटि में मेखला से कायबंधन से बंधी है। कानों में भारी कुंडल, गले में कंठा, छाती पर तिकोना हार और बाहुओं पर अंगद है। मूतियों को थोड़ा घटोदर दिखाया गया है जैसे परखम की मूति में देखने को मिलता है।

समय निर्धारण

विद्वानों का विचार है कि इन्हीं यक्ष-यक्षी प्रतिमाओं के आधार पर कालान्तर में बुद्ध, बोधिसत्व तथा जैन तीर्थंकरों की विशाल मूर्तियों का निर्माण किया गया था। यक्ष-यक्षी प्रतिमायें लोकधर्म का प्रमुख आधार थीं। इन्हें सर्वत्र देवी-देवताओं के रूप में पूजा जाता था।

इन मूर्तियों के अतिरिक्त पटना के निकट लोहानीपुर से दो जैन दिगम्बरों की प्रतिमाओं के धड़ तथा सारनाथ से दो पुरुष मूर्तियों के मसाक प्राप्त होते हैं जिनकी चिकनी पॉलिश तथा चुनार के बलुए पत्थर के आधार पर इन्हें मार्शल, आर० पी० चन्द्रा, कुमारस्वामी आदि विद्वानों ने मौर्यकालीन बताया है। इसी प्रकार सारनाथ, अहिच्छत्र, मथुरा, हस्तिनापुर, कौशाम्बी, बुलन्दीबाग, बसाढ़, कुम्हराहार आदि अनेक स्थानों से विभिन्न पशु-पक्षियों जैसे हाथी, घोड़ा, वृषभ, भेड़, कुत्ता, हरिण, पक्षियों तथा नर-नारियों की बहुसंख्यक मिट्टी की मूर्तियाँ मिली हैं जिन्हें हाथ से साँचे में ढालकर बनाया गया है। इन मृण्मूर्तियों को भी विद्वान् मौर्यकालीन मानते है।

परन्तु नीहार रंजन राय उपर्युक्त मूर्तियों को उनकी कल्पना तथा शैली के आधार पर मौर्य-युग का नहीं मानते हैं। उनके अनुसार “पत्थर पर शीशे की तरह चमकीली पॉलिश लगाने को कला मौर्य कलाकारों ने हखामनियों से सीखी थी। मौर्य साम्राज्य के पतन के बाद भी यह कला जीवित रही तथा शिल्पी कुछ समय बाद तक चुनार के पत्थरों का ही प्रयोग करते रहे। अतः पूर्ण आकार की साँचे में ढली हुई गोल मूर्तियाँ भारतीय कला के भिन्न-भिन्न स्तरों से सम्बन्धित है। ये सभी आकार-प्रकार, शैली तथा बनावट में भारतीय है और मौर्यों की दरबारी कला से उनका कोई सम्बन्ध नहीं है।”

“These life size, plastically round statues belong to different aspects and phases of Indian art. They are all Indian in form and appearance, in style and treatment, and they have hardly any relation with the court-art of the Mauryas.” — p. 53; Maurya and Shunga Art.

मौर्यकालीन धार्मिक दशा (The Mauryan Religious Life)

मौर्यकालीन अर्थव्यवस्था (The Mauryan Economy)

मौर्यकालीन समाज

मौर्य प्रशासन

मौर्य साम्राज्य का पतन (Downfall of the Mauryan Empire)

अशोक के उत्तराधिकारी (The Successors of Ashoka)

अशोक के अभिलेख

अशोक शासक के रूप में

अशोक का मूल्यांकन या इतिहास में अशोक का स्थान

अशोक की परराष्ट्र नीति

अशोक का साम्राज्य विस्तार

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कलिंग युद्ध : कारण और परिणाम (२६१ ई०पू०)

अशोक ‘प्रियदर्शी’ (२७३-२३२ ई० पू०)

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