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जाति-प्रथा की उत्पत्ति और विकास

भूमिका जिस कर्म आधारित वर्ण व्यवस्था की आधारशिला वैदिक काल में पड़ी थी कालान्तर में उसकी परिणति जन्माधारित जाति व्यवस्था में हुई। दूसरे शब्दों में जहाँ वर्ण व्यवस्था कर्म पर आधारित थी वहीं जाति व्यवस्था विशुद्ध रूप से जन्म पर आधारित है। जाति शब्द ‘जन्’ से व्यूत्पन्न हुआ है जिसका अर्थ...

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भारतीय संस्कार व्यवस्था

भूमिका ’संस्कार’ शब्द का अर्थ है – परिष्कार, पवित्रता या शुद्धता। भारतीय चिंतकों ने संस्कारों की व्यवस्था शरीर को परिष्कृत या संस्कारित करने के उद्देश्य से की है जिससे वह वैयक्तिक और सामाजिक रूप से योग्य बन सके। शबर मुनि के शब्दों में — ‘संस्कार वह क्रिया है जिसके संपन्न होने...

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भारतीय पुरुषार्थ व्यवस्था और उसकी सामाजिक उपादेयता एवं महत्त्व

भूमिका ‘पुरुषैर्थ्यते इति पुरुषार्थः’ अर्थात् ‘पुरुषार्थ’ का तात्पर्य पुरुष के लिए जो अर्थपूर्ण है, अभीष्ट है, उसको प्राप्त करने के लिए प्रयास करना ही पुरुषार्थ है। एक विवेकशील मनुष्य इन्हीं उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए प्रयत्नशील रहता है। इनकी संख्या चार है अतः इन्हें ‘पुरुषार्थचतुष्ट्य’ कहा गया है। पुरुषार्थ दो शब्दों...

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आश्रम व्यवस्था

भूमिका आश्रम शब्द की व्युत्पत्ति ‘श्रम’ धातु से हुई है जिसका अर्थ है – ‘परिश्रम अथवा प्रयास करना।’ अतः आश्रम वह स्थान है जहाँ पर प्रयास किया जाये। ‘इस प्रकार आश्रम व्यवस्था से अभिप्राय एक ऐसी व्यवस्था से है जिसमें व्यक्ति की जीवनयात्रा में कुछ सोपान या चरण निर्धारित किये गये...

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प्राचीन भारत में ‘दास प्रथा’

परिचय दास विधिक रूप से किसी अन्य व्यक्ति के स्वामित्व में होता है और अपने स्वामी के लिए काम करने के लिए बाध्य है। दास अपने निर्णय स्वयं नहीं ले सकता। दास होने की अवस्था ही ‘दास-प्रथा’ कहलाती है। अब तक जितनी संस्कृति और सभ्यताएँ हुई हैं उन सबमें यह प्रथा...

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प्राचीन भारतीय सम्वत्

प्राचीन भारतीय सम्वत् भारत में अति प्राचीन काल से ही सम्वत् का प्रचलन था। प्राचीन अभिलेख और साहित्यों में इसका उल्लेख है। प्राचीन भारतीय सम्वतों में विक्रम और शक सम्वत् सर्वाधिक प्रसिद्ध हैं। कुछ प्रसिद्ध प्राचीन भारतीय सम्वत् निम्न हैं :— सम्वत् का नाम समय प्रणेता विक्रम सम्वत् ५७ ई॰पू॰ उज्जयिनी...

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भारतवर्ष का नामकरण

भूमिका हमारे देश भारत का नाम ऋग्वैदिक जन ‘भरत’ के नाम पर भारतवर्ष पड़ा है। यद्यपि भारतीय संविधान के अनुच्छेद – १ में इसे ‘भारत अर्थात् इंडिया’ कहा गया है। भारतवर्ष शब्द के प्रयोग का अभिलेखीय साक्ष्य सर्वप्रथम खारवेल के हाथीगुम्फा अभिलेख में मिलता है। यहाँ पर यह शब्द गंगा घाटी या उत्तरी...

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भारत और तिब्बत सम्पर्क

भूमिका तिब्बत उत्तर में कुललुन एवं दक्षिण में हिमालय पर्वत शृंखला से घिरा एक पठारी क्षेत्र है। वर्तमान में यह चीन का स्वायत्त क्षेत्र है। इसका उल्लेख महाभारत और कालिदास कृत रघुवंश में ‘त्रिविष्टप’ नाम से मिलता है। तिब्बत के साथ भारत का सम्पर्क बौद्ध धर्म के माध्यम से हुआ। तिब्बत...

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विक्रमशिला विश्वविद्यालय

संस्थापक पालवंशी शासक ‘धर्मपाल’ ( ७७० – ८१० ई॰ )। स्थान पथरघाट पहाड़ी, भागलपुर जनपद; बिहार। समय इसकी स्थापना आठवीं शताब्दी में हुई। यह आठवीं से १२वीं शताब्दी के अंत तक अस्तित्व में रहा। प्रसिद्ध विद्वान दीपंकर श्रीज्ञान ‘अतीश’, अभयांकर गुप्त, ज्ञानपाद, वैरोचन, रक्षित, जेतारी, शान्ति, रत्नाकर, मित्र, ज्ञानश्री, तथागत, रत्नवज्र...

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बलभी विश्वविद्यालय

भूमिका  बलभी विश्वविद्यालय ( वल्लभी विश्वविद्यालय ) की स्थापना गुप्तशासन के सैन्याधिकारी भट्टार्क ( मैत्रक वंश ) द्वारा की गयी थी। यह गुजरात के भावनगर जिले के ‘वल’ नामक स्थान पर स्थित था। यह हीनयान बौद्ध धर्म की शिक्षा का केंद्र था। इसका समयकाल ५वीं शताब्दी से १२वीं शताब्दी तक था। बलभी गुप्त...

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