अशोक का धम्म

भूमिका

अशोक का धम्म ही वह तत्व है जो इतिहास में उसे सभी शासकों से अलग श्रेणी में लाकर खड़ा देता है। अपनी प्रजा के नैतिक उत्थान के लिये इतना प्रयास? इतनी कर्मठता? यहाँ तक की जीवमात्र लिये करुणा भाव। धम्म पर सर्वांगीण विचार करने से पहले हम सभी पहलुओं को जान लेते हैं, यथा – अन्य मत-मतान्तरों से सम्बन्ध, बौद्ध धर्म अपनाना इत्यादि।

सम्राट अशोक को सीधे-सीधे यह बता देना कि वे बौद्ध धर्मानुयायी थे। जैसा कि बौद्ध साहित्य उनके बौद्ध मतानुयायी बनने की कहानियाँ बताते हैं उनपर आँख बंद करके विश्वास नहीं किया जा सकता है। साथ ही कलिंग युद्ध के पूर्व का जीवन जिस तरह ये ग्रंथ अशोक को क्रूर शासक के रूप में दर्शाते हैं उसे जाँचने-परखने की आवश्यकता है।

अशोक और ब्राह्मण धर्म

अपने शासन के प्रारम्भिक वर्षों में अशोक ब्राह्मण धर्म के अनुयायी थे। बोद्ध साहित्य महावंश के अनुसार अशोक प्रारम्भ में ब्राह्मण मतानुयायी थे और प्रतिदिन ६०,००० ब्राह्मणों को भोजन कराया करते थे। रजतरंगिणी के आधार पर यह कहा जा सकता है कि वे भगवान शिव का उपासक थे। अन्य हिन्दू शासकों की भाँति वे अपने रिक्त समय में विहार यात्राओं पर निकलते थे जहाँ मृगया में विशेष रुचि लिया जाता था। अपनी प्रजा के मनोरंजन हेतु सम्राट विभिन्न प्रकार की गोष्ठियों एवं प्रीतिभोजों का भी आयोजन किया करते थे जिसमें मांस आदि बड़े चाव से खाये जाते थे। इसके लिये राजकीय पाकशाला में सहस्त्रों पशु-पक्षी प्रति-दिन मारे जाते थे।

अशोक की जिज्ञासु प्रवृत्ति

अपने पूर्वजों की तरह सम्राट अशोक जिज्ञासु प्रवृत्ति के थे। मौर्य राजसभा में सभी धर्मों के विद्वान विवाद में भाग लेते थे— जैसे ब्राह्मण, दार्शनिक, निर्ग्रंथ, आजीवक, बौद्ध तथा यूनानी दार्शनिक।

बौद्ध ग्रंथ दीपवंश के अनुसार अशोक अपनी धार्मिक जिज्ञासा शांत करने के लिये विभिन्न सिद्धांतों के व्याख्याताओं को राजसभा में आमन्त्रित करते थे, उन्हें उपहार देकर सम्मानित करते थे और साथ ही स्वयं भी विचारार्थ अनेक प्रश्न प्रस्तावित करते थे। वह यह जानना चाहता थे कि धर्म के किन पंथों में सत्य है? उनको अपने प्रश्नों के जो उत्तर मिले उनसे वह संतुष्ट नहीं हुए।

अशोक का बौद्ध धर्मानुयायी बनना

सिंहली अनुश्रुतियाँ – दीपवंश और महावंश के अनुसार अशोक को उसके शासन के चौथे वर्ष ‘निग्रोध’ नामक सात वर्षीय भिक्षु ने बौद्ध मत में दीक्षित किया। तत्पश्चात् मोग्गलिपुत्ततिस्स के प्रभाव से वे पूर्णरूपेण बौद्ध बन गये। दिव्यावदान अशोक को बौद्ध धर्म में दीक्षित करने का श्रेय ‘उपगुप्त’ नामक बौद्ध भिक्षु को प्रदान करता है। इन विरोधी मतों में कौन अधिक सत्य है, इसका निर्धारण कर सकना कठिन है। मोग्गलिपुत्ततिस्स ने ही अशोक के पुत्र महेन्द्र और पुत्री संघमित्रा को भी बौद्ध धर्म में दीक्षित किया था।

बौद्ध परम्पराओं के विपरीत स्वयं अशोक के अभिलेख उनके बौद्ध होने का सम्बन्ध कलिंग युद्ध से जोड़ते हैं। अशोक अपने तेरहवें शिलालेख में (जिसमें कलिंग युद्ध की घटनाओं का वर्णन है) यह घोषणा करते हैं कि ‘इसके बाद देवताओं का प्रिय धम्म की सोत्साह परिरक्षा, सोत्साह अभिलाषा एवं सोत्साह शिक्षा करता है।*

तिव्रे ध्रमशिलनं ध्रमकमत ध्रमनुशस्ति च देवनं-प्रियसर [।]…… ।*त्रयोदश शिलालेख

कलिंग युद्ध अशोक के अभिषेक के आठवें वर्ष की घटना है। अतः कहा जा सकता है कि इसी वर्ष अशोक ने बौद्ध धर्म ग्रहण कर लिया था। सम्भव है उनका झुकाव कुछ पहले से ही इस धर्म की ओर रहा हो तथा इस युद्ध के बाद उन्होंने पूर्णरूप से बौद्ध धर्म ग्रहण कर लिया हो।

प्रथम लघु शिलालेख* से ज्ञात होता है कि बौद्ध धर्म ग्रहण करने के ढाई वर्ष तक सम्राट अशोक साधारण उपासक थे तथा उन्होंने इस धर्म के प्रचार के लिये कोई उद्योग नहीं किये। इसके पश्चात् एक वर्ष से कुछ अधिक समय तक वह संघ के साथ रहे तथा उन्होंने इस धर्म की उन्नति के लिये इतनी अधिक कर्मठता दिखायी कि स्वयं उन्हें धम्म की वृद्धि पर आश्चर्य हुआ तथा वह दावा करने लगे कि धम्म की इतनी उन्नति इसके पहले कभी नहीं हुई।

अधिकानि अढ़ातियानि वसानि य हंक [ …… ] सके [ । ] नो तु खो बाढ़े प्रकंते हुसं [ । ] एकं सवछरे सातिरेके तुखो सवछरे ….. यं मया संघे उपयीते बाढ़ं च मे पकंते [ । ]*ब्रह्मगिरि लघु शिलालेख

कुछ विद्वानों ने ‘संघ की शरण लेने’ (संघ उपेते या संघे उपीयते) का अर्थ यह लगाया है कि सम्राट अशोक भिक्षुवस्त्र धारण कर स्वयं संघ में प्रवेश कर गये तथा वह संघ एवं राज्य दोनों का प्रधान बन गये। परन्तु इस प्रकार के निष्कर्ष से सहमत होना कठिन है क्योंकि ऐसी स्थिति में वह स्पष्ट रूप से अपने लेखों में इसका उल्लेख करते हैं। ‘संघ उपेते’ या ‘संघे उपीयते’ का वास्तविक अर्थ ‘संघ में प्रविष्ट होने के लिये उन्मुख होना’ है। बौद्ध साहित्य में ऐसे व्यक्ति को ‘भिक्षु गतिक’* कहा गया है।

  • अशोक के अभिलेख, पृष्ठ ११२. — डॉ० राजबली पाण्डेय*

ऐसा प्रतीत होता है कि एक वर्ष तक साधारण उपासक रहने के उपरान्त सम्राट अशोक बौद्ध संघ के विद्वान भिक्षुओं के घनिष्ठ सम्पर्क में आये तथा उनके उपदेशों के फलस्वरूप अशोक के हृदय में बौद्ध धर्म के सिद्धान्तों के प्रति अधिक श्रद्धा उत्पन्न हो गयी। तब उन्होंने सार्वजनिक रूप से अपने को संघ का अनुयायी घोषित कर दिया तथा संघ की सीधी सेवा करने का व्रत लिया। अपने इस नवीन मत परिवर्तन की सूचना देने के लिये अशोक प्रियदर्शी ने अभिषेक के १०वें वर्ष ( २५९ ई० पू० ) सम्बोधि (बोधगया) की यात्रा की।*

सो देवानंपियो पियदसि राजा दसवसभिसितो संतो अयाय संबोधि [ । ]*अष्टम् बृहद् शिलालेख

बौद्ध धर्म ग्रहण करने के बाद अशोक में होने वाले परिवर्तन

बौद्ध धर्म ग्रहण कर लेने के पश्चात् अशोक के जीवन में अनेक परिवर्तन उत्पन्न हो गये।

  • उन्होंने अहिंसा तथा सदाचार पर चलना प्रारम्भ कर दिया, मांसाहार त्याग दिया तथा राजकीय भोजनालयों में मारे जाने वाले पशुओं की संख्या कम कर दी गयी है। यहाँ तक की राज्याभिषेक के २६वें वर्ष जीवहत्या निषेध कर दिया गया।
  • आखेट तथा विहार यात्रायें रोक दी गयीं और उनके स्थान पर धर्म यात्राओं का प्रारम्भ हुआ।
  • इन यात्राओं के दौरान सम्राट अशोक देश के विभिन्न भागों के लोगों से मिलते थे तथा उन्हें धम्म के विषय में बताते थे।
  • वे महात्मा बुद्ध के चरण-चिन्हों से पवित्र हुए स्थानों में गये तथा उनकी पूजा की। इस धम्मयात्रा के क्रम में वे :
    • सर्वप्रथम बोधगया गये। यहाँ वे अपने राज्याभिषेक के १०वें वर्ष ( २५९ ई० पू० ) में गये थे। — अष्टम् बृहद् शिलालेख
    • इसके बाद अपने अभिषेक के २०वें वर्ष ( २५९ ई० पू० ) वह लुम्बिनी ग्राम में गये। उन्होंने वहाँ पत्थर की सुदृढ़ दीवार बनवायी तथा शिला-स्तम्भ खड़ा किया। चूँकि वहाँ भगवान बुद्ध का जन्म हुआ था, अतः लुम्बिनी ग्राम कर-मुक्त घोषित किया गया तथा केवल / भाग लेने की घोषणा की गयी। — रूम्मिनदेई का लघु स्तम्भ लेख
    • अशोक ने नेपाल की तराई में स्थित निग्लीवा में कनकमुनि (एक पौराणिक बुद्ध) के स्तूप को सम्बर्द्धित एवं द्विगुणित करवाया। यहाँ पर सम्राट अशोक अपने राज्याभिषेक के १४वें वर्ष ( २५५ ई० पू० ) आये थे। — निग्लीवा लघु स्तम्भलेख
    • बौद्ध अनुश्रुतियाँ सम्राट अशोक को ८४ हजार स्तूपों के निर्माता के रूप में स्मरण करती हैं।

अशोक के बौद्ध होने के अभिलेखीय प्रमाण

अशोक के अभिलेख इस बात के स्पष्ट प्रमाण प्रस्तुत करते हैं कि वह बौद्ध मतानुयायी थे, अतः अब किसी को उनके बौद्ध होने में संदेह करने की बिल्कुल गुंजाइश नहीं है। इसका सबसे सबल प्रमाण उनका भाब्रू से प्राप्त लघु-शिलालेख* है जिसमें अशोक स्पष्टतः ‘बुद्ध, धम्म तथा संघ’ का अभिवादन करते हैं। इस लेख के धार्मिक ( साम्प्रदायिक ) स्वरूप के विषय में संदेह नहीं किया जा सकता।

हमा बुधसि धंमसि संघसी ति गालवे चं प्रसादे च [ । ]*भाब्रू लघु शिलालेख

सम्राट अशोक को बौद्ध धर्मानुयायी सिद्ध करने वाला दूसरा अभिलेख उनका शासनादेश है जो सारनाथ, साँची तथा कौशाम्बी के लघु-स्तम्भों पर उत्कीर्ण मिलता है। इसमें अशोक बौद्ध धर्म के रक्षक के रूप में हमारे सामने आते हैं। साँची के लघु स्तम्भलेख में वह बौद्ध संघ में फूट डालने वाले भिक्षुओं तथा भिक्षुणियों को चेतावनी देते है जो कोई भिक्षु या भिक्षुणी संघ को भंग करेगा, वह श्वेत वस्त्र पहनाकर अयोग्य स्थान पर रखा जायेगा। इस प्रकार यह आदेश भिक्षुसंघ और भिक्षुणीसंघ में सूचित किया जाना चाहिए क्योंकि मेरी इच्छा है कि संघ समग्र होकर चिरस्थायी हो जाय।*

ए चुं खो भिखू वा भिखुनि वा संघं भाखति से ओदातानि दुसानि सनंधापयि या आनावाससि आवासयिये ( । ) हेवं इयं सासने भिखु-संघसि च भिखुनि-संघसि च विनपयितविये ( । ) ।* सारनाथ लघु स्तम्भलेख

इसके अतिरिक्त किसी भी धार्मिक अथवा लौकिक ग्रन्थ से अशोक का किसी बौद्धेतर धर्म से सम्बन्धित होना सूचित नहीं होता।

क्या अशोक उपासक थे या भिक्षु बन गये?

यहाँ उल्लेखनीय है कि सम्राट अशोक आजीवन उपासक ही रहे और वे भिक्षु अथवा संघाध्यक्ष कभी नहीं बने। संघ-भेद रोकने का आदेश भी उन्होंने राजा के अधिकार से ही दिया था। इस समय बौद्ध संघ में कुछ ऐसे अवांछनीय तत्त्व प्रविष्ट हो गये थे जिनसे संघ की व्यवस्था हानि हो रही थी और संघ की कार्यवाही को सुचारु रूप से चलाने के लिये इन तत्त्वों का निष्कासन आवश्यक था। अतः विवश होकर संघ ने सम्राट अशोक से सहायता की माँग की होगी और उन्होंने यह सहायता प्रदान किया। इस प्रकार की सहायता वह किसी भी अन्य संस्था को दे सकते थे जो इस प्रकार के बाहरी व्यक्तियों द्वारा आक्रान्त होती* और सहायता की माँग करते।

But here the authority of the king was obviously invoked by the Sangha which had recently experienced great difficulty by the intrusion of undesirable elements within its fold; a Council had been held and a fresh settlement of the affairs reached; not feeling equal to the task of securing its proper observance without the aid of the secular arm, the Sangha appealed to the State for aid, and got it; the assistance which Asoka gave to the Sangha in such circumstances, he would have given to any other corporate body which suffered similarly at the hands of assailants from outside.* — Age of Nandas and Mauryas; p. 242-43 : Nilakantha Shashtri.

महावंश ( ११/३४-३५ ) से ज्ञात होता है कि अपने अभिषेक के १८वें वर्ष सम्राट अशोक ने लंका के राजा के पास भेजे गये एक सन्देश में बताया था कि ‘वे शाक्यपुत्र (गौतम बुद्ध) के धर्म के एक साधारण उपासक बन गये हैं।

अशोक ने सन्यास ग्रहण कर लिया हो, इस बात के भी पर्याप्त प्रमाण नहीं हैं। नीलकंठ शास्त्री के अनुसार लघुशिला लेख में जो ‘संघ-उप-ई’ पदावली मिलती है, वह इतनी अधिक संदिग्ध है कि उससे उनके सन्यास ग्रहण कर लेने की बात की पुष्टि नहीं होती। अशोक के समय तक पब्बजा (प्रवज्या-संन्यास) की प्रथा पर्याप्त दृढ़ हो चुकी थी। प्राचीन भारत के ऐतिहासिक काल में हमें किसी भी ऐसे राजा का नाम असंदिग्ध रूप से ज्ञात नहीं है जो एक ही समय भिक्षु भी हो तथा राजा के सभी विशेषाधिकारों का भी उपयोग करता रहे।*

The phrase Sangham-upa-i in the Minor Rock-Edict is too vague to convey the precise idea of ordination (pabbajjā) which must have been well established by Asoka’s timeAnd the situation of a king turning monk while retaining the life and prerogatives of royalty is incompatible with all our notions of ancient monachism.* — Age of Nandas and Mauryas; p. 243 : Nilakantha Shashtri.

धार्मिक नीति

यद्यपि अशोक ने व्यक्तिगत रूप से बौद्ध धर्म ग्रहण कर लिया तथा पूर्णरूपेण आश्वस्त हो गये कि ‘जो कुछ भगवान बुद्ध ने कहा है वह शब्दशः सत्य है’, तथापि अपने विशाल साम्राज्य में उन्होंने कहीं भी किसी दूसरे धर्म अथवा सम्प्रदाय के प्रति अनादर अथवा असहिष्णुता प्रदर्शित नहीं किया। स्वयं अशोक के अभिलेख इस बात के साक्षी है कि अपने राज्य के विभिन्न मतों तथा सम्प्रदायों के प्रति वे सदैव उदार एवं सहनशील बने रहे। उन्होंने बलपूर्वक किसी को भी अपने मत में दीक्षित करने का प्रयास नहीं किया। सातवें शिलालेख में वह अपनी धार्मिक इच्छा व्यक्त करते हुए बताता है कि ‘सब मतों के व्यक्ति सब स्थानों पर रह सकें क्योंकि वे सभी आत्म-संयम एवं हृदय की पवित्रता चाहते हैं।’*

देवानंप्रियो प्रिय [ द्र ] शि रज सवत्र इछति सव्र—प्रषंड वसेयु [ । ] सवे हि ते समये भव-शुधि च इछंति [ । ]।*सप्तम बृहद् शिलालेख

इस कथन से स्पष्ट है कि सम्राट अशोक ने यह भली-भाँति समझ लिया था कि सभी धर्मों में सच्चाई का अंश विद्यमान है और यह समझ लेने पर उनका सभी मत-मतान्तरों के प्रति उदार होना स्वाभाविक ही था। १२वें बृहद् शिलालेख में वह विभिन्न धर्मों के प्रति अपने दृष्टिकोण को और अधिक स्पष्ट करते हुए कहते हैं — ‘मनुष्य को अपने धर्म का आदर और दूसरे धर्म की अकारण निन्दा नहीं करनी चाहिये। एक न एक कारण से अन्य धर्मों का आदर करना चाहिये। ऐसा करने पर मनुष्य अपने सम्प्रदाय की वृद्धि करता है तथा दूसरे के सम्प्रदाय का उपकार करता है। इसके विपरीत करता हुआ वह अपने सम्प्रदाय को क्षीण करता तथा दूसरे के सम्प्रदाय का अपकार करता है। जो कोई अपने सम्प्रदाय के प्रति भक्ति और उसकी उन्नति की लालसा से दूसरे के धर्म की निन्दा करता है वह वस्तुतः अपने सम्प्रदाय की ही बहुत बड़ी हानि करता है।…. लोग एक दूसरे के धम्म को सुनें। इससे सभी सम्प्रदाय बहुश्रुत (अधिक ज्ञान वाले) होंगे तथा संसार का कल्याण होगा।*

आत्पपांसंडपूजा व परपासंडगरहा व नो भवे अपकरणम्हि लुहुका व अस तम्हि प्रकरणे [ । ] पूजेतया तु एव परपासंडा तेन तेन प्रकरण [ । ] एवं करुं आत्पपासण्डं च वढयति परपासंडस च, उपकरोति [ । ] तदंञथा करोतो आपत्पासंडं च छणति परपासाण्डस, च पि अपकरोति [ । ] यो हि कोचटि आत्पपासण्डं पूजयति परसासाण्डं व गरहति सवं आत्पपासण्डभतिया किंति आत्पपासण्डं दिपयेम इति सो च पुन तथ करातो आत्पपासण्डं बाढ़तरं उपहनाति [ । ] त समवायों एव साधु किंति अञमञंस धंमं स्रुणारु च सुसंसेर च [ । ] एवं हि देवानं पियस इछा किंति सब पासण्डा बहुस्रुता च असु कलाणागमा च असु [ । ] *द्वादश बृहद् शिलालेख

इन पंक्तियों से स्पष्ट है कि एक सच्चे अन्वेषक की भाँति सम्राट अशोक ने यह पता लगा लिया था कि विभिन्न मतों की संकीर्ण बुद्धि ही आपसी कलह एवं विवाद का कारण बनती है। अतः वह सबको उदार दृष्टिकोण अपनाने का वे उपदेश देते हैं।

इस बात के प्रमाण हैं कि सम्राट अशोक की दानशीलता से बौद्धेतर जनों एवं सम्प्रदायों को भी प्रभूत लाभ प्राप्त हो रहे थे। उनके समय में बराबर (जहानाबाद जनपद) पहाड़ी पर आजीवक सम्प्रदाय के संन्यासियों के निवास के लिये कुछ गुफायें निर्मित करवायी थीं।*

यवनजातीय तुषास्प को अशोक ने काठियावाड़ प्रान्त का राज्यपाल नियुक्त किया था। इसकी जानकारी हमें रुद्रदामन के गिरनार अभिलेख से मिलती है।

राजतरंगिणी से ज्ञात होता है कि कश्मीर में सम्राट अशोक ने विजयेश्वर नामक एक शैव मन्दिर का जीर्णोद्धार करवाया था तथा उसके भीतर दो समाधियाँ निर्मित करवाई थीं।

इन उद्धरणों से अशोक की धार्मिक सहिष्णुता स्पष्टतः सिद्ध हो जाती है।

प्रो० रोमिला थापर का विचार है कि अशोक की ‘धम्म-नीति सफल नहीं हुई। सामाजिक तनाव ज्यों-के-त्यों बने रहे, साम्प्रदायिक संघर्ष बराबर चलते रहे।* किन्तु इस प्रकार के मत से सहमत होना कठिन है। अशोक के काल मे हमें किसी भी प्रकार के तनाव अथवा साम्प्रदायिक संघर्ष के स्पष्ट उदाहरण नहीं मिलते हैं। वस्तुतः यह उनकी उदार धार्मिक नीति का ही प्रतिफल था कि वे अपने विशाल साम्राज्य में एकता स्थापित कर सकने में सफल रहे।

नीलकण्ठ शास्त्री ने ठीक ही लिखा है कि अकबर के पूर्व अशोक पहला शासक था जिसने भारतीय राष्ट्र की एकता की समस्या का सामना किया। इसमें उसे अकबर से अधिक सफलता मिली थी क्योंकि उसको मानव-प्रकृति का बेहतर ज्ञान था। एक नया धर्म बनाने या अपने धर्म को बलात् सबसे स्वीकार कराने के स्थान पर उसने सुस्थित धर्म व्यवस्था को स्वीकार किया और एक ऐसे मार्ग का अनुसरण किया जिससे स्वस्थ्य और सुव्यवस्थित विकास की आशा थी सहिष्णुता के मार्ग से वह कभी विचलित नहीं हुआ।’*

Asoka was the one ruler before Akbar who faced the problem of Indian national unity, and he came much nearer success than Akbar because he had a better understanding of human nature, and instead of seeking to invent a new common faith or compel everybody to adopt the faith he had accepted as his own, he took the established order for granted and struck the road along which there was the best chance of healthy and ordered development. He never departed from his rule of tolerance.* — Age of Nandas and Mauryas, p. 232-33 : Nilakantha Shashtri.

अशोक का धम्म

अपनी प्रजा के नैतिक उत्थान के लिये सम्राट अशोक ने जो ‘आचार संहिता’ प्रस्तुत की उसे उनके अभिलेखों में ‘धम्म’ कहा गया है। ‘धम्म’ संस्कृत के ‘धर्म’ का ही प्राकृत रूपान्तर है परन्तु अशोक के लिये इस शब्द का विशेष महत्त्व है। वस्तुतः यदि देखा जाय तो यही धम्म तथा उसका प्रचार सम्राट अशोक के विश्व इतिहास में प्रसिद्ध होने का सर्वप्रमुख कारण है।

धम्म क्या है?

अपने दूसरे स्तम्भ लेख में अशोक स्वयं प्रश्न करते हैं — ‘कियं चु धंमे? अर्थात् धम्म (धर्म) क्या है? इसका उत्तर वह स्वयं दूसरे स्तम्भ लेख एवं सातवें स्तम्भ लेख में देते हैं। वह हमें उन गुणों को गिनाते है जो धम्म का निर्माण करते हैं।

इन्हें हम इस प्रकार रख सकते हैं ——

अपासिनवे बहुकयाने दया दाने सचे सोचये [ । ] च। — दूसरा स्तम्भलेख

दया दाने सचे सोचवे मदवे साधवे च। — सातवाँ स्तम्भलेख

अर्थात् धम्म है —

(१) अल्प पाप (अपासिनवे) है।

(२) अत्यधिक कल्याण (बहुकयाने) है।

(३) दया है।

(४) दान है।

(५) सत्यवादिता है।

(६) पवित्रता (सोचये) है।

(७) मृदुता (मादवे) हैं।

(८) साधुता (साधवे) है।

इन गुणों को व्यवहार में लाने के लिये निम्नलिखित बातें आवश्यक बतायी गयी हैं-

(१) अनारम्भो प्राणानाम् (प्राणियों की हत्या न करना)।

(२) अविहिंसा भूतानाम् (प्राणियों को क्षति न पहुँचाना)।

(३) मातरि-पितरि सुसूसा (माता-पिता की सेवा करना)।

(४) थेर सुसूसा (वृद्धों की सेवा करना)।

(५) गुरूणाम् अपचिति (गुरुजनों का सम्मान करना)।

(६) मित संस्तुत नाटिकानां बहमण-समणानां दानं संपटिपति (मित्रों, परिचितों, ब्राह्मणों तथा श्रमणों के साथ अच्छा व्यवहार करना)।

(७) दास-भतकम्हि सम्य प्रतिपति (दासों एवं नौकरों के साथ अच्छा बर्ताव करना)।

(८) अप-व्ययता (अल्प व्यय)।

(९) अपभाण्डता (अल्प संचय)।

ये धम्म के विधायक पक्ष है।

इसके अतिरिक्त अशोक के धम्म का एक निषेधात्मक पक्ष भी है जिसके अन्तर्गत कुछ दुर्गुणों की गणना की गयी है। ये दुर्गुण व्यक्ति की आध्यात्मिक उन्नति के मार्ग में बाधक होते है। इन्हें ‘आसिनव’ शब्द में व्यक्त किया गया है। आसिनव को अशोक तीसरे स्तम्भ लेख में ‘पाप’ कहते हैं। मनुष्य ‘आसिनव’ के कारण सद्गुणों में विचलित हो जाता है। उसके अनुसार निम्नलिखित दुर्गुणों से आसिनव हो जाते हैं ( आसिनव-गामीनि नाम अथ चण्डिये निठूलये कोधे माने इस्सा…..तृतीय स्तम्भलेख ।)।

(१) चंडिये अर्थात् प्रचण्डता।

(२) निठूलिये अर्थात् निष्ठुरता।

(३) कोधे अर्थात् क्रोध।

(४) माने अर्थात् घमण्ड।

(५) इस्सा अर्थात् ईर्ष्या।

अतः धम्म का पूर्ण परिपालन तभी सम्भव हो सकता है जब मनुष्य उसके गुणों के साथ ही साथ इन विकारों से भी स्वयं को मुक्त रखे। इसके लिये यह भी आवश्यक हैं कि मनुष्य सदैव आत्म-निरीक्षण करता रहे ताकि उसे अधःपतन के मार्ग में अग्रसर करने वाली बुराइयों का ज्ञान हो सके। तभी धम्म ( धर्म ) की भावना का विकास हो सकता है। धम्म के मार्ग का अनुसरण करने वाला व्यक्ति स्वर्ग की प्राप्ति करता है और उसे इहलोक तथा परलोक दोनों में पुण्य की प्राप्ति होती है।

धम्म तथा उसके उपादान ( प्रयोग करना ) सम्राट अशोक को बहुत प्रिय थे। साधारण मनुष्यों में धम्म को बोधगम्य बनाने के उद्देश्य से वे इसकी तुलना भौतिक जीवन के विभिन्न आचरणों से करते हैं तथा धम्म को उनमें सर्वश्रेष्ठ घोषित करता है।

९वें बृहद् शिला प्रज्ञापन में सम्राट अशोक मानव जीवन के विविध अवसरों पर किये जाने वाले मंगल कार्यों का उल्लेख करते हैं तथा उन्हें अल्पफल वाला बताते हैं। उनके अनुसार ‘धम्म- मंगल’ महाफल वाला है — ९वें बृहद् शिलालेख

यह दासों तथा नौकरों के साथ उचित व्यवहार, गुरुजनों के प्रति आदर, प्राणियों के प्रति दया आदि आचरणों में प्रकट होता है।

११वें बृहद् शिलालेख में धम्मदान की तुलना सामान्य दान से की गयी हैं तथा धम्मदान को श्रेष्ठतर बताया गया है ( नास्ति एतारिसं दानं यारिसि धंमदानं )। धम्मदान का अर्थ है— धम्म का उपदेश देना, धम्म में भाग लेना तथा धम्म से अपने को सम्बन्धित कर लेना।

इसी प्रकार १३वें बृहद् शिलालेख में सम्राट अशोक सैनिक विजय की तुलना धम्म-विजय से करते हैं। इस प्रसंग में वे कलिंग विजय में होने वाली व्यापक हिंसा एवं संहार की घटनाओं पर भारी पश्चाताप करते हैं। उनके अनुसार प्रत्येक सैनिक-विजय में घृणा, हिंसा एवं हत्या की घटनायें होती हैं। इसके विपरीत धम्म-विजय प्रेम, दया, मृदुता एवं उदारता आदि से अनुप्राणित होती है।

धम्म-विजय

तेरहवें शिलालेख में धम्म-विजय की चर्चा करते हुए सम्राट अशोक कहते हैं कि —

देवताओं का प्रिय धम्म विजय को सबसे मुख्य विजय समझता है। यह विजय उसे अपने राज्य में तथा सब सीमान्त प्रदेशों में छह सौ योजन तक, जिसमें अन्तियोक नामक यवन राजा तथा अन्य चार राजा, तुरमय, अन्तिकिन, मग और अलिक सुन्दर हैं, तथा दक्षिण की ओर चोल, पाण्ड्य और ताम्रपर्ण तक में प्राप्त हुई है। उसी तरह यहाँ राजा के राज्य में यवनों और कम्बोजों में, नभपंक्तियों और नाभक में, वंशानुगत भोजों, आन्ध्रक और पुलिन्दों में — सब जगह लोग देवताओं के प्रिय का धर्मानुशासन मानते हैं। जहाँ देवताओं के प्रिय के दूत नहीं जाते वहाँ भी लोग धर्मादेशों और धर्मविधान को सुनकर धर्माचरण करते हैं और करते रहेंगे। इस प्रकार प्राप्त विजय सर्वत्र प्रेम से सुरभित होती है। वह प्रेम धर्म विजय से प्राप्त होता है। पर वह तुक्ष वस्तु है। देवताओं का प्रिय पारलौकिक कल्याण को ही बड़ा समझता है। यह धर्मलेख इसलिये लिखवाया गया ताकि मेरे पुत्र, पौत्र और प्रपौत्र नये देश विजय करने का इच्छा त्याग दें और जो विजय सिर्फ तीर से प्राप्त हो सकती है उसमें भी वे साहिष्णुता तथा मृत्युदण्ड का ध्यान रखे और वे धम्म विजय को ही वास्तविक विजय समझें। यह इहलोक तथा परलोक दोनों के लिये अच्छा है। धर्म-प्रेम सभी राज्यों का प्रेम बने। यह इहलोक तथा परलोक दोनों के लिये मंगलकारी है।’

“इछति हि देवनं प्रियो सव्रभुतन अछति संयमं समचरियं रभसिये [ । ] एषे च मुखमुते विजये देवनं प्रियस यो ध्रमविजयो [ । ] सो चन पुन लधो देवनं प्रियस इह च अन्तेषु अषपु पि योजन शतेषु यत्र अन्तियोको नम योनरज परं च तेन अन्तियोकेत चतुरे ४ रजनि तुरमये नम अन्तिकिनि नम मक नम अलिकसुदरो नम निज चोड पण्ड अब तम्बपंनिय [ । ] एवमेव हिद रज विषवस्पि योन-कंबोयेषु नमभ नभितिन भोज-पितिनिकेषु अन्ध्रपलिदेषु सवत्र देवनं प्रियस ध्रुमनुशस्ति अनुवटन्ति [ । ] यत्र पि देवनं प्रियस दुत न व्रचन्ति ते पि श्रुतु देवनं प्रियस ध्रमवुटं विधेनं ध्रुमनुशस्ति ध्रमं अनुविधियन्ति अनुविधियशन्ति च [ । ] यो च लधे एतकेन भोति सवत्र विजयो सवत्र पुन विजयो प्रतिरसो सो [ । ] लघ भोति प्रति ध्रमविजयस्पि [ । ] लहुक तु खो स प्रित [ । ] परत्रिकेव महफल मेञति देवन प्रियो [ । ] एतये च अठये अयो ध्रमदिपि दि पस्त [ । ] किति पुत्र पपोत मे असु नवं विजयं म विजेतविअ मञिषु [ । ] स्पकस्पि यो विजये छन्ति च लहुदण्डतं च रोचेतु [ । ] तं एवं विज [ यं ] मञ [ तु ] यो ध्रुमविजयो [ । ] सो हिदलोकिको परलोकिको [ । ] सव्र च निरति भोतु य स्रमरति [ । ] स हि हिदलोकिक परलोकिक [ । ]” —  १३वाँ बृहद् शिलालेख

निःसन्देह अशोक की धम्मविजय संबन्धी उपर्युक्त अवधारणा ब्राह्मण तथा बौद्ध ग्रन्थों की एतद्विषयक अवधारणाओं से सर्वथा भिन्न है। कौटिल्य कृत अर्थशास्त्र, महाभारत, कालिदास कृत रघुवंश आदि में धर्मविजय का जो विवरण प्राप्त होता है उससे यह स्पष्ट है कि यह एक निश्चित साम्राज्यवादी नीति थी। ब्राह्मण तथा बौद्ध ग्रन्थों की धम्मविजय का तात्पर्य राजनीतिक है। इसमें धर्मविजयी शासक का राजनीतिकप्रभुत्व उसके प्रतिद्वन्द्वी स्वीकार करते हैं। वह अधीन राजाओं से भेंट उपहारादि लेकर ही संतुष्ट हो जाता है तथा उनके राज्य अथवा कोष के ऊपर अधिकार नहीं करता।

गुप्त सम्राट समुद्रगुप्त की दक्षिणापथ विजय तथा हर्षवर्धन की सिन्ध विजय को इसी अर्थ में ‘धर्मविजय’ कहा गया है। कालिदास ने रघुवंश में रघु की धर्मविजय के प्रसंग में बताया है कि उन्होंने महेन्द्रनाथ की लक्ष्मी का अधिग्रहण किया, उसके राज्य का नहीं।

बौद्ध साहित्य में भी हम धम्मविजय का स्वरूप राजनीतिक ही पाते हैं। अन्तर मात्र यह है कि बौद्ध धर्म-विजयी युद्ध अथवा दबाव के स्थान पर अपनी उत्कृष्ट नैतिक शक्ति द्वारा सार्वभौम साम्राज्य का स्वामी बन जाता है। विजित शासक उसकी प्रभुसत्ता को स्वीकार करते हुए उसके सामन्त बन जाते हैं। उसकी विजय तथा साम्राज्य वास्तविक होते हैं यद्यपि उसका स्वरूप मृदु तथा लोकोपकारी होता है।

परन्तु अशोक ‘प्रियदर्शी’ की ‘धम्मविजय’ इस अर्थ में कदापि नहीं की गयीतेरहवें बृहद् अभिलेख में अशोक यह दावा करते हैं कि उन्होंने अपने तथा अपने पड़ोसी राज्यों में धम्मविजय प्राप्त किया है। अर्थ मात्र यही है कि उन्होंने स्वदेशी तथा विदेशी राज्यों में धम्म का प्रचार किया तथा धम्म प्रचार को उन राज्यों में सफलता प्राप्त हुई। इस प्रकार ‘धम्मविजय’ शुद्ध रूप से धम्म प्रचार का अभियान थी*

To Ashok Dharmavijaya was a missionary movement, pure and simple, and the claim means nothing more than that his propaganda in favour of Dharma had borne some success in neighbouring countries; p. 494 — Some Indological Studies : J. S. Negi.

यहाँ पर यह विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि सम्राट अशोक स्वयं अपने राज्य में भी धर्म-विजय करने का दावा करते हैं। यदि इसका स्वरूप राजनीतिक होता तो उनके द्वारा इस प्रकार के दावे का कोई अर्थ नहीं होता क्योंकि मौर्य साम्राज्य पर स्वयं अशोक का पूर्ण अधिकार था। पुनश्च विदेशी विशेषकर यवन राज्यों के शासक कभी भी इसे स्वीकार नहीं करते।

अतः स्पष्ट है कि सम्राट अशोक के ‘धम्म विजय’ में युद्ध अथवा हिंसा के लिये कोई स्थान नहीं था। वस्तुतः अशोक भारतीय इतिहास में पहले शासक हैं जिन्होंने राजनीतिक जीवन में हिंसा के त्याग का सिद्धान्त सामने रखा।

यह सही है कि अशोक के पूर्व कई ऐसे विचारक हुए जिन्होंने हिंसा के त्याग तथा अहिंसा के पालन करने का सिद्धान्त प्रचारित किया। परन्तु यह केवल व्यक्तिगत जीवन के सम्बन्ध में था। यहाँ तक कि स्वयं महात्मा बुद्ध भी राजनीतिक हिंसा के विरुद्ध नहीं थे और उन्होंने मगध नरेश अजातशत्रु को वज्जि संघ को जीतने का उपाय बताया था

हमें ज्ञात है कि न तो बौद्ध शासक अजातशत्रु और न ही जैन धर्म के पोषक नन्द राजाओं तथा कलिंग राज खारवेल ने ही यह स्वीकार किया कि राजनीतिक हिंसा धर्म विरुद्ध है।

अतः यह अवधारणा कि राजनीतिक हिंसा धर्म विरुद्ध है अशोक के मस्तिष्क की ही उपज प्रतीत होती है। अशोक ने व्यक्तिगत आचारशास्त्र को शासकीय आचारशास्त्र में परिणत कर दिया। इस प्रकार अशोक की धम्म विजय की अवधारणा ब्राह्मण अथवा बौद्ध लेखकों के धर्म विजय सम्बन्धी इस अवधारणा के प्रतिकूल थी कि ‘इसमें युद्ध तथा हिंसा द्वारा प्राप्त साम्राज्य सम्मिलित हैं।’

धम्म का स्वरूप

अशोक के अभिलेखों का अनुशीलन करने से यह स्पष्ट हो जाता है कि अशोक के धम्म ( धर्म ) के अन्तर्गत जिन सामाजिक एवं नैतिक आचारों का समावेश किया है वे वही हैं जिन्हें सभी सम्प्रदाय समान रूप से श्रद्धेय मानते हैं। धम्म की इस सरलता और सर्वांगीड़णता ने इसके स्वरूप को एक प्रहेलिका बना दिया है।

  • स्पष्टतः इसमें किसी भी दार्शनिक अथवा तत्त्वमीमांसीय प्रश्न की समीक्षा नहीं की गयी है।
  • इसमें न तो महात्मा बुद्ध के चार आर्य सत्यों का उल्लेख है, न अष्टांगिक मार्ग हैं और न आत्मा-परमात्मा सम्बन्धी अवधारणायें ही हैं।

अतः विद्वानों ने धम्म को भिन्न-भिन्न रूपों में देखा है। फ्लीट इसे ‘राजधर्म’ मानते हैं जिसका विधान अशोक ने अपने राजकर्मचारियों के पालनार्थ किया था।*

  • Journal of the Royal Asiatic Society, p. 491-97; 1908.*

परन्तु फ्लीट महोदय के निष्कर्ष तर्कसंगत नहीं लगते क्योंकि अशोक के लेखों से स्पष्ट हो जाता है कि उनका धम्म केवल राजकर्मचारियों तक ही सीमित नहीं था, अपितु वह जनसामान्य के लिये भी था।

राधाकुमुद मुकर्जी ने इसे ‘सभी धर्मों की साझी सम्पत्ति‘ बताया है। उनके अनुसार अशोक का व्यक्तिगत धर्म ही बौद्ध धर्म था तथा उसने साधारण जनता के लिये जिस धर्म का विधान किया वह वस्तुतः ‘सभी धर्मो का सार‘ था।*

The dharma that is thus presented in these Edicts is but another name for the moral or virtuous life, and takes its stand upon the common ground of all religions. It cannot be called sectarian in any sense, but is completely cosmopolitan, capable of universal application and acceptance as the sara, essence, of all religions. p. 75-76 — Ashoka : K. Mukherjee.*

रमाशंकर त्रिपाठी एवं विंसेन्ट स्मिथ जैसे कुछ अन्य विद्वानों ने भी राधाकुमुद मुखर्जी के मत का समर्थन किया है। डॉ० रमाशंकर त्रिपाठी* के अनुसार अशोक के धम्म के तत्त्व विश्वजनीन (Universal) हैं और हम उस पर किसी धर्म-विशेष को प्रोत्साहन अथवा संरक्षण प्रदान करने का दोषारोपण नहीं कर सकते।

  • प्राचीन भारत का इतिहास; पृ० १२७ — डॉ० रमाशंकर त्रिपाठी*

इसके विपरीत फ्रांसीसी विद्वान् सेनार्ट का विचार है कि अपने अभिलेखों में सम्राट अशोक ने जिस धम्म का उल्लेख किया है वह उसके समय के बौद्ध धर्म का एक पूर्ण तथा सर्वाङ्गीण चित्र प्रस्तुत करता है।*

  • The Indian Antiquary — Senart.*

प्रो० रोमिला थापर का विचार है कि ‘धम्म’ अशोक का अपना आविष्कार था। सम्भव है इसे बौद्ध तथा हिन्दू विचारधारा से ग्रहण किया गया हो किन्तु सार रूप में यह सम्राट द्वारा जीवन-पद्धति को सुझाने का एक ऐसा प्रयास था जो व्यावहारिक तथा सुविधाजनक होने के साथ-साथ अत्यधिक नैतिक भी था। इसका उद्देश्य उन लोगों के बीच सुखद समन्वय स्थापित करना था जिनके पास दार्शनिक चिन्तन में उलझने का अवकाश ही नहीं था।

The Dhamma was Asoka’s own invention. It may have been borrowed from Buddhist and Hindu thought, but it was in essence an attempt on the part of the king to suggest a way of life, which was both practical and convenient, as well as being highly moralIt was intended as a happy compromise for those of his subjects who did not have the leisure to indulge in philosophic speculation.* — Asoka and The Decline of the Mauryas, p. 149

उपर्युक्त सभी मतों के विपरीत प्रसिद्ध विद्वान् डी० आर० भण्डारकर ने एक नवीन सिद्धान्त प्रस्तुत किया है। उनके अनुसार न तो अशोक का धम्म सभी धर्मो का सार ही है और न ही उसमें बौद्ध धर्म का पूर्ण एवं सर्वांगीण चित्रण है। उनके विचार में अशोक के धम्म का मूल स्रोत बौद्ध धर्म ही है। अशोक के समय बौद्धधर्म के दो रूप थे –

  • भिक्षु बौद्धधर्म तथा
  • उपासक बौद्धधर्म।

इसमें दूसरा अर्थात् उपासक बौद्ध धर्म सामान्य गृहस्थों के लिये था। सम्राट अशोक गृहस्थ थे। अतः उन्होंने बौद्ध धर्म के दूसरे रूप को ही ग्रहण किया। इस धर्म के अन्तर्गत साधारण गृहस्थों के लिये सामाजिक एवं नैतिक नियमों का समावेश रहता था। अशोक के धम्म तथा बौद्ध ग्रन्थों में उल्लिखित उपासक धर्म के तुलनात्मक अध्ययन से यह स्पष्ट हो जाता है कि उन्होंने धम्म के जिन गुणों का निर्देश किया है वे ‘दीघनिकाय’ के ‘सिगालोवादसुत्त‘ में उसी प्रकार देखे जा सकते हैं। इसमें उन उपदेशों का संग्रह हुआ है जिन्हें महात्मा बुद्ध ने साधारण गृहस्थों के लिये अनुकरणीय बताया था। इसी कारण इस सुत्त को ‘गिहिविनय’ (गृहस्थियों के लिये उपदेश) भी कहा गया है। इसमें भी माता-पिता की सेवा, गुरुओं का सम्मान, मित्रों, सम्बन्धियों, परिचितों तथा ब्राह्मण-श्रमण-साधुओं के साथ उदारता और दास भृत्यों के साथ उचित व्यवहार करने का उपदेश दिया गया है। पुनः अशोक ने धम्म पालन से प्राप्त होने वाले जिन स्वर्गीय सुखों का उल्लेख किया है उनका भी ‘विमानवत्थु’ नामक पालिग्रन्थ में इसी रूप में विवरण देखा जा सकता है। अतः इन समानताओं को देखते हुए डी० आर० भण्डारकर महोदय ने अशोक के धम्म को ‘उपासक बौद्ध धर्म’ (Buddhism for the Laity) बताया हैं।*

  • अशोक, पृ० १०५ – १११ : डी० आर० भंडारकर।*

डी० आर० भण्डारकर महोदय का मत सर्वाधिक सन्तोषप्रद तथा तर्कसंगत लगता है। इस निष्कर्ष की पुष्टि सम्राट अशोक के प्रथम लघु शिलालेख से भी हो जाती है जिसमें वे कहते हैं कि ‘संघ के साथ सम्बन्ध हो जाने के बाद उसने धम्म के प्रति अधिक उत्साह दिखाया।’*

यं मया संघे उपयीते बाढ़ं च मे पकंते [ । ]*ब्रह्मगिरि शिलालेख

यदि अशोक के लेखों का धम्म बौद्ध धर्म नहीं होता तो बौद्ध ग्रन्थ तथा कथानक कभी भी उसका चित्रण अपने धर्म के महान् पोषक एवं संरक्षक के रूप में नहीं करते। इस प्रकार उपासक बौद्ध धर्म ही अशोक के ‘धम्म’ का मूल स्रोत था। यही कारण है कि इसका लक्ष्य निर्वाण की प्राप्ति न होकर स्वर्ग की प्राप्ति बताया गया है

प्रो० रोमिला थापर की धारणा है कि अशोक की धम्म नीति उसके द्वारा स्थापित किये गये सुविस्तृत साम्राज्य में एकता स्थापित करने के उद्देश्य से अपनायी गयी थी। यह एकता या तो कठोर केन्द्रीय नियंत्रण या भावनात्मक एकता के द्वारा स्थापित की जा सकती थी। अशोक प्रथम मौर्य सम्राट थे जिन्होंने भावनात्मक एकता के महत्त्व को समझा तथा इसी को प्राप्त करने के लिये धम्म का प्रचार किया। रोमिला थापर के अनुसार “अशोक ने धम्म को सामाजिक उत्तरदायित्व की एक वृत्ति के रूप में देखा था। इसका उद्देश्य एक ऐसी मानसिक वृत्ति का निर्माण करना था जिसमें सामाजिक उत्तरदायित्वों को, एक व्यक्ति के दूसरे के प्रति व्यवहार को, अधिक महत्त्वपूर्ण समझा जाय। इसमें मनुष्य की महिमा को स्वीकृति देने और समाज के कार्यकलापों में मानवीय भावना का संचार करने का आग्रह था।*

  • भारत का इतिहास, पृ० ६२ — प्रो० रोमिला थापर।*

कुछ अन्य विद्वान् अशोक के धम्म को एक राजनीतिक चाल समझते हैं जिसका उद्देश्य कलिंग युद्ध में हुए भारी नर-संहार से उत्पन्न जन-आक्रोश को शान्त करना रहा होगा। परन्तु इस प्रकार के विचार कल्पना की उड़ान मात्र लगते हैं तथा १३वें बृहद् शिलालेख से व्यक्त सम्राट की भावनाओं से मेल नहीं खाते। पुनश्च यदि जनाक्रोश के शमन हेतु यदि यह प्रयास होते तो धम्म का प्रचार और प्रसार मात्र कलिंग तक ही सीमित होता परन्तु यह ऐतिहासिक तथ्य है कि न केवल अपने साम्राज्य में धम्म प्रचार कराया वरन् तत्कालीन ज्ञात विश्व के हरेक स्थान पर धर्म प्रचारक भेंजे जाने का विवरण हमें मिलता है। सम्राट अशोक सच्चे हृदय से अपनी प्रजा का भौतिक तथा नैतिक कल्याण करना चाहते थे और इसी उद्देश्य से उन्होंने अपनी ‘धम्म नीति’ का विधान किया। इसके पीछे कोई राजनीतिक चाल खोजना तर्कसंगत नहीं होगा।

धम्म-प्रचार के उपाय

बौद्ध धर्म ग्रहण करने के एक वर्ष बाद तक सम्राट अशोक एक साधारण उपासक रहे और इस बीच उन्होंने बौद्ध धर्म के प्रचार के लिये कोई उद्योग नहीं किया। इसके पश्चात् सम्राट अशोक संघ की शरण में आये और एक वर्ष से कुछ अधिक समय तक संघ के साथ रहे। इसी बीच उन्होंने बौद्ध धर्म के प्रचार के लिये इतना अधिक कार्य किया कि उनको स्वयं यह देखकर आश्चर्य होने लगा कि बौद्ध धर्म की जितनी अधिक उन्नति इस काल में हुई उतनी इसके पूर्व कभी नहीं हुई थी। — ब्रह्मगिरि लघु शिलालेख

उन्होंने बौद्ध धर्म के प्रचार में अपने विशाल साम्राज्य से सभी साधनों को नियोजित कर दिया। उनके द्वारा किये गये कुछ उपाय पर्याप्त रूप से मौलिक थे। अशोक द्वारा बौद्ध धर्म के प्रचारार्थ अपनाये गये साधनों को हम निम्न प्रकार रख सकते हैं :—

(१) धर्म-यात्राओं का प्रारम्भ — अशोक ने बौद्ध-धर्म का प्रचार धर्म-यात्राओं से प्रारम्भ किया।

  • सम्राट अशोक अपने अभिषेक के १०वें वर्ष बोधगया की यात्रा पर गये। यह अशोक प्रियदर्शी की पहली धर्म यात्रा थी। इसके पूर्व वे अन्य राजाओं की भाँति विहार-यात्राओं पर जाया करता थे। इस प्रकार की यात्राओं में मृगया तथा दूसरे इसी प्रकार के आमोद-प्रमोद हुआ करते थे। परन्तु कलिंग युद्ध ( २६१ ई० पू० ) के पश्चात् सम्राट अशोक ने विहार यात्रायें बन्द कर दीं तथा धर्म यात्रायें प्रारम्भ कर दिये। इन यात्राओं में सम्राट ‘ब्राह्मणों’ और श्रमणों का दर्शन, दान, वृद्धों का दर्शन, धन से उनके पोषण की व्यवस्था, जनपद के लोगों का दर्शन, धर्म का आदेश और धर्म के सम्बन्ध में उनसे प्रश्नादि किया करते थे। [ बाम्हण-समणानं दसणे च दाने च थैरानं दसणे च हिरंण-पटिविधानो च जानपदस च जनस दस्पनं धंमानुसस्टी च धंमपरिपुछा च — अष्टम बृहद् शिलालेख ]
  • अपने अभिषेक के १४वें वर्ष में नेपाल की तराई में स्थित निग्लीवा (निगाली सागर) में जाकर उन्होंने कनकमुनि बुद्ध के स्तूप के आकार को द्विगुणित करवाया।
  • २०वें वर्ष वह भगवान बुद्ध के जन्मस्थली लुम्बिनि ग्राम गये, वहाँ शिलास्तम्भ स्थापित करवाया तथा पूजा की। चूँकि वहाँ बुद्ध का जन्म हुआ था, अतः वहाँ का कर घटाकर / कर दिया। अशोक प्रियदर्शी के इन कार्यों का जनता के ऊपर बड़ा प्रभाव पड़ा और बौद्ध धर्म की ओर आकृष्ट हुई।

(२) राजकीय पदाधिकारियों की नियुक्ति – अशोक महान का साम्राज्य बहुत विशाल था। अतः यह एक व्यक्ति के लिये सम्भव नहीं था कि वह सभी स्थानों में जाकर धर्म का प्रचार कर सके। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिये सम्राट अशोक ने अपने साम्राज्य के उच्च पदाधिकारियों को भी धर्म प्रचार के कार्य में लगा दिया। तृतीय बृहद् शिलालेख से ज्ञात होता है कि उसने युक्त, रज्जुक, प्रादेशिक नामक पदाधिकारियों को जनता के बीच जाकर धर्म के प्रचार एवं उपदेश करने का आदेश दिया। ये अधिकारी प्रति पाँचवें वर्ष अपने-अपने क्षेत्रों में दौरे पर जाया करते थे तथा सामान्य प्रशासकीय कार्यों के साथ जनता में धर्म का प्रचार किया करते थे। इसी तरह सातवें स्तम्भलेख से ज्ञात होता है कि राजुक और धर्ममहामात्रों के बारे में जानकारी मिलती है।

  • सर्वत विजिते मम युता च राजुके प्रादेसिके च पंचसु पंचसु वासेसु अनुसं— यानं नियातु एतायेव अथाय इमाय धंमानुसस्टिय यथा अञा — तृतीय बृहद् शिलालेख
  • लजूका पि बहुकेसु पान-सत-सहसेसु आयता [।] ते पि मे आनपिता हेवं च पलियोवदाथ जनं धम्म युतं …. ……. …… — सातवाँ स्तम्भ लेख
  • धम्म-महामाता पि मे ते बहुविधेसु अठेसु आनुगहिकेसु वियापटासे पवजीतानं चेव गिहिथानं चन [ च ] सव- [ पांस ] डेसु पि च वियापटासे [ । ] संघठसि पि मे कटे इमे वियापटा होहन्ति ति हेमेव बाभनेस आजीविकेसु पि मे कटे इमे वियापटा होहन्ति ति निगंठेसु पि मे कटे इमे वियापटा होहन्ति नाना-पासण्डेसु पि मे कटे इमे वियापटा होहन्ति ति पटिविसिठं पटीविसिठं तेसु तेसु ते ते [ महा ] माता [ । ] धम्म-महामाता चु मे एतेसु चेव वियापटा सवेसु च अन्नेसु पासण्डेसु [ । ] — सातवाँ स्तम्भ लेख

(३) धर्मश्रावन तथा धर्मोपदेश की व्यवस्था – धर्म-प्रचार के उद्देश्य से अशोक ने अपने साम्राज्य में धर्म श्रावन (धम्म सावन) तथा धर्मोपदेश (धम्मानुसथि) की व्यवस्था करवायी। उनके साम्राज्य के विभिन्न पदाधिकारी जगह-जगह घूमकर धर्म के विषय में लोगों को शिक्षा देते तथा राजा की ओर से जो धर्म-सम्बन्धी घोषणायें की जाती थीं उनसे जनता को अवगत कराते थे।

(४) धर्म-महामात्रों की नियुक्ति – अपने अभिषेक के १३वें वर्ष बौद्ध धर्म के प्रचार के लिये अशोक ने पदाधिकारियों का एक नवीन वर्ग बनाया जिसे धर्म-महामात्र (धम्ममहामात्त) कहा गया। ५वें बृहद् शिलालेख में अशोक कहते हैं — “प्राचीन काल में धर्ममहामात्र कभी नियुक्त नहीं हुए थे। मैंने अपने अभिषेक के १३वें वर्ष धर्ममहापात्र नियुक्त किये हैं।” [ पपे हि नम सुपदरे व [ । ] से अतिक्रतं अन्तरं न भुतप्रुव ध्रममहमत्र नम [ । ] से त्रेडशवषभिसितेन  मय ध्रममहमत्र कट [ । ] से सव्रपषडेषु । ] इनका एक कार्य विभिन्न धार्मिक सम्प्रदायों के बीच के द्वेष-भाव को समाप्त कर धर्म की एकता पर बल देना था। उनका प्रमुख कर्त्तव्य धर्म की रक्षा, धर्म की वृद्धि (ध्रमधिथनये, ध्रमवध्रिय) करना बताया गया है। धर्ममहामात्र राजपरिवार के सदस्यों से धर्म के लिये धनाधि दान में प्राप्त करते थे तथा राजा द्वारा जो धन दान में दिया जाता था उसकी समुचित व्यवस्था करके उसे धर्म प्रचार के काम में नियोजित करते थे। इन धर्म महामात्रों के प्रयास से धर्म की अधिकाधिक वृद्धि हुई।

(५) दिव्य रूपों का प्रदर्शन – अशोक पारलौकिक जीवन में आस्था रखते थे। उसने धर्म को लोकप्रिय बनाने के उद्देश्य से जनता के बीच उन स्वर्गीय सुखों का प्रदर्शन करवाया जो मनुष्य को देवत्व प्राप्त करने पर स्वर्ग लोक में मिलते है। इनमें विमान, हस्ति, अग्निस्कन्ध आदि दिव्य रूपों का प्रदर्शन किया गया। ये प्रदर्शन आजकल भारत के विभिन्न भागों में दशहरा एवं अन्य धार्मिक उत्सवों के अवसर पर निकाली जाने वाली चौकियों / झाँकियों के समान प्रतीत होते हैं। इसके पीछे यह भावना थी कि मनुष्य यदि धर्मानुसरण करेगा तो वह देवत्व को प्राप्त कर स्वर्ग लोक में निवास करेगा तथा इन सुखों का उपभोग करेगा। इन प्रदर्शनों से जहाँ एक ओर जनता का मनोरंजन होता था वहीं दूसरी ओर पारलौकिक सुखों की लालसा से वह धर्म की ओर आकृष्ट होती थी।

(६) लोकोपकारिता के कार्य – अपने धर्म को लोकप्रिय बनाने के लिये अशोक ने मानव के साथ-साथ पशुओं के कल्याणार्थ अनेक कार्य किये।

  • सर्वप्रथम पशु-पक्षियों की हत्या पर रोक लगा दिया गया।
  • इसके पश्चात् उन्होंने अपने राज्य तथा विदेशी राज्यों में भी मनुष्यों तथा पशुओं के चिकित्सा की अलग-अलग व्यवस्था करवायी।
  • जो औषधियाँ प्राप्त नहीं थीं उन्हें बाहर से लाकर विभिन्न स्थानों में आरोपित किया गया।
  • सातवें स्तम्भ लेख में सम्राट अशोक बताते हैं कि “मार्गों में मेरे द्वारा वट-वृक्ष लगाये गये। वे पशु एवं मनुष्यों को छाया प्रदान करेंगे। आम्रवाटिकायें लगाई गईं। आधे-आधे कोस की दूरी पर कुएँ खुदवाये गये तथा विश्राम गृह बनवाये गये। मनुष्य तथा पशु के उपयोग के लिये प्याउ चलाये गये….. मैंने यह इस अभिप्राय से किया है कि लोग धम्म का आचरण करें।” — मगेसु पि मे निगोहानि लोपापितानि छायोपगानि होसन्ति पसुमुनिसानं अम्बा-वडिक्या लोपापिता [ । ] अढकोसिक्यानि पि मे उदुपानानि खानापापितानि निंसिढया च कालापिता [ । ] आपानानि में बहुकानि तत तत कालापितानि पटी भोगाये पसु मुनिसानं [ । ] —सातवाँ स्तम्भलेख
  • उल्लेखनीय है कि बौद्ध ग्रन्थ ‘संयुक्त निकाय’ में फलदार वृक्ष लगवाने, पुल बंधवाने, कुएँ खुदवाने, प्याऊ चलवाने आदि को महान् पुण्य का कार्य बताया गया है जिसके बल पर मनुष्य स्वर्गलोक की प्राप्ति करता है। सम्भव है कि सम्राट अशोक की प्रेरणा का स्रोत यही रहा हो। इन सभी कार्यों का जनमानस पर अच्छा प्रभाव पड़ा होगा और वे धर्म की ओर आकर्षित हुए होंगे।

(७) धर्मलपियों का खुदवाना – धर्म के प्रचारार्थ अशोक ने विभिन्न शिलाओं एवं स्तम्भों के ऊपर धम्म के सिद्धान्तों को उत्कीर्ण करवा करके साम्राज्य के विभिन्न भागों में स्थापित करवाया। ये लेख विशाल मौर्य साम्राज्य के प्रत्येक कोने में फैले थे। इनके दो उद्देश्य थे –

  • एक, पाषाणों पर खुदे होने से ये लेख चिरस्थायी होगें तथा
  • द्वितीय, सम्राट अशोक के परवर्ती पुत्र-पौत्रादि प्रजा के भौतिक एवं नैतिक लाभ के लिये उनका अनुसरण कर सकेगें।

[ अयं धमं लिपि लेखापिता किंति चिरंतिस्टेय इति तथा च मे पुत्रा पोता च प्रपोत्रा च अनुवतरं सवलोकहिताय। ] – षष्ठम् बृहद् शिलालेख

इन लेखों में धर्म के उपदेश एवं शिक्षायें लिखी होती थीं। इनकी भाषा संस्कृत न होकर प्राकृत थी और यह उस समय आम जनता की भाषा थी। ऐसी धर्मलपियों ने धर्म को लोकप्रिय बनाया होगा।

(८) विदेशों में धर्म-प्रचारकों को भेजना — सम्राट अशोक ने बौद्ध धर्म के प्रचार के लिये विदेशों में भी प्रचारकों को भेजा। द्वितीय तथा त्रयोदश बृहद् शिलालेखों में सम्राट अशोक उन देशों के नाम गिनाते हैं जहाँ उन्होंने अपने दूत भेजे थे :

  • इनमें दक्षिणी सीमा पर स्थित राज्य चोल, पाण्ड्य, सतियपुत्त, केरलपुत्त एवं ताम्रपर्णि (लंका) बताये गये हैं।
  • तेरहवें शिलालेख में पाँच यवन राजाओं के नाम मिलते हैं जिनके राज्यों में उसके धर्म प्रचारक गये थे – (१) अन्तियोक (सीरियाई नरेश) (२) तुरमय (मिस्री नरेश) (३) अन्तिकिनि (मेसीडोनियन राजा) (४) मग (एपिरस) तथा (५) अलिकसुन्दर (सिरीन)।
    • अन्तियोक सीरिया का राजा एन्टियोकस द्वितीय थियोस (ई० पू० २६१-२४६ ) तथा
    • तुरमय मिस्र का शासक टालमी द्वितीय फिलाडेल्फस (ई० पू० २८५-२४७) था।
    • अन्तिकिन, मेसीडोनिया का एन्टिगोनस गोनाटास (ई० पू० २७६-२३९) माना जाता है।
    • मग से तात्पर्य सीरियाई नरेश मगस (ई० पू० ३००-२५०) से है।
    • अलिकसुन्दर का तादात्म्य सुनिश्चित नहीं है। कुछ विद्वान् इसे एपिरस का एलेक्जेंडर (ई० पू० २७२-२५५) तथा कुछ इसे कोरिन्थ का एलेक्जेंडर (ई० पू० २५२-२४४) मानते हैं। भण्डारकर महोदय दूसरे समीकरण को अधिक तर्कसंगत मानते हैं।
  • इसी शिलालेख में सम्राट हमें बताते हैं कि “जहाँ देवताओं के प्रिय के दूत नहीं पहुँचे वहाँ के लोग भी धर्मानुशासन, धर्म-विधान तथा धर्म प्रचार की प्रसिद्धि सुनकर उनका अनुसरण करते हैं।” ऐसे स्थलों से तात्पर्य सम्भवतया चीन एवं वर्मा (म्यांमार) से है।
    • किन्तु रिजडेविड्स महोदय* इस बात को स्वीकार नहीं करते कि अशोक के राजदूत कभी यवन राज्यों में गये थे। उनके अनुसार यदि अशोक ने इन राज्यों में अपना धर्म प्रचारक भेजा भी हो तो भी उन्हें वहाँ कोई सफलता नहीं मिली। इसका कारण यह है कि यूनानी अपने ही धर्म से अत्यधिक संतुष्ट थे और इस प्रकार वे किसी भारतीय धर्म को ग्रहण नहीं कर सकते थे। अतः अशोक अपने अभिलेख में इन राज्यों में अपने धर्म प्रचारक भेजने का जो दावा करता है वह मिथ्या एवं राजकीय प्रलाप (Royal rhodomontade) से परिपूर्ण है तथा इससे उसका अहंभाव सूचित होता है। यह कहा जा सकता है कि यवनों ने इस बेहूदगी पर हँसी उड़ाई होगी कि ‘एक जंगली उन्हें उनका कर्तव्य बताये। यह कदापि सम्भव नहीं है कि एक विदेशी राजा के कहने से उन्होंने अपने देवताओं तथा अन्ध विश्वासों को त्याग दिया होगा। अशोक के धर्म प्रचारक केवल भारतीय सीमा में ही रहे।

It is difficult to say how much of this is mere royal rhodomontade. It is quite likely that the Greek kings are only thrown in by way of make- weight, as it were; and that no emissaries had been actually sent there at all. Even had they been sent, there is little reason to believe that the Greek self- complacency would have been much disturbed. Asoka’s estimate of the results obtained is better. evidence of his own vanity than it is of Greek do- cility. We may imagine the Greek amusement at the absurd idea of a “barbarian” teaching them their duty; but we can scarcely imagine them dis- carding their gods and their superstitions at the bidding of an alien king. — Buddhist India; p. 298-99. : T. W. Rhys Davids.*

परन्तु अशोक जैसे सदाशय एवं मानवतावादी शासक के प्रति मिथ्याचार, प्रलाप एवं अहंमान्यता का आरोप लगाना उचित नहीं प्रतीत होता जैसा कि उसके लेखों से ध्वनित होता है, उसका उद्देश्य अपने धर्म प्रचारकों के माध्यम से यूनानी जनता को बौद्ध धर्म में दीक्षित करना कदापि नहीं था। वह तो वहाँ रह रहे अपने राजनयिकों तथा पदाधिकारियों को आदेश देना चाहता था कि वे धर्म के प्रचार का कार्य प्रारम्भ कर दें तथा उन राज्यों में लोकहितकारी कार्य, जैसे-मनुष्य तथा पशु जाति के लिये औषधालयों की स्थापना आदि करें। यह सर्वथा उसकी नीतियों के अनुकूल था।

हमें ज्ञात है कि सिकन्दर के बाद आने वाले यवनों ने अपनी प्राचीन संस्कृति को त्याग कर भारतीय संस्कृति को अपना लिया था। मेनान्डर तथा हेलियोडोरस इसके ज्वलन्त उदाहरण है। इसी प्रकार मिस्री नरेश टालमी फिलाडेल्फस ने सिकन्दरिया में एक विशाल पुस्तकालय स्थापित किया जिसका उद्देश्य भारतीय ग्रन्थों के अनुवाद को सुरक्षित रखना था।

ऐसी स्थिति में यदि अशोक के धर्म प्रचार की ख्याति को सुनकर कुछ यूनानी बौद्ध बन गये हों तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं है।

इस प्रचार कार्य का फल यह हुआ कि पश्चिमी एशिया में बौद्ध धर्म का व्यापक प्रचार हुआ। वहाँ के अनेक धार्मिक सम्प्रदायों – ईसाई, एसनस, राप्यूटी आदि – की रीति रिवाजों पर बौद्ध धर्म का प्रभाव देखा जा सकता है। ईसाई तथा बौद्ध धर्मों के कुछ कर्मकाण्ड तो बिल्कुल एक जैसे ही हैं। दोनों धर्मों में पाप-स्वीकृति, उपवास, भिक्षुओं का ब्रह्मचारी रहना, माला धारण करना आदि की प्रथायें हैं। चूँकि ये भारत के बौद्ध धर्म में प्राचीन काल से ही प्रचलित थीं, अतः यह निष्कर्ष स्वाभाविक है कि ईसाइयों ने इन्हें बौद्धों से ही ग्रहण किया होगा तथा यह अशोक के धर्म-प्रचार के फलस्वरूप ही सम्भव हुआ था।

सिंहली अनुश्रुतियों – दीपवंश एवं महावंश – के अनुसार अशोक के राज्य-काल में पाटलिपुत्र में बौद्ध धर्म की तृतीय संगीति हुई। इसकी अध्यक्षता मोग्गलिपुत्त तिस्स नामक प्रसिद्ध बौद्ध भिक्षु ने की थी। इस संगीति की समाप्ति के पश्चात् भिन्न-भिन्न देशों में बौद्ध धर्म के प्रचारार्थ भिक्षु भेजे गये जिनके नाम महावंश में इस प्रकार प्राप्त होते हैं – धर्म प्रचारक

क्र० सं० धर्म प्रचारक देश / क्षेत्र
१. मज्झन्तिक कश्मीर और गन्धार क्षेत्र
२. महारक्षित यवन देश
३. मज्झिम हिमालय देश
४. धर्म रक्षित अपरान्तक
५. महाधर्मरक्षित महाराष्ट्र
६. महादेव महिषमण्डल

( मैसूर या मान्धाता )

७. रक्षित बनवासी

(उत्तरी कन्नड़)

८. सोन और उत्तर सुवर्णभूमि
९. महेन्द्र और संघमित्रा ताम्रपर्णी

(श्रीलंका)

लंका में बौद्ध धर्म प्रचारकों को विशेष सफलता मिली जहाँ सम्राट अशोक के पुत्र महेन्द्र ने वहाँ के शासक तिस्स को बौद्ध धर्म में दीक्षित कर लिया तथा तिस्स ने सम्भवतः इसे राजधर्म बना लिया तथा स्वयं अशोक के अनुकरण पर उसने ‘देवानाम् पिय’ की उपाधि धारण कर ली।

“बौद्ध साहित्य अपने धर्म में तथागत के बाद बाद दूसरा स्थान देते हैं।” जो सत्य ही है। इसको इस तरह भी समझ सकते हैं जैसे कि महात्मा बुद्ध एक विचार है तो सम्राट अशोक उसका मूर्त रूप। जिस तरह आचार्य चाणक्य ने अखिल भारतीय साम्राज्य की कल्पना की और चन्द्रगुप्त मौर्य ने उसे मूर्त रूप दिया। इसी तरह यदि सम्राट अशोक की बौद्ध धर्म से सम्बन्ध में विचार करें तो स्पष्ट हो जाता है कि उनके पुरुषार्थ व अनथक प्रयासों ने स्थानीय छोटे से धर्म को उठाकर भारतीय सीमा ही नहीं अपितु अंतरराष्ट्रीय पटल पर स्थापित कर देते हैं।

इस तरह इन विविध उपायों द्वारा सम्राट अशोक ने स्वदेश एवं विदेश में बौद्ध धर्म का प्रचार किया। इसका परिणाम यह हुआ कि बौद्ध धर्म भारत की सीमाओं का अतिक्रमण कर एशिया के विभिन्न भागों में फैल गया। स्थानीय बौद्ध धर्म को सम्राट अशोक के लगन और पुरुषार्थ ने वैश्विक पटल पर स्थापित कर दिया और अब यह अन्तर्राष्ट्रीय धर्म बन गया। वास्तव में बिना किसी राजनीतिक और आर्थिक स्वार्थ के धर्म के प्रचार का यह पहला उदाहरण था और इसका दूसरा उदाहरण अभी तक इतिहास में उपस्थित नहीं हुआ। (राजबली पाण्डेय कृत प्राचीन भारत, पृष्ठ १८१)

अशोक ‘प्रियदर्शी’ (२७३-२३२ ई० पू०)

कलिंग युद्ध : कारण और परिणाम (२६१ ई०पू०)

1 thought on “अशोक का धम्म”

  1. Rahul Tyagi

    भाई साहब, मान गए ।।। यार इतना अधिक जानकारी वो भी प्रामाणिक अभिलेखों के साथ । गजब।

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