आर्यों का मूल निवास स्थान कहाँ था?

भूमिका

आर्यों का मूल निवास स्थान क्या था? या आर्य मूलतः किस प्रदेश के निवासी थे? वे भारतीय उप-महाद्वीप में बाहर से आये या यहीं के मूल निवासी थे? इत्यादि … ये अत्यन्त विवादग्रस्त प्रश्न हैं। यहाँ कुछ प्रमुख मतों का संक्षेप में उल्लेख किया जायेगा। इन मतों को हम दो भागों में बाँटकर सूक्ष्मता विचार कर सकते हैं :

  • एक, आर्य भारतीय उप-महाद्वीप के ही निवासी थे।
  • द्वितीय, आर्य भारत में बाहर से आये थे। इसमें भी दो उप-विचार हैं :
    • आर्य-आक्रांता-सिद्धान्त।
    • आर्य-आव्रजन-सिद्धान्त।

मूल निवास स्थान सम्बन्धित विचार

आर्यों का मूल निवास स्थान सम्बन्धित विद्वान 
सप्त-सैन्धव प्रदेश डॉ० अविनाश चन्द्र और डॉ० सम्पूर्णानन्द
ब्रह्मर्षि देश पं० गंगानाथ झा
कश्मीर या हिमाचल क्षेत्र डॉ० एल डी० कल्ला
देविका प्रदेश डी० एस० त्रिवेदी
तिब्बत स्वामी दयानन्द सरस्वती एवं पार्जिटर
उत्तरी ध्रुव पं० बाल गंगाधर तिलक
हंगरी या डेन्यूब नदी घाटी पी० गाइल्स
जर्मनी हर्ट एवं पेन्का
दक्षिणी रूस गार्डन चाइल्ड एवं नेहरिंग
मध्य एशिया (बैक्ट्रिया) मैक्स मूलर
पामीर का पठार एडवर्ड मेयर

भारत

अनेक विद्वानों की धारणा है कि आर्य मूलतः भारत के ही निवासी थे तथा यहाँ से वे विश्व के विभिन्न भागों में गये। इसमें से प्रमुख मत इस प्रकार हैं —

  • पं० गंगानाथ झा – ब्रह्मर्षि देश
  • डी० एस० त्रिवेदी – मुल्तान स्थित देविका
  • एल० डी० कल्ला – कश्मीर तथा हिमालय क्षेत्र
  • सप्त सैन्धव प्रदेश – डॉ० अविनाश चन्द्र और डॉ० सम्पूर्णानन्द

ब्रह्मर्षि देश

प्राचीन काल में गंगा-यमुना दोआब को ब्रह्मर्षि देश कहा जाता था। पं० गंगानाथ झा इसी ब्रह्मर्षि देश को आर्यों का मूल निवास स्थान बताते हैं।

परन्तु हम सब जानते हैं कि गंगा और यमुना नदी को ऋग्वैदिक काल में वह स्थान नहीं प्राप्त था जो वर्तमान में प्राप्त है। ऋग्वेद में गंगा नदी का उल्लेख मात्र एक बार जबकि यमुना नदी का उल्लेख केवल तीन बार आता है। इस तरह न तो ऋग्वेद के सम्मत यह मत है और न ही किसी पुरातात्त्विक सामग्री से इसकी पुष्टि होती है। अतः यह मत अमान्य है।

मुल्तान स्थित देविका

डी० एस० त्रिवेदी का कहना है कि आर्य मुल्तान के पास देविका नामक नदी के पास के निवासी थे। परन्तु ऋग्वेद में आर्य बार-बार सप्त सैंधव प्रदेश का उल्लेख किया है। अतः यह मत ग्राह्य नहीं है।

कश्मीर तथा हिमालय क्षेत्र

एल० डी० कल्ला महोदय आर्यों का मूल निवास स्थान कश्मीर और हिमालय का भूभाग बताते हैं। उनका कहना है कि आर्य पर्वतीय क्षेमेन्द्र रहते थे और इसका साम्य हिमालय व कश्मीर से है। परन्तु यह मत न तो स्वयं ऋग्वेद से सिद्ध होता है न ही पुरातत्त्व से।

सप्त-सैंधव प्रदेश

इस मत के प्रतिपादक डॉ० अविनाश चन्द्र और डॉ० सम्पूर्णानन्द जी हैं। इन विद्वानों का कहना है कि जब स्वयं ऋग्वेद बार-बार सप्त-सैन्धव प्रदेश की चर्चा है तो यह विवाद क्यों कि आर्य मूलतः कहाँ के निवासी थे? अतः आर्य निश्चित ही सप्त-सैन्धव प्रदेश के  निवासी थे। ऋग्वेद में सप्त-सैन्धव प्रदेश को ‘देवकृत योनि’ कहा गया है। यहीं पर ‘देवासुर संग्राम’ हुआ और असुर पराजित होकर पश्चिम की ओर चले गये।

विश्लेषण

उपर्युक्त जितने भी मत हैं उनमें से ‘सप्त-सैन्धव प्रदेश’ वाले मत को छोड़कर अन्य सभी तार्किक नहीं लगते हैं। सप्त-सैन्धव को आर्यों का मूल निवास मानने का मत विचारणीय इसलिए है क्योंकि स्वयं ऋग्वेद ही इसकी बार-बार प्रशंसा करता है और इसको ‘देवकृति योनि’ बताया है। फिरभी इस मत की पुष्टि के लिए और अधिक अनुसंधान की आवश्यकता है।

भारतीय उप-महाद्वीप में ही आर्यों के निवास के विरूद्ध जो तर्क दिये जाते हैं वे इस तरह हैं –

एक; सैंधव सभ्यता आर्य सभ्यता से भिन्न एवं इससे अधिक प्राचीन थी। आर्य आक्रांता के रूप में यहाँ आये और हड़प्पा सभ्यता के पतन के लिए वे ही उत्तरदायी हैं।

द्वितीय; यदि आर्य भारत के निवासी होते तो वे सर्वप्रथम अपने देश का ही आर्यीकरण करते। समस्त दक्षिणी भारत आज तक आर्य भाषा-भाषी नहीं है। उत्तर-पश्चिम में बलूचिस्तान से ‘ब्राहुई’ भाषा का पता चलता है जो द्रविड़ परिवार की भाषा थी। यह इस बात का सूचक है कि सम्पूर्ण भारत अथवा कम से कम उसका एक बड़ा भाग भाषा की दृष्टि से अनार्य था। यह आर्यों के भारतीय मूल के सिद्धान्त के विरुद्ध सबसे प्रबल प्रमाण है।

  • The fact that whole of South India and part of Northern India too, are to this day non-Aryan in speech, is the strongest single argument against Indian home hypothesis, especially as the existence of a Dravidian speech pocket Brabui in Baluchistan clearly suggests that the whole or at least a considerable part of India was originally non-Aryan in speech.. – The Vedic Age.

आर्य बाहर से आये

आर्य भारत में बाहर से आये थे इस मत को कई विद्वानों ने भाँति-भाँति से प्रस्तुत किया और अपने मत के पक्ष में तर्क व साक्ष्य प्रस्तुत किये हैं। इसमें से दो समूह बन गये हैं – एक वे जो यह मानते हैं कि आर्य आव्रजित होकर कई लहरों या चरणों या समूहों में भारतीय उप-महाद्वीप में आये। दूसरे वे जो यह मानते हैं कि आर्य आक्रांता के रूप में भारत आये और अपनी पूर्ववर्ती सैन्धव सभ्यता का विनाश कर दिया। इसमें प्रमुख मत इस प्रकार हैं :

  • उत्तरी ध्रुव – बाल गंगाधर तिलक
  • एशिया
    • मध्य एशिया – मैक्स मूलर
    • बैक्ट्रिया – रोड्स
    • पामीर का पठार – एडवर्ड मेयर
  • यूरोप
    • जर्मनी – पेनका, हर्ट
    • हंगरी – गार्डन
    • दक्षिणी रूस – मेयर, पीक, गार्डन चाइल्ड

उत्तरी ध्रुव

आर्यों का आदि स्थान उत्तरी ध्रुव में मानने वाले सर्वप्रथम विद्वान बाल गंगाधर तिलक है। तिलक जी का विचार है कि आर्यों ने ऋग्वेद की रचना सप्त सैन्धव प्रदेश में किया था। इसमें एक सूक्त के अन्तर्गत दीर्घकालीन उषा की स्तुति मिलती है। दीर्घकालीन उषा उत्तरी ध्रुव में ही दिखायी देती है। महाभारत में सुमेरुपर्वत का वर्णन मिलता है जहाँ छः महीने का दिन तथा छः महीने की रात होती है। यहाँ भी उत्तरी ध्रुव की ओर ही संकेत है। अतः हम कह सकते है कि आर्य उत्तरी ध्रुव के ही निवासी थे और इसी कारण उनके मस्तिष्क में अपनी मूल भूमि की स्मृति बनी हुई थी।

किन्तु तिलक जी का उपर्युक्त मत कोरे साहित्य पर आधारित होने के कारण मान्य नहीं है। स्वयं आर्यों ने ही सप्त सैन्धव प्रदेश को ‘देवताओं द्वारा निर्मित’ (देवकृत योनि) कहा है। यदि उत्तरी ध्रुव उनका आदि देश होता तो कहीं न कहीं स्पष्ट रूप से उसका उल्लेख वे करते।

  • The Arctic Home in the Vedas

एशिया

अनेक विद्वानों ने एशिया के विभिन्न क्षेत्रों में आर्यों का मूल निवास स्थान स्वीकार किया है।

  • मैक्समूलर – मध्य एशिया,
  • रोड्स – बैक्ट्रिया
  • एडवर्ड मेयर – पामीर का पठार

मध्य एशिया

प्रसिद्ध जर्मन विद्वान ‘मैक्स मूलर’ ( Max Muller ) के अनुसार आर्य मध्य एशिया के बैक्ट्रिया के निवासी थे। यह आल्प्स पर्वत के पूर्व में कैस्पियन सागर के पास ‘यूरेशिया’ क्षेत्र में स्थित था। इन्होंने ईरानी धार्मिक ग्रन्थ ‘जिंद अवेस्ता’ और ‘ऋग्वेद’ के सापेक्षिक अध्ययन के आधार पर यह निष्कर्ष प्रस्तुत किया। इन दोनों ग्रंथों में भाषाई समानता के साथ-साथ देवताओं, वृक्षों, पशुओं आदि में समता मिलती है; यथा –

  • ऋग्वेद में इंद्र, जिंद अवेस्ता में इंद्र,
  • ऋग्वेद में वायु, जिंद अवेस्ता में वयु,
  • ऋग्वेद में मित्र, जिंद अवेस्ता में मिथ्र आदि।
  • इसके अतिरिक्त भुज, देवदार, मैपिल जैसे वृक्षों के नामों में समानता है। 
  • पशुओं के नामों में समानता है; जैसे – कुत्ता, अश्व आदि।

मैक्स मूलर का दावा है कि जिंद अवेस्ता पहले लिखी गयी और उसी क्षेत्र बैक्ट्रिया के आसपास के लोग आर्य थे।

वर्तमान में यह मत अधिक मान्य है। यही मत हमारी वर्तमान अकादमिक स्तर पर पढ़ाया जा रहा है।

आलोचना : परन्तु बहुत-से विद्वानों का मत है कि आर्य लोग मूल रूप से भारत के ही निवासी थे और वे कहीं बाहर से यहाँ नहीं आए थे। इन विद्वानों ने अपने मत के समर्थन में यह तर्क दिया है कि —

  • ऐसा पुरातात्त्विक या जीव-वैज्ञानिक साक्ष्य (प्रमाण) नहीं है, जिसके आधार पर यह सिद्ध किया जा सके कि ५,००० ई०पू० से ८०० ई०पू० के बीच कोई नया जन-समुदाय यहाँ आया था। इसका अर्थ यह हुआ कि यदि आर्य लोग अथवा और भी किसी जाति समुदाय के लोग भारत में आकर बसे तो उनका आगमन कम-से-कम आठ-नौ हजार वर्ष पहले अथवा ८०० ई०पू० के बाद हुआ होगा। लेकिन इन दोनों समय-सीमाओं के बारे में भी कोई साक्ष्य उपलब्ध नहीं है।
  • इसके अतिरिक्त एक बात यह भी है कि नर कंकालों के जो अवशेष विभिन्न हड़प्पाई स्थलों से प्राप्त हुए हैं, वे उसी भौगोलिक क्षेत्र के आधुनिक निवासियों के कंकालों से मिलते-जुलते हैं।

एडवर्ड मेयर का विचार है कि पामीर के पठार से ही इण्डो-ईरानी जाति पूर्व में पंजाब तथा पश्चिम में मेसोपोटामिया की ओर गयी। इस मत का समर्थन ओल्डेनवर्ग तथा कीथ आदि विद्वानों ने भी किया है।

ब्रेन्डेस्टोन महोदय ने बताया है कि भारतीय भाषाकोश से प्रकट होता है कि आर्य मूलतः एक पर्वत के नीचे घास के मैदान में निवास करते थे। यह मैदान यूराल पर्वत के दक्षिण में स्थिर किर्जिग का मैदान था।

यूरोप

आर्यों के मूल निवास को यूरोप में मानने वाले विद्वानों का कहना है कि कि भारोपीय भाषा-भाषी परिवार के मुहावरों का प्रसार यह सिद्ध करता है कि आर्यों का मूल निवास स्थान एशिया को अपेक्षा यूरोप में खोजना अधिक तर्कसंगत होगा। यूरोप महाद्वीप के विभिन्न स्थानों— जर्मनी, हंगरी तथा दक्षिणी रूस में विद्वानों ने आर्यों का मूल स्थान निर्धारित करने के पक्ष में अपने-अपने तर्क प्रस्तुत किये हैं। इनका विवरण इस प्रकार है-

जर्मनी

जर्मनों को आर्यों का आदि देश मानने वाले विद्वानों में पेनका, हर्ट (Hirt) आदि प्रमुख हैं। उनके तर्क इस प्रकार है —

  • मध्य जर्मनी में स्थित स्कन्डेनीविया नामक स्थान कभी भी विदेशी आधिपत्य में नहीं रहा तो भी यहाँ के निवासी भोरोपीय भाषा बोलते थे। इससे सिद्ध होती है कि भारोपीय भाषा का मूल स्थान यहाँ था।
  • पश्चिम बाल्टिक सागर के तट से सर्वप्राचीन एवं अति साधारण वस्तुएँ पायी गयी है। यहाँ से प्राप्त पाषाणोपकरण अत्यन्त कलापूर्ण एवं तकनीकी दृष्टि से उत्तम कोटि के हैं। ये सब भारोपीयों की कृतियाँ हैं। मध्य जर्मनी से भी प्रागैतिहासिक काल के कुछ मृद्भाण्ड पाये गये है। इन्हें भी प्राचीन आर्यों से ही सम्बन्धित किया गया है।
  • आर्यों को शारीरिक विशेषताएँ भी उन्हें जर्मनी का आदिवासी बताती है। जैसे उनकी एक प्रमुख विशेषता भूरे वालों का होना है। आज भी जर्मनी के लोग भूरे बालों वाले पाये जाते हैं।

आलोचना – परन्तु यदि उपर्युक्त तर्कों की समालोचनात्मक परीक्षण की जाय तो बड़ी आसानी से उनका खण्डन हो जायेगा। एकमात्र भाषाई आधार पर स्कैन्डेनीविया को आर्यों का मूल स्थान नहीं माना जा सकता। किसी स्थान की भाषा का परिवर्तित न होना उसके बोलने वालों की प्रगतिहीनता तथा संकीर्णता को भी सूचित करता है न कि उसकी प्राचीनता को। बाल्टिक सागर तथा मध्य जर्मनी से मिलते-जुलते उपकरण तथा मृद्भाण्ड कुछ अन्य स्थानों जैसे दक्षिणी रूस, पोलैण्ड, त्रिपोल्जे आदि से भी मिलते हैं। कुछ उपकरण जर्मनी के उपकरणों से भी अधिक प्राचीन हैं। जहाँ तक भूरे बालों का प्रश्न है यह एक मात्र जर्मनी के निवासियों की ही विशेषता नहीं है। पतंजलि ने भारतीय ब्राह्मणों को भी भूरे बालों वाला बताया है, तो क्या हम केवल इसी आधार पर भारत को आर्यों का आदि देश स्वीकार कर सकते हैं।

हंगरी

आर्यों का मूल निवास स्थान हंगरी अथवा डेन्यूब नदी घाटी के मानने वाले विद्वानों में पी० गाइल्स सर्वप्रमुख हैं। विभिन्न भारोपीय भाषाओं का तुलनात्मक अध्ययन करने के बाद उन्होंने यह बताया है कि आर्य मूलतः एक ऐसे स्थान में रहते थे जहाँ पर्वत, नदियाँ, झील आदि थे तथा गेहूँ, जो की प्रमुख रूप से खेती की जाती थी और गाय, बैल, भेंड़, घोड़ा, कुत्ता आदि पशु पाले जाते थे। ये सभी विशेषतायें हंगरी प्रदेश अथवा डेन्यूब नदी घाटी में प्राप्त होती है। अतः यहाँ आर्यों का मूल निवास स्थान रहा होगा।

किन्तु यह मत भी असंगत है। इस प्रकार की विशेषतायें कुछ अन्य स्थानों में भी पाई जाती हैं। मात्र भाषाविज्ञान के आधार पर इस समस्या का हल निकालना उचित नहीं लगता।

दक्षिणी रूस

कुछ पुरातत्वीय एवं भाषाशास्त्रीय सामग्रियों के आधार पर मेयर, पीक तथा गार्डन चाइल्ड्स ने दक्षिणी रूस को आर्यों का मूल निवास स्थान स्वीकार किया है। दक्षिणी रूस में किये गये उत्खनन से लगभग उसी प्रकार की संस्कृति के अवशेष मिले हैं जो आर्यों के समय में थे। यहाँ की खुदाई से अश्व का अवशेष भी मिला है जो आर्यों का प्रिय पशु था। पिगट महोदय के अनुसार आर्य दक्षिणी रूस के एक विस्तृत प्रदेश पर निवास करते थे।

  • The Aryans – A Study of Indo-European Origins – V. Gordon Childe

दक्षिणी रूस के त्रिपोल्जे से लगभग तीस हजार ईसा पूर्व के मृद्भाण्ड प्राप्त हुए हैं। इस आधार पर नेहरिंग ने दक्षिणी रूस को आर्यों का आदि देश बताया है। भारोपीय तथा मध्य रूस की फिनो-उग्रीयन (Finno-Ugrian) भाषाओं में आश्चर्यजनक समता दिखायी देती है जो इस बात की सूचक है कि भारोपीय तथा मध्य रूस की जाति में प्राचीन काल से ही ऐतिहासिक सम्पर्क था। अतः उक्त विद्वानों के अनुसार दक्षिणी रूस को आर्यों का मूल निवास स्थान स्वीकार किया जा सकता है।

विश्लेषण

इस प्रसंग में उल्लेखनीय है कि आर्यों को विदेशी मूल का मानने का मत प्रधानतया भाषा विज्ञान पर आधारित होने के कारण बहुत अधिक सबल नहीं है। वेद में कोई उद्धरण ऐसा नहीं है जो यह सिद्ध कर सके कि आर्य यहाँ आक्रान्ता के रूप में आये थे।

‘आर्य’ शब्द को जातिवाची मानना ठीक नहीं है। ऋग्वेद के मंत्रों में प्रयुक्त शब्दों की संख्या १,५३,९७२ है जिसमें ‘आर्य’ शब्द मात्र ३३ बार ही आता है।

भाषाविदों ने तुलनात्मक भाषा विज्ञान को एक प्रामाणिक शास्त्र के रूप में प्रतिष्ठित किया है किन्तु भाषा एक सांस्कृतिक इकाई है जिसका किसी जाति विशेष से सम्बन्ध स्थापित करना उचित नहीं है। एक ही प्रजाति के लोग विभिन्न भाषाभाषी हो सकते है।

ऋग्वेद में आर्य तथा दास-दस्यु के बीच जो विभेद किया गया है वह प्रजातीय न होकर धार्मिक लगता है। आर्य तथा दास-दस्यु किसी जन समुदाय, प्रजाति अथवा जनजाति के नाम नहीं लगते। इनका विरोध धार्मिक व अधार्मिक का विरोध है। दास-दस्यु का प्रयोग परिचारक के रूप में भी मिलता है। ‘दस्यु’ शब्द ईरानी भाषा में भी मिलता है जो ग्रामीण जन का सूचक है।

जहाँ तक ‘ब्राहुई’ भाषा का प्रश्न है इसका दक्षिण की द्रविड़ भाषा से दूर का सम्बन्ध ही हो सकता है। उत्तर-पश्चिम में इसके व्यापक प्रचलन का प्रमाण नहीं मिलता। कुछ विद्वानों का कहना है कि बलूचिस्तान में ब्राहुई भाषा-भाषी लोग बाहर से आये थे जबकि कुछ विद्वान् इस भाषा को बोलचाल की आधुनिक पूर्वी एलमी (Modern Eastern Colloquial Elamite) भाषा बताते है। यह भी दृष्टव्य है कि गोदावरी के दक्षिण में सैन्धव सभ्यता का कोई साक्ष्य नहीं मिलता।

जहाँ तक इन्द्र को ‘पुरन्दर’ अर्थात् पुरों को ध्वस्त करने वाला कहे जाने का प्रश्न है, इस सम्बन्ध में उल्लेखनीय है कि कोटदीजी तथा कालीबंगन के प्राक् सैन्धव स्थलों से भी दुर्गीकरण के साक्ष्य मिल चुके हैं। स्वयं सिन्धु सभ्यता के लोगों द्वारा पूर्ववर्ती संस्कृति के दुर्गों का भेदन किया जाना भी संभव है। ऐसी स्थिति में अब केवल आर्यों के ही देवता को ‘पुरन्दर’ नहीं कहा जा सकता। पुनश्चः इससे यह भी निष्कर्ष निकलता है कि इन्द्र शत्रु नगरों का विजेता था।

पुरातत्त्व से भी आर्यों के आक्रान्ता होने की बात पुष्ट नहीं होती। अब प्रायः सभी विद्वान् इसे स्वीकार करने लगे है कि इस बात का कोई स्पष्ट प्रमाण नहीं है कि आर्य विदेशी आक्रान्ता थे।

जो विद्वान् आर्यो को विदेशी मूल का मानते हैं उनका आधार मैक्समूलर द्वारा निर्धारित ऋग्वेद की तिथि है। सूत्र साहित्य को ई० पू० ६००-२०० में रखते हुए वे इसके पूर्ववर्ती साहित्य जिसका विभाजन के ब्राह्मण काल, मन्त्रकाल, तथा छन्दकाल में करते हैं, के लिये दो-दो सौ वर्षों की अवधि निर्धारित करते हुए प्रस्तावित करते हैं कि वैदिक मन्त्रों की रचना लगभग १,२०० ई० पू० में हुई। यह निष्कर्ष उस समय तक ठीक था जब तक पश्चिम के लोगों को वैदिक साहित्य के विषय में बहुत कम ज्ञात था। परन्तु अब यह मत अमान्य हो गया है। स्वयं मैक्समूलर ने भी अपने जीवन के अन्तिम दिनों में इसे त्याग दिया था। पुनश्च मैक्समूलर द्वारा निर्धारित तिथिक्रम को विधि संदिग्ध है और इसे सत्य नहीं माना जा सकता।

सुप्रसिद्ध मानवविज्ञानी और कैंब्रिज विश्वविद्यालय के प्रोफेसर ‘एडमंड लीच’ ( Prof. Edmund Leach ) ने आर्यों के आक्रमण के सिद्धांत के संपूर्ण प्रश्न पर भलीभाँति विचार करके अत्यंत उपयुक्त ढंग से अपना निष्कर्ष निकाला है। सन् १९९० में ‘Culture Through Time : Anthropological Approaches’ नामक पुस्तक में प्रकाशित अपने प्रसिद्ध लेख ‘Aryan Invasions Over Four Millennia’ में प्रो० लीच ने लिखा है :

“विचारशील विद्वान अब भी यह विश्वास क्यों करते हैं कि आर्यों का आक्रमण हुआ था ? (…) इस प्रकार की कल्पना अब भी आकर्षक क्यों है? इसे कौन आकर्षक पाता है? प्रारंभिक संस्कृत के विकास को आर्यों के आक्रमण के साथ जोड़ने की हठधर्मी क्यों बरती जा रही है? (…) इस सिद्धांत के ब्योरे तो नस्लवाद की चौखट में ही फिट बैठते हैं। (…) ब्रिटिश औपनिवेशिक साम्राज्यवाद के सृष्टि की उत्पत्ति संबंधी मिथक ने भारतीय सिविल सेवा के प्रबुद्ध प्रशासकों को स्वयं यह बता दिया कि वे एक ऐसे देश में विशुद्ध सभ्यता ला रहे हैं, जहाँ अत्यंत परिष्कृत कोटि की सभ्यता लगभग ६,००० वर्ष पहले से ही विद्यमान थी । यहाँ मैं यह बता देना चाहूँगा कि ब्रिटेन के मध्यम वर्ग की कल्पना इस मिथक से इतनी अधिक अभिभूत है कि आज जबकि हिटलर को मरे ४४ वर्ष बीत चुके हैं और दो स्वतंत्र देशों के रूप में भारत तथा पाकिस्तान का उदय हुए ४३ साल गुजर चुके हैं, ईसा से दो सहस्राब्दी पूर्व हुए आर्यों के तथाकथित आक्रमणों को अब भी प्रामाणिक ऐतिहासिक तथ्य के रूप में माना जा रहा है (…) सच मानिए, आर्यों के आक्रमण तो कभी हुए ही नहीं।”

निष्कर्ष

निष्कर्ष रूप में हम कह सकते हैं कि आर्यों के मूल निवास स्थान का निर्धारण निश्चित रूप से अभी तक नहीं हो पाया है। परन्तु अकादमिक रूप से मध्य एशिया के बैक्ट्रिया को मोटे-तौर पर आर्यों का मूल निवास माना और पढ़ाया जाता रहा है।

अभी हाल में आर्य डी०एन०ए० की नवीन पद्धति का सहारा लिया जा रहा है। इस आर्य डी०एन०ए० को ‘R1a1’ नाम दिया गया है। राखीगढ़ी से मिले २,५०० ई०पू० के एक मादा ( महिला ) कंकाल के आनुवंशिक अध्ययन के बाद एक रिपोर्ट प्रकाशित हुई है ( सितंबर, २०१९ में )। इस अध्ययन से सम्बंधित प्रमुख विद्वानों में प्रो० वसंत सिंदे और डॉ० नीरज राय हैं। इसने कई बातों की ओर संकेत किया है। फिरभी ऐसे ही और अनुसंधानों की आवश्यकता है जिससे कि निश्चित निष्कर्ष पर पहुँच सकें।

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