सांख्य दर्शन

सांख्य दर्शन

 

परिचय

सांख्य दर्शन सभी प्राचीन दर्शनों में सबसे प्राचीन है। इसके प्रवर्तक महर्षि कपिल हैं। इसकी सबसे प्राचीन और प्रामाणिक ग्रंथ ‘सांख्यकारिका’ है जिसकी रचना ईश्वरकृष्ण ने की थी। विद्वान गोविन्द चन्द्र पाण्डेय ने इसकी उत्पत्ति अवैदिक श्रमण विचारधारा से माना है। 

सांख्य के दो अर्थ हैं — संख्या और सम्यक् ज्ञान। इसमें २५ तत्त्वों का विवरण मिलता अतः इसे संख्या का दर्शन ( Philosophy of Numbers ) भी कहा जाता है। महाभारत और गीता में सांख्य शब्द का प्रयोग सम्यक् ज्ञान के अर्थ में हुआ है। यह पूर्णतया बौद्धिक  एवं सैद्धान्तिक सम्प्रदाय है।

सांख्य दर्शन के प्रमुख सिद्धान्त

सत्कार्यवाद

यह सांख्य दर्शन का मुख्य आधार है। ‘सत्कार्यवाद’ का अर्थ है कि कार्य अपनी उत्पत्ति के पूर्व कारण में विद्यमान ( सत् ) रहता है। सत्कार्यवाद के आधार पर दर्शन दो भागों में बँटे हैं — एक, वे जो सत्कार्यवाद को मान्यता देते हैं उन्हें सत्कार्यवादी दर्शन कहते हैं; द्वितीय, वे जो इस विचारधारा में विश्वास नहीं करते उन्हें असत्कार्यवादी दर्शन कहते हैं। असत्कार्यवादी दर्शन में प्रमुख हैं — बौद्ध, न्याय और वैशेषिक आदि।

सांख्य मत सत्कार्यवाद के पक्ष में निम्न तर्क देता है —

  1. कार्य वस्तुतः कारण की अभिव्यक्ति मात्र है। इसके लिए सांख्यवादी तिल ( कारण ) और तेल ( कार्य ) का उदाहरण देते हैं। दूसरी ओर बालू से तेल नहीं पैदा होता है।
  2. प्रत्येक वस्तु से प्रत्येक वस्तु की उत्पत्ति नहीं होती या यूँ कहें कि वस्तु विशेष की उत्पत्ति वस्तु विशेष से होती है; जैसे — तिल से तिल और दूध से दही।
  3. केवल योग्य कारण से ही अभीष्ट कार्य उत्पन्न होता है। उत्पत्ति कारण का प्रत्यक्षीकरण मात्र है।
  4. कार्य अपने कारण का सार है। कार्य और कारण वस्तुतः समान प्रक्रिया के व्यक्त और अव्यक्त रूप हैं। कपड़ा धागों में, तेल तिल में, दही दूध में अव्यक्त रूप से वर्तमान रहता है। जब उत्पत्ति की सभी बाधाओं को दूर कर दिया जाता है तो कारण ( धागों, तिल, दूध ) कार्य ( वस्त्र, तेल, दही ) के रूप में प्रकट होता है।

इस सम्बंध में सांख्यकारिका में कहा गया है —

“असद्कारणात् उपादान ग्रहणात् सर्वसंभवाभावात् शक्तस्य शक्यकरणात् करणाभावाच्च सत्कार्यवाद।”

सत्कार्यवाद के दो भेद हैं :—

  1. परिणामवाद —इसका तात्पर्य है कि कारण वास्तविक रूप से कार्य में परिवर्तित होता है; जैसे — तिल तेल में, दूध दही में में बदल जाता है।
  2. विवर्तवाद — इसके अनुसार परिवर्तन आभासी होता है न कि वास्तविक; जैसे — रज्जु से सर्प का आभास मात्र है।
  • सांख्य दर्शन परिणामवाद का समर्थक है परन्तु वह विवर्तवात को मान्यता नहीं देता है। विवर्तवाद के समर्थक अद्वैत वेदांती हैं।

सांख्य दर्शन द्वैतवादी दर्शन है। इसमें प्रकृति और पुरुष नामक दो स्वतंत्र शक्तियों की सत्ता स्वीकार किया गया है जिसके संयोग से सृष्टि की उत्पत्ति होती है।

प्रकृति

यह सृष्टि का आदिकारण है और इसे प्रधान एवं अव्यक्त की संज्ञा दी गयी है। प्रकृति नित्य और निरपेक्ष है। प्रकृति का कोई कारण नहीं है वरन् यह स्वयं सभी कार्यों का मूल स्रोत / मूल कारण है।

प्रकृति में तीन गुण होते हैं — सत्व, रजस् और तमस्। इन तीनों की साम्यावस्था का नाम ही प्रकृति है। ये गुण प्रकृति के अंगभूत तत्त्व ( Component factors ) हैं। इन तीन गुणों से मिलकर बनी होने पर भी प्रकृति इन पर आश्रित नहीं है। यहाँ गुण का अर्थ है सामान्य गुण अथवा धर्म से नहीं है अपितु गुण का अर्थ है धर्म, सहकारी और रस्सी की डोरी

प्रकृति के तीनों तत्त्व रस्सी की डोरियों की भाँति मिलकर पुरुष को बाँधते हैं, अतः इन्हें गुण कहते हैं अथवा पुरुष के उद्देश्य में सहायक होने के कारण ये गुण हैं।

सत्व प्रकाश और प्रसन्नता का, रजस् क्रियाशीलता का और तमस् स्थिरता अवरोध और मोह का प्रतीक है। सभी सांसारिक वस्तुओं में ये तीनों गुण दिखायी देते हैं क्योंकि वे सभी प्रकृति से उत्पन्न हुई हैं।

सत्व, रजस् और तमस् क्रमशः शुक्ल ( श्वेत ), रक्त ( लाल ) और कृष्ण ( काला ) वर्ण के रूप में कल्पित किया गया है। 

ये तीनों गुण एक साथ रहते हैं अर्थात् तीनों का अन्योन्याश्रित सम्बंध है। एक के बिना दूसरा नहीं रह सकता है और न ही कोई कार्य कर सकता है। इन तीनों की तुलना तेल, बत्ती और दीपक से की गयी है जो परस्पर मिलकर प्रकाश उत्पन्न करते हैं। 

तीनों गुणों में जो प्रबल होता है उसी के अनुसार वस्तु का स्वरूप निर्धारित होता है। 

गुण निरन्तर परिवर्तित होते रहते हैं और गुणों में परिवर्तन दो प्रकार से होता है — 

  • सरूप परिणाम — यह प्रलय की अवस्था है। इस अवस्था में तीनों गुणों में साम्यावस्था होती है और ये गुण अपने मौलिक स्वरूप में परिवर्तित हो जाते हैं। इस अवस्था में किसी प्रकार की उत्पत्ति नहीं होती है। इसी को प्रकृति कहते हैं।
  • विरूप परिणाम — प्रलय काल की साम्यावस्था में जब तीन गुणों में से कोई एक गुण प्रबल हो जाता है और अन्य दो गुण उसके अधीन तब सृष्टि के विकास का क्रम प्रारम्भ होता है। इसे ही विरूप परिणाम या परिवर्तन कहा जाता है। इस समय गुणों में क्षोभ उत्पन्न होता है और साम्यावस्था उद्विग्न हो जाती है। ऐसा तभी होता है जब प्रकृति, पुरुष के ‘संसर्ग’ में आती है

 

पुरुष

सांख्य दर्शन का द्वितीय मुख्य तत्त्व पुरुष ( आत्मा ) है। आत्मा का स्वरूप नित्य, सर्वव्यापी और शुद्ध चैतन्य है। चैतन्यता आत्मा का मूल स्वभाव है। यह शरीर, इन्द्रिय, मन एवं बुद्धि से भिन्न है। आत्मा सदैव ज्ञाता के रूप में रहता है और यह ज्ञान का विषय नहीं हो सकता। आत्मा को निस्त्रैगुण्य, उदासीन, अकर्त्ता, केवल, मध्यस्थ, साक्षी, द्रष्टा, सदाप्रकाशस्वरूप, ज्ञाता आदि कहा गया है। आत्मा में  किसी भी प्रकार का विकार अथवा परिवर्तन नहीं होता, अपितु विकार या परिवर्तन तो प्रकृति के धर्म हैं।

सांख्य मत जैन दर्शन की भाँति ‘अनेकात्मवादी’ है। प्रत्येक जीव में भिन्न-भिन्न आत्मा होती है। इस प्रकार जहाँ प्रकृति एक है वहीं पुरुष ( आत्मा ) अनेक माने गये हैं। पुरुष नित्य द्रष्टा अथवा ज्ञाता के रूप में विद्यमान होते हैं। वे चैतन्य स्वरूप हैं।

 

जगत् की उत्पत्ति और विकास

पुरुष के संसर्ग से प्रकृति के गुणों की साम्यावस्था विकृति हो जाती है और सृष्टि की उत्पत्ति होती है। सृष्टि का उद्देश्य पुरुष का हितसाधन करना है। पुरुष को भोग और कैवल्य दोनों के लिए प्रकृति की आवश्यकता होती है। दूसरी ओर प्रकृति को ज्ञात होने के निमित्त पुरुष की आवश्यकता होती है।

सृष्टि द्वारा पुरुष के भोग के निमित्त वस्तुएँ उत्पन्न होती हैं और जब पुरुष अपने स्वरूप को पहचान कर प्रकृति से विभेद स्थापित कर लेता है तब उसकी मुक्ति हो जाती है।

सांख्यकारिका में एक दूसरे का अन्योन्याश्रित सम्बंध इस तरह बताया गया है :— 

“पुरुषस्य दर्शनार्थम् कैवल्यार्थम् तथा प्रधानस्य पंग्वन्धवद् उभयोरपि संयोगस् तत्कृतः सर्गः।” 

 

पुरुष के संसर्ग से प्रकृति के गुणों में क्षोभ जन्म होता है। त्रिगुणों में सर्वप्रथम रजस् गुण क्रियाशील होता है जिसके कारण अन्य उसे संतुलित और प्रतिसंतुलित करने के लिए अथवा परस्पर अधिकार करने हेतु उद्वेलित हो उठते हैं। तीनों गुणों के संयोग से विभिन्न सांसारिक वस्तुओं का निर्माण होता है।

प्रकृति का पुरुष से संसर्ग होने से ‘महत्’ या ‘बुद्धि’  तत्त्व उत्पन्न होता है। यह प्रकृति का प्रथम विकार है। इसे महत्-तत्त्व भी कहते हैं। बुद्धि बाह्य जगत् की वस्तुओं का विशाल बीज है। जब सत्त्व गुण की प्रधानता होती है तब बुद्धि तत्त्व की उत्पत्ति होती है। बुद्धि ज्ञाता और ज्ञेय का भेद कराती है। जब बुद्धि में सत्त्व गुण की प्रधानता होती है तब सात्विक बुद्धि के फल होते हैं — धर्म, ज्ञान, वैराग्य और ऐश्वर्य। परन्तु जब तमस् गुण की प्रधानता होती है तब तामसिक बुद्धि से अधर्म, अज्ञान, आसक्ति और अशक्ति की उत्पत्ति होती है।

बुद्धि से अहंकार का जन्म होता है। बुद्धि में ‘मैं’ और ‘मेरा’ का भाव अहंकार है। अहंकार का कार्य अभियान को उत्पन्न करना होता है। पुरुष भ्रमवश अपना तादात्म्य अहंकार से स्थापित कर लेता है और स्वयं को कर्त्ता, भोक्ता, कामी और स्वामी समझने लगता है। अहंकार के तीन भेद हैं :—

(१) सात्विक – इसमें सत्व की प्रधानता होती है जिससे मन, पाँच ज्ञानेन्द्रियों और पाँच कर्मेन्द्रियों की उत्पत्ति होती है।

  • पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ हैं — आँख, कान, नाक, जीभ और त्वचा।
  • पाँच कर्मेन्द्रियाँ — मुख, हाथ, पैर, मलद्वार और जननेंद्रिय।

(२) तामसइसमें तमस् की प्रधानता होती है। इससे पाँच तन्मात्रों की उत्पत्ति होती है। तन्मात्र ( Subtle essence ) का अर्थ है पंचमहाभूतों का मूल सूक्ष्म रूप। 

  • पाँच तन्मात्र हैं — शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध।
  • इन्हीं पंच तन्मात्रों से पंचमहाभूतों की उत्पत्ति होती है — आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी एवं इसकी इनके गुण क्रमशः शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध हैं।

(३) राजस – इसमें रजस् की प्रधानता होती है। यह सात्विक और तामस को गति प्रदान करता है।

इस प्रकार सृष्टि का विकास प्रकृति से प्रारम्भ होकर पंच महाभूतों पर समाप्त होता है। इस तरह यह २४ तत्त्वों का खेल मात्र है। पुरुष को मिलाकर सांख्य मत का २५ तत्त्व स्वीकार किया गया है। पुरुष इस विकास की परिधि से बाहर रहकर इसका द्रष्टामात्र होता है। पुरुष न तो कारण है और न ही कार्य। प्रकृति कारण मात्र है। महत्, अहंकार और पाँच तन्मात्र कार्य एवं कारण दोनों ही ही हैं। पंच महाभूत और मन कार्य मात्र होते हैं।

बंधन और मोक्ष

सांख्य मत में संसार दुःखों से परिपूर्ण माना गया है। जिन्हें हम दुःख समझते हैं वे अन्ततः दुःख ही प्रदान करते हैं। दुःख तीन प्रकार के बताये गये हैं :—

  1. आध्यात्मिक दुःख 
  2. आधिभौतिक दुःख
  3. आधिदैविक दुःख 

मनुष्य के जीवन का उद्देश्य इन तीनों दुःखों से छुटकारा प्राप्त करना है। मोक्ष का अर्थ है सभी प्रकार के दुःखों से मुक्ति। यही अपवर्ग अथवा पुरुषार्थ है। अविवेक या अज्ञान बन्धन का कारण है।

पुरुष स्वतंत्र और शुद्ध चैतन्यस्वरूप है। यह देश, काल और कारण से सीमातीत एवं निर्गुण और निष्क्रिय है। शारीरिक और मानसिक विकार इसको प्रभावित नहीं करते हैं। सुख और दुःख मन के विषय हैं, पुरुष के नहीं। किन्तु अज्ञान के वशीभूत हो पुरुष स्वयं का तादात्म्य प्राकृतिक विकारों; यथा – बुद्धि और अहंकार आदि, से कर बैठता है। यह स्वयं को ही शरीर, इन्द्रिय, मन और बुद्धि मान लेता है। पुरुष स्वयं को कर्त्ता और भोक्ता मान लेता है जिससे नाना प्रकार के दुःखों को प्राप्त होता है।

दुःखों और बंधन से मुक्ति का एकमात्र साधन ‘विवेक ज्ञान’ है। सांख्यकारिका में कहा गया है —

“ज्ञानेन चापवर्गो विपर्ययात् इष्यते बन्धः।”

विवेक ज्ञान का अर्थ है पुरुष का स्वयं को प्रकृति के विकारों से अलग समझ लेना। विवेक ज्ञान की प्राप्ति निरन्तर साधना से होती है। इस साधना का विवरण ‘योगदर्शन’ में मिलता है और यह सांख्य दर्शन का व्यावहारिक पक्ष है।

सांख्य दर्शन में दो प्रकार की मुक्ति का उल्लेख मिलता है :—

  1. जीवनमुक्ति 
  2. विदेहमुक्ति

 

सांख्य में मोक्ष का अर्थ है सभी प्रकार के दुःखों से मुक्ति और इसमें पुरुष अपने अपने शुद्ध चैतन्यस्वरूप को प्राप्त होता है। सांख्य दर्शन की मोक्षावस्था आनन्द रहित है क्योंकि जहाँ दुःख नहीं वहाँ सुख भी नहीं हो सकता है। सुख या आनन्द सतोगुण की देन है तथा मोक्ष त्रिगुण निरपेक्ष होता है। पुरुष का बन्धन में पड़ना भ्रममात्र है। पुरुष बन्धन तथा मोक्ष की सीमाओं से परे है। केवल प्रकृति ही बंधनग्रस्त होती है।

 

ईश्वर

ईश्वर की सत्ता के विषय में सांख्य मतानुयायियों में मतभेद है। इस सम्बन्ध में दो मत है — ईश्वरवादी सांख्य और अनीश्वरवादी सांख्य।

(१) ईश्वरवादी सांख्य — यह मत ईश्वर की सत्ता को नहीं मानता था। उसके अनुसार यह कार्य-कारण शृंखला का परिणाम है जिसके विकास के लिये प्रकृति और पुरुष ही समर्थ है। इसमें ईश्वर के लिए कोई स्थान नहीं है।

(२) अनीश्वरवादी सांख्य — कालान्तर में विज्ञानभिक्षु आदि सांख्य दार्शनिकों ने ईश्वर की सत्ता को मान्यता दी। उनके अनुसार ईश्वर के सानिध्य से प्रकृति का विकास होता है। जिस तरह चुम्बक से लौह तत्त्व गतिमान होता है उसी तरह ईश्वर के सानिध्य से प्रकृति क्रियाशील होती है।

 

 

 

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