भारतीय सभ्यता और संस्कृति के स्रोत । प्राचीन भारतीय इतिहास के स्रोत

भारतीय सभ्यता और संस्कृति
सभ्यता और संस्कृति

भूमिका

सभ्यता और संस्कृति को प्रायः समानार्थी रूप में प्रयुक्त कर दिया जाता है। परन्तु इसमें भेद है।

सभ्यता ( सभ्य + तल् + टाप् ) का शाब्दिक अर्थ है सभ्य होने का भाव या नम्रता और शिष्टता। सभ्यता का सम्बन्ध सामाजिकता से है और इसके अन्तर्गत कुछ विधि-निषेधों का पालन किया जाता है। आँग्ल भाषा में इसे Civilization कहा जाता है। ऑक्सफोर्ड शब्दकोश के अनुसार, ‘a state of human society i.e. very developed and organised at a perticular period of time or in a particular part of the world.’

संस्कृति ( सम् + कृ + क्तिन् ) का शाब्दिक अर्थ है परिष्कृत, परिमार्जित या संस्कारित। प्रत्येक सभ्यता की इतिवृत्ति में एक ऐसा अवसर आता है जिसमें मानव एक विशेष प्रकार के बौद्धिक उत्कर्ष स्तर पर पहुँच जाता है। यह परिष्कार मानव की रचनात्मकता ( साहित्य, कला, विज्ञान, दर्शन ) के माध्यम से व्यक्त होती है। इस अवस्था में सभ्यता परिमार्जित और परिष्कृत रूप में प्रकट होती है। सभ्यता के इसी परिष्कारित या परिमार्जित अवस्था को संस्कृति कहते हैं। ऑक्सफोर्ड शब्दकोश में इसे ‘way of life’ कहा गया है।

“सभ्यता भौतिक प्रगति का सूचक है जबकि संस्कृति बौद्धिक या आत्मिक उन्नति की सूचक है। सभ्यता मूर्त तो संस्कृति अमूर्त अवधारणा है। परन्तु दोनों परस्पर सम्बन्धित हैं।”

भारतीय संस्कृति का गौरवशाली इतिहास है और विश्व में इसका आदरणीय स्थान है। ऋग्वेद में उल्लेख है कि, ‘सा संस्कृतिः प्रथिमा विश्ववारा।’ अर्थात् आदि संस्कृति विश्वकल्याण के लिए थी। अपनी इसी कल्याणकारी भावना के कारण यह अपनी जीवन्तता और निरन्तरता बनाये हुए है।

भारतीयों की इतिहास के प्रति दृष्टिकोण

यह सत्य है कि भारत में हेरोडोटस, थ्यूसीडायमीज और लिवी जैसे इतिहासकार नहीं हुए, इसलिए कुछ पश्चिमी विद्वानों ने यह भ्रांतिपूर्ण धारणा बना ली कि भारतीयों में ऐतिहासिक संकल्पना या इतिहास-बुद्धि का अभाव था। इन विद्वानों में प्रमुख हैं – लोयस डिकिंसन, विंटरनित्स, मैकडनल्ड, एल्फिंसटन, फ्लीट, मैक्समूलर, वी०ए० स्मिथ आदि।

  • हिन्दू इतिहासकार नहीं थे। — लोयस डिकिंसन – Essay on the Civilization of India, China and Japan.
  • It has never been the way to make a clarity defined distinction between myth, legend and history. Historiography in India was never more than a branch of poetry. — विंटरनित्स – History of Indian literature.
  • भारतीय साहित्य का दुर्बल पक्ष इतिहास है जिसका यहाँ अस्तित्व ही नहीं है। — मैकडनल्ड।

इस सम्बन्ध में अल्बरूनी ने ११वीं शताब्दी में लिखा था — हिन्दू लोग घटनाओं के ऐतिहासिक क्रम की ओर ध्यान नहीं देते। वे घटनाओं के तिथिक्रम के अनुसार वर्णन के प्रति लापरवाही बरतते हैं। इसी बात को शचाऊ ने अलबेरुनी का भारत में इस तरह लिखा है —

  • The Hindus don’t pay much attention to the historical order of things, they are very careless in relating the chronological succession of things. — Sachau – Alberuni’s India.

परन्तु इस तरह के आरोप लगाना नितांत भ्रामक है। क्योंकि :—

  • प्राचीन भारतीयों की इतिहास विषयक धारणा आधुनिक ऐतिहासिक संकल्पना से भिन्न थी। आधुनिक इतिहासकार ऐतिहासिक घटनाओं में कार्य-कारण सम्बन्ध स्थापित करने का प्रयास करता है। परन्तु प्राचीन भारतीय ऐसी घटनाओं का वर्णन करता है जिससे जनसाधारण को कुछ सीख या शिक्षा मिल सके।
  • महाभारत में स्पष्ट उल्लेख मिलता है कि ऐसी रुचिकर कथा जिससे धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की शिक्षा मिल सके ‘इतिहास’ कहलाती है।
  • इन चार पुरुषार्थों को प्रेरणा देने में इतिहास भी एक साधन था। अतः भरतीय उन घटनाओं को महत्त्व नहीं देते थे जिनसे इन चार पुरुषार्थों की शिक्षा न मिल सके।

अतः प्राचीन भारत का इतिहास राजनीतिक कम जबकि सांस्कृतिक अधिक है। भारतीयों की दृष्टि में साम्राज्यों और शासकों के उत्थान और पतन की अपेक्षा मानवीय मूल्यों का संकलन अधिक महत्त्वपूर्ण था जिनपर मानव-जीवन आधृत है। अतः वे सांस्कृतिक ( धार्मिक-दार्शनिक ) घटनाक्रमों के संकलन में लगे रहे न कि राजनीतिक।

फिरभी इसका यह अर्थ नहीं लगाया जाना चाहिए कि प्राचीन भारतीय आधुनिक इतिहास विषयक संकल्पना से पूर्णतया अनभिज्ञ थे :—

  • धार्मिक और लौकिक साहित्यों के सावधानीपूर्वक अध्ययन से इतिहासकारों ने इतिहास निर्माण किया है। पुराण जो कि मुख्यतः ऐतिहासिक रचनायें ही हैं। पुराणों के पाँच विषयों में से दो वंश और वंशानुचरित से इतिहास निर्माण में पर्याप्त सहायता मिलती है।
  • सातवीं शताब्दी में भारत यात्रा पर आये बौद्ध विद्वान हुएनसांग लिखता है कि भारत के प्रत्येक प्रांत में घटनाओं के विवरण को क्रमबद्ध लिखने के लिए कर्मचारी नियुक्त थे।
  • कल्हण के विवरण से ज्ञात होता है कि प्राचीन भारतीय विस्मृत ऐतिहासिक घटनाओं को पुनरुज्जीवित करने के लिए कुछ आधुनिक विधियों का प्रयोग करते थे। उसके मत से इतिहासकारों का कार्य केवल घटनाओं को लिखते जाना नहीं है अपितु पुरालेखों और सिक्कों के उपयोग से विलुप्त घटनाओं का प्रामाणिक संकलन करना भी है। उसके अनुसार —

“श्लाघ्यः सा एवं गुणवान् रागद्वेषबहिष्कृता।

भूताऽर्थ कथने यस्य स्थेयस्येव सरस्वती॥” राजतरंगिणी ॥

कल्हण का कथन भारतीयों की इतिहास-बुद्धि का स्पष्ट प्रमाण है।

सभ्यता और संस्कृति को जानने के स्रोत

भारतीय संदर्भ में इसे जानने के निम्न स्रोत हैं :—

  • पुरातात्त्विक स्रोत
  • साहित्यिक स्रोत

लेखन कला से पूर्व के सभ्यता और संस्कृति को जानने का एकमात्र स्रोत पुरातत्त्व ही है। सम्पूर्ण प्रस्तर युग इसके अंतर्गत आता है। प्रस्तर युग को प्रागितिहास ( Pre-history ) कहते हैं।

सैंधव काल में लिपि का ज्ञान तो था परन्तु वह अभी तक पढ़ी नहीं जा सकी है। इसी तरह वैदिक संस्कृति में लेखन कला का ज्ञान नहीं था। शिक्षा मौखिक थी। अतः इन दोनों संस्कृतियों को आद्य इतिहास ( Proto-history ) काल कहते हैं।

जिन संस्कृतियों का ज्ञान हमें लेखन साक्ष्यों होने लगता है उसे इतिहास कहते हैं।

प्रागैतिहासिक संस्कृतियों के अध्ययन का एकमात्र स्रोत पुरातत्त्व ही है। दूसरी ओर ६०० ई॰पू॰ के बाद की सभ्यता और संस्कृतियों की जानकारी में साहित्यिक और पुरातात्त्विक दोनों स्रोतों का उपयोग किया जाता है।

पुरातात्त्विक स्रोत

लगभग ३० लाख वर्ष पूर्व से ३,००० ई॰पू॰ तक के कालखण्ड को प्रागितिहास कहते हैं। इसके अध्ययन के लिए एकमात्र पुरातात्त्विक स्रोत ही हैं।

मनुष्य अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति वातावरण से और उसके साथ मिलकर करता है। वातावरण की जिन वस्तुओं को मानव आवश्यकतानुसार विशेष रूप से ढाल लेता है, उसे ही पुरातत्त्व में संस्कृति कहा गया है। इन्हीं वस्तुओं या कृतियों से हम मानव की सभ्यता और संस्कृति का ज्ञान अर्जित करते हैं।

पुरातन मानव ने आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु विभिन्न प्रस्तर उपकरण बनाये। आवास गुफाओं में चित्रकारियाँ की। विभिन्न धातुओं के उपकरण, पात्र, मूर्तियाँ आदि बनायीं। मृद्भाण्ड बनाये। शवाधान में वस्तुओं को रखा। पशुपालन व कृषि की शुरुआत की आदि।

किसी काल और स्थान विशेष पर जब मानव के कृतित्व ( उपकरण, मृद्भाण्ड आदि ) एक समान मिलते हैं तब इसे परम्परा कहने लगते हैं। इन अनेक तरह की परम्पराओं को मिलाकर संस्कृति बनती है।

पुरातत्त्व का महत्त्व

  • प्रस्तर युग के इतिहास, सभ्यता और संस्कृति को जानने का एकमात्र साधन है।
  • ऐतिहासिक काल के साहित्यिक साक्ष्यों को पुष्ट करके विश्वसनीय बनाता है।
  • भारतीय साहित्य की बहुत सारी रचनाएँ ऐसी हैं जिसमें उसका रचनाकाल नहीं दिया गया है, जबकि पुरातत्त्व के स्रोतों की वैज्ञानिक विधि से समय का विश्वसनीय ज्ञान होता है।
  • साहित्य प्रायः रचनाकार के दृष्टिकोण को दर्शाते हैं जबकि पुरातत्त्व इससे विरत होता है।
  • साहित्यों में प्रक्षिप्त की एक बड़ी समस्या है जबकि पुरातात्त्विक स्रोत में ऐसी सम्भावना कम है।

अतः पुरातत्त्व अपेक्षाकृत अधिक विश्वसनीय होते हैं।

पुरातत्त्व के प्रकार

  • अवशेष
  • अभिलेख
  • सिक्के
  • स्मारक और भवन
  • मूर्तियाँ
  • चित्रकला
अवशेष

आदि मानव ने उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग से जनजीवन को सुखमय बनाने का प्रयास शुरू कर दिया था। ये रूपांतरित अवशेष हमें उसके प्राकृतावासों व बस्तियों से मिलते हैं। इन्हीं अवशेषों से हम मानव की संस्कृति का ज्ञान प्राप्त करते हैं; यथा —

  • वर्तमान पाकिस्तान में सोहन नदी घाटी मिले प्रस्तर उपकरण पता चलता है कि आदि मानव ने भारतीय उपमहाद्वीप में कोई ४- २ लाख वर्ष रहता आ रहा है।
  • नवपाषाणकाल ( ई॰पू॰ १०,००० से ई॰पू॰ ६,००० ) में कैसे क्रांतिकारी परिवर्तन हुए : कृषि, पशुपालन, मृद्भाण्ड, चाक का प्रयोग, पालिशदार प्रस्तर उपकरण, कपड़ा बुनना।
  • कैसे जंगली फसलों को कृषि के अनुकूल बनाया।
  • जहाँ बस्तियों की खुदायी में कई स्तर मिले हैं उससे विकास क्रम का पता चलता है।
  • मृद्भाण्डों से संस्कृति पर विशेष प्रकाश पड़ता है; जैसे गंगा-यमुना दोआब में नीचे से ऊपर के स्तरों में क्रमशः गैरिक मृद्भाण्ड, लाल-काले मृद्भाण्ड, एवं चित्रित धूसर मृद्भाण्ड मिलते हैं। गैरिक मद्भाण्ड को ताम्र संचय से, लाल-काले मृद्भाण्ड को पूर्व-वैदिक काल से जबकि चित्रित धूसर मृद्भाण्ड को लौह युग ( उत्तर वैदिक ) संस्कृति से जोड़ा जातासहै।
  • अवशेषों में प्राप्त मुहरों से पर्याप्त सहायता मिलती है। सैंधव युगीन मुहरों से उनके धार्मिक विश्वास की जानकारी मिलती है। बसाढ़ ( वैशाली ) से प्राप्त २७४ मिट्टी की मुहरों गुप्तकालीन आर्थिक श्रेणियों का पता चलता है।
अभिलेख

पुरातात्त्विक स्रोतों में सबसे महत्त्वपूर्ण अभिलेख हैं। ये प्रस्तर और धातु की चादरों पर अंकित मिले हैं। अभिलेखों में साहित्य की तरह हेर-फेर की सम्भावना नहीं है। जिन अभिलेखों पर तिथि नहीं है तो उसकी लिखावट के आधार पर मोटे तौर पर तिथि का निर्धारण हो जाता है।

  • अशोक के अभिलेख भारत के प्राचीनतम् अभिलेख हैं। इसे सर्वप्रथम १८३७ ई॰ में जेम्स प्रिंसेप ने पढ़ा था। यह उसके साम्राज्य की सीमा निर्धारित करते हैं। इससे शासन-प्रशासन, राज्य की नीति, अशोक के व्यक्तित्व आदि की जानकारी मिलती है। अशोक के अभिलेखों में कुल ४ लिपियों ( ब्राह्मी, खरोष्ठी, अरामाइक और यूनानी ) और प्राकृत भाषा का प्रयोग हुआ है। शरेकुना ( कंधार ) से प्राप्त अभिलेख द्विभाषी है।
  • मौर्योत्तर अभिलेखों को दो भागों पर बाँटा गया है : एक, सरकारी अभिलेख और द्वितीय, निजी अभिलेख।
  • सरकारी अभिलेखों में राजकवियों द्वारा लिखित प्रशस्तियाँ और भूमि-अनुदान-पत्र आती हैं; यथा — समुद्रगुप्त का प्रयाग प्रशस्ति, राजा भोज का ग्वालियर प्रशस्ति, खारवेल का हाथीगुम्फा अभिलेख, गौतमी बलश्री का नासिक अभिलेख, रुद्रदामन का गिरनार अभिलेख, स्कंदगुप्त का भीतरी स्तम्भ लेख और गिरनार अभिलेख, विजयसेन का देवपाड़ा अभिलेख, पुलकेशिन् द्वितीय का ऐहोल अभिलेख आदि।
  • भूमि अनुदान पत्र मुख्य रूप से ताम्र पत्रों पर मिलते हैं। इनपर भूमि की सीमाओं, दानकर्त्ता, दानग्रहीता आदि का विवरण मिलता है। ये दान पत्र अधिकतर पूर्व मध्य कालीन हैं जिससे विद्वानों ने ‘सामन्ती अर्थव्यवस्था’ का गुण माना है।
  • व्यक्तिगत अभिलेख मुख्य रूप से मंदिरों व मूर्तियों पर अंकित हैं। इससे मूर्ति की स्थापना का समय, मूर्ति संथापक का नाम, मूर्तिकला, वास्तुकला, धार्मिक अवस्था आदि की अवस्था पर प्रकाश पड़ता है।
  • व्यक्तिगत अभिलेखों से राजनीतिक अवस्था पर भी प्रकाश पड़ता है क्योंकि उनमें शासक, पदाधिकारी, कर आदि का उल्लेख मिलता है।
  • प्रस्तर अभिलेखों से राज्य की सीमा का पता चलता है; जैसे अशोक के अभिलेख, रुद्रदामन का गिरनार अभिलेख।
  • अभिलेखों से भाषा और लिपि के विकास का ज्ञान होता है। अशोक के अभिलेख जहाँ प्राकृत भाषा में हैं वहीं गुप्त और गुप्तोत्तर काल के संस्कृति भाषा में हैं ( गुप्तपूर्व काल तक के अभिलेख प्राकृत भाषा में हैं )। रुद्रदामन का गिरनार अभिलेख प्रथम अभिलेख हैं जिसमें संस्कृत भाषा का प्रयोग किया गया है।
  • अभिलेख साहित्यिक वर्णनों की सत्यता को पुष्ट करते हैं; जैसे — पतंजलि के कथन कि उन्होंने पुष्यमित्र शुंग के लिए अश्वमेध यज्ञ किया था ( महाभाष्य ) की पुष्टि घनदेव के अयोघ्या अभिलेख से होता है।
  • अभिलेख नये तथ्यों को प्रकाशित करते हैं; जैसे — हाथीगुम्फा अभिलेख से खारवेल की उपलब्धियाँ, समुद्रगुप्त के प्रयाग प्रशस्ति से उसकी उपलब्धियाँ।
  • सातवाहनों का तो पूरा इतिहास ही उनके अभिलेखों पर आधृत है।

विदेशों से प्राप्त अभिलेख :—

  • मेसोपोटामिया सभ्यता के सारगोन युगीन अभिलेखों में मेलुहा का उल्लेख है जिसकी पहचान मोहनजोदड़ो से की जाती है।
  • बोघजकोई अभिलेख ( १,४०० ई॰पू॰ ) इसमें वैदिक देवताओं ( इन्द्र, वरुण, मित्र और नासत्य ) का उल्लेख है।
  • तेल-अल—अमनो, मिश्र पर जो नाम मिले हैं वो भारतीय व ईरानी आर्यों सदृश हैं।
  • पर्सिपोलिस और बेहिस्तून अभिलेख से ज्ञात होता है कि दारा प्रथम ने सिन्धु नदी घाटी को अधिकृत कर लिया था।
सिक्के

भारत के प्राचीनतम् सिक्के ‘आहत सिक्के’ कहलाते हैं क्योंकि इन्हें ठप्पा लगाकर तैयार किया जाता था। इन पर किसी तरह का कोई लेख नहीं है। इनकी शुरुआत लगभग ६ठीं या ५वीं शताब्दी ई॰पू॰ से मानी जाती है। ये चाँदी और ताँबे के होते थे। इन आहत सिक्कों से भारत में मुद्रा विनिमय का प्रारम्भ हुआ। डॉ॰ डी॰ डी॰ कौशाम्बी ने आहत मुद्राओं पर विशेष अध्ययन किया है।

मौर्योत्तर काल मुद्राओं की दृष्टि अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। इस काल में पश्चिमोत्तर में हिन्द-यूनानी शासकों ने सर्वप्रथम लेख-युक्त सिक्कों की शुरुआत की गयी। इनके सिक्के द्विभाषी थे। इन्होंने ही सर्वप्रथम स्वर्ण सिक्के चलाये जिसे स्टेटर  ( १३३ ग्रेन ) कहा गया। सम्भवतः मिनान्डर नें सर्वप्रथम स्वर्ण सिक्के चलाये। इनके रजत् सिक्के द्रम्म ( ८२·२ ग्रेन ) कहा गया।

शकों ने मुख्यतः रजत् सिक्के जारी किये। रुद्रदामन के रजत् सिक्के रुद्रदामक कहलाते थे। नहपान ने त्रिभाषा युक्त सिक्के जारी किये।

कुषाणों ने रोमन शासकों के अनुरूप स्वर्ण सिक्के चलाये। इन्होंने सर्वाधिक शुद्ध स्वर्ण सिक्के जारी किये। ये १२४ ग्रेन के थे। इन्होंने सर्वाधिक ताम्र सिक्के चलाये। इनके सिक्कों पर हिन्दू और बौद्ध धर्म के प्रतीक मिलते हैं।

सातवाहनों ने रजत्, ताँबा, शीशा, पोटीन आदि के सिक्के प्रचलित किये।

पांचाल के मित्र शासकों, मालव व यौधेय गणराज्यों का इतिहास तो मुद्राओं से ही ज्ञात होता है।

गुप्तों ने सर्वाधिक स्वर्ण सिक्के जारी किये।

गुप्तोत्तर काल में सिक्के दुर्लभ होते चले गये।

सिक्कों का महत्त्व :—

  • यदि एक स्थान से बड़ी संख्या में सिक्के मिले तो उसे सिक्का-प्रचलन-कर्त्ता के राज्य का हिस्सा माना जाता है।
  • तिथियुक्त सिक्के से शासक का शासनकाल पता चलता है।
  • अंकित आकृति से धार्मिक विश्वासों का ज्ञान होता है; जैसे —
    • समुद्रगुप्त का परमभागवत होना।
    • कनिष्क का बौद्ध होना।
  • सिक्कों में खोंट होने से राज्य की आर्थिक अवस्था कमजोर होने का पता चलता है।
  • गुप्तकाल के सिक्कों से कुछ विशेष घटनाओं का ज्ञान होता है; जैसे —
    • समुद्रगुप्त के ‘अश्वमेघ पराक्रमः’ प्रकार के सिक्के और कुमारगुप्त के अश्वमेध शैली सिक्के से अश्वमेध यज्ञ करने जानकारी मिलती है।
    • चन्द्रगुप्त द्वितीय के रजत् सिक्कों ( व्याघ्रशैली ) से उसकी शकों पर विजय की जानकारी मिलती है।
    • पह्लव शासक अपने गवर्नर के साथ शासन करते थे इसकी जानकारी सिक्कों से मिलती है।
    • शातकर्णि की जलपोत अंकित मुद्रा से उसके समुद्र-विजय और व्यापार की सूचना मिलती है।
  • सिक्कों पर अंकित आकृति से कभी-कभी शासक की अभिरुचि का पता चलता है; यथा —
    • समुद्रगुप्त की वीणावादन मुद्रा से उसके संगीत-प्रेम की पुष्टि होती है।
  • गुप्तकालीन सिक्के बहुत कलात्मक हैं जिससे साहित्य और कलात्मक अभिरुचि की जानकारी मिलती है।
  • प्राचीन भारत में गणराज्यों का अस्तित्व मुद्राओं से ही प्रमाणित होता है; यथा — मालव, यौधेय आदि गणराज्यों और पाँचाल के मित्रवंशी शासक इत्यादि।
  • भारत में इण्डो-बख्त्री राजाओं के विषय में जानकारी सिक्कों से ही होती है।
  • इण्डो-सीथियन और इण्डो-यूनानी राजाओं के विषय में जानकारी का मुख्य स्रोत सिक्के ही हैं।
वास्तुकला

इसके अंतर्गत स्मारक और भवन आते हैं।

  • भारतीय उपमहाद्वीप में प्रथम नगरीकरण हड़प्पा सभ्यता से मिलता है।
  • द्वितीय नगरीकरण ६वीं शताब्दी ई॰पू॰ में शुरू हुई।
  • मौर्यकालीन चन्द्रगुप्त मौर्य के राजप्रासाद के अवशेष पटना के बुलन्दीबाग और कुम्राहार से प्राप्त होती है। यह ऐतिहासिक काल का प्रथम विशाल अवशेष है। इसे गुप्तकाल में चीनी यात्री फाह्यियान ने देखा था।
  • मौर्यकाल के गुहा, स्तूप, स्तम्भ आदि मिलते हैं।
  • गुप्तकाल में मंदिर निर्माण बड़े पैमाने पर हुआ।
  • गुप्तोत्तर काल में मंदिर निर्माण की दो शैलियों का विकास हुआ — नागर ( उत्तरी भारत ), द्रविड़ शैली ( दक्षिण भारत )। इन दोनों के सम्मिलन से बेसर शैली का विकास हुआ।
  • इनके अध्ययन से वास्तुकला के तकनीकी विकास, धार्मिक दशा आदि का ज्ञान मिलता है।
मूर्तियाँ
  • मूर्ति निर्माण की कला की शुरुआत कुषाण के काल ने मानी जाती है। कुषाणों के संरक्षकों मथुरा और गांधार कला का विकास हुआ।
  • गुप्तकाल में मूर्तिपूजा कालप्रचलन हुआ जब इन्हें मंदिरों में स्थापित करके पूजा की जाने लगी। यद्यपि इसकी शुरुआत कुषाणों के समय से मानी जाती परन्तु प्रचलन गुप्तकाल से मानी जाती है।
  • कुषाणों की मूर्तियों पर विदेशी प्रभाव है
  • गुप्तकालीन मूर्तियाँ विदेशी प्रभाव से मुक्त हैं। मूर्तियों में अंतरात्मा और मुखाकृति का सामंजस्य है जोकि अद्वितीय है।
  • गुप्तोत्तर कालीन मूर्तियों में संकेतित है जिसे कला विशेषज्ञ समझ सकते हैं।
चित्रकला
  • चित्रकला के प्राचीनतम् उदाहरण प्रस्तर युगीन भीमबेटका, आदमगढ़, सित्तनवासल आदि से मिलता है।
  • गुप्तकालीन अजंता की चित्रकला कालातीत है; जैसे — माता-शिशु, मरणासन्न राजकुमारी आदि।
  • कला और जनजीवन का अन्योन्याश्रित सम्बंध है। चित्रकला अध्ययन से हमें जनजीवन की जानकारी प्राप्त होती है।

निष्कर्ष

पुरातात्त्विक और साहित्यिक स्रोतों के विवेकपूर्ण सामंजस्य से इतिहास, सभ्यता एवं संस्कृति का निर्माण किया जा सकता है।

वर्तमान में कुछ पुरात्त्ववेत्ताओं ने वैदिक साहित्य, रामायण, महाभारत में वर्णित स्थलों का उत्खनन करके उसके भौतिक संस्कृति का खाका प्रस्तुत करने का प्रयास करते हैं। जैसे — हस्तिनापुर की खुदाई के आधार पर डॉ॰ वी॰ बी॰ लाल ने महाभारत युद्ध का समय लगभग ९०० ई॰पू॰ बताया है।

मौर्योत्तर काल और गुप्तपूर्व समय की जानकारी मुख्य रूप से पुरातत्त्व से मिलती है।

भारत में लोहे का उपयोग कब शुरू हुआ? इसकी जानकारी पुरातत्त्व से होती है। यह अब स्पष्ट हो गया है कि इस संदर्भ में भारत हिट्टाइटों का ऋणी नहीं है। यहाँ स्वतंत्र रूप से इस धातु का प्रयोग शुरू हुआ।

 

साहित्यिक स्रोत

विस्तृत विवरण के लिए इस लिंक पर देखें प्राचीन भारतीय साहित्य और संस्कृत के प्रमुख कवि तथा ग्रन्थ

भूमिका

प्राचीन भारतीयों की इतिहास विषयक अवधारणा आधुनिक इतिहासकारों से भिन्न थी। महाभारत में कहा गया है कि, ऐसी रुचिकर कथा जिससे धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की शिक्षा मिल सके “इतिहास” कहलाती है।’ अर्थात् प्राचीन भारत का इतिहास राजनीतिक कम जबकि सांस्कृतिक अधिक है। हुएनसांग के अनुसार प्रत्येक प्रांत की घटनाओं के विवरण को लिखने के लिये राजकीय अधिकारी होते थे।

प्राचीन भारतीय साहित्य को दो भागों में बाँटा गया है — धार्मिक और लौकिक। धार्मिक को पुनः तीन भागों में बाँटा गया है- ब्राह्मण, बौद्ध और जैन साहित्य।

ब्राह्मण धार्मिक साहित्य से सामाजिक और सांस्कृतिक जनजीवन पर पर्याप्त प्रकाश पड़ता है जबकि राजनीतिक जानकारी कम मिलती है।

कमियाँ

प्राचीन भारतीय साहित्य से साहित्यिक अधिक और राजनीतिक जानकारी कम मिलती है :—

  • ये तिथि क्रम का उल्लेख नहीं करते हैं।
  • लेखक प्रायः निष्पक्ष नहीं हैं।
  • प्रक्षिप्त जोड़े जाने की समस्या है।
  • स्तरीकरण की समस्या है।

विदेशी विवरण

भूमिका

समय-२ पर भारत में विदेशी यात्री आये। उन्होंने भारत के बारे में अमूल्य साहित्यिक साक्ष्य छोड़े हैं। इनके समय भी निश्चित हैं अतः उनके विवरण बहुत कुछ इतिहास सम्मत हैं। इन्हें हम तीन भागों में बाँट सकते हैं :—

  • यूनान और रोम के लेखक,
  • चीन के लेखक और
  • अरब लेखक।

यूनान और रोम के लेखक

  • हेरोडोटस और टेसियस के वृत्तांत।
  • नियार्कस, आनेसिक्रिटस और अरिस्टोबुलस – सिकन्दर के साथ भारत आये थे।
  • मेगस्थनीज — सेल्युकस निकेटर का मौर्य सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य की राजसभा में राजदूत।
  • पेरीप्लस ऑफ द इरीथ्रियन सी
  • टॉलमी का भूगोल
  • प्लिनी की हिस्टोरिका
मेगस्थनीज
परिचय

मेगस्थनीज एक यूनानी राजदूत थे जिन्हें सेल्यूकस निकेटर ने चन्द्रगुप्त की राजसभा में भेंजा था। यहाँ वे ३०४ -२९९ ई॰पू॰ के बीच लगभग ५ वर्षों तक रहे। इसी समय मेगस्थनीज ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक इंडिका लिखी।

यह पुस्तक मूल रूप में प्राप्त नहीं है बल्कि यह बाद के यूनानी रोमन लेखकों की कृतियों में उद्धरणों के रूप में मिलता है। ये लेखक हैं — एरियन, स्ट्रैबो, प्लिनी आदि।

आगे चलकर डॉ॰ स्वानबेग ने १८४६ ई॰ में इन उद्धरणों को संग्रहित करके प्रकाशित किया और १८९१ ई॰ मैक्रिन्डल ने इसका आँग्ल भाषा में अनुवाद किया।

इंडिका नामक एक अन्य पुस्तक की रचना एरियन ने भी की थी।

इंडिका के वर्ण्य विषय

मेगस्थनीज ने चन्द्रगुप्त मौर्य के लिए सैन्ड्रोकोटस नाम का प्रयोग किया है।

सैंड्रोकोटस की सुरक्षा सशस्त्र महिला अंगरक्षिकाएँ करती थीं।

सैन्ड्रोकोटस की राजधानी पोलिब्रोथा ( पाटलिपुत्र ) का वर्णन किया है।

इंडिका में नगर के प्रमुख अधिकारी का नाम एस्टोनोमोई मिलता है।

नगर के प्रशासन के लिए ३० सदस्यों का एक समूह द्वारा होता है, जिसकी ६ समितियाँ थीं और प्रत्येक समिति में ५ सदस्य थे।

जिले के अधिकारी को एग्रोनोमोई कहा गया है। वह सड़क निर्माण और भू-राजस्व एकत्रित करने का अधिकारी भी था।

सैन्य प्रशासन के लिए ३० सदस्यों की एक समिति थी। यह समिति ५ – ५ सदस्यों की ६ समितियों में विभाजित थी।

भू-राजस्व की मात्रा मौर्यकाल में १ ⁄ ४ थी।

मेगस्थनीज ने उत्तरापथ मार्ग का वर्णन किया है। इसी को शेरशाह सूरी ने ‘सड़क-ए-आज़म’ तो ब्रिट्रिश काल में ऑकलैण्ड ने ‘ग्राण्ड ट्रंक रोड’ के रूप में विकसित किया।

भारत में अनेक स्वर्ण खानें थीं। इन्हीं में से एक कश्मीर के दर्दिस्तान में थी जहाँ स्वर्ण निकालने वाली लाल रंग की चींटियाँ होती थीं।

मेगस्थनीज के भ्रामक विवरण

भारत में ७ जातियाँ थीं।

दास प्रथा का अभाव था।

भारत में अकाल नहीं पड़ते थे।

भारतीयों को लिपि का ज्ञान नहीं था।

चीनी यात्री

 

  • फाह्यियान
  • हुएनसांग
  • इत्सिंग
फाह्यियान
सामान्य परिचय

फाह्यियान एक चीनी यात्री था जो ३९९ – ४१४ ई॰ के मध्य भारत की यात्रा पर रहे थे। इस समय गुप्त सम्राट चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य का शासन था। फाह्यियान बौद्ध साहित्यों के संकलन और बुद्ध रज से पवित्र स्थलों के दर्शनार्थ आया था। फाह्यियान के बचपन का नाम कुंग था और फाह्यियान का शाब्दिक अर्थ धर्माचार्य है।

फाह्यियान पश्चिमी चीन से चलकर मध्य एशिया के काशगर, यारकंद, खोतान आया। उसने खोतान के गोमती विहार का का उल्लेख करते हुए बताया है कि यहाँ महायान सम्प्रदाय के लगभग १०,००० बौद्ध भिक्षु निवास करते थे।

अफगानिस्तान में फाह्यियान के अनुसार हीनयान व महायान सम्प्रदाय के लगभग ३,००० बौद्ध भिक्षु निवास करते थे।

सिन्धु नदी पार करके फाह्यियान पंजाब प्रांत पहुँचा और इसे वह बौद्ध धर्म का केन्द्र बताता है। कश्मीर को भी वह बौद्ध धर्म का केन्द्र बताता है। फाह्यियान ने उत्तर भारत के अनेक बौद्ध स्थलों व नगरों की यात्रा थी। इसमें कौशाम्बी, कुशीनगर, कपिलवस्तु, सारनाथ ( मृगदाव ), राजगृह, वैशाली, पाटलिपुत्र, ताम्रलिप्ति……आदि प्रमुख थे। उसने उत्तरी भारत के अनेक बौद्ध स्थलों की पतनावस्था का उल्लेख किया है।

ताम्रलिप्ति से ही फाह्यियान श्रीलंका और दक्षिण-पूर्व एशिया होते हुए वापस लौट गया। फाह्यियान ने तत्कालीन शासक का कहीं भी उल्लेख नहीं किया है। उसने अपना वर्णन ‘फो-चो-की’ नाम से किया है।

कुछ प्रमुख वर्ण्य विषय

मध्यदेश ब्राह्मणों का देश था जहाँ लोग सुखी और सम्पन्न थे।

मध्यदेश में मृत्युदण्ड प्रचलित नहीं था। सामान्यतः आर्थिक दण्ड प्रचलित थे। बार-बार राजद्रोह करने पर केवल दाहिना हाथ काट लिया जाता था।

मध्य देश के लोग माँस-मदिरा, प्याज, लहसुन आदि का प्रयोग नहीं करते थे। चांडाल इसके अपवाद थे जो नगर के बाहर रहते थे और नगर में आने से पहले ढोलक आदि बजाकर आने की सूचना देते थे।

चांडालों का विस्तृति विवरण करने वाला फाह्यियान पहला विदेशी यात्री था।

मध्य देश में ब्राह्मण धर्म का बोलबाला था।

बाजारों में बूचड़खाने तथा मदिरालय नहीं थे।

फाह्यियान ने मौर्यकालीन राजप्रासाद को देखा था और इसे देवनिर्मित बताया था।

मध्य देश के लोग क्रय-विक्रय के लिए कौड़ियों का प्रयोग करते थे।

हुएनसांग ( युवान च्वांग )
सामान्य परिचय

युवान च्वांग एक चीनी यात्री था जो बौद्ध ग्रंथों के संकलन और बुद्ध-चरण-रज से पवित्र स्थलों के दर्शनार्थ आया था। इस समय उत्तर भारत में हर्षवर्धन, द्रविड़ क्षेत्र में नरसिंह वर्मन् प्रथम और दक्कन क्षेत्र में पुलकेशिन् द्वितीय का शासन था। वह मध्य एशिया होते हुए भारत आया था और इसी रास्ते से वापस लौट गया। उसने अपनी यात्रा वृतान्त ‘सी-यू-की’ नाम से किया था। भारत के लिए वह ‘ईन-तू’ शब्द का प्रयोग करता है। हुएनसांग को ‘यात्रियों का राजकुमार’ और ‘शाक्यमुनि’ कहा जाता है। हुएनसांग के मित्र ह्वीली ने उसके जीवन पर एक पुस्तक लिखी जिसका नाम है — ‘ह्नेनसांग की जीवनी’।

कुछ प्रमुख वर्ण्य विषय

आवागमन के मार्ग सुरक्षित नहीं थे। क्योंकि पंजाब में एक स्थान पर उसे डाकुओं ने बलि देने के लिए पकड़ लिया था। तूफान आने से उसने किसी तरह भागकर अपने प्राण की रक्षकों थी।

हर्षवर्धन को वह शिलादित्य कहता है। उसके अनुसार हर्षवर्धन फीशे ( वैश्य ) जाति का था। शिलादित्य सुबह से शाम तक राजकार्य करता था फिरभी अथक था।

शिलादित्य ने अपनी आय को ४ भागों में बाँटा था —

  • १/४ भाग विद्वानों के लिए,
  • १/४ भाग शिक्षा के लिए,
  • १/४ भाग अधिकारियों के वेतन के लिए और
  • १/४ भाग स्वयं के लिए।
  • इस तरह शिलादित्य शिक्षा और विद्वानों पर राज्य की आय का १/२ ( ५० % ) व्यय करता था।

युवान च्वांग सामंतों की अनेक श्रेणियों का उल्लेख करता है।

सिन्धु का शासक शूद्र था।

शूद्र कृषक थे।

पाटलिपुत्र की पतनावस्था का उल्लेख किया है।

भारत में घोड़े अरब, कम्बोज और फारस से आते थे।

दैनिक लेनदेन कौड़ियों में होता था।

सिंचाई के लिए घंटी यंत्री ( रहट ) प्रयोग होता था।

काञ्ची में उसने १०,००० भिक्षु देखे थे।

वातापी के चालुक्य नरेश पुलकेशिन् द्वितीय की राजसभा में वह गया था और उसकी प्रशंसा करता है।

उसने नालंदा विश्वविद्यालय, कन्नौज की घर्मसभा और प्रयाग की महामोक्षपरिषद का उल्लेख किया है।

अरबी यात्री

  • सुलैमान
  • अल मसूदी
  • अल्बरूनी
अल्बरूनी
सामान्य परिचय

अल्बरूनी मध्य एशियाई देश उजबेकिस्तान के खोरज्म प्रांत स्थित ‘खीवा’ का रहने वाला था। इसके बचपन का नाम अबूरेहान था। महमूद गजनवी ने जब खीवा को विजित किया तो उसे भी अपने साथ गजनी ले आया। भारत आक्रमण के समय वह १०१७ ई॰ में गजनी के साथ भारत आया। उन्होंने गणित, दर्शन, चिकित्सा, खगोलशास्त्र आदि का विद्वान था। उसने काशी पहुँचकर ब्राह्मणों से संस्कृत सीखी थी। अल्बरूनी ने भग्वद्गीता, विष्णु पुराण, वायु पुराण, साँख्य दर्शन, पतंजलि के योगशास्त्र, वाराहमिहिर और ब्रह्मगुप्त की रचनाओं का भी अध्ययन किया था।

अल्बेरूनी ने तहकीक-ए-हिन्द या किताब-उल-हिन्द नामक पुस्तक अरबी भाषा में लिखी जोकि भारतीय संस्कृति का संवेदनशील अध्ययन है। इस पुस्तक का शचाऊ ने आँग्ल भाषा में तो रजनीकांत शर्मा ने हिन्दी भाषा में अनुवाद किया।

तहकीक-ए-हिन्द तत्कालीन भारत की सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक अवस्था का वर्णन है जबकि राजनीतिक दशा का वर्णन विस्तृत रूप में नहीं मिलता है।

वर्ण्य विषय

’हिन्दुओं का यह दृढ़ विश्वास है कि उनके जैसा कोई देश नहीं है, शासक नहीं है, धर्म नहीं है, ज्ञान नहीं है……उसके अनुसार यही नकारात्मक सोच ही उनके पतन का कारण बनी।

अल्बरूनी ने भारतीयों की पराजय का कारण उनमें एकता का अभाव था और वे आपस में युद्धरत रहते थे।

भारतीय जाति व्यवस्था बहुत जटिल थी। अंतर्जातीय व्यवस्था सम्भव नहीं था। यहाँ तक कि जब दो ब्राह्मण भोजन करने बैठते थे तो बीच में एक कपड़ा रख लेते थे।

अल्बरूनी ने शूद्रों की सबसे बड़ी सूची प्रस्तुत की है। इस काल में शिल्पकार सामान्यतः शूद्रों की श्रेणी में आ गये थे।

तहकीक-ए-हिन्द में ८ प्रकार के अन्त्यजों ( चांडालों ) का उल्लेख किया है। ये हैं — मोची, मछुवारे, शिकारी, टोकरी बनाने वाले आदि।

विधवाओं की दशा हेय थी और उनका मुंडन करा दिया जाता था।

सामंतवाद चरम पर था।

सड़क निर्माण, बाग लगवाने, प्याऊ आदि के लिए वह भारतीयों की प्रशंसा करता है।

मंदिर स्थापत्य की अल्बरूनी आलोचना करते हैं क्योंकि मंदिर स्थापत्य के मुख्य केन्द्र थे और वहाँ अत्यधिक धन एकत्र होने के कारण आक्रांताओं के निशाने पर आ जाते थे।

भारत में अनेक धर्म व सम्प्रदाय थे जो अनेक उप-सम्प्रदायों में विभाजित थे।

विदेशी यात्रियों के वर्णन की कमियाँ

अधिकांश चीनी यात्री बौद्ध भिक्षु थे और उनका दृष्टिकोण पूर्णतया धार्मिक था। फाह्यियान और ई-चिंग ने तो धर्मेतर अवस्था का वर्णन बहुत कम किया है। उन्होंने तो तत्कालीन शासकों का तो उल्लेख तक नहीं किया है।

हुएनसांग ने तो तत्कालीन शासकों हर्षवर्धन, भास्करवर्मन्, पुलकेशिन् द्वितीय आदि का उल्लेख किया है। परन्तु उसने अपना वर्णन बौद्ध दृष्टिकोण से किया है। वह कहता है कि हर्षवर्धन बौद्ध था जबकि महामोक्षपरिषद में हर्षवर्धन ने बुद्ध के साथ-२ सूर्य और शिव की भी पूजा की थी। चीनी यात्री प्रत्येक बातों को बौद्ध दृष्टिकोण से ही देखते थे।

अरबी लेखकों में अल्बरूनी ने तत्कालीन भारतीय राजनीतिक अवस्था के विषय में कुछ नहीं लिखा है। दूसरा दोष है कि उसने वर्णन का आधार उपलब्ध भारतीय साहित्य था उसके निजी अनुभव नहीं।

FAQ

पुरातात्त्विक स्रोतों का इतिहास निर्माण में क्या महत्त्व है? या सभ्यता और संस्कृति जानने में पुरातात्त्विक स्रोतों का क्या महत्त्व है?

  • प्रस्तर युग के इतिहास, सभ्यता और संस्कृति को जानने का एकमात्र साधन है।
  • ऐतिहासिक काल के साहित्यिक साक्ष्यों को पुष्ट करके विश्वसनीय बनाता है।
  • भारतीय साहित्य की बहुत सारी रचनाएँ ऐसी हैं जिसमें उसका रचनाकाल नहीं दिया गया है, जबकि पुरातत्त्व के स्रोतों की वैज्ञानिक विधि से समय का विश्वसनीय ज्ञान होता है।
  • साहित्य प्रायः रचनाकार के दृष्टिकोण को दर्शाते हैं जबकि पुरातत्त्व इससे विरत होता है।
  • साहित्यों में प्रक्षिप्त की एक बड़ी समस्या है जबकि पुरातात्त्विक स्रोत में ऐसी सम्भावना कम है।

अतः पुरातत्त्व अपेक्षाकृत अधिक विश्वसनीय होते हैं।

 

प्राचीन भारतीय इतिहास के स्रोत के रूप में सिक्कों का क्या महत्त्व है?

इतिहास निर्माण में सिक्कों का महत्त्व :—

  • यदि एक स्थान से बड़ी संख्या में सिक्के मिले तो उसे सिक्का-प्रचलन-कर्त्ता के राज्य का हिस्सा माना जाता है।
  • तिथियुक्त सिक्के से शासक का शासनकाल पता चलता है।
  • अंकित आकृति से धार्मिक विश्वासों का ज्ञान होता है।
  • सिक्कों में खोंट होने से राज्य की आर्थिक अवस्था कमजोर होने का पता चलता है।
  • गुप्तकाल के सिक्कों से कुछ विशेष घटनाओं का ज्ञान होता है; जैसे – समुद्रगुप्त के ‘अश्वमेघ पराक्रमः’ प्रकार के सिक्के से अश्वमेध यज्ञ की और चन्द्रगुप्त द्वितीय के रजत् सिक्कों से उसकी शकों पर विजय की जानकारी मिलती है।
  • गुप्तकालीन सिक्के बहुत कलात्मक हैं जिससे साहित्य और कलात्मक अभिरुचि की जानकारी मिलती है।

साहित्यिक स्रोतों की इतिहास निर्माण क्या कमियाँ हैं?

प्राचीन भारतीय साहित्य से साहित्यिक अधिक और राजनीतिक जानकारी कम मिलती है :—

  • ये तिथि क्रम का उल्लेख नहीं करते हैं।
  • लेखक प्रायः निष्पक्ष नहीं हैं।
  • प्रक्षिप्त जोड़े जाने की समस्या है।
  • स्तरीकरण की समस्या है।

 

इतिहास निर्माण में साहित्यिक स्रोत की अपेक्षा पुरातात्त्विक स्रोत महत्त्व अधिक क्यों है?

इसके निम्न कारण हैं :-

  • भारतीय रचनाकार तिथिक्रम के प्रति जागरुक नहीं रहे हैं जिससे काल विशेष की सामाजिक और आर्थिक स्थिति का ज्ञान नहीं हो पाता है।
  • रचनाकार का व्यक्तिगत दृष्टिकोण ऐतिहासिकता को बाधित करता है; जैसे —
    • चीनी यात्रियों का बौद्ध दृष्टिकोण
    • रचनाकार आश्रयदाता की प्रशस्तिगान में ऐतिहासिकता से छेड़छाड़ कर देते थे।
  • प्रक्षिप्त और स्तरीकरण की समस्या साहित्यिक स्रोतों की बड़ी समस्या है।

पुरातात्त्विक स्रोत इस तरह की कमियों से मुक्त होते हैं, अतः वे अधिक विश्वसनीय होते हैं।

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