प्राचीन भारतीय सम्वत्

प्राचीन भारतीय सम्वत्

भारत में अति प्राचीन काल से ही सम्वत् का प्रचलन था। प्राचीन अभिलेख और साहित्यों में इसका उल्लेख है। प्राचीन भारतीय सम्वतों में विक्रम और शक सम्वत् सर्वाधिक प्रसिद्ध हैं। कुछ प्रसिद्ध प्राचीन भारतीय सम्वत् निम्न हैं :—

सम्वत् का नाम समय प्रणेता
विक्रम सम्वत् ५७ ई॰पू॰ उज्जयिनी के राजा विक्रमादित्य
शक सम्वत् ७८ ई॰ कुषाण नरेश कनिष्क
गुप्त सम्वत् ३१९ ई॰ गुप्त शासक चन्द्रगुप्त प्रथम
बलभी सम्वत्
हर्ष सम्वत् ६०६ ई॰ हर्षवर्धन
कलचुरि-चेदि सम्वत् २४८-५९ ई॰ आभीर शासक ईश्वरसेन
कोल्लम सम्वत् ८२५ ई॰ केरल में शंकराचार्य के सुधारों का द्योतक

विक्रम ( कृत ) सम्वत्

कृत या विक्रम सम्वत् के विषय में जैन स्रोतों में कहा गया है कि महावीर स्वामी के निर्वाण और कृत सम्वत् के मध्य ४७० वर्षों का अंतर है। महावीर के निर्वाण का समय ५२७ ई॰पू॰ मानी गयी है। इस प्रकार विक्रम सम्वत् की तिथि ५२७ − ४७० = ५७ ई॰पू॰ हो जाती है।

विक्रम सम्वत् के प्रवर्तक के सम्बन्ध में मतभेद है। जैन साहित्य के अनुसार मालवा के शासक विक्रमादित्य ने ५७ ई॰पू॰ में शकों को पराजित करने के उपलक्ष्य में विक्रम सम्वत् का प्रवर्तन किया था। विक्रमादित्य का शासनकाल सतयुग ( कृतयुग ) के समान सुख और समृद्धि से भरा हुआ था। इसीलिए इसे कृत या सतयुग सम्वत् भी कहा जाता है।

मालवा से सम्बंधित होने के कारण इसे ‘मालव सम्वत्’ भी कहा जाता है।

भारतीय पञ्चागों में आज भी इसका प्रयोग किया जाता है।

यदि हमें वर्तमान विक्रम सम्वत् की गणना करनी हो तो हम वर्तमान सन् ईसवी में ५७ जोड़कर प्राप्त कर लेंगे; जैसे – २०२१ में शक सम्वत् की गणना इस तरह होगी –

  • २०२१ + ५७ = २०७८
  • अर्थात् इस समय २०७८ विक्रम सम्वत् चल रहा है।

शक सम्वत्

जैन साहित्यों के अनुसार विक्रमादित्य ( ५७ ई॰पू॰ ) के उत्तराधिकारियों को कृत सम्वत् के १३५वें वर्ष में शकों ने पराजित कर उसके राज्य पर अधिकार कर लिया।  इस विजय के उपलक्ष्य में उन्होंने ‘शक-सम्वत्’ का प्रवर्तन किया।

शक-सम्वत् का समय १३५ − ५७ = ७८ ई॰ है।

शक सम्वत् के प्रवर्तक के सम्बंध मतभेद है।  एक विचार के अनुसार कुषाण शासक कनिष्क ने इसका प्रवर्तन किया था।  शक शासक कुषाणों के अधीन थे। बाद में शक स्वतंत्र हो गये परन्तु पश्चिमी भारत में इस सम्वत् का प्रयोग होता रहा। इस क्षेत्र में शकों का शासन लम्बे समय तक रहा।  इसलिए इस सम्वत् को शकों से सम्बद्ध माना जाने लगा।  परिणामतः यह शक सम्वत् के नाम से प्रसिद्ध हो गया।

वर्तमान में भारतीय गणराज्य का ‘राष्ट्रीय पंचांग’ शक सम्वत् ही है।

शक सम्वत् को २२ मार्च, १९५७ ई॰ को राष्ट्रीय पंचांग ( national calendar ) के रूप में स्वीकार किया गया। शक सम्वत् का प्रयोग ग्रेगोरियन कैलेंडर के साथ-२ निम्न सरकारी उद्देश्यों ( official purpose ) के लिए किया जाता है :—

  • भारत का राजपत्र ( Gazette of India ),
  • आकाशवाणी प्रसारणों में ( In All India Radio Broadcasts ),
  • भारत सरकार के कैलेंडरों में और
  • सरकार द्वारा जनता से संवादों में।

राष्ट्रीय और ग्रीगैरियन कैलंडर में एक स्थायी सामंजस्य है। क्योंकि

  • सामान्य वर्ष ( ३६५ दिन ) में शक सम्वत् के चैत्र मास की शुरुआत ग्रीगैरियन कैलेंडर के २२ मार्च से होती है।
  • लीप वर्ष ( ३६५ दिन ) में शक सम्वत् के चैत्र मास की शुरुआत ग्रीगैरियन कैलेंडर के २१ मार्च से होती है।

यदि हमें वर्तमान शक सम्वत् की गणना करनी हो तो हम वर्तमान सन् ईसवी से ७८ घटाकर प्राप्त कर लेंगे; जैसे – २०२१ में शक सम्वत् की गणना इस तरह होगी –

  • २०२१ – ७८ = १९४३
  • अर्थात् इस समय १९४३ शक सम्वत् चल रहा है।

विक्रम सम्वत् और शक सम्वत् में अंतर –

  • ५७ + ७८ = १३५ वर्ष।

गुप्त सम्वत्

चक्रवर्ती गुप्त सम्राटों के लेखों और अभिलेखों में इसका प्रयोग मिलता है।  इसका प्रवर्तन चन्द्रगुप्त प्रथम ने ३१९ ई॰ में किया था।

बलभी सम्वत्

अल्बेरुनी के अनुसार बलभद्र नामक शासक ने शक-काल के २४१ वर्ष के बाद बलभी सम्वत् का प्रवर्तन किया था।  इस तरह इसकी स्थापना तिथि ७८ + २८१ = ३१९ ई॰ है।  यही स्थापना तिथि गुप्त सम्वत् की भी है।  अतः दोनों सम्वत् एक ही हैं।  गुप्तोत्तर काल में भी बलभी में इसका प्रयोग होता रहा।  इसलिए बलभी सम्वत् के नाम से जाना जाने लगा।

हर्ष सम्वत्

इस सम्वत् का प्रवर्तन हर्षवर्धन ने ६०६ ई॰ में अपने राज्यारोहण के तिथि पर किया था।  हर्षवर्धन के लेखों, समकालीन उत्तरगुप्त राजाओं तथा नेपाल में इसका प्रयोग मिलता है।

कलचुरि-चेदि सम्वत्

कलचुरि चेदि सम्वत् की स्थापना आभीर नरेश ईश्वरसेन ने २४८ – २४९ ई॰ में किया था।  मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के कलचुरि शासकों ने अपने लेखों में इसी का प्रयोग किया है।  कालान्तर में यह सम्वत् कलचुरि-चेदि सम्वत् कहलाया।

कोल्लम सम्वत्

मालाबार तट से शंकराचार्य ने ८२५ ई॰ में सुधार आन्दोलन की शुरुआत की थी।  इसे ही कोल्लम सम्वत् कहा है।

 

भारतवर्ष का नामकरण

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