जैन धर्म की देन

जैन धर्म की देन

जैन धर्म की प्रमुख देन निम्न है :—

  • साहित्य और कला के क्षेत्र में 
  • सामाजिक देन
  • धर्म और दर्शन के क्षेत्र में 
  • अन्य

भाषा और साहित्य 

  • जैन मतावलंबियों ने विभिन्न समयों में लोकभाषाओं के माध्यम से अपने मत का प्रचार-प्रसार किया।
  • प्राकृत, अपभ्रंश, कन्नड़, तमिल, तेलुगु आदि क्षेत्रिय भाषाओं में जैन साहित्य मिलते हैं।
  • इन रचनाओं से भाषा एवं साहित्य समृद्धशाली हुआ।
  • प्राचीन जैन साहित्य अर्धमागधी या मागध या प्राकृत में लिखे गये हैं।
  • पूर्व-मध्यकाल में हेमचन्द्रादि विद्वानों ने काव्य, व्याकरण, ज्योतिष, छन्दशास्त्र आदि विषयों पर लेखनी चलाकर भाषा और साहित्य को समृद्ध किया।
  • दक्षिण भारत की क्षेत्रिय भाषाओं में भी जैन विद्वानों ने योगदान दिया है। 
  • तमिल ग्रंथ ‘कुरल’ के कुछ भाग जैन विद्वानों द्वारा विरचित हैं।
  • तमिल महाकाव्य ‘शिल्पादिकारम्’ और ‘जीवक चिन्तामणि’ के लेखक जैन थे।
  • जैन साहित्य संस्कृत भाषा में भी लिखे गये हैं।

कला और स्थापत्य

  • हस्तलिखित जैन पाण्डुलिपियों पर पूर्व-मध्यकाल में चित्र उकेरे गये जो कि चित्रकला सुन्दर नमूने हैं।
  • मध्य-भारत, ओडिशा, राजस्थान, गुजरात आदि स्थानों पर जैन मंदिर, मूर्तियाँ, गुहा-स्थापत्य आदि का निर्माण हुआ।
  • ओडिशा के उदयगिरि में अनेक जैन गुफाओं का निर्माण महामेघवाहन वंशी नरेश खारवेल के समय कराया गया था।
  • खजुराहो, सौराष्ट्र, राजस्थान से भव्य जैन मंदिर मिलते हैं।
  • खजुराहो में कई जैन तीर्थंकरों; यथा – पार्श्वनाथ, आदिनाथ आदि के मंदिर मिलते हैं।
  • राजस्थान का माउण्ट आबू पर निर्मित जैन मंदिर अपनी जैन कला की दृष्टि से अत्युत्कृष्ट है।
  • कर्नाटक के श्रवणबेलगोला में कई जैन मंदिर है। परन्तु यहाँ स्थित गोमतेश्वर बाहुबली की ग्रेफाइट निर्मित एकाश्म प्रतिमा प्रसिद्ध है।

 

सामाजिक प्रभाव

  • महावीर स्वामी के त्रिरत्नों में से सम्यक् आचरण पर सर्वाधिक बल दिया है। इस आचरण के पालनार्थ पञ्च-महाव्रत की शिक्षा दी। उसमें से सत्य और अहिंसा को जब आधुनिक चिन्तक महात्मा गाँधी अपनाते हैं तो आश्चर्य की बात नहीं है।
  • स्याद्वाद का सिद्धान्त समन्वयवाद की जैनियों द्वारा व्यापक उद्घोषणा थी जो कि किसी भी कट्टरपंथ विचार का निरोध करती है।
  • महावीर ने वेदों की प्रामाणिकता और यज्ञीय कर्मकाण्डों को मान्यता नहीं दी।
  • निर्वाण का द्वार बिना किसी भेदभाव के सभी के लिए खुला था चाहे वह शुद्र हो या ब्राह्मण, चाहे स्त्री हो या पुरुष।
  • जन्माधारित वर्ण व्यवस्था को महावीर स्वामी ने सिरे से खारिज कर दिया।

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