अश्व और आर्य बहस ( THE HORSE AND THE ARYAN DEBATE )

भूमिका

अश्व और आर्य बहस थमने का नाम ही नहीं ले रही है। सिंधु-सरस्वती सभ्यता में घोड़े की उपस्थिति या अनुपस्थिति विगत एक सदी से विवाद का विषय रही है, विशेष रूप से आर्य-आक्रमण-सिद्धांत के सन्दर्भ में। इस सम्बन्ध में अक्सर यह तर्क दिया जाता है :

  • ऋग्वेद में २१५ बार अश्व शब्द का प्रयोग किया गया है, इसलिए वैदिक समाज में घोड़ों का महत्त्वपूर्ण स्थान था। जबकि हड़प्पा सभ्यता में अश्व अनुपस्थित हैं और यह सभ्यता गैर-वैदिक और वैदिक सभ्यता की पूर्ववर्ती है।
  • इसलिए घोड़े को लगभग १,५०० ईसा पूर्व में आक्रमणकारी आर्यों द्वारा भारत में लाया गया होगा, जिन्होंने मूल, वृषभ-संचालित हड़प्पा सभ्यता को वश में करने के लिए अपनी तीव्रगति से संचालित अश्व सेना से कुचलने के लिये उपयोग किया था।
  • तर्क की इस पंक्ति को इतना स्पष्ट और अचूक माना जाता है कि इसे इस मुद्दे पर अंतिम शब्द माना जाता है; परिणामस्वरूप, हम इसे भारत के प्रागितिहास से निपटने वाली सन्दर्भ पुस्तकों और इतिहास की पाठ्यपुस्तकों में आत्मविश्वास से दोहराते हुए पाते हैं।

हालाँकि, करीब से देखने पर, तर्क के हर चरण में गंभीर खामियाँ हैं और इसके लिए विभिन्न तथ्यों की सूक्ष्मता से जाँचने-परखने की आवश्यकता है :

  • सबसे पहले विभिन्न हड़प्पा स्थलों से घोड़े के भौतिक साक्ष्य की जाँच दो सन्दर्भ में एक, कंकाल अवशेषों और विवरण के संदर्भ में।
  • औपनिवेशिक कार्यप्रणाली जिसने नकारात्मक साक्ष्यों से भ्रम पैदा किया और वामपंथियों द्वारा यह व्याख्या की भारत में जो कुछ अच्छा है वह सब बाहरी है।
  • लगातार ऋग्वेद की औपनिवेशिक व वामपंथी गलत व्याख्या।

सैंधव सभ्यता से मिले अश्वों के अवशेष

पारम्परिक दावों के विपरीत, कुछ पुरातत्त्वविदों ने भारत के प्रागैतिहासिक स्थलों से घोड़े के अवशेषों की सूचना दी है। भारतीय पुरातत्त्व के ए० घोष का सम्मानित और आधिकारिक विश्वकोश बिना किसी किसी लाग-लपेट के अश्व के सम्बन्ध में उल्लेख करता है :-

Equus caballus (horse) : The horse was primarily domesticated for labour and transport. There are no examples of its ancestral forms in India. Wild caballine horses were widespread in prehistoric and early historical Europe and Asia. Their descendants have either become extinct (e.g. Ukranian tarpan) or been domesticated, and only the Mongolian horse survives in a wild state. It appears likely that the horse was domesticated in c. 2000 B.C. in the region around Turkestan, although Europe and w. Asia are considered as alternative centres. Thence movements occurred both to the e. and w., and by c. 2000 B.C. it is found in Egypt and Mesopotamia.

In India the earliest evidence for the domesticated horse occurs in c. 4500 B.C. at BAGOR. Subsequently the true horse is reported from the Neolithic levels at KODEKAL and HALLUR and the late Harappa levels at Mohenjo-daro (Sewell and Guha, 1931) and ROPAR and at Harappa, LOTHAL and numerous other sites. UJJAIN and HASTINAPURA are among the important Iron Age sites where there is evidence of the domesticated horse at an early date, and cut-marks on the bones from HASTINAPURA (Period II) suggest the slaughter of the animal for food. At SURKOTADA bones of Equus caballus occur from Periods IA to IC (2100-1700 B.C.) along with those of Equus asinus and Equus hemionus (Sharma, 1974). Some of the caballine bones are charred; possibly the older animals were killed and eaten. Further study of the bones from this site might reveal skeletal changes which would indicate whether the animal was merely used for transport or was in fact also ridden. Recently bones of Equus caballus have also been reported from the proto-Harappa site of MALVAN in Gujarat. However the introduction of the horse into the subcontinent has sometimes been associated with the Indo-Aryans (Allchin, 1969).

 

इक्वस कैबेलस (घोड़ा) : घोड़े को मुख्य रूप से श्रम और परिवहन के लिए पालतू बनाया गया था। भारत में इसके पैतृक रूपों के कोई उदाहरण नहीं हैं। प्रागैतिहासिक और प्रारम्भिक ऐतिहासिक यूरोप और एशिया में जंगली कैबलाइन घोड़े व्यापक थे। उनके वंशज या तो विलुप्त हो गए हैं (जैसे उक्रानियन तर्पण) या पालतू हो गये हैं, और केवल मंगोलियाई घोड़ा जंगली अवस्था में जीवित है। ऐसा प्रतीत होता है कि घोड़े को c. २,०००ई०पू० में पालतू बनाया गया था। तुर्केस्तान के आसपास के क्षेत्र में, हालाँकि यूरोप और पश्चिम एशिया को वैकल्पिक केंद्र माना जाता है। वहाँ से इसका प्रसार पूर्व और पश्चिम दोनों ओर हुआ और c. २,००० ई०पू० में यह मिस्र और मेसोपोटामिया में पाया जाता है।

भारत में पालतू घोड़े का सबसे पहला प्रमाण c. ४,५००  ई०पू० में बागोर में मिलता है।  इसके बाद वास्तविकघोड़े को कोडेकल और हल्लूर में नवपाषाण स्तरों और मोहनजोदड़ो (सेवेल और गुहा, १९३१) और रोपड़ और हड़प्पा, लोथल और कई अन्य स्थलों पर हड़प्पा स्तरों से सूचित किया गया है। उज्जैन और हस्तिनापुर लौह युग के उन महत्त्वपूर्ण स्थलों में से हैं, जहाँ प्रारम्भिक तिथि में पालतू घोड़े के होने के प्रमाण मिलते हैं, और हस्तिनापुर (अवधि II) से हड्डियों पर कट-मार्क भोजन के लिए पशु के वध का संकेत देते हैं। इक्वस कैबेलस की सुरकोतदा हड्डियों में पीरियड IA से IC (२,१००-१,७०० ई०पू०) के साथ-साथ इक्वस एसिनस और इक्वस हेमियोनस (शर्मा, १९७४) की हड्डियाँ प्राप्त होती हैं। कैबलाइन की कुछ हड्डियाँ जली हुई हैं; संभवतः वृद्ध जानवरों को मार कर खा लिया जाता था। इस स्थल से अस्थियों के आगे के अध्ययन से कंकाल के परिवर्तनों का पता चल सकता है जो यह संकेत देगा कि क्या जानवर केवल परिवहन के लिए इस्तेमाल किया गया था या वास्तव में सवारी भी किया गया था। हाल ही में गुजरात में मालवन के प्रोटो-हड़प्पा स्थल से इक्वस कैबेलस की हड्डियों की भी सूचना मिली है। हालाँकि, उपमहाद्वीप में घोड़े का परिचय कभी-कभी इंडो-आर्यन (ऑलचिन, १९६९) से जुड़ा हुआ है।

Source : An Encyclopaedia of Indian Archaeology – A. Ghosh

 

ए० घोष कृत ‘An Encyclopaedia of Indian Archaeology’ में भारतवर्ष के कई पुरातात्त्विक स्थलों से वास्तविक घोड़े के साक्ष्य मिले हैं जिसका सार इस प्रकार है; यथा –

  • नवपाषाणकालीन स्थल
    • कोडेकल ( Kodekal ), यादगीर जनपद; कर्नाटक।
    • हल्लूर ( Hallur ), हवेरी जनपद; कर्नाटक।
  • हड़प्पोत्तर स्तर ( late-Hadappan or post-Hadappan level ) स्थल
    • मोहनजोदड़ो (Sewel and Guha, १९३१) और
    • रोपड़ और हड़प्पा, लोथल और कई अन्य स्थलों पर।
  • हाल ही में प्राक् हड़प्पा ( proto-Hadappa ) स्थल मालवाण ( Malvan ) से अश्व ( Equuas caballus ) के हड्डियों की भी सूचना मिली है। मालवाण गुजरात के वलसाड जनपद में है।

मार्टिमर व्हीलर* आर्य-आक्रमण-सिद्धान्त के एक तेजतर्रार समर्थक थे। यद्यपि स्वयं में आर्य आक्रमण सिद्धान्त बहुत विवादास्पद है। मार्टीमर व्हीलर ने बहुत पहले स्वीकार किया था कि ‘यह काफी संभव है कि ऊँट, घोड़ा और गधा वास्तव में सिंधु कारवां की एक परिचित विशेषता थी’।

  • The Indus Civilization : Mortimer Wheeler के इस विचार को Edwin Bryant कृत The Quest for the Origin of Vedic Aryan : The Endo-Aryan Debate  में उद्दृत।

प्रसिद्ध पुरातत्त्वविद् बी० बी० लाल* ने कालीबंगन, रोपड़, मालवन और लोथल से घोड़े के कई दाँतों और हड्डियों का उल्लेख किया है। एक अन्य वरिष्ठ पुरातत्त्वविद्, एस० पी० गुप्ता*, उन खोजों पर और विवरण जोड़ते व पुष्ट करते हैं, जिनमें प्रारम्भिक भी शामिल हैं।

  • The Earliest Civilization of South Asia : B. B. Lal*
  • The Indus-Saraswati Civilization – Origins, Problems and Issues*

लोथल के मामले में, पुरातत्त्वविद् भोला नाथ ने एक दाँत* की पहचान प्रमाणित की है साथ ही उन्होंने मोहनजोदड़ो और हड़प्पा की हड्डियों के बारे में भी इसी तरह के अवलोकन प्रस्तुत किये हैं।*

  • Lothal – A Harappan Port Town : Volume 2 ; S. R. Rao *
  • हड़प्पा के लिए देखें – “Remains of the Horse and the Indian Elephant from the Prehistoric Site of Harappa ( West Pakistan )” in भोला नाथ कृत “Advance in the Study of Prehistoric and and Ancient Animal Remains in India – A Review” in Record of the Zoological Survey of India. *

अश्व और आर्य विवाद :सुरकोतदा से प्राप्त घोड़े की हड्डियाँ

चित्र – १ : सुरकोतदा से मिली अश्व की अस्थियाँ

ए० के० शर्मा ने सुरकोतदा से घोड़े के अवशेषों की पहचान की है। इस तथ्य का समर्थन हंगरी के प्रसिद्ध पुरातत्त्व-जीवविज्ञानी ( Archaeo-zoologist ) स्व० संडोर बोकोयीं ( Sandor Bokonyi ) ने १९९१ में किया है। दिवंगत संडोर बोकोयीं अश्व से सम्बन्धित ज्ञान में एक अंतर्राष्ट्रीय ख्यातिलब्ध पुरातत्त्वविद् हैं। संडोर बोकोयीं महोदय ने सुरकोतदा से मिले अवशेषों में से स्थानीय वन्य गधों ( local wild ass ) से अलग ‘वास्तविक अश्व के अवशेष’ ( remnants of true horses )* होने की पुष्टि की और यह भी कहा कि ये पालतू घोड़े थे। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के महानिदेशक को १९९३ की अपनी रिपोर्ट में, बोकोनी ने पूरे मामले के बारे में कोई ठोस जानकारी नहीं दी :

  • Sandor Bokonyi, “Horse Remains from the Prehistoric site of Surkotada, Kutch, Late 3rd Millenium B.C.” – South Asian Studies, Volume-13, 1997.*

डॉ० जे० पी० जोशी के निर्देशन में प्रागैतिहासिक स्थल सुरकोतदा के उत्खनन में मिले समतुल्य अवशेषों के गहन अध्ययन के माध्यम से, मैं निम्नलिखित बातें बता सकता हूँ : “वास्तविक घोड़े (Equus Caballus L.) की उपस्थिति को ऊपरी व निचले गाल एवं दाँतों के तामचीनी पैटर्न ( enamel pattern ) और कृदंत ( incisors ) व पैर की अस्थियों ( phalanges ) के आकार एवं रूप द्वारा प्रमाणित किया गया था। चूँकि प्लाइस्टोसीन काल के बाद भारत में कोई वन्य घोड़े नहीं रहते थे, इसलिए सुरकोटदा घोड़ों की घरेलू प्रकृति निस्संदेह है। यह एक इंटर-मैक्सिला टुकड़े द्वारा भी समर्थित है, जिसका कृदंत दाँत नाँद काटने ( crib biting ) के स्पष्ट संकेत दिखाता है, यह एक बुरी आदत है जो केवल घरेलू घोड़ों में मौजूद है जो युद्ध के लिए बड़े पैमाने पर उपयोग नहीं किया जाता है।”*

  • Sandor Bokonyi, ने १३ दिसम्बर १९९३, भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण के निदेशक को दी गयी अपनी रिपोर्ट में यह बात कही। इसको बी० बी० लाल ने अपनी कृत ‘The Earliest Civilisation of South Asia’ में उद्धृत किया है।*

सुरकोटदा और लोथल के निष्कर्षों के अनुरूप ही ‘पशु अवशेषों पर डेक्कन कॉलेज के विशेषज्ञों’ पी० के० थॉमस, पी० पी० जोगलेकर और अन्य को शिकारपुर* के पास के हड़प्पा स्थल से “परिपक्व हड़प्पा काल में” और कुंतासी* से घोड़े की अस्थयाँ मिली है।

  • K. Thomas, P. P. Joglekar, et al, ‘Harappan Subsistence Pattern with Special Reference to Shikarpur, a Harappan Site in Gujrat, Man and Environment XX ( 2 ) – 1995.*
  • K. Thomas, P. P. Joglekar, et al, “Subsistence Based on Animals in the Harappan Culture of Gujarat”, Anthropozoologica, 1997.*

ए० घोष द्वारा उल्लिखित नवपाषाण स्थलों में प्रयागराज जनपद का कोल्डीहवा उल्लेखनीय है। कोल्डिहवा में जी० आर० शर्मा और अन्य द्वारा अश्व के जीवाश्म की पहचान की गयी।*

  • R. Sharma, History to Protohistory : Archaeology of the Vindhyas and the Ganga Valley ( University of Allahabad, 1980 ), quoted by K. D. Sethna, The Problem of Aryan Origins.*

हड़प्पा काल के समकालीन, चंबल नदी घाटी (मध्य प्रदेश में) की संस्कृति का पता २,४५० और २,००० ईसा पूर्व के बीच की परतों के संदर्भ में पुरातत्त्वविद् एम० के० धवलीकर के अवलोकन उल्लेखनीय हैं :

“सबसे दिलचस्प है कायथा संस्कृति के स्तरों से घोड़े की अस्थियों की खोज और एक घोड़ी की टेराकोटा मूर्ति। यह घरेलू प्रजाति (Equus Caballus) है, जो भारतवर्ष में घोड़े की प्राचीनता को तृतीय सहस्राब्दी ईसा पूर्व के उत्तरार्ध में ले जाती है। सभी ताम्रपाषाण स्तरों में कायथा में घोड़े की उपस्थिति घोड़े के विवादास्पद प्रसंग के सन्दर्भ में बहुत महत्त्व रखती है।”*

  • K. Dhavalikar, Indian Protohistory – 1997. *

यहाँ यह बात उल्लेखनीय है कि सुरकोतदा की ही तरह कायथा में भी अश्व को पालतू बना लिया गया था।

इतने सारे विशेषज्ञों द्वारा इतने सारे स्थलों से इतनी सारी रिपोर्टों के सामने आने के बाद भी १,५०० ईसा पूर्व  से पहले भारतीय उप-महाद्वीप में घोड़े की भौतिक उपस्थिति को इतिहासकारों के एक वर्ग द्वारा सिरे से नकार देना समझ से परे है और स्वस्थ परम्परा नहीं है। प्रश्न है कि क्या हम यह मान लें कि विशेषज्ञों द्वारा घोड़े के अवशेषों की सभी पहचान गलत और भ्रामक हैं? क्या ऐसे साक्ष्यों को खारिज करने वाले विद्वानों ने व्यक्तिगत रूप से इसके १०% हिस्से की भी जाँच की है? क्या उन्होंने भी, उन्हीं स्थलों और स्थितियों में पाये गये अन्य जानवरों के अवशेषों की पहचान के बारे में समान संदेह व्यक्त किया है?

रिचर्ड मीडो और अजिता पटेल ने पुरातत्त्व सर्वेक्षण के लिये सांडोर बोकोनी की रिपोर्ट को चुनौती दी थी।* हालाँकि बोकोनी अपने विचारों पर अड़े रहे (हालाँकि अपनी अंतिम प्रतिक्रिया देने से पहले ही उनका निधन हो गया)। मीडो और पटेल ने अपनी लंबी दलील को कमजोर बयान के साथ समाप्त कर दिया कि “अंत में … कि [बोकोनी की घोड़े की पहचान सुरकोटदा में बनी हुई है” ] जोर और राय का विषय हो सकता है।”

  • Richard Meadow & Ajita Patel, “A comment on ‘Horse Remains from Surkotada’ by Sandor Bokonyi” – South Asian Studies, Volume-13, 1997.*

यहाँ यह बात उल्लेखनीय है कि रिचर्ड मीडो व अजीता पटेल ने भारतीय विद्वानों ए० के० शर्मा, पी० के० थॉमस या पी० पी० जोगलेकर के अश्व सम्बन्धित विचार को चुनौती नहीं देते। परन्तु वो बोकोनी द्वारा सुरकोतदा में अश्व की उपस्थिति को पुष्ट करने पर ये विद्वान चिंतित हो उठते हैं। तब से, मनोरंजक रूप से, उनके अनिर्णायक पेपर को कई मार्क्सवादी इतिहासकारों द्वारा सिंधु-सरस्वती सभ्यता में घोड़े के गैर-अस्तित्व या अनुपस्थिति पर अंतिम शब्द के रूप में उद्धृत किया जाता रहा है।*

  • उदाहरणार्थ – रामशरण शर्मा – ‘क्या हड़प्पा संस्कृति वैदिक थी?’ – Journal of the Interdisciplinary Studies in History & Archaeology. रोमिला थॉपर कृत Penguin History of India.

इससे भी अधिक हास्यास्पद यह है कि जब आक्रमणकारी यूरोप में घोड़े की शुरूआत का पता लगाने का प्रयास करते हैं, तो वे उसी बोकोनी*की ओर मुड़ते हैं, उनकी विशेषज्ञता यूरोप में कभी भी सवालों के घेरे में नहीं थी, लेकिन इन्हें भारत में बोकोनी अस्वीकार्य है।

  • उदाहरणार्थ – P. Mallory, In search of Indo-European : Language, Archaeology and Myth.*

पुराना तर्क कि तथाकथित घोड़ा हमेशा जंगली गधे की प्रजातियों से सम्बंधित होता है, जैसे कि एशियाई वन्य गधा ( onager – Equus hemionus onager), दक्षिण एशियाई गधा (Equus hemionus khur), या सादा गधा (the plain ass – Equus asinus) अस्वीकार्य है ; एक, सबसे पहले क्योंकि यह प्रकृति में व्यापक है और बहुत कम या कोई सबूत नहीं देता है। दूसरा क्योंकि कई मामलों में, विशेषज्ञों ने एक ही स्थान से जंगली गधे के अवशेषों की एक साथ रिपोर्ट की है, जिसका अर्थ है कि उन प्रजातियों के बीच अंतर करने की कुछ क्षमता है।*

  • सुरकोतदा का यही हाल है। देखें – जगतपति जोशी कृत ‘Excavation at Surkotada and exploration in Kutch.*

एक और आपत्ति यह है कि विवादित घोड़े के अवशेष की तिथियाँ दृढ़ता से स्थापित नहीं हैं और यह बहुत अधिक हाल की हो सकती हैं। लेकिन जगत पति जोशी की उत्खनन रिपोर्ट, उदाहरण के लिए, यह स्पष्ट करती है कि, तीनों चरणों से सुरकोतदा में पर्याप्त संख्या में घोड़े (Equus caballus L.) की हड्डियाँ प्राप्त हुई हैं। मिली हुई अस्थियों के हिस्से बहुत विशिष्ट हैं: पहला, दूसरा और तीसरा अंगुलास्थि ( phalanges ) और कुछ कशेरुकाओं के टुकड़े।* सुरकोतदा के तीन चरणों में पहला चरण* परिपक्व हड़प्पा सभ्यता से सम्बंधित है, जिससे कि यह सम्भावना समाप्त हो जाती है कि अश्व का प्रचलन भारत में तथाकथित आर्य आक्रमण* से जुड़ा हुआ है।

  • जगतपति जोशी कृत ‘Excavation at Surkotada and exploration in Kutch.*
  • अवधि IA लगभग २,३०० BCE से शुरू होती है (देखें , पृ. 60 ff.), लेकिन यह अशोधित ( uncalibrated ) C-१४ विश्लेषण पर आधारित है; एक शोधित तिथि आमतौर पर कुछ सदियों पुरानी होगी, जो परिपक्व हड़प्पा चरण की शुरुआत के लिए २,६०० ईसा पूर्व की स्वीकृत तिथि के साथ अच्छी तरह से फिट होगी।
  • आर्य आक्रमण की तथाकथित तिथि – १,५०० ई०पू०

इसके अलावा, हमारे पास प्रयागराज के पास महगड़ा ( Mahagara ) से घोड़े की हड्डियों की पहचान जी० आर० शर्मा और अन्य द्वारा की गयी है। यहाँ से मिले “छह नमूना पूर्ण कार्बन १४ परीक्षणों ने २,२६५ ईसा पूर्व से १,४८० ईसा पूर्व तक की तारीखें दी हैं।”*

  • R. Sharma et al., Beginnings of Agriculture (Allahabad: Abinash Prakashan, 1980), pp. 220-221, quoted by Edwin Bryant in The Quest for the Origins of Vedic Culture, op. cit., p. 170.*

ऊपर ए० घोष द्वारा उल्लेखित हल्लूर का मामला और भी महत्त्वपूर्ण है। यहाँ से घोड़े के जो अवशेष मिले वे १,५०० और १,३०० ईसा पूर्व के बीच के हैं। दूसरे शब्दों में, उस समय के बारे में जब पश्चिमोत्तर के खैबर दर्रे से आर्य आक्रमण की कल्पना की गयी है लगभग उसी समय हल्लूर से अश्व के साक्ष्य मिलते हैं।*

  • R. Alur, ‘Animal Remains’ in Proto-historical Cultures of the Tungabhadra Valley. यहाँ ध्यान देने वाली बात है कि बतायी गयी तिथि अशोधित है अतः यह तिथि और पुरानी हो सकती है।*

आर्य तीव्रगति से भी कर्नाटक तक नहीं पहुँच सकते थे और साथ ही ऋग्वैदिक आर्य जब पूर्णतः उत्तरी भारत से ही नहीं परिचित थे तो दक्षिण भारत से परिचय का तो प्रश्न ही नहीं उठता है। मज़े की बात तो देखो जब एक पुरातत्त्वविद् और साथ ही एक पशु चिकित्सक के० आर० अलुर ने हल्लूर से जानवरों के अवशेषों पर अपनी रिपोर्ट प्रकाशित की, तो उन्हें चिंताजनक प्रश्न मिले, यहाँ तक ​​कि विरोध का भी सामना करना पड़ा। साथ ही यह कहा गया कि उन घोड़ों की हड्डियों से सम्बंधित रिपोर्ट में कुछ त्रुटि है। कुछ बीस साल बाद अंततः एक नये सिरे से उत्खनन कराया गया जिसमें और अधिक घोड़े की हड्डियाँ मिली जिसने आर्य-आक्रमण-सिद्धान्त के पोषकों में और अधिक व्याकुलता बढ़ा दी। अलुर ने अपनी मूल रिपोर्ट को बदलने का कोई कारण नहीं देखा, और लिखा कि उनके आलोचकों की राय “आर्यन आक्रमण की (अनुमानित) अवधि से पहले हल्लूर में मौजूद एक वैज्ञानिक तथ्य की खोज को न तो अस्वीकार कर सकती है और न ही बदल सकती है।”*

  • R. Alur, “Aryan Invasion of India, Indo-Gangetic Valley Cultures,” in New Trends in Indian Art and Archaeology, ed. B. U. Nayak & N. C. Ghosh (New Delhi: Aditya Prakashan, 1992), p. 562, quoted by Edwin Bryant, The Quest for the Origins of Vedic Culture: The Indo- Aryan Migration Debate (New York: Oxford University Press, 2001), p170 and by A.K. Sharma, “The Harappan Horse was buried under the dunes of …”, Puratattva, No23, 1992- 93, p. 30.*

इसलिए यह दावा कि घोड़े की खोज पर तारीख नहीं है, कहना बुद्धिमत्तापूर्ण नहीं है।

अंततः एस० पी० गुप्ता एक समझदारी भरा प्रति-उत्तर देते हैं। यदि २% भी किसी अन्य पशु का अवशेष प्राप्त होता है तो उसे स्वीकार कर लिया जाता है। यह इंगित करते हुए कि ऊँट और हाथी (हड़प्पा स्थलों में निर्विवाद रूप से मौजूद जानवर) के बारे में भी यही सच है। वह बताते हैं कि इनका कम अनुपात “सिर्फ इसलिए है क्योंकि इन जानवरों को नियमित रूप से मवेशियों, भेड़ों और बकरियों के रूप में भी खाये जाने की सम्भावना नहीं है। मछली के रूप में जिसकी हड्डियाँ सभी सिंधु-सरस्वती बस्तियों में बहुतायत से पायी जाती हैं।”*

  • P. Gupta, The Indus-Saraswati Civilization – Origin, Problems and Issues.*

कुल मिलाकर, सिंधु-सरस्वती सभ्यता में घोड़े की भौतिक उपस्थिति जबरदस्त रूप से है, और अन्य अज्ञात स्थलों से इसके साक्ष्यों से और मजबूत होना तय है। पुरातत्वविद् ए० के० शर्मा का निष्कर्ष, एक पेपर में जिसने “घोड़े के साक्ष्य” और इस संबंध में अपने स्वयं के अनुभवों का सर्वेक्षण किया, उद्धृत करने योग्य है : “यह वास्तव में अजीब है कि पुरातत्वविदों द्वारा इन महत्वपूर्ण निष्कर्षों पर कोई ध्यान नहीं दिया गया; और बार-बार दोहराया जाने वाला सिद्धांत कि वास्तविक पालतू घोड़े को हड़प्पावासी नहीं जानते थे, हमारे तथाकथित दिग्गज इतिहासकारों और व्हीलर की पीढ़ी के पुरातत्त्वविदों को घोड़े की पीठ पर बैठकर आये भारत पर आर्यों के आक्रमण के अपने सिद्धांत को तैयार करने और प्रचारित करने में मदद करने के लिए इन निष्कर्षों की अनदेखी करते रहे।’*

  • Gupta, “The Harappan Horse was buried under the dunes of …..l Puratattva.

अश्व और आरीदार पहिये

हड़प्पावासियों ने निश्चित रूप से जानवरों के चारों ओर अपने अधिकांश धार्मिक प्रतीकों का निर्माण किया। उनमें से कई को उनकी मुहरों और पट्टिकाओं पर, टेराकोटा की मूर्तियों में, या मिट्टी के बर्तनों के रूप में चित्रित किया गया। हालाँकि यह सच है कि हड़प्पा मुहरों पर घोड़ा दिखायी नहीं देता है, सिवाय इसके कि हम एस० आर० राव* के अनुमान को स्वीकार करें। और साथ ही कुछ अन्य विद्वानों का कहना है कि हजारों मुहरों पर एकसिगीं ( unicorn ) के रूप में दर्शाये गये मिश्रित जानवर का वास्तव में घोड़े का सिर प्रतीत होता है। वस्तुतः यह जल्दबाजी में दावा किया गया है कि जानवर को कभी भी चित्रित नहीं किया गया है।

  • R. Rao, Down and Devolution of the Indus Civilization.*

मोहनजोदड़ो (चित्र २) में एक घोड़े की मूर्ति मिली है। इस सम्बन्ध में ई० जे० एच० मैके ने निम्न टिप्पणी की है : “सम्भवतः मॉडल जानवरों में सबसे दिलचस्प वह है जिसे मैं व्यक्तिगत रूप से घोड़े का प्रतिनिधित्व करने के लिये लेता हूँ। मुझे नहीं लगता कि हमें विशेष रूप से आश्चर्यचकित होने की आवश्यकता है यदि यह सिद्ध किया जाय कि घोड़ा मोहनजोदड़ो में इतना पहले अस्तित्व में था।”* मार्टीमर व्हीलर ने इस तथ्य को स्वीकार किया है।*

  • H.J. Mackey, Further excavations at Mohenjo-daro.*
  • Quoted by B.B. Lal in India 1947-1997: New Light on the Indus Civilisation ( New Delhi: Aryan Book International, 1998).*

मोहनजोदड़ो से प्राप्त अश्व मूर्ति : अश्व और आर्य बहस

चित्र – २ : मोहनजोदड़ो से मिली घोड़े की मूर्ति

स्टुअर्ट पिग्गट द्वारा पेरियानों घुंडई से एक अश्व मूर्तिका मिलने की सूचना दी गयी है। साथ ही लोथल से कई मूर्तियाँ मिली हैं। जिसमें से कुछ पर्याप्त रूप से स्पष्ट भी हैं ( चित्र – ३ और ४ )।*

  • शतरंज के सेट को सिंधु सभ्यता के एस० आर० राव, ‘Dawn and Devolution of the Indus Civilization’ से लिया गया है। मैं निम्नलिखित परीक्षण का सुझाव किसी को भी देता हूँ, जिसे संदेह है कि यह मूर्ति एक घोड़े का प्रतिनिधित्व करती है: स्कूली बच्चों को “शतरंज” का पूरा सेट दिखाएँ और उनसे पूछें कि यह क्या है; जवाब हमेशा “शतरंज!” (यह, कम से कम, मेरा अपना अनुभव रहा है।) फिर जैसे, “क्यों?” उत्तर: “घोड़े की वजह से।” मेरा सुझाव है कि ऐसे मामले में बच्चों की अवलोकन की भावना “विशेषज्ञों” की तुलना में अधिक विश्वसनीय और कम पक्षपाती है, और तो और इसलिए कि हड़प्पा की कई मूर्तियाँ बच्चों के लिए बहुत संभावित खिलौने थीं।*

कुछ मिट्टी के बर्तनों पर भी घोड़े का चित्रण दिखायी देता है, उदाहरणार्थ -उत्खननकर्ता आर० एस० बिष्ट और अन्य के अनुसार;  कुणाल ( हरियाणा ) से अन्य जानवरों के बीच पूर्व-हड़प्पा स्तर पर।*

  • S. Bisht, C. Dorje, Anundhati Banerji, end. Indian Archaeology 1993-94 — A Review, Explorations and Excavations ( New Delhi: DG of ASI, 2000 )

बालू में एक और मूर्ति मिली, जो एक काठी की तरह दिखती है।*

  • देखें के० डी० सेथना, ‘The Problem of Aryan Origins.*

ऊपर उद्धृत धवलीकर ने चंबल घाटी में “एक घोड़ी की टेराकोटा मूर्ति” का उल्लेख किया।

अंत में, घोड़े को रॉक कला में दर्शाया गया है; उदाहरणार्थ – नर्मदा घाटी में भीमबेटका और उत्तर प्रदेश में मोरहना पहाड़। लेकिन दुर्भाग्यवश हमारे पास भारत में रॉक कला के लिये बहुत कम सटीक तारीखें हैं।

अश्व और आर्य विवाद

चित्र -३ : लोथल से मिली अश्व की मूर्ति

अश्व और आर्य बहस

चित्र – ४ : लोथल से मिला शतरंज का सेट

यह मात्र घोड़े के सम्बन्ध में ही नहीं अपितु आरीदार पहिये के सन्दर्भ में भी सही है कि औपनिवेशिक/आक्रमणकारी विचार पोषित विद्वानों ने हर उस तथ्य या चीज़ को बाहरी प्रामाणिक करने का प्रयास किया है जो कुछ भी भारतीय सभ्यता या संस्कृति में शुभ व अच्छी है। इस वर्ग में विदेशी विद्वान ही नहीं स्वयं भारतीय विद्वान भी सम्मिलित हैं।*

  • देखें – रोमिल थापा कृति ‘Cultural Past’.*

उन्नीसवीं शताब्दी के नस्लीय सिद्धांतों की भव्य गूंज में माइकल विट्जेल लिखते हैं, “[आक्रमणकारी आर्यों] की पहली उपस्थिति ने स्थानीय आबादी को एक आतंक से त्रस्त कर दिया होगा।”*

  • Michael Witzel – ‘Early Indian history: Linguistic and textual parameters’, in the Indo-Aryan of Ancient South Asia: Language, Material culture and Ethnicity.*

इस प्रकार धीमी बैल चालित ठोस-पहिये वाली हड़प्पा गाड़ी की तुलना में आरीदार पहिये को गति के खेल में एक महत्त्वपूर्ण तत्त्व के रूप में देखा गया था; जब तक यह पता नहीं चला कि हड़प्पावासियों के पास भी आरीदार पहिये थे।

हड़प्पा सभ्यता और आरीदार पहियाचित्र – ५ : बनावली एवं राखीगढ़ी से मिले आरीदार पहिये के साक्ष्य

बनावली और राखीगढ़ी से कुछ टेराकोटा के पहिये दिखाते हैं जहाँ आरियाँ स्पष्ट रूप से टेराकोट्टा या फलक पर दिखती हैं।*

  • दोनों चित्र बी० बी० लाल कृत ‘The Saraswati Flows on : the continuity of Indian Culture’ से लिया गया है।*

कुंतासी*, लोथल और भिर्राना* (हरियाणा) से ऐसे और भी पहिये मिले हैं।

  • कुंतासी : K. Dhavalikar कृत ‘Indian Protohistory.*
  • S. Rao , “The Harappan Spoked Whells Rattled Down the Streets of Bhirrana, Dist. Fatehabad, Haryana” in Puratattva.*

यह सारी सामग्री “नकारात्मक साक्ष्य” के खतरे को दर्शाती है: इसे अप्रासंगिक बनाने में बहुत कम समय लगता है।

पद्धति सम्बंधी मुद्दे

कच्चे सबूतों या अशोधित साक्ष्यों ( raw evidence ) के अलावा, भारतीय उपमहाद्वीप में घोड़े की उपस्थिति वास्तव में एक जटिल मुद्दा है, और इसे अशोधित रूप से व्यवहार करने से पारम्परिक सिद्धान्त गम्भीर पद्धतिगत दोषों से ग्रस्त है। आइए संक्षेप में उनमें से कुछ पर विचार करते हैं।

१,५०० ईसा पूर्व के बाद भारत में घोड़े के भौतिक अवशेष और चित्रण

आर्य-आक्रमणकारी स्कूल का मानना ​​है कि घोड़े को भारत में “आर्यों” द्वारा १,५०० ईसा पूर्व के आसपास भारतीय उप-महाद्वीप में प्रचलित किया गया था। इसलिए उसके बाद जानवरों के अवशेषों और चित्रणों में उल्लेखनीय वृद्धि की उम्मीद की जा सकती है और यह भारतीय प्रागितिहास के सबसे अच्छे रहस्यों में से एक है – ऐसा कुछ भी नहीं होता अर्थात् अश्व की संख्या में वृद्धि नहीं होती हुई दिखाई देती है।

केवल शुरुआती ऐतिहासिक चरणों को देखते हुए, तक्षशिला, हस्तिनापुर या अतरंजीखेड़ा (उत्तर प्रदेश) से वास्तव में वास्तविक घोड़े और घरेलू गधे दोनों की हड्डियाँ मिली हैं साथ ही आश्चर्यजनक रूप से, दोनों के बीच का अंतर अब यहाँ विवादित नहीं है। परन्तु अन्य स्थलों पर; जैसे – नासिक, नागदा (मध्य प्रदेश), सारनाथ, अरिकामेडु (तमिलनाडु), ब्रह्मगिरी (कर्नाटक), नागार्जुनकोंडा (आंध्र प्रदेश), दोनों में से किसी भी जानवर के अवशेष नहीं मिले हैं। जौगड़ (उड़ीसा) या मस्की (कर्नाटक) जैसे स्थल भी हैं जहाँ गधा तो मिला है, लेकिन घोड़ा नहीं।*

  • Bhola Nath, “Advance in the study of prehistoric and ancient animal remains in India – A brief review” in records of the zoological survey of India.*

अंत में, घोड़े के अवशेषों के साथ आने वाले स्थलों से उपलब्ध आँकड़ा हड़प्पा स्थलों जैसे सुरकोटदा की तुलना में घोड़े की हड्डियों या दाँतों के समग्र प्रतिशत में कोई उल्लेखनीय वृद्धि नहीं दिखाता है।

इसलिए, यदि सिंधु-सरस्वती सभ्यता में घोड़े के कम प्रमाणों को प्रमाण के रूप में लिया जाता है कि वह सभ्यता पूर्व-वैदिक है, तो हमें पूरे मौर्य-पूर्व भारत में उसी तर्क का विस्तार करना चाहिए। यह स्पष्ट है कि घोड़ा १,५०० ई०पू० से पहले और बाद में उतना ही दुर्लभ या उतना ही आम जानवर था। सम्भवतः “दुर्लभ” शब्द दोनों के लिये सही है।

जहाँ तक तथाकथित ​​”आर्य-आक्रमण के बाद” घोड़े के चित्रण का सम्बन्ध है, वे भी हड़प्पा स्थलों की तुलना में अधिक नहीं हैं : पिराक, हस्तिनापुर और अतरंजीखेड़ा की कुछ मूर्तियों को छोड़कर, हम जानवर का कोई उत्साहवर्धक प्रतिनिधित्व नहीं पाते हैं, जबकि हम आक्रामक “आर्यों” से अपने विजय के साधन के लिये समृद्ध श्रद्धांजलि देने की अपेक्षा करते थे, जैसा कि आर्य-आक्रमण के समर्थक कहते हैं और जिसे ऋग्वेद में बहुत महिमामंडित किया गया है।

इतिहासकार टी० के० बिस्वास लिखते हैं कि “पत्थर जैसी टिकाऊ सामग्री में घोड़े को आकार देने का पहला जानबूझकर और सचेत प्रयास भारत में मौर्यों की कला में देखा गया था।”*

  • K. Biswas : Horse in Early Indian Art.*

इतिहासकार जयंती रथ प्रारंभिक भारतीय सिक्कों पर चित्रित जानवरों पर टिप्पणी करते हुए लिखते हैं : “आहत सिक्कों ( punch-marked coins ) की पशु दुनिया में हाथी, बैल, शेर, कुत्ता, बिल्ली, हिरण, ऊँट, गैंडा, खरगोश, मेंढक, मछली, कछुआ, घड़ियाल (मछली खाने वाला मगरमच्छ), बिच्छू और सांप अंकित हैं। पक्षियों में मोर बहुत लोकप्रिय है। शेर और घोड़े के प्रतीकों ने तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व में अधिक लोकप्रियता हासिल की है।”*

  • Jayanti Rath, “The Animal Motifs On Indian Coins ( Ancient and Orissa Historical Research Journal, Vol. XLVII, No. 1. *

कुल मिलाकर, मौर्य-पूर्व भारत में एक भयानक अश्वीय सन्नाटा व्याप्त है।

भारत के बाहर घोड़े के भौतिक अवशेष और चित्रण

आइये भारतीय उप-महाद्वीप के बाहर कुछ क्षेत्रों पर दृष्टिपात करते हैं। उदाहरणार्थ समकालीन बैक्ट्रिया में घोड़े को शवगाहों के सामानों में चित्रण के माध्यम से अच्छी तरह से प्रलेखित किया गया है, फिर भी घोड़े की कोई अस्थि नहीं मिली है। यू० एस० के भारतविद् ( Indologist )एडविन ब्रायंट इस सम्बन्ध में लिखते हैं —”यह फिर से इस बिंदु को रेखांकित करता है कि घोड़े की अस्थियों की कमी घोड़े की अनुपस्थिति के बराबर नहीं है।”*

  • Edwin Bryant, The Quest of the Origin of Vedic Culture.*

अमेरिका में घोड़े के सन्दर्भ में, जहाँ इसका प्रसार काफी प्रसिद्ध है, एलिजाबेथ विंग बताती हैं : “एक बार नई दुनिया में सुरक्षित पहुँचने के बाद, वे प्रतिस्पर्धियों और शिकारियों से मुक्त चरागाह भूमि में मवेशियों के साथ समृद्ध होने की सूचना देते हैं। हालाँकि,  पुरातात्त्विक स्थलों में शायद ही कभी घोड़े के अवशेष पाये जाते हैं। यह निपटान के पैटर्न का एक कार्य हो सकता है, जिसमें बोझ के जानवरों के अवशेष जो आमतौर पर उपभोग नहीं किये जाते थे। उन्हें भोजन में शामिल नहीं किया जाएगा या कत्लेआम के अवशेषों को शामिल नहीं किया जाएगा।”*

  • Elizabeth S. Wing, “Impact of Spanish Animal Uses in New World”, The Walking Larder — Pattern of Domestication, Pastoralism, and Predation.*

सिंधु-सरस्वती सभ्यता में हमने घोड़े की जो तस्वीर बनायी है, और घोड़े के मांस का सेवन न करने पर एस०पी०गुप्ता के इसी तरह के अवलोकन के साथ यह उपयुक्त बैठता है।

अतः स्पष्ट है कि तथाकथित “आर्य-आक्रमण-सिद्धान्त” के समर्थकों ( invasionists ) ने तीसरी सहस्राब्दी में घोड़े के अवशेषों की दुर्लभता पर आवश्यकता से अधिक जोर देकर तथ्य को अपनी विचारधारा के अनुरूप पेश किया है।

घोड़े का भारत में आगमन = आर्य आक्रमण (?)

एक तथ्य यह बार-बार दोहराया जाता है कि भारतीय उप-महाद्वीप में अश्व का प्रवेश मध्य एशिया से आर्य-आक्रमण के माध्यम से हुआ था।

जैसा कि हमने देखा कि भारतीयों का घोड़े से परिचय परिपक्व हड़प्पा काल में ही हो गया था। परन्तु जैसा कि आर्य-आक्रमण के समर्थकों ने दावा किया वो भी बिना किसी साक्ष्य के कि उत्तर हड़प्पा काल में तो घोड़े जानकारी हो ही गयी थी। अगर ऐसा हो भी तब भी यह कैसे स्थापित होता कि घोड़ा आर्य-आक्रमण या आर्य-प्रवास के परिणामस्वरूप भारतीय उप-महाद्वीप में आया। जबकि अन्य संभावनाएँ समान रूप से मान्य हैं या इससे भी अधिक अगर हम क्षेत्र के विकास को देखें? ब्रायंट महोदय पुनः स्पष्ट रूप से कहते हैं : “अकाट्य भाषाई प्रमाणों के अभाव में यह मानने के लिये कोई पुख्ता कारण नहीं है कि भारतीय उप-महाद्वीप में घोड़े का परिचय नये लोगों के परिचय का संकेत है….।” (In the absence of irrefutable linguistic evidence, there is no reason to feel compelled to believe that the introduction of the horse into the subcontinent is indicative of the introduction of new peoples any more than the introduction of any other innovatory items of material culture (such as camels, sorghum, rice, lapis lazuli, or anything else) is representative of new human migratory influxes.)*

  • Edwin Bryant, The Quest for the Vedic Culture.*

दूसरे शब्दों में, किसी भी युग में, घोड़े को व्यापार की एक वस्तु के रूप में पेश किया जा सकता था और हम जानते हैं कि हड़प्पावासियों के मेसोपोटामिया से लेकर उत्तरी अफगानिस्तान और संभवतः तुर्कमेनिस्तान के कुछ हिस्सों तक विस्तृत क्षेत्र के साथ व्यापक व्यापारिक सम्पर्क थे। यह वास्तव में जीन-फ्रांकोइस जेरिगे या जोनाथन एम० केनोयर जैसे पुरातत्त्वविदों का मत है। जोनाथन एम० केनोयर ने नोट किया कि अश्व और ऊँट को अपनाना स्वदेशी लोगों ( उत्तर हड़प्पा काल ) द्वारा किया गया था न कि ये पशु नये लोगों के इस क्षेत्र में आव्रजन का परिणाम था। घोड़े और ऊँट का साक्ष्य मध्य-एशिया से सम्पर्क को सूचित करता है।*

  • Jonathan M. Kenoyer, “ Interaction Systems, Specialised craft and cultural change”, in The Indo-Aryans of Ancient South Asia.*

उपमहाद्वीप में घोड़ों के आगमन की तिथि जो भी हो, युद्ध जैसी विजय के माध्यम से “हिंसक” परिचय देने का कोई आधार नहीं है।

चित्रण की समस्या

भौतिक अवशेषों के मुद्दे के बावजूद, आर्य-आक्रमण-सिद्धान्त के समर्थकों ने सिंधु मुहरों पर घोड़े के चित्रण न होने को अश्व के अनुपस्थिति के रूप सक्ष्य माना। परन्तु जैसा की अश्वों की टेराकोटा मूर्तिकाएँ व भौतिक अवशेष इनके तताकथित दावों की पोल खोल देते हैं। हालाँकि एस० पी० गुप्ता ने बताया कि “ऊँट, भेड़िया, बिल्ली, हिरण, नीलगाई, फाउल, शृंगाल शायद ही कभी या कहीं भी हड़प्पा कला का विषय रहा हो या इनका मुहर आदि पर चित्रण हुआ हो, लेकिन उनकी उपस्थिति को हड्डियों से प्रमाणित किया गया है।”*

  • P. Gupta, The Indus-Saraswati Civilization.*

इस क्रम में हम ऊँट और शेर जोड़ सकते हैं, जो निश्चित रूप से सैंधव सभ्यता के कुछ क्षेत्रों में मौजूद थे, फिर भी इसे कभी भी चित्रित नहीं किया गया था।

के० डी० सेथना प्रश्न उड़ाते हैं कि “चूँकि वृषभ की तस्वीरों के विपरीत, गाय के चित्रण नहीं हुआ है, जो प्रचुर मात्रा में होते हैं, तो क्या हमें यह निष्कर्ष निकालना चाहिए कि हड़प्पा और मोहनजोदड़ो में केवल बैल थे?”* इसी तर्क को सेथना महोदय आगे बढ़ाते हुए कहते हैं कि हड़प्पा सभ्यता में एकशृंगी पशु ( unicorn ) का अंकन है तो क्या एकशृंगी पशु हड़प्पा काल का आम पशु ( common animal ) था?

  • D. Sethna, The Problem of Aryan Orogins.*

स्पष्ट रूप से पशु प्रतिनिधित्व या उनकी अनुपस्थिति का सांस्कृतिक कारण होता है। सैंधव मुहरों का उद्देश्य प्राणियों की सूचना देना नहीं था। जब तक हमें सैंधव संस्कृति की गहरी समझ नहीं होती है, हम केवल इसकी प्रतीकात्मकता के बारे में अनुमान ही लगा सकते हैं।

क्या वैदिक अश्व वास्तविक अश्व है?

आर्य-आक्रमण-सिद्धान्त के समर्थक पहले से ही एक धारणा बनाकर चलते हैं। वे यह मानकर चलते हैं कि वेदों में वर्णित अश्व वास्तविक अश्व ( true Horse – Equus Caballus L. ) था। हालाँकि यह स्व-प्रमाणित हो ऐसा नहीं है। वास्तव में, जैसा कि कुछ विद्वानों ने बताया है, ऋग्वेद में ३४ पसलियों वाले घोड़े का वर्णन मिलता है।* शतपथ ब्राह्मण में भी ऐसा ही विवरण मिलता है। जबकि हम जानते हैं कि अश्व में ३६ पसलियाँ होती हैं।

चतुस्त्रिंशद्वाजिनो देवबन्धोर्वङ् क्रीरश्वस्य स्वधितिः समेति।

अच्छिद्रा गात्रा वयुना कृणोत परुष्परुरनुघुष्या वि शस्त॥१८॥*

प्रथम मण्डल, १६२वाँ सूक्त, १८वाँ श्लोक; ऋग्वेद।

हिन्दी – हे घोड़े को काटने वाले ! देवों के प्रिय अश्व की दोनों बगलों की चौंतीस हड्डियों को काटने के लिए छुरी भली प्रकार चलाई जाती है। ऐसी सावधानी बरतना, जिससे अश्व का कोई अंग कट न जाए। एक-एक भाग को देखकर और नाम लेकर काटो॥(१८)॥

इससे ज्ञात होता है कि ऋग्वेद में वर्णित घोड़ा एक अलग प्रजाति हो सकता है, जैसे कि छोटे और स्टॉकियर सिवालिक ( stockier Shiwalik ) या प्रेज़वल्स्की ( Przewaslki ) घोड़े, जिनमें अक्सर (हमेशा नहीं) ३४ पसलियाँ होती थीं। इस सम्बन्ध में पॉल मानेंसला का कहना है कि “तो भारत का घोड़ा, जिसमें ऋग्वेद के सबसे पुराने हिस्से के रूप में माने जाने वाले अश्वमेध यज्ञ सम्मिलित हैं, दक्षिण-पूर्वी एशिया के मूल निवासी का एक विशिष्ट किस्म है।”*

  • Paul Kekai Manansala, “A new look at Vedic India.”*

यह प्रश्न अभी भी अनसुलझा है क्योंकि इस क्षेत्र में विशेषज्ञों ने गम्भीरतापूर्वक विचार नहीं किया और न ही दृढ़ता से अपना मत रखते हैं।

ऋग्वेद में अश्व का अर्थ

अब हम एक अधिक मौलिक बिंदु पर आते हैं। १९वीं सदी के यूरोपीय संस्कृतिविदों के मत को स्वीकार करते हुए अधिकांश विद्वानों ने यह मान लिया है कि ऋग्वेद में अश्व की बारम्बारता के कारण वैदिक समाज में घोड़ों का प्राचुर्य था। यह निष्कर्ष दो आधारों पर त्रुटिपूर्ण है।

प्रथम, क्योंकि ऋग्वेद की भाषा प्रतीकात्मक है जो लगातार विभिन्न स्तरों पर काम करती है। अन्यथा, हम बिना किसी संभावित कर्मकाण्ड या “जीववादी” स्पष्टीकरण के शक्तिशाली छवियों की व्याख्या कैसे कर सकते हैं, जैसे कि एक निचला और एक ऊपरी महासागर, समुद्र से उठती “शहद की लहर”, “हृदय के महासागर” में घी की नदियाँ उठती हैं, चट्टान के नीचे छिपा हुआ “शहद का कुआँ”, पानी से पैदा हुई एक दिव्य अग्नि, पत्थर में मौजूद, या उस बच्चे की तुलना में जिसने अपनी माँ को जन्म दिया, “आठवाँ सूरज, जो अँधेरे में छिपा हुआ” और दर्जनों अधिक?

  • एक निचला और एक ऊपरी महासागर ( ऋग्वेद : ७/६/७ )
  • समुद्र से उठती शहद की लहर ( ऋग्वेद : ४/५८/१ )
  • हृदय के महासागर में उठती घृत की नदियाँ ( ऋग्वेद : ४/५८/५ )
  • चट्टान के नीचे छुपा हुआ शहद का कुँआ ( ऋग्वेद : २/२४/४ )
  • पानी में उत्पन्न एक दिव्य अग्नि ( ऋग्वेद : ३/१/३ )
  • पत्थर में मौजूद ( ऋग्वेद : १/७०/२ )
  • बालक जिसने पनी माँ को जन्म दिया ( ऋग्वेद : १/९५/४ )
  • अँधेरे में छिपा हुआ आठवाँ सूर्य ( ऋग्वेद ३/३९/५; १०/७२/९ )

ऋग्वेद का विशुद्ध रूप से भौतिकवादी या कर्मकाण्डीय अध्ययन हमें सही अर्थ या निहितार्थ से दूर कर देगा। साथ ही यह अनुचित है जब अन्य पौराणिक कथाओं के लंबे समय से गहरे आलंकारिक और प्रतीकात्मक स्तरों पर अध्ययन किया गया हो; जैसे – बेबीलोनियन मिस्र और ग्रीक के साहित्य व कथाएँ। यह और भी आश्चर्यजनक के साथ-साथ निराशाजनक भी है कि अधिकांश विद्वान औपनिवेशिक गलत व्याख्याओं से सम्मोहित व अभिभूत रहें है। वे ऋग्वेद में निहित अर्थ और संकेत ( गुप्त अर्थ ) को समझने में अलफल रहे हैं। “गुप्त शब्द जो केवल द्रष्टा को अपना अर्थ प्रकट करते हैं।”*

  • ऋग्वेद : ४/३/१६ *

तो आइए हम एक ऐसे ही एक “द्रष्टा” के विचार को जानते हैं। १९१२-१४ ई० में जब हड़प्पा सभ्यता की खोज नहीं हुई थी और हड़प्पा-अश्व के विवाद की शुरुआत नहीं हुई थी; श्री अरबिंदो ने ऋग्वेद और उपनिषदों के अपने अध्ययन में पाया कि “घोड़े के लिए प्रयुक्त अश्व शब्द का अर्थ शक्ति या गति अथवा दोनों से होना चाहिए।”*

  • Sri Aurobindo, The Upanishads.*

विशेष रूप से

गाय और घोड़ा; गो और अश्व, लगातार जुड़े हुए हैं। उषा ( the Dawn ) को गोमति व अश्ववती के रूप में वर्णित किया गया है; उषा यज्ञकर्ता को घोड़े और गाय देती है। जैसा कि भौतिक रूप से उषा पर लागू होता है, गोमति का अर्थ है प्रकाश की किरणों के साथ या प्रकाश की किरणों को लाना और मानव मन में रोशनी की सुबह की एक छवि है। इसी तरह अश्ववती भी केवल भौतिक घोड़े का उल्लेख नहीं कर सकती; इसका एक मनोवैज्ञानिक महत्त्व भी होना चाहिए। वैदिक अश्व के एक अध्ययन ने मुझे इस निष्कर्ष पर पहुँचाया कि गो और अश्व; प्रकाश और ऊर्जा, चेतना और बल के दो युगल विचारों का प्रतिनिधित्व करते हैं।*

  • Sri Aurobindo, The Secret of the Veda.*

कर्मकांड के लिए गो शब्द का अर्थ केवल एक भौतिक गाय है और कुछ नहीं, जैसे कि इसके साथी शब्द, अश्व का अर्थ केवल एक भौतिक घोड़ा है। जब ऋषि उषा की प्रार्थना करते हैं, ‘गोमद विरवद धेहि रत्नम उषो अश्ववत’, कर्मकांडी टीकाकार आह्वान में केवल “सुखद धन के लिए एक विनती देखता है जिससे गाय, पुरुष (या पुत्र) और घोड़े जुड़े होते हैं”। दूसरी ओर यदि ये शब्द प्रतीकात्मक हैं तो इसका यह भाव चलेगा, “हमें प्रकाश से भरपूर आनंद की स्थिति, विजयिनी उर्जा और जीवन-शक्ति से पुष्ट करें।”*

  • Sri Aurobindo – The secret of Veda.*

दूसरे शब्दों में; महर्षि अरबिंदो ने अश्व को घोड़े से समीकरण को खारिज कर दिया। ऋग्वेद से लेकर समुद्र मंथन के पौराणिक आख्यान तक, जल और समुद्र के साथ वैदिक घोड़े का निरंतर जुड़ाव इस बात की पुष्टि करता है कि हम यहाँ एक साधारण जानवर की बात नहीं कर रहें हैं; जैसा कि अश्विन कुमारों का पक्षियों के रूप में चित्रण है। इस ढाँचे के भीतर, अश्वमेध यज्ञ भी एक नये ढंग से विचार का हकदार है, जिसे भारतविद् ( Indologist ) सुभाष काक ने हाल ही में बहुत ही स्पष्ट रूप से रेखांकित किया है।*

  • Subhash Kak – The Asvamedh : the Rite and its Logic. *

श्री अरबिंदो के रुख को पूरी तरह से अलग दृष्टिकोण से अप्रत्यक्ष समर्थन मिला, जो दिवंगत मानवविज्ञानी एडमंड लीच का था। जिन्होंने एक अश्व-समृद्ध ऋग्वैदिक समाज की तस्वीर के विरुद्ध चेताया था : “ऋग्वेद में घोड़ों और रथों को दिया गया प्रमुख स्थान हमें वस्तुतः ऐसा कुछ भी नहीं बता सकता है जो किसी वास्तविक समाज को अलग कर सके जिसके लिए ऋग्वेद एक आंशिक ब्रह्माण्ड विज्ञान प्रदान कर सकता है। अगर कुछ भी है, तो यह सुझाव देता है कि वास्तविक समाज में (इसके पौराणिक समकक्ष के विपरीत), घोड़े और रथ एक दुर्लभ वस्तु थे, जिसका स्वामित्व अभिजात या राजकीय भेद का प्रतीक था।”*

  • Edmund Leach : “Aryan invasions over the millennia” in CultureThrough Time : Anthropological Approaches.*

इस प्रकार ऋग्वेद में घोड़े के स्थान का वैदिक संदेश और अनुभव पर नये सिरे से नज़र डालने के साथ-साथ एक गैर-औपनिवेशिक दृष्टिकोण से पुनर्मूल्यांकन करने की आवश्यकता है। यदि श्री अरबिंदो और एडमंड लीच दोनों सही हैं, तो अश्व शब्द केवल कभी-कभी वास्तविक जानवर को संदर्भित करता है और इसकी दुर्लभता भौतिक अवशेषों और विवरणों की मामूली मात्रा में अच्छी तरह से परिलक्षित होती है। वास्तविकता में आज के भारत में भी अश्व एक दुर्लभ जानवर रहा है। घोड़े को कई शताब्दियों तक भारत में आयात किया जाता था। यह अधिकांश गाँवों में अदृश्य रहा है।

इस बिंदु पर एक वैध आपत्ति उठायी जा सकती है : यदि घोड़ा सैंधव सभ्यता में मौजूद था और यदि कोई इस सभ्यता की तुलना वैदिक संस्कृति से करना चाहता है*, उत्तरार्द्ध ( वैदिक लोग ) कम से कम जानवर का प्रतीकात्मक उपयोग करता है; तो हड़प्पा कला में घोड़े को एक प्रतीक के रूप में अधिक बार क्यों नहीं दर्शाया गया है; उदाहरणार्थ सैंधव मुहरों पर? मैं जो उत्तर प्रस्तावित करता हूँ वह सरल है : भले ही ऋग्वेद समकालीन है, या परिपक्व सिंधु-सरस्वती सभ्यता से पुराना है, हमें हड़प्पा कला को वैदिक अवधारणाओं का शुद्ध प्रतिबिंब होने की अपेक्षा नहीं करनी चाहिए। वेद कुछ ऋषियों की अत्यंत विशिष्ट जिज्ञासाओं का प्रतिनिधित्व करता है, जिनके हड़प्पा नगरों के मध्य में रहने की संभावना नहीं है। यद्यपि वैदिक अवधारणाएँ और प्रतीक हड़प्पा संस्कृति में दिखायी देते हैं। सैंधव सभ्यता एक लोकप्रिय संस्कृति है। ठीक उसी तरह जैसे वर्तमान भारतीय गाँवों की संस्कृति को वॉलीवुड या अन्य संगीत और नृत्यों में सटीक रूप से प्रतिबिंबित नहीं होती है। कालीबंगन के किसानों द्वारा अच्छी बारिश के लिए बकरे की बलि देने और ‘तत् एकम्’ ( वह एक है ) की तलाश में ऋषियों के बीच पर्याप्त अंतर है, भले ही वे अंततः एक ही विश्वदृष्टि साझा करते हों।

  • See a number of parallels between Harappan and Vedic cultures, as well as historical survivals of Harappan cultures in Michel Danino, “The Harappan Heritage and the Aryan Problem”, Man and Environment ( Pune ) XXVIII.1 2003.*

हड़प्पा और वैदिक संस्कृतियों के पारस्परिक सम्बन्ध और अन्तर पर अधिक सूक्ष्म दृष्टिकोण से पुनर्विचार की आवश्यकता है।

क्या अश्व केवल आर्यों से सम्बंधित है?

आर्य-आक्रमण-सिद्धान्त-समर्थकों ( Invasionists ) की एक और अनकही धारणा है — कि ऋग्वेद में अश्व एक शुद्ध आर्य पशु है। साथ ही वे जो विश्वास करते हैं कि उनके पाठक जाकर मूल पाठ की जाँच नहीं करेंगे। परन्तु ऋग्वेद का मूलपाठ क्या यही कहता है? नि:संदेह, अधिकांश संदर्भों में अश्व को स्पष्ट रूप से आर्य देवताओं और उनके मानवीय सहायकों के पक्ष में रखा गया है। यद्यपि ऋषियों के मन में इस शब्द ( अश्व ) का जो भी अर्थ रहा हो।

लेकिन यह पता चला है कि कुछ खुलासा करने वाले अपवाद हैं; जैसे – दस्युओं और पणियों के पास भी अश्व होते थे। उदाहरणार्थ इंद्र-सोम ने सत्य (एवा सत्यम्) के माध्यम से, उस अस्तबल को चकनाचूर कर देते हैं जहाँ दस्यु “घोड़ों और गायों” (अश्वयम् गोः) को पकड़े हुए थे।*

एवा सत्यं मघवाना युवं तदिन्द्रश्च सोमोर्वमश्व्यं गोः।

आदर्दृतमपिहितान्यश्ना रिरिचथुः क्षाश्चित्ततृदाना॥*

हिन्दी – हे सोम ! तुम और इंद्र – दोनों ने अश्वों एवं गायों का समूह दान किया। तुमने पणियों द्वारा रोकी गई गायों को एवं उन पणियों की भूमियों को बल द्वारा मुक्त किया था। हे इंद्र एवं सोम! तुम दोनों शत्रुनाशकारियों ने जो किया, वह सत्य है॥

चतुर्थ मण्डल, २८वाँ सूक्त, ५वाँ श्लोक – ऋग्वेद।

एक अन्य श्लोक में इंद्र के मानव सहायक पाणि के “घोड़ों और मवेशियों” को ढूंढते हैं: “अंगिरसों ने पाणि, गायों और घोड़ों के झुंडों का पूरा आनंद प्राप्त किया।”*

आदङ्गिराः प्रथमं दधिरे वय इवाग्नयः शम्या ये सुकृत्यया।

सर्वं पणेः समविन्दन्त भोजनमश्वावन्तं गोमन्तमा पशुं नरः॥*

हिन्दी – पहले पणियों द्वारा गाएं चुराने पर अंगिरा ऋषि ने इंद्र के लिए हवि प्रस्तुत किया था। इस कारण यज्ञ नेता अंगिरावंशियों ने गाय, अश्व एवं अन्य पशुओं से युक्त धन पाया था॥

प्रथम मण्डल, ८३वाँ सूक्त, चतुर्थ श्लोक – ऋग्वेद।

इंद्र के दृढ़ दूती दैवीय सरामा या सरमा ( एक कुक्कुरी ) और पणियों के बीच प्रसिद्ध संवाद ऋग्वेद के दशम् मण्डल में, १०८वें सूक्त में मिलता है। यहाँ पर कुल ११ श्लोकों में पणियों और सरमा का संवाद है :

इन्द्रस्य दूतीरिषिता चरामि मह इच्छन्ती पणयो निधीन्वः।

अतिष्कदो भियसा तन्न आवत्तथा रसाया अतरं पयांसि॥२॥

हिन्दी – सरमा बोली—“हे पणियो ! मैं इंद्र की दूती हूं और उन्हीं के भेजने से आई हूँ। मैं तुम्हारे द्वारा एकत्रित गायों रूपी निधि को लेने की इच्छा से आई हूँ। मेरी छलांग से डरकर नदी के जल ने मुझे बचाया इस प्रकार मैंने नदी का जल पार किया॥”

XXX

अयं निधिः सरमे अद्रिबुध्नो गोभिरश्वेभिर्वसुभिर्दृष्टः।

रक्षन्ति तं पणयो ये सुगोपा रेकु पदमलकमा जगन्थ॥७॥

हिन्दी – पणियों ने कहा- “हे सरमा! हमारी गायरूपी संपत्ति पर्वतों द्वारा सुरक्षित है। यह गायों, घोड़ों और धनों से प्राप्त है। रक्षणसमर्थ पणि इस संपत्ति की रक्षा करते हैं। गायों के रंभाने के शब्द से सुशोभित हमारे इस स्थान पर तुम व्यर्थ आई हो॥”

XXX

दूरमित पणयो वरीय उद्गावो यन्तु मिनतीर्ऋतेन।

बृहस्पतिर्या अविन्दन्निगूळ्हाः सोमो ग्रावाण ऋषयश्च विप्राः॥११॥

हिन्दी – हे पणियो! तुम इस स्थान से दूर भाग जाओ। घेरने वाले पर्वत को टक्करें मारती हुई गाएँ इस सत्याश्रित पर्वत से लौट जावें। बृहस्पति, सोम, पत्थर, ऋषि एवं ब्राह्मण इस गुप्त स्थान को जान गए हैं॥

हर श्लोक यह स्पष्ट करता है कि ये सभी खजाने, जिनमें घोड़े भी शामिल हैं, पणियों के हैं। सरमा किसी भी बिंदु पर यह शिकायत नहीं करती कि ये चोरी के सामान हैं। वह पहले घोषणा करती है, और पणियों में इतना ढीठपना नहीं होना चाहिये कि आर्यों से जब्त माल के साथ उसे ताना मार सके। फिर भी सरमा को लगता है कि इंद्र उनका पूरा हकदार है।

अब यदि हम उसी औपनिवेशिक व्याख्या का अनुसरण करते हैं जो आर्य-आक्रमण-सिद्धान्त-समर्थक वेदों पर थोपते हैं, तब हमें यह स्वीकार करने के लिए मजबूर होना पड़ेगा कि दस्युओं और पणियों के पास भी अपने स्वयं के घोड़े थे जो निश्चित रूप से आर्यों द्वारा भारत में लाये गये घोड़े के पूरे विचार को नकारते हैं। ऐसा लगता है जैसे यह वैदिक परिदृश्य घोड़ों के साथ कुछ ज्यादा ही भीड़भाड़ वाला हो रहा है, बल्कि एक सस्ते पश्चिमी हॉलीवुड की तरह।

दस्युओं और पणियों के “घोड़ों” को समझने के लिये हमें श्री अरबिंदो द्वारा प्रस्तावित वैदिक प्रतीकवाद पर लौटने की आवश्यकता है : राक्षसों ( demon ) के पास गाय और अश्व तो थे। परन्तु वे कृपण थे। उनके अधिकार में गाय व अश्व न तो देवताओं के काम आते थे और न ही आमजन के। यह अर्थ और स्पष्ट हो जाता है जब हम गाय को प्रकाश का और अश्व के शक्ति और उर्जा का प्रतीक मानकर व्याख्यायित करते हैं। वैदिक दृष्टि से यह लौकिक नियम का उल्लंघन है। ऋषियों का यह कर्तव्य है कि देवताओं द्वारा सहायता प्राप्त करके वे उन “खजाने” को फिर से जीतें और उन्हें उनके वास्तविक उद्देश्य में लगाना सुनिश्चित करें; तभी लौकिक व्यवस्था को फिर से स्थापित किया जा सकेगा। यह निश्चित रूप से एक बर्बर और आदिम युग के कबीलाई संघर्षों की तुलना में अधिक दिलचस्प है। वास्तव में, ऋग्वेद स्वयं अपने प्रतीकवाद को बार-बार स्पष्ट करता है, यदि हम इसे खुले दिमाग और पूर्वाग्रह से विरत होकर इसे पढ़ना सीख सकें। सरमा और पणियों के बीच संवाद के अंतिम श्लोक ( १०/१०८/११ – ऋग्वेद ) में, उदाहरण के लिए, कथावाचक निष्कर्ष निकालता है, “हे पणियो! तुम इस स्थान से दूर भाग जाओ। घेरने वाले पर्वत को टक्करें मारती हुई गाएँ इस सत्याश्रित पर्वत से लौट जावें। बृहस्पति, सोम, पत्थर, ऋषि एवं ब्राह्मण इस गुप्त स्थान को जान गये हैं।” यह आदेश “ऋत्” है, सच्चा लौकिक नियम ( cosmic law )। इसका उल्लंघन इसलिए नहीं है कि पणियों ने कुछ गायों और घोड़ों को एक गुफा के अंदर छिपा दिया हैं, बल्कि इसलिए है कि वे प्रकाश और शक्तियों का दुरुपयोग करते हैं और उनमें स्वार्थत्याग की भावना नहीं है अतः प्रकाश व शक्ति का उपयोग पणि लोग यज्ञ, बलि व परोपकार में प्रयोग नहीं करते हैं। इसलिए इंद्र उनके खजाने का हकदार है, इसलिए नहीं कि वह एक लालची आदिवासी नेता है जो अपने क्षेत्र और धन का विस्तार करने के लिए निकला है; वरन् इसलिए कि वह केवल “सत्य के द्वारा” दुष्टात्माओं के माँदों को चकनाचूर कर सकता है।

यदि यह आर्य-आक्रमण-सिद्धांत आड़े न आता तो ऋग्वेद का बहुत पहले एक स्तर पर व्याख्या का उद्देश्य होता जो ग्रीक या मिस्र की पौराणिक कथाओं के अनुरूप होता है, बजाय इसके कि वह एक शाब्दिक पढ़ने के लिए बाध्य हो।

निष्कर्ष

आर्य-आक्रमण-सिद्धान्त के समर्थक विद्वानों को ऐसे महत्त्वपूर्ण मुद्दों से बचना चाहिए था, जहाँ तक ​​निष्कर्षों और कार्यप्रणाली दोनों का सम्बन्ध है, आत्मविश्वास को प्रेरित करने के लिये बहुत कम है। स्पष्ट है कि ह्ड़प्पा और वैदिक दोनों संस्कृतियों में घोड़े का परिष्कृत व्यवहार किया गया है।

सारांश में :-

  • वास्तविक घोड़े सहित अश्व की कई प्रजातियाँ सिंधु-सरस्वती सभ्यता में मौजूद थीं। परन्तु सम्भवतया कम संख्या में। सैंधव सभ्यता के पड़ोसी क्षेत्रों के साथ अंतःक्रिया के दौरान और उनमें से कुछ भारत में बहुत पहले ही प्रवेश कर गये थे। लेकिन निश्चित रूप से किसी घोड़े का भारत में आगमन किसी आर्य आक्रमण या प्रव्रजन का परिणाम नहीं है। यह तथ्य पुरातात्विक, मानवशास्त्रीय, आनुवांशिक, साहित्यिक और सांस्कृतिक साक्ष्य द्वारा पुष्ट है।
  • सिंधु-सरस्वती-घाटी सभ्यता के परिपक्व चरण की समाप्ति के बाद प्रारम्भिक ऐतिहासिक काल तक यह प्रक्रिया धीरे-धीरे लेकिन मामूली वृद्धि के साथ चलती रही। अश्व का अचानक और पहली बार परिचय प्रदर्शित करने वाला कोई युग नहीं था।
  • ऋग्वेद को गलत तरीके से पढ़ा गया है। यह हमें घोड़ों की एक बड़ी आबादी के बारे में सख्ती से कुछ नहीं बताता है, वरन् इसकी दुर्लभता की ओर संकेत करता है। अश्व प्रतीकात्मक रूप से महत्त्वपूर्ण था; न कि मात्रात्मक दृष्टि से।
  • ऋग्वेद भी हमें आर्यों के आक्रमण का संकेत तक नहीं करता है। इसमें अफगानिस्तान से उनके घोड़ों द्वारा खींचे जाने वाले “गरजते हुए” रथों पर सवार होकर स्वदेशी जनजातीय आबादी को कुचलने के तथाकथित सिद्धान्त का संकेत तक नहीं मिलता है। अब समय आ गया है कि हम १९वीं सदी के औपनिवेशिक विद्वानों और वर्तमान के छिद्रान्वेषी इतिहासकारों ( विशेषकर वामपंथी ) की उन सभी विकृत कल्पनाओं को त्यागकर पूर्वाग्रह रहित हो अपने इतिहास का पुनर्लेखन और पुनर्मूल्यांकन करें।

उपर्युक्त विश्लेषण परीक्षण योग्य है और यदि सही है, तो हमें उम्मीद करनी चाहिए कि हड़प्पा स्थलों के उत्खनन से और अधिक घोड़े के अवशेष और विवरण प्राप्त होंगे। हाँ आर्य-आक्रमण-सिद्धान्त धराशायी हो चुका है। यह तथाकथित सिद्धान्त गलत तरीके से वैदिक समाज की अपेक्षा करता है और हड़प्पा के बाद के भारत में दस्तावेज करने में विफल रहा है। हालाँकि यह सिद्धांत आज भी राजनीतिक, जातिवादी जैसे संकीर्ण मानसिकता को पोषण प्रदान कर रहा है।

स्वीकारोक्ति

यह विषय बहुत विवादित है। औपनिवेशिक दौर में तो आर्य व अश्व एक दूसरे से जोड़ दिया गया था। साथ ही आर्य-आक्रमण या आव्रजन को निर्विवाद रूप से मान लिया गया था। स्वातंत्र्योत्तर युग में भी अकादमिक स्तर पर स्वस्थ परम्परा देखने को नहीं मिलती है। आज भी इस विषय पर एक तरफ़ा विचार देखने को मिलता है। वामपंथी इतिहासकारों का बोलबाला है और ये इतिहासकार इस विषय पर विचार करने से पहले ही यह मानकर चलते हैं कि आर्य-आक्रमण हुआ था और भारतीय उप-महाद्वीप में घोड़े व आरीदार पहिये आर्यों द्वारा लाये गये थे। इसलिए हमने यह प्रयास किया है कि प्रामाणिक स्रोतों से जानकारी साक्ष्यों सहित प्रस्तुत की जाये। इसलिए स्रोतों को भी सन्दर्भित करने का यथासम्भव प्रयास किया है। जिसे जिज्ञासुजन स्वयं पढ़ सकते हैं। सुझाव का स्वागत है।

धन्यवाद।

हड़प्पा सभ्यता या सिन्धु घाटी सभ्यता

 

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