हड़प्पा सभ्यता या सिन्धु घाटी सभ्यता

 हड़प्पा सभ्यता या सिन्धु घाटी सभ्यता

भूमिका

कांस्य युगीन सभ्यता के अन्तर्गत हड़प्पा सभ्यता आती है। जब ताँबे में टिन को मिलाकर कांस्य नामक मिश्रधातु का प्रयोग मानव ने किया। कांस्य सभ्यता सामान्यतः नगरीय सभ्यता कहलाती है। भारतीय उप-महाद्वीप में प्रथम नगरीकरण इसी समय हुआ।

हड़प्पा सभ्यता ‘आद्य इतिहास’ के अन्तर्गत आता है। इसे इस श्रेणी के अंतर्गत इसलिए रखा जाता है क्योंकि इस सभ्यता के लोगों को लेखन कला का ज्ञान था परन्तु इसका वाचन नहीं हो पाने के कारण ही इसे ‘आद्य इतिहास’ कहा गया।

हड़प्पा सभ्यता की खोज हड़प्पा में डी॰ आर॰ साहनी ( १९२१ ई॰ ) और मोहनजोदड़ो में आर॰ डी॰ बनर्जी ( १९२२ ई॰ ) में किये गये उत्खननों से हुआ। इस खोज के समय ‘भारतीय पुरातत्व एवं सर्वेक्षण विभाग’ के महानिदेशक ‘जॉन मार्शल’ थे। हड़प्पा वर्तमान में पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में रावी नदी के बायें तट पर और मोहनजोदड़ो पाकिस्तान के ही सिंध प्रांत में सिंधु नदी के दायें तट पर स्थित है।

नामकरण

विभिन्न नामकरण —

  • सिंधु घाटी सभ्यता
  • सिंधु सभ्यता
  • हड़प्पा सभ्यता
  • कांस्य युगीन सभ्यता
  • प्रथम नगरीय सभ्यता
  • सरस्वती या सिंधु-सरस्वती सभ्यता

जॉन मार्शल ने इस सभ्यता के प्रारम्भिक स्थल सिंधु नदी घाटी में मिलने के कारण इसे ‘सिंघु घाटी सभ्यता’ कहा।

परन्तु जब सिंधु घाटी से दूर भी इस सभ्यता के स्थल प्रकाश में आने लगे तो इस सभ्यता को ‘सिंधु सभ्यता’ का नाम दिया गया।

बाद में इस सभ्यता के स्थल भारत, पाकिस्तान और अफगानिस्तान तक में पाये जाने के कारण इसका नामकरण पुरातात्विक दृष्टि से प्रथम खोजे गये स्थल को प्रतीक स्थल मानकर सभ्यता का नामकरण कर दिया गया। अतः इसे ‘हड़प्पा सभ्यता’ का नाम दिया गया।

इस सभ्यता के लोगों ने ही सर्वप्रथम ताँबे में टिन मिलाकर कांस्य का प्रयोग किया अतः इसे ‘कांस्य युगीन सभ्यता’ कहा गया।

इसी सभ्यता में प्रथम बार नगर अस्तित्व में आये अतः इसे ‘प्रथम नगरीय क्रांति’ या ‘प्रथम नगरीय सभ्यता’ कहा गया।

वर्तमान के ८० % स्थल विलुप्त सरस्वती नदी घाटी और उसकी बहाव सीमा में स्थित थे। अतः इसे ‘सरस्वती या सिंधु-सरस्वती सभ्यता’ भी कहा जाता है।

विस्तार और प्रमुख स्थल

हड़प्पा सभ्यता के प्रमुख स्थल
हड़प्पा सभ्यता के प्रमुख स्थल

इस सभ्यता का विस्तार तीन देशों तक है — अफगानिस्तान, पाकिस्तान और भारत।

भारतीय उप-महाद्वीप में लगभग २,८०० स्थलों की खोज हो चुकी है जिनमें से कुछ हैं।

अफगानिस्तान में हिंदुकुश के पार मुंडीगाक और शोर्तुघई।

पाकिस्तान के तीन क्षेत्र बलूचिस्तान, सिंध और पंजाब में। बलूचिस्तान में — मेहरगढ़, नौशारो, सुत्कांगेनडोर, सुत्काकोह, डाबरकोट, बालाकोट आदि। सिंध प्रांत में — मोहनजोदड़ो, आमरी, कोटदीजी ( कैचीबेग ), चंहूदड़ो, अलीमुराद आदि। पंजाब प्रांत में — हड़प्पा, सरायखोला, डेरा इस्माइल खान, जलीलपुर, रहमान ढेरी, गुमला, चक पुरवाने आदि।

भारत में जम्मू, पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, उ॰प्र॰, गुजरात और महाराष्ट्र में। जम्मू में माण्डा। पंजाब में — रोपड़ ( रूपनगर ), कोटलानिहंगखान, चकछियासी, बाड़ा, संघोल, डेरामजरा। हरियाणा में — राखीगढ़ी, बनावली, कुणाल, भगवानपुरा, मित्ताथल, सिसवाल, बालू आदि। राजस्थान में — कालीबंगन। उ॰ प्र॰ में — आलमगीरपुर, हुलास, बड़गाँव। गुजरात में — देसलपुर, सुरकोटदा, धौलावीरा, रोजदी, रंगपुर, प्रभास, लोथल आदि। महाराष्ट्र में — दैमाबाद ( दायमाबाद )।

इनमें से कुछ बसावट का आकार नगर की श्रेणी में आती हैं — मोहनजोदड़ो ( +२५० हेक्टेयर ), हड़प्पा ( +१५० हेक्टेयर ), कालीबंगन ( +१०० हेक्टेयर ), धौलावीरा ( +१०० हेक्टेयर ), गणवारीवाला ( +८० हेक्टेयर ), राखीगढ़ी ( +८० हेक्टेयर ) आदि।

हड़प्पा सभ्यता के स्थलों को मिलाने से लगभग एक ‘त्रिभुजाकार आकृति’ बनती है। बृचेट और अल्चिन कृत The rise of Civilization in India and Pakistan में इस सभ्यता का क्षेत्रफल लगभग १२,९९,६०० किलोमीटर बताया गया है। इसका क्षेत्रफल विश्व के किसी भी समकालीन सभ्यता से विस्तृत थी। स्वातंत्र्योत्तर काल में सर्वाधिक स्थलों की खोज गुजरात प्रांत में की गयी।

इसका विस्तार पूर्व से पश्चिम तक लगभग १६०० किलोमीटर और उत्तर से दक्षिण विस्तार लगभग १४०० किलोमीटर है।

  • सबसे उत्तरी स्थल – माण्डा
  • सबसे दक्षिणी स्थल – दायमाबाद
  • सबसे पूर्वी स्थल – आलमगीरपुर
  • सबसे पश्चिमी स्थल – सुत्कांगेनडोर

कुछ स्थलों से संबंधित बातें

मेहरगढ़ ( उत्तरी बलूचिस्तान, कच्छी का मैदान, गोमल नदी घाटी में स्थित ) में नवपाषाणकाल से लेकर सैंधव सभ्यता तक के सांस्कृतिक प्रमाण मिलते हैं। नौशारो ( मेहरगढ़ के समीप ) से माँग में सिंदूर लगाने के प्रमाण मिलते हैं।

दक्षिणी बलूचिस्तान में अरब सागर तट पर दाश्क नदी तट पर स्थित सुत्कांगेनडोर इस सभ्यता का सबसे पश्चिमी स्थल था। दक्षिणी बलूचिस्तान में ही सुत्काकोह, डाबरकोट और बालाकोट स्थित थे। सुत्काकोह शादी कौर नदी तट पर और बालाकोट सोनमियानी खाड़ी के पूर्व में विदार नदी के मुहाने पर स्थित थे।

मोहनजोदड़ो और आमरी सिंध प्रांत में सिंधु नदी के दायें तट पर स्थित है। मोहनजोदड़ो इस सभ्यता की राजधानी, सबसे बड़ा नगर और सर्वाधिक जनसंख्या वाला नगर भी था। कोटदीजी और चन्हूदड़ो सिंधु नदी के बायें तट पर स्थित है। कोटदीजी का एक अन्य नाम कैचीबेग भी था और इसका अंत अग्निकांड से होने के प्रमाण मिलते हैं।

हड़प्पा पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में रावी नदी के बायें तट पर स्थित है। हड़प्पा इस सभ्यता का दूसरा सबसे बड़ा नगर और दूसरी राजधानी थी।

जम्मू के अखनूर जनपद में चिनाब नदी तट पर मांडा इस सभ्यता का सबसे उत्तरी स्थल था।

रोपड़ ( रूपनगर ) पंजाब में सतलुज नदी तट पर स्थित है। यह स्वातंत्र्योत्तर काल में खोजा गया प्रथम स्थल था। यहाँ से मालिक के साथ कुत्ते के दफनाये जाने के प्रमाण मिले हैं।

हरियाणा के जींद जनपद में राखीगढ़ी यहाँ का सबसे बड़ा स्थल था। हरियाणा के ही बनावली से मिट्टी के हल का प्रतिरूप मिला है। कुणाल से हमें चाँदी का मुकुट मिला है। भगवानपुरा से इस सभ्यता की अंतिम अवस्था से १५ कमरों वाला मकान और चित्रित धूसर मृद्भाण्ड के प्रमाण मिले हैं।

कालीबंगन के प्राक् हड़प्पा काल से जुते हुए खेत और द्विफसली कृषि के साक्ष्य मिले हैं। इसमें आड़ी और तिरछी दोनों तरफ जुताई की जाती थी। एक साथ चना और सरसों के खेती करने के साक्ष्य मिले हैं।

राजस्थान में हड़प्पा सभ्यता के सर्वाधिक संकेंद्रण घघ्घर-हाकरा पाट में मिलता है।

आलमगीरपुर ( मेरठ, उ॰प्र॰ ) यमुना नदी की सहायक हिंडन नदी के तट पर स्थित हड़प्पा सभ्यता का सबसे पूर्वी स्थल था।

देसलपुर से ताँबे की मुहर, सुरकोटदा से घोड़े के अस्थिपंजर, धौलापुर से पॉलिशदार प्रस्तर मिले हैं। धौलीवीरा से ही जल संरक्षण की विशेष तकनीक का ज्ञान मिलता है।

गुजरात के रंगपुर से धान की भूसी के प्रमाण मिले हैं हालाँकि चावल की कृषि के साक्ष्य पर विद्वानों में विवाद रहा है।

गुजरात में ही स्थित लोथल एक बंदरगाह नगर था। यह स्थल साबरमती नदी की सहायक भोगवा नदी से एक नहर द्वारा जुड़ा था।

धौलावीरा के मुख्य द्वार पर एक सूचना पट्टिका ( sign board ) मिली है जिसमें हड़प्पन लिपि के में अंकित सबसे बड़े अक्षर प्राप्त होते हैं।

प्रमुख स्थलों की विशेषताएँ

हड़प्पा

पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में शाहीवाल जनपद में रावी नदी के बायें तट पर स्थित है। यह हड़प्पा सभ्यता का प्रथम खोजा गया स्थल है। हड़प्पा का प्रथम उल्लेख १८२६ ई॰ में  चार्ल्स मैसन ने किया। इसका द्वितीय उल्लेख १८५६ ई॰ में तब आया जब रेलवे के निर्माण के लिए ब्रांटन बंधुओं ( विलियम ब्रांटन और जॉन ब्रांटन ) ने इस स्थल से रोड़ियों और गिट्टियों का उपयोग किया था। इस समय इसे कोई बौद्ध स्तूप समझा गया था। अंततः १९२१ ई॰ में दयाराम साहनी ने इस स्थल की खोज की।

यह नगर दो भागों में विभाजित था — पूर्वी और पश्चिमी। पश्चिमी टीले को माउण्ड AB कहा गया है और इसके उत्तर में माउण्ड F स्थित है। माउण्ड F पर अनाज कूटने के वृत्ताकार गढ्ढे, धातु गलाने की मूसा ( melting pots ) और कर्मकारों का निवास स्थित है। कर्मकारों के निवास से ‘दास प्रथा’ के संकेत मिलते हैं।

“भारतीय इतिहास में संगम काल को छोड़कर दास प्रथा सदैव अस्तित्व में रही है।”

हड़प्पा का अन्नागार रावी नदी के तट पर था। हड़प्पा के पूर्वी नगर से दक्षिण दिशा में हमें एक शवगाह मिला है जोकि हड़प्पा की अंतिम अवस्था से संबंधित है। इस शवगाह को R-३७ नाम दिया गया है। हड़प्पा के समीप एक समाधि मिली है जिसको सीमेंटरी-एच-२० ( cementry-H-20 ) नाम दिया गया है।

मोहनजोदड़ो

पाकिस्तान के सिंध प्रांत के लरकाना जनपद में सिंधु नदी के दायें तट पर स्थित है। इसकी खोज १९२२ ई॰ में राखाल दास बनर्जी ने की। सिंधी भाषा में मोहनजोदड़ो का शाब्दिक अर्थ है ‘मुर्दों का टीला’ क्योंकि हमें मोहनजोदड़ो के ऊपरी स्थल से नरकंकाल मिले हैं जोकि भूमध्यसागरीय प्रजाति के हैं। इसी को आधार बनाकर कुछ विद्वान आर्य आक्रमण की बात करते हैं। परन्तु अमेरिका के विद्वान केनेडी ने अपने शोधों में पाया है कि ये नर कंकाल मलेरिया जैसी किसी बीमारी से ग्रसित थे।

मोहनजोदड़ो से कोई शवगाह नहीं मिला है।

मोहनजोदड़ो के पश्चिमी टीले से कुषाणकाल का एक स्तूप मिला है इसीलिए इसको ‘स्तूप का टीला’ कहा गया है।

पश्चिमी टीले से हमें अन्नागार, स्नानागार, पुरोहित आवास और सभाभवन जैसे सार्वजनिक भवन के प्रमाण मिले हैं।

  • ‘विशाल स्नानागार’ मोहनजोदड़ो का सबसे प्रमुख सार्वजनिक स्थल है।
    • इसका आकार ११·८८ मीटर लम्बा × ७·०१ मीटर चौड़ा × २·४३ मीटर गहरा है।
    • इसके उ॰ और द॰ दिशा में दोनों सिरों पर तल तक सीढ़ियाँ बनी हुई थीं।
    • कपड़े बदलने के लिए किनारे पर कमरे बने हैं।
    • स्नानागार का फर्श पकी और तराशी हुई ईंटों से बना था और इसको चूने के गारे से जोड़ा गया एवं बाहरी परतों के बीच में बिटुमिन ( डोमर ) की परत लगाई गयी थी।
    • बगल के कमरे में एक बड़े कुएँ से पानी खींचकर स्नानागार के कुंड को भरा जाता था और स्नानागार के एक कोने ( दक्षिण-पश्चिम ) से एक जल-निर्गमन नाली से जल निकाला जाता था।
    • यह एक सामूहिक स्नानागार था जोकि अनुष्ठान स्नान स्थल के रूप या मांगलिक समारोहों के अवसर पर किये जाते होगे।
    • विद्वान जॉन मार्शल ने इसे तत्कालीन विश्व का आश्चर्यजनक निर्माण कहा है।
  • विशाल अन्नागार मोहनजोदड़ो की सबसे बड़ा भवन था। इसका आकार ४५·७२ मीटर × २२·८६ मीटर था। इसमें २७ प्रकोष्ठ थे। लेकिन हड़प्पा के गढ़ में हमें छह अन्न भंडार मिलते हैं।
  • सभाभवन का आकार २७ मीटर × २७ मीटर का एक वर्गाकार भवन है।
  • पुरोहित आवास की माप ७०·१ मीटर × २३·७७ मीटर है।

पूर्वी नगर को ३ भागों — HR, Vs और DK में बाँटा गया है। इसमें से HR क्षेत्र से काँस्य नर्तकी और DK से प्रस्तर की पुजारी की धड़ मिली है। कांस्य नर्तकी प्रोटो ऑस्ट्रेलियाई प्रजाति और पुजारी मंगोलॉयड प्रजाति की है। इसमें से HR की सर्वाधिक खुदाई हुई है। यहाँ यह उल्लेखनीय है कि आगे चलकर चोलकाल में चरमोत्कर्ष को प्राप्त हुई जहाँ काँसे की नटराज की मूर्तियों में हमें ४ कोण या झुकाव प्राप्त होते हैं।

चन्हूदड़ो

पाकिस्तान के सिंध प्रांत में सिंधु नदी के तट पर स्थित चन्हूदड़ो की खोज १९३१ ई॰ एन॰ जी॰ मजूमदार ने की थी। यहाँ से —

  • मनके बनाने के कारखाने प्राप्त हुए हैं। सर्वाधिक मनके सेलखड़ी ( steatite ) के बने हैं ( लोथल से भी मनके के कारखाने मिले हैं। )।
    • कारखाने का उल्लेख सर्वप्रथम फिरोजशाह तुगलग के समय किया गया है। सल्तनतकाल और मुगलकाल में कारखाने के अध्यक्ष को क्रमशः मुतसर्रिफ और दीवान-ए-बयूतात कहा जाता था।
  • प्रशाधन संबंधी सामग्री ( लिपिस्टिक, काजल आदि ) मिलते हैं।

लोथल

गुजरात के अहमदाबाद जनपद में साबरमती नदी की सहायक नदी भोगवा के तट पर स्थित लोथल सैंधव सभ्यता का एक बंदरगाह नगर था। इसकी खोज १९५४ ई॰ में एस॰ आर॰ राव ने की।

  • इसे ‘लघु हड़प्पा’ या ‘लघु मोहनजोदड़ो’ भी कहा जाता है।
  • यह एक नहर द्वारा भोगवा नदी से जुड़ा हुआ था।
  • लोथल के पूर्वी भाग से एक गोदीवाड़ा ( duck yard ) का साक्ष्य मिला है। इस गोदीवाड़ा का आकार २२३ मीटर लम्बाई  × ३५ मीटर चौड़ाई × ८ मीटर है। इसमें पानी भरने के लिए पूर्वी दीवार में एक सरणी नहर ( १२·३ मीटर चौड़ी ) बनी थी जबकि पानी निर्गमन के लिए एक अधिप्लावन मार्ग बना था।
  • यहाँ से फारस की मोहर मिली है और यहाँ के मुहरों पर नावों का अंकन है।
  • अग्नि कुण्ड और मनके बनाने के कारखाने के साक्ष्य यहाँ से मिले हैं।
  • रंगाई के हौज यहाँ से प्राप्त हुए हैं।
  • तीन युग्मित शवाधान के साक्ष्य भी यहाँ से मिले हैं ( कालीबंगन से एक युग्मित शवाधान )। इसे कुछ विद्वान सती प्रथा के साक्ष्यों रूप में प्रस्तुत करते हैं।
    • सती प्रथा का प्रथम अभिलेखीय साक्ष्य गुप्तकाल के एरण अभिलेख ( ५१० ई॰ ) से मिलता है। इस संदर्भ में उल्लेखनीय है कि भारतीय इतिहास में सर्वप्रथम सतीप्रथा पर प्रतिबंध मुहम्मद बिन तुगलक ने लगाया। तदुपरांत पुर्तगाली गवर्नर अल्बुकर्क ने अपने क्षेत्र में तो अकबर ने सती प्रथा पर प्रतिबंध लगाया था। आधुनिककाल में लार्ड विलियम बैंटिग ने नियम १७ द्वारा सती प्रथा को समाप्त कर दिया।
  • यहाँ से चतुर शृंगाल और प्यासे काक की कहानी का चित्रांकन मिलता है।

कालीबंगन

राजस्थान के गंगानगर जनपद में स्थित इस स्थल की खोज १९५१ ई॰ अमलानंद घोष ने की थी। इस स्थल की प्रमुख बातें निम्न हैं —

  • हमें प्राक् हड़प्पा काल के जुते हुए खेत के साक्ष्य मिले हैं। ये जुताई आड़ी-तिरछी की गयी है। यहाँ पर दो फसलों को साथ उगाने के साक्ष्य मिले हैं।
  • अधिकांश मकानों में कुँए के साक्ष्य मिलते हैं (?)।
  • अयताकार अग्निकुण्ड के साक्ष्य मिले हैं।
    •  ऋग्वेद की पहली ऋचा ही अग्नि को समर्पित है और प्रत्येक मंडल की शुरुआत भी अग्नि की स्तुति से होती है।
  • एक बालक की खोपड़ी मिली है जिसमें सुइयाँ चुभोई गयी हैं ( ट्रेफीनेशन ) यह शल्य चिकित्सा का प्राचीनतम् उदाहरण है। ( कालीबंगन, लोथल और बुर्जहोम से ट्रेफीनेशन के साक्ष्य मिलते हैं )
    • आगे चलकर विद्वान सुश्रुत प्रसिद्ध शल्य चिकित्सक हुए जिन्होंने सुश्रुत संहिता लिखी।
  • कालीबंगन से भूकंप के साक्ष्य मिलते हैं।

बनावली

हरियाणा के फतेहाबाद जनपद में घघ्घर नदी ( सरस्वती नदी ) के तट पर स्थित है। बनावली की खोज १९७४ ई॰ में आर॰ एस॰ विष्ट ने की। यहाँ से हमें ‘मिट्टी के हल’ का एक प्रतिरूप प्राप्त हुआ है। चोलिस्तान से भी मिट्टी के हल का प्रतिरूप प्राप्त हुआ है। यहाँ से हमें बढ़िया किस्म के जौ के प्रमाण मिले हैं। कुछ विद्वानों के अनुसार यहाँ से मंदिर के भी प्रमाण मिले हैं। बनावली के अधिकांश घरों में अग्निकुण्ड के प्रमाण मिले हैं।

धौलावीरा

गुजरात प्रांत के कच्छ जनपद के भचाऊ तहसील में धौलावीरा स्थित है। इसकी खोज जे॰ पी॰ जोशी ने १९६७-६८ ई॰ में की जबकि आर॰ एस॰ विष्ट के नेतृत्व में १९९०-९१ ई॰ से अनुसंधान कार्य चल रहा है।

  • धौलावीरा में धौला का अर्थ शुक्ल और वीरा का अर्थ कुआँ है। यहाँ से प्राप्त शुक्ल रंग के कुँए के कारण इस स्थान का नाम धौलावीरा पड़ा।
  • सैंधव सभ्यता के अन्य नगर जहाँ दो भागों में विभाजित थे वहीं धौलावीरा तीन समानान्तर भागों में विभाजित था।
  • यहाँ से हमें स्टेडियम के प्रमाण मिलते हैं ( पाकिस्तान के जुदीकरान से भी )।
  • यहाँ की जल संरक्षण तकनीक पर्याप्त अच्छी थी। अनेक टैंकों से जल संरक्षण के साक्ष्य मिले हैं।
  • धौलावीरा से एक प्रस्तर नेवले की मूर्ति और पॉलिशदार प्रस्तर खण्ड मिले हैं।

अन्य स्थल

मुंडीगाक – अफगानिस्तान के हेलमंड प्रांत में स्थित है। शोर्तुघई – अफगानिस्तान के बदख्शाँ क्षेत्र में स्थित है। शोर्तुघई बदख्शाँ क्षेत्र से लाजवर्द मणि ( lapis lazuli ) प्राप्त करने का माध्यम था। ये दोनों स्थल हड़प्पा सभ्यता के लिए अफगानिस्तान में एक तरह से उपनिवेश की भाँति कार्य करते थे।

नौशारो – पाकिस्तान के बलूचिस्तान में स्थित है। यहाँ से सिंदूर के प्रमाण और घोड़े की मृण्मूर्तियाँ मिली हैं।

सुत्कांगेनडोर – दक्षिणी बलूचिस्तान में दाश्क नदी के किनारे पर स्थित है। यह हड़प्पा सभ्यता का सबसे पश्चिमी स्थल है। इसकी खोज १९२७ ई॰ में ऑरेल स्टाइल ने की थी।

डाबरकोट – दक्षिणी बलूचिस्तान में स्थित है। इसकी खोज १९२८ ई॰ में ऑरेल स्टाइन ने की थी।

सुत्काकोह – दक्षिणी बलूचिस्तान में शादी कौर नदी के मुहाने पर स्थित है। इसकी खोज १९६२ ई॰ में जॉर्ज डेल्स ने की थी।

बालाकोट – दक्षिणी बलूचिस्तान स्थित इसका उत्खनन जॉर्ज डेल्स ने करवाया था। यहाँ का ‘सीपी उद्योग’ अत्यंत प्रसिद्ध था।

आमरी – सिंधु नदी के बायें तट पर स्थित इस स्थल की खोज १९३१ ई॰ में एन॰ जी॰ मजूमदार ने की। यहाँ से प्राक् हड़प्पा सभ्यता के प्रमाण मिले हैं।

कोटदीजी ( कैचीबेग ) – सिंधु नदी के बायें तट पर स्थित इसकी खोज १९३५ ई॰ में धूर्वे ने की। इस स्थल का अंत आकस्मिक अग्निकाण्ड से हुआ था।

सरायखोला – पाकिस्तान के पंजाब क्षेत्र में स्थित इस स्थान से प्राक् हड़प्पा साक्ष्य मिले हैं।

मांडा – जम्मू के अखनूर जनपद में चिनाब नदी के तट पर स्थित है। १९८२ ई॰ में जे॰ पी॰ जोशी ने इसकी खोज की। यहाँ से प्राक् हड़प्पा, हड़प्पा और हड़प्पोत्तर तीनों कालों के प्रमाण प्राप्त होते हैं।

रोपड़ – भारत के पंजाब प्रांत में सतलुज नदी के बायें तट पर स्थित इस स्थल की स्वतंत्रता के बाद की प्रथम खोज थी। इसका उत्खनन १९५३-५६ ई॰ के मध्य यज्ञदत्त शर्मा ने कराया था। यहाँ के कब्रिस्तान में मानव के साथ श्वान के दफनाने का साक्ष्य मिलता है।

राखीगढ़ी – हरियाणा के जींद जनपद में स्थित इस स्थल की खोज १९६९ ई॰ में की थी।

भागवानपुरा – हरियाणा के कुरुक्षेत्र जनपद में स्थित इस स्थल की खोज जे॰ पी॰ जोशी ने ने की थी। यहाँ से हमें १५ कमरों वाला मकान मिला है। हड़प्पा सभ्यता के पतनावस्था के समय का चित्रित धूसर मृद्भाण्ड मिले हैं। ध्यातव्य है कि ये मृद्भाण्ड मुख्यतः उत्तर वैदिक काल से संबंधित है।

कुणाल – हरियाणा के हिसार जनपद में स्थित इस स्थल की खोज १९७४ ई॰ में जे॰ पी॰ और आर॰ एस॰ विष्ट ने की थी। यहाँ से चाँदी का मुकुट मिला है।

बाड़ा – पंजाब के रोपड़ जनपद में स्थित इस स्थल की खोज १९५६ ई॰ यज्ञदत्त शर्मा ने की थी।

संघोल – पंजाब के लुधियाना जनपद में इस स्थल की खोज १९४८ ई॰ में एस॰ एस॰ तलवार ने की थी।

मित्ताथल – हरियाणा के भिवानी जनपद में स्थित इस स्थल की खोज १९६८ ई॰ सूरजभान ने की थी।

आलमगीरपुर – उ॰ प्र॰ के मेरठ जनपद में यमुना नदी की सहायक हिंडन नदी के तट पर स्थित इस स्थल की खोज १९५८ ई॰ में भारत सेवक समाज ( संस्थापक गोपाल कृष्ण गोखले ) ने की थी। यह हड़प्पा सभ्यता का सबसे पूर्वी स्थल था। आलमगीरपुर का उत्खनन यज्ञादत्त शर्मा ने कराया था।

सुरकोटदा – गुजरात के कच्छ जनपद में स्थित इस स्थल की खोज जे॰ पी॰ जोशी ने १९६४ में की थी। यहाँ से घोड़े के अस्थि पंजर के प्रमाण मिले हैं।

देसलपुर – गुजरात के कच्छ जनपद में स्थित है। यहाँ से ताँबे की मुहर मिली है।

रोजदी – गुजरात के सौराष्ट्र में स्थित यहाँ से हड़प्पोत्तर संस्कृति ( ताम्रपाषाण ) के प्रमाण मिलते हैं।

रंगपुर – गुजरात के अहमदाबाद जनपद में भादर नदी तट पर स्थित रंगपुर की खोज १९५४ ई॰ में एस॰ आर॰ राव ने की थी। यहाँ से धान की भूसी के प्रमाण मिले हैं।

मालवड़ – गुजरात प्रांत के सूरत जनपद में ताप्ती नदी के किनारे स्थित मालवड़ की खोज १९६८ ई॰ में जे॰ पी॰ जोशी ने की थी।

भागत्राव – किमसागर तट पर दक्षिण गुजरात में स्थित स्थित है।

कुंतसी – गुजरात के राजकोट जनपद में स्थित है।

अल्लाहदीनो – कराची से कुछ दूरी पर स्थित यह हड़प्पा सभ्यता का एक बंदरगाह नगर था।

दैमाबाद ( दायमाबाद ) – महाराष्ट्र के अहमदनगर जनपद में गोदावरी नदी की सहायक प्रवरा नदी के तट पर स्थित यह एक प्रमुख स्थल है। कुछ विद्वानों के अनुसार यहाँ से उत्खनन में हड़प्पा सभ्यता के साक्ष्य मिले हैं। अतः इसे इस सभ्यता का दक्षिणतम स्थल माना गया है।

उद्भव और विकास

उद्भव

सिंधु सभ्यता की लिपि के अवशेष जहाँ से भी मिले वे विकसित अवस्था में मिले। अतः इसके उद्भव के संबंध में दो मत प्रचलित हो गये — एक, विदेशी उद्भव का मत और द्वितीय, स्वदेशी या यहाँ की ग्रामीण संस्कृतियों से क्रमिक विकास का मत।

विदेशी उद्भव का मत

इस मत को मानने वाले विद्वान निम्न हैं — जॉन मार्शल, मार्टीमर व्हीलर, गार्डन चाइल्ड, क्रेमर, संकालिया, डी॰ डी॰ कौशाम्बी आदि।

इन विद्वानों का विचार है कि सैंधव सभ्यता का उद्भव विदेशी प्रभाव से हुआ है।

मार्टीमर व्हीलर ने ‘आकस्मिक उद्भव’ का सिद्धान्त दिया।

इनका मानना है कि मेसोपोटामिया से आये लोगों ने सैंधव क्षेत्र में इस सभ्यता का विकास किया। इसीलिए इस सभ्यता के प्रारम्भिक बिन्दु नहीं मिलते हैं।

संकालिया के अनुसार बलूचिस्तान से प्राप्त आयताकार चबूतरे की तुलना  मेसोपोटामिया के जिगुरत ( मंदिर ) के समान हैं।

इन विद्वानों के अनुसार दोनों सभ्यताएँ नागर थी। दोनों में लिपि का प्रयोग होता था। दोनों जगहों पर अन्नागार पाये गये हैं।

इन लोगों का कहना है कि क्योंकि मेसोपोटामिया की सभ्यता पहले की है अतः यहीं के लोगों ने आकर सैंधव सभ्यता को जन्म दिया होगा।

परन्तु जब इन दोनों सभ्यताओं का गहन विश्लेषण किया जाता है तो निष्कर्ष इसके विपरीत निकलता है।

सैंधव नगर जल सदृश थे जबकि मेसोपोटामिया के नगर बेतरतीब बसे थे। हड़प्पावासी पकी ईंटों ( burnt bricks ) का प्रयोग करते थे जबकि मेसोपोटामियाई लोग धूप में सुखायी गयी ईंटों का प्रयोग करते थे। सैंधव लिपि चित्रात्मक ( pictograph ) है जबकि मेसोपोटामिया की लिपि कीलाकार। सिंधु सभ्यता में संभवतः व्यापारियों का शासन जबकि मेसोपोटामिया में पुजारियों का शासन था।

हड़प्पा सभ्यता अपने समकालीन किसी भी सभ्यता से विस्तृत थी।

अतः विदेशी ( मेसोपोटामियाई ) उद्भव का मत तर्कसंगत नहीं लगता है।

स्वदेशी उद्भव का मत

इस मत के समर्थक निम्न विद्वान हैं — रोमिल थापर, एस॰ आर॰ राव, अमलानंद घोष, डी॰ पी॰ अग्रवाल, फेयर सर्विस, अल्चिन दम्पति आदि।

इन विद्वानों का मानना है कि सिंधु सभ्यता के उद्भव में बलूचिस्तान, सिंधु और राजस्थान की ग्रामीण संस्कृतियों का योगदान है।

  • बलूचिस्तान से प्राप्त ग्रामीण संस्कृतियों में कुल्ली, नाल, झोब, राना घुंडई आदि से।
  • सिंध के मैदान मैदान में आमरी, कोटदीजी आदि की ग्रामीण संस्कृतियाँ।
  • राजस्थान से प्राप्त सोथी संस्कृति।

इन विद्वानों का मत है कि इन ग्रामीण संस्कृति के लोगों में ‘मातृ देवी’ और ‘आद्य शिव’ की पूजा का प्रचलन था। ये लोग मृद्भाण्डों का प्रयोग करते थे और इनपर विभिन्न आकृतियाँ बनायी जाती थीं।

अमलानंद घोष ने राजस्थान में अपने शोध के दौरान ‘सोथी नामक ग्रामीण संस्कृति’ का पता लगाया। उनके अनुसार राजस्थान और गुजरात की इस सोथी संस्कृति का हड़प्पा संस्कृति से सह-अस्तित्व था। उनका विचार है कि कालान्तर में यही सोथी संस्कृति सैंधव सभ्यता में विकसित हुई।

वर्तमान में अधिकांश विद्वान हड़प्पा सभ्यता को इन्हीं ग्रामीण संस्कृतियों का विकसित रूप मानते हैं।

विकास

विगत एक शतक के अन्वेषण और उत्खनन से प्राप्त निष्कर्षों से हड़प्पा संस्कृति के क्रमिक विकास का पता चलता है। विकास के चार महत्वपूर्ण चरण हैं — प्राक्-हड़प्पा ( pre-Harappa ), प्रारंभिक-हड़प्पा ( early-Harappa ), परिपक्व-हड़प्पा ( mature-Harappa ) और उत्तर-हड़प्पा ( late- Harappa )।

प्राक्-हड़प्पाई चरण की बस्तियाँ पूर्वी बलूचिस्तान में स्थित हैं। क्वेटा से कुछ दूर बोलन नदी के किनारे कच्छी के मैदान में उत्तरी बलूचिस्तान ( पाकिस्तान ) में ‘मेहरगढ़’ की खुदाई से प्राक्-हड़प्पा संस्कृति के अस्तित्व का पता चलता है। इस अवस्था में, खानाबदोश लोग एक व्यवस्थित कृषि जीवन जीने लगे।

प्रारंभिक-हड़प्पा चरण में लोग मैदानी क्षेत्रों के बड़े गाँवों में रहने लगे। सिंधु नदी घाटी में गाँवों से नगरों का क्रमिक विकास हुआ। यह गाँव और नगर के संक्रमण का काल था। आमरी, कोटदीजी, कालीबंगन आदि स्थलों से प्रारंभिक-हड़प्पा चरणों के प्रमाण मिलते हैं।

परिपक्व-हड़प्पाई चरण में नगरों का उदय हुआ। कालीबंगा के अन्वेषण और उत्खनन से विस्तृत नगर योजना और शहरी विशेषताओं के साथ-साथ विकास के इस चरण के साक्ष्य मिलते हैं।

हड़प्पा सभ्यता के उत्तरार्ध में इस संस्कृति का पतन प्रारम्भ हुआ। लोथल की खुदाई से इस चरण का पता चलता है। लोथल और इसके बंदरगाह के साथ स्थापना बहुत बाद में हुई थी। यहाँ बाढ़ से सुरक्षा के लिए एक विशाल ईंट की दीवार से घेरा गया था। लोथल हड़प्पा सभ्यता का एक बंदरगाह नगर था और यहाँ से लोग व्यापार के लिए मेसोपोटामिया तक जाया करते थे। लोथल हड़प्पा सभ्यता के बिक्री और भंडार केंद्र ( emporium ) के रूप में कार्य करता था।

समयकाल

हड़प्पा सभ्यता के समय का निर्धारण निम्न विद्वानों ने किया है फिरभी इन तिथियों में पर्याप्त संशोधन की संभावना है :—

  • सर्वप्रथम सर मार्टीमर व्हीलर ने इस सभ्यता का निर्धारण २५०० ई॰पू॰ से १५०० ई॰पू॰ के मध्य किया है। इस समय निर्धारण का आधार मेसोपोटामिया से सारगोन युगीन प्रमाणों के आधार पर किया है। परम्परानुसार यह सर्वाधिक मान्य समयकाल है।
  • सर जॉन मार्शल ने सन् १९३१ ई॰ में मोहनजोदड़ो के उत्खनन के आधार पर हड़प्पा सभ्यता का समय ३,२५० ई॰पू॰ से २,७५० ई॰पू॰ के मध्य निर्धारित किया।
  • मैके ने इसकी तिथि २८०० ई॰पू॰ से २५०० ई॰पू॰ के मध्य माना है।
  • कार्बन-१४ तिथि मापन :—
    • डी॰पी॰ अग्रवाल ने सन् १९५६ ई॰ में कार्बन-१४ तिथि मापन के आधार पर इस सभ्यता का समयकाल २३५० ई॰पू॰ से १७५० ई॰पू॰ माना है परन्तु उनका कहना है कि इसका चरमोत्कर्ष २३५० ई॰पू॰ जबकि १७५० ई॰पू॰ को पतनावस्था मानते हैं। इस आधार पर हम इसका समय काल २५०० ई॰पू॰ से १५०० ई॰पू॰ माना जा सकता है।
    • कार्बन-१४ तिथि निर्धारण की पद्धति के आधार पर — फेयरसर्विस ने सन् १९५६ ई॰ में इस सभ्यता का काल निर्धारण २,००० ई॰पू॰ से १,५०० ई॰पू॰ के मध्य निर्धारित किया।
    • हाल के ही शोधों में कार्बन-१४ तिथि निर्धारण के आधार पर इस सभ्यता का समयकाल ३५०० ई॰पू॰ से १३०० ई॰पू॰ माना गया है। इस सम्बंध में उल्लेखनीय है कि इस समयकाल में नवपाषाणकाल, ताम्रपाषाणकाल, कांस्ययुग और ऋग्वैदिक सभ्यता का सह-अस्तित्व माना जा सकता है।

‘कार्बन-१४ तिथि निर्धारण विधि की खोज अमेरिका के वी॰ एफ॰ लिवि ने १९४६ ई॰ में की थी।’

सिंधु सभ्यता के निर्माता

सिंधु सभ्यता के उत्खनन से हमें ४ प्रजातियों के साक्ष्य मिले हैं —

  • प्रोटो-ऑस्ट्रेलॉयड,
  • भू-मध्य सागरीय,
  • मंगोलॉयड और
  • अल्पाइन।

सैंधव क्षेत्र में बसने वाली प्रथम प्रजाति प्रोटो-ऑस्ट्रलॉयड थी। जबकि सिंधु सभ्यता का निर्माता भू-मध्य सागरीय प्रजाति को माना जाता है।

मोहनजोदड़ो से मिली कांस्य नर्तकी की प्रतिमा प्रोटो-ऑस्ट्रलॉयड प्रजाति की और पुजारी की प्रस्तर मूर्ति मंगोलॉयड प्रजाति की है।

इस सभ्यता के अधिकांश नरकंकाल भू-मध्य सागरीय प्रजाति के हैं। वर्तमान में इस प्रजाति के लक्षण सुदूर दक्षिण के तमिल, तेलुगु और कन्नड़ प्रजातियों में पाये जाते हैं।

हड़प्पा सभ्यता की विशेषताएँ

नगर नियोजन

हड़प्पा सभ्यता से लगभग आधा दर्जन नगरों के आधार पर नगर नियोजन का अनुमान लगाया जाता है। ये नगर थे — मोहनजोदड़ो, हड़प्पा, कालीबंगन, लोथल, चन्हूदड़ो, धौलावीरा आदि।

हड़प्पा संस्कृति की प्रमुख विशेषता है उसका नगर नियोजन। नगर नियोजन जाल सदृश ( grid system ) थी जिसमें सड़कें और गलियाँ परस्पर लगभग समकोण पर काटती हैं और नगर कई आयताकार भागों व उप-भागों में विभाजित करती हैं। वर्तमान में चंडीगढ़ नगर ही इसकी समता कर सकता है।

नगर सामान्यतः तीन भागों में विभाजित थे — एक, पूर्वी और द्वितीय, पश्चिमी। पश्चिमी भाग थोड़ी ऊँचाई ( चबूतरे – podium ) पर बसाकर एक प्राचीर से घेरकर दुर्गीकृत किया जाता था अतः इसे गढ़ी या दुर्ग ( citadel ) कहा गया है। सामान्यतः यहाँ पर शासक वर्ग रहता था। पूर्वी नगर थोड़ा नीचे बसाया जाता था और यह किसी रक्षा प्राचीर से घिरा नहीं था। पूर्वी नगर में सामान्य जन रहते थे। इस नगर संरचना के कुछ ‘अपवाद’ हैं जोकि निम्न हैं —

  • कालीबंगन — इस नगर के पश्चिमी और पूर्वी दोनों भाग अलग-अलग रक्षा प्राचीरों से दुर्गीकृत थे।
  • चन्हूदड़ो — यह एकमात्र ऐसा नगर था जोकि दुर्गीकृत नहीं था।
  • लोथल, सुरकोटदा और बनावली — इन तीन नगरों में पूर्वी और पश्चिमी विभाजन नहीं था, समस्त नगर एक ही तल पर स्थित था और एक ही रक्षा प्राचीर से घिरा हुआ था।
  • धौलावीरा — यह नगर दो नहीं अपितु तीन समान भागों में विभाजित था। ( मेसोपोटामियाई नगरों के समान )

नगरों में बने मकान के बीचो-बीच एक आँगन होता था जिसके तीन ओर कमरे होते थे। सीढ़ियों के मिलने से मकानों के बहुमंजिली होने के साक्ष्य मिलते हैं।

मकानों के निर्माण में मुख्यतया पक्की ईंटों ( burnt bricks ) का प्रयोग किया गया है परन्तु इसका अपवाद कालीबंगन है जहाँ पर मकानों के निर्माण में कच्ची ईंटों का प्रयोग किया गया है। यद्यपि कालीबंगन की नालियों में पक्की ईंटों का प्रयोग हुआ है।

प्रयुक्त ईंटों का अनुपात सामान्यतया ४ : २ : १ था।

मकानों के कपाट और झरोखे सामान्यतः गलियों की ओर खुलते थे जबकि इसका अपवाद लोथल में मिलता है। लोथल में घरों के कपाट और झरोखे सड़कों की ओर खुलते थे।

प्रत्येक मकान में स्नानागार और अन्नागार की व्यवस्था मिलती है।

मकानों के अंदर नालियाँ थीं जो सड़कों के किनारे चलने वाली मुख्य नालियों से मिल जाती थी। भूमिगत जल निकास प्रणाली ( underground drainage system ) थी जो सभी घरों को सड़क की नालियों से जोड़ती थी और यह पत्थर की पटिया ( slab ) या ईंटों से ढकी होती थी।

इस सभ्यता में ‘सफाई और स्वच्छता’ पर समकालीन अन्य सभी सभ्यताओं में सबसे अधिक दिया गया था।

पत्थर के भवनों की अनुपस्थिति हड़प्पा सभ्यता की प्रमुख विशेषताएँ हैं।

मोहनजोदड़ो के महत्वपूर्ण सार्वजनिक भवन हैं — सभाभवन, पुरोहित आवास, अन्नागार, विशाल स्नानागार।

  • विशाल स्नानागार का आकार ११·८८ मीटर लम्बा × ७·०१ मीटर चौड़ा × २·४३ मीटर गहरा है। इसके दोनों सिरों पर तल तक सीढ़ियाँ बनी हुई हैं। कपड़े बदलने के लिए किनारे पर कमरे बने हैं। स्नानागार का फर्श पकी और तराशी हुई ईंटों से बना था। बगल के कमरे में एक बड़े कुएँ से पानी खींचकर स्नानागार के कुंड को भरा जाता था और स्नानागार के एक कोने ( दक्षिण-पश्चिम ) से एक जल-निर्गमन नाली से जल निकाला जाता था। यह एक सामूहिक स्नानागार था जोकि अनुष्ठान स्नान स्थल के रूप या मांगलिक समारोहों के अवसर पर किये जाते होगे।
  • विशाल अन्नागार मोहनजोदड़ो की सबसे बड़ा भवन था। इसका आकार ४५·७२ मीटर × २२·८६ मीटर था। इसमें २७ प्रकोष्ठ थे। लेकिन हड़प्पा के गढ़ में हमें छह अन्न भंडार मिलते हैं।

राजनीतिक संगठन

सैंधव लिपि के वाचन न होने के कारण यहाँ के राजनीतिक संगठन की जानकारी अस्पष्ट है। समकालीन मेसोपोटामिया सभ्यता में हमें मंदिर के प्रमाण मिले हैं और यहाँ पर पुरोहितों का शासन था। परन्तु सैंधव सभ्यता में किसी मंदिर के प्रमाण न मिलने के कारण पुरोहित शासन की कल्पना नहीं की जा सकती है। यद्यपि ए॰ एल॰ बॉशम कृत अद्भुत भारत ( The Wonder That was India ) में इस सभ्यता पुरोहित शासन की बात कही गयी है।

इतिहासकार राम शरण शर्मा इस सभ्यता में वणिक् या व्यापारियों का शासन मानते हैं। यह सर्वाधिक स्वीकार्य मत है।

मैके और हंटर जैसे विद्वान यहाँ पर जनतांत्रिक प्रणाली का विचार प्रस्तुत करते हैं।

पिग्गट ने विचार व्यक्त किया है कि, ‘मोहनजोदड़ो और हड़प्पा यहाँ की जुड़वा राजधानियाँ थीं।’

हाल ही के कुछ शोधों में यह मत व्यक्त किया गया है कि महाजनपदकाल में जिस तरह महाजनपदों की अलग-अलग राजधानियाँ थीं। उसी तरह हड़प्पा सभ्यता में भी अलग-अलग राजधानियाँ क्यों नहीं हो सकती ? जैसे; सिंध क्षेत्र में मोहनजोदड़ो, पंजाब क्षेत्र में हड़प्पा, राजस्थान क्षेत्र में कालीबंगन आदि।

एक विचार यह भी व्यक्त किया गया है कि, ‘क्या पुरोहित और व्यापारी वर्ग एक ही वर्ग नहीं हो सकते ?’

अंतिम निष्कर्ष तो सिंधु लिपि पढ़ने के बाद ही स्पष्ट हो सकता है।

आर्थिक जनजीवन

कृषि, पशुपालन, उद्योग, शिल्प और व्यापार जैसी आर्थिक गतिविधियों जैसे क्षेत्रों में पूर्ववर्ती समय से प्रगति हुई थी।

कृषि – कृषि की उन्नत दशा के निम्न प्रमाण दिये जाते हैं —

  • कालीबंगन से प्राक् हड़प्पा काल के जुते हुए खेत के साक्ष्य मिले हैं।
  • अधिकांश मकानों में अन्नागारों का मिलना।
  • बनावली, चोलिस्तान से मिट्टी का हल प्रतिरूप का मिलना।
  • लोथल से चक्की के दो पाटों का मिलना।

सैंधव लोग वर्षा का का पानी उतरने के बाद फसल की बुआई नवंबर-दिसंबर में करते थे और फसल की कटाई वर्षा ऋतु के पुनरागमन से पूर्व मार्च-अप्रैल में किया जाता था। यहाँ की अधिकांश रबी फसलें थीं।

फसल को काटने के लिए प्रस्तर के हँसियों का प्रयोग किया जाता था।

हड़प्पा क्षेत्र में ‘९ फसलों’ के कृषि का प्रमाण मिलते हैं; जैसे — गेहूँ, जौ, मटर, तिल, सरसों, राई, खजूर, तरबूज और कपास।

  • गेहूँ की तीन और जौ की दो किस्में मिली हैं।
  • अधिशेष उत्पादन को अन्न-भंडारों में रखा जाता है।
  • कपास सैंधव सभ्यता की मूल फसल थी। कपास के साक्ष्य मेहरगढ़ और मोहनजोदड़ो से मिले हैं। यूनानी कपास उत्पादन के कारण ही सैंधव लोगों को सिंडन ( sindon) कहते थे।

विवादित अथवा अज्ञात फसलें – चावल, रागी और गन्ना :—

  • चावल के प्रमाण लोथल से मिला है जबकि रंगपुर से धान की भूसी के प्रमाण मिले हैं। परन्तु इसे हड़प्पा सभ्यता की फसल नहीं माना जाता है।
  • रागी की कृषि महाराष्ट्र, गुजरात और राजस्थान के कुछ क्षेत्रों में की जाती थी परन्तु यह हड़प्पा सभ्यता की फसल नहीं मानी जाती है।
  • गन्ना इसका ज्ञान हड़प्पा वासियों को नहीं था। गन्ने के खेती के प्रमाण उत्तरवैदिक काल में हस्तिनापुर से मिला है ( लगभग १००० ई॰ पू॰ )।

पशुपालन – भेड़, बकरी, श्वान, वृषभ, सुकर, बिल्ली, गर्दभ, ऊँट, हाथी, गैंड़ा, व्याघ्र, हरिण, कूबड़दार वृषभ, एक शृंगी पशु, भैंस आदि जानवरों को पालतू बनाया जाता था। इसके अतिरिक्त गिलहरी, मयूर, काक, मत्स्य, मगरमच्छ, कच्छप आदि की भी जानकारी थी। इनमें से कुछ पशुओं की धार्मिक महत्ता भी थी।

धार्मिक दृष्टि से सर्वप्रमुख पशु कूबड़वाला वृषभ था। यद्यपि मुहरों पर सर्वाधिक अंकन एकशृंगी पशु का मिलता है।

मैके को मोहनजोदड़ो से एक ऐसी मुहर मिली है जिसपर — एक तीन मुखों वाला पुरुष देवता पद्मासन मुद्रा में विद्यमान है। दायीं ओर व्याघ्र और हाथी जबकि बायीं ओर गैंड़ा और भैंसा अंकित है। सिंहासन के नीचे दो हरिण खड़े हैं। योगी के सिर पर त्रिसिंगी मुकुट ( दो शृंग और बीच में एक उभार ) है। मार्शल ने इसे ऐतिहासिक शिव का आद्य रूप कहा है।

लोथल ( कुछ विद्वानों के अनुसार हड़प्पा से भी ) से एक मृद्भाण्ड मिला है जिसपर एक चित्रांकन है जिनमें – एक वृक्ष अंकित है और उसपर एक काक बैठा है। काक के मुख में एक मत्स्य है। पेड़ के नीचे एक लोमड़ी खड़ी है। यह गुप्तकाल में लिखी गयी पंचतंत्र की कथा चालाक लोमड़ी की याद दिलाती है। इसी तरह प्यासा कौआ की कहानी का अंकन भी लोथल से मिलता है।

पक्षियों में सर्वाधिक महत्ता फाख्ता ( शुक्ल कपोत ) की थी।

काक ( कौआ ) का उल्लेख हड़प्पा, संगमकाल और बौद्धकाल में मिलता है।

विवादित पशु – घोड़ा, गाय, ऊँट, शेर।

  • घोड़ा — सामान्यतः रथों में घोड़े नहीं अपितु वृषभ जुते होने का अंकन मिलता है। यह माना जाता है कि सैंधव लोग घोड़े से अपरिचित थे। यद्यपि सुरकोटदा से घोड़े के अस्थिपंजर, राना घुंडई से घोड़े के दाँत मिले हैं। मोहनजोदड़ो, लोथल, नौशारो से घोड़े की मृण्मूर्तियाँ मिली हैं।
  • गाय — यह तो बड़े आश्चर्य की बात है कि वृषभ का अंकन तो मिलता है परन्तु गाय की न तो मृण्मूर्तियाँ मिलती हैं न ही इसका अंकन किसी मृद्भाण्ड पर और न ही मुहरों आदि पर मिलता है। यद्यपि एस॰ आर॰ राव ने लोथल से दो गाय की मृण्मूर्तियाँ प्राप्त करने का दावा किया है।
  • ऊँट — इस पशु का ज्ञान सैंधव लोगों को था। ऊँट का अस्थिपंजर मुख्यतः कालीबंगन से मिला है। इसके अलावा हड़प्पा, मोहनजोदड़ो से भी ऊँट की अस्थियाँ मिली हैं। परन्तु इस पशु का अंकन मृण्मूर्ति, मृद्भाण्ड व मुहरों पर नहीं मिलता है।
  • शेर — हड़प्पा सभ्यता में बाघ के प्रमाण मिले हैं परन्तु शेर से यहाँ के लोग अपरिचित थे।

सैंधव सभ्यता में वस्त्र उद्योग, धातु उद्योग, मनका उद्योग, हाथी दाँत उद्योग, मसाला उद्योग आदि शामिल थे।

वस्त्र उद्योग – यह उद्योग इस सभ्यता का सबसे महत्वपूर्ण उद्योग था। सैंधव लोगों ने ही कपास का उत्पादन प्रारम्भ किया था। मोहनजोदड़ो से वस्त्रों जानकारी मिलती है। हड़प्पावासी सूती और ऊनी वस्त्रों प्रयोग करते थे। सूती वस्त्र हड़प्पा वासियों के व्यापार ( निर्यात ) की प्रमुख वस्तु थी। परन्तु आश्चर्य की बात यह है कि मेसोपोटामिया को निर्यातित वस्तुओं की सूची में कपास और वस्त्रों का उल्लेख नहीं मिलता है।

धातु उद्योग – सैंधव लोगों ने ताँबे व काँसे की वस्तुएँ बनायी। परन्तु इसमें ताँबे की वस्तुएँ काँसे से अधिक प्राप्त हुई हैं। हरियाणा के कुणाल से चाँदी का मुकुट मिला है। काँस्य और ताम्र के पात्र धातु शिल्प के उत्कृष्ट उदाहरण हैं। स्वर्ण और रजत के आभूषण मिलते हैं।

मनका उद्योग – मनकों अर्थात् गुरियों ( beads ) का बड़े पैमाने पर उत्पादन होता था। चन्हूदड़ो और लोथल से मनका बनाने का कारखाने प्राप्त हुए हैं। मनकों ( beads ) का निर्माण विभिन्न प्रकार के अर्ध-कीमती ( semi-precious ) पत्थरों से किया जाता था।

शिल्पकारों के विशिष्ट समूहों में स्वर्णकार, ईंट बनाने वाले, राजगिरी, पत्थर काटने वाले, बुनकर, नाव बनाने वाले, कुम्भकारी  और टेराकोटा निर्माता आदि शामिल हैं। मृद्भाण्ड सामान्यतः सादे हैं परन्तु कहीं-कहीं लाल और काले रंग के मृदभांड मिलते हैं।

व्यापार और वाणिज्य – व्यापार और वाणिज्य को दो भागों में बाँटा जा सकता है; एक, आंतरिक व्यापार और द्वितीय, बाह्य व्यापार।

आंतरिक व्यापार — सैंधव लोग आपस में एक दूसरे से जुड़े हुए थे और उनके बीच में वस्तुओं का लेनदेन होता था। कर्नाटक व तमिलनाडु के केन्द्रों से उनके व्यापार की जानकारी मिलती है। आंतरिक व्यापार के निम्न प्रमाण हैं —

  • एक ही प्रकार के बाँट-माप और उनका १६ के गुणन में प्रयोग।
  • एक ही प्रकार की मुहरें सामान्यतः सभी स्थानों से मिलती हैं।
  • लगभग सभी महत्वपूर्ण नगरों से अन्नागार के प्रमाण मिले हैं।
  • बैलगाड़ी व रथों का प्रयोग। इनके पहिये ‘ठोस’ होते थे और उनमें आधुनिक काल की तरह तीलियाँ नहीं होती थीं।

बाह्य व्यापार — सिंधु सभ्यता का व्यापार मुख्य रूप से एशियाई और अफ्रीकी क्षेत्रों से होता था। इस बाह्य व्यापार के निम्न प्रमाण हैं —

  • लोथल, सुत्कांगेनडोर जैसे बंदरगाह नगरों की उपस्थिति।
  • लोथल की मुहरों पर नावों का अंकन और वहीं से फारस की एक मुहर मिली है।
  • दोदाबेट्टा ( तमिलनाडु ) और उर ( मेसोपोटामिया ) से हरा पत्थर मिलना।
  • सिंधु की बेलनाकार मुहरों का लगभग मेसोपोटामिया के एक दर्जन नगरों ( उर, निप्पुर, हम्मा, किश आदि ) से मिले हैं।
  • मेसोपोटामिया के शासक सारगोन की मिट्टी की पट्टी पर मेलुहा, ढिल्मुन व मगन के साथ व्यापार का उल्लेख मिलता है जिनकी पहचान क्रमशः मोहनजोदड़ो, बहरीन और मकरान ( या ओमान ) से की जाती है।

हड़प्पा क्षेत्र में कच्चे माल की कमी थी अतः वे लोग विभिन्न क्षेत्रों से वस्तुओं को मंगाते थे; जैसे —

  • ताँबा राजस्थान के खेतड़ी, गणेश्वर के साथ-साथ बलूचिस्तान से भी मँगाया जाता था।
  • चाँदी ईरान और अफगानिस्तान से मंगाया जाता था।
  • स्वर्ण कर्नाटक के कोलार एवं हट्टी की खानों से प्राप्त होता था। थोड़ा-बहुत सोना कश्मीर से भी मिलता था।
  • टिन अफगानिस्तान से मँगाया जाता था। टिन को ताँबें में मिलाकर काँस्य का निर्माण किया जाता था।
  • लाजवर्दि मणि ( lapis lazuli ) मुख्यतः अफगानिस्तान के बदख्शाँ क्षेत्र प्राप्त होता था। साथ ही यह थोड़ी मात्रा में कश्मीर से भी प्राप्त होता था।
  • गोमेद ( agate ) यह प्रस्तर गुजरात से प्राप्त होता था।
  • फ्लिंट और चर्ट के प्रस्तर बलूचिस्तान के रोड़ी और सक्खर की खदानों से प्राप्त किया जाता था।
  • हरा पत्थर तमिलनाडु के दोदाबेट्टा से मँगाया जाता था। यही प्रस्तर हमें मेसोपोटामिया के उर ( पुर ) से भी प्राप्त हुआ है।

हड़प्पा सभ्यता से निर्यातित वस्तुएँ — वस्त्र, मसाले, आबनूस की लकड़ी, हाथी दाँत, मुहरें आदि।

हड़प्पा सभ्यता में आयातित वस्तुएँ — फिरोजा, लाजवर्दि मणि, हरिताश्म, चाँदी, सोना, टिन आदि।

हड़प्पावासियों के साथ व्यापार में भाग लेने वाले प्रमुख देश निम्न थे — मेसोपोटामिया, अफगानिस्तान, फारस, मिश्र, ढिल्मुन, कुवैत, तिब्बत।

मेसोपोटामिया — इस सभ्यता का विकास दजला-फरात नदी घाटी में हुआ था। हड़प्पा सभ्यता का इस सभ्यता के लोगों से सर्वाधिक व्यापार होता था। यह व्यापार वहाँ के शासक सारगोन के समय में सर्वाधिक होता था। सारगोन युगीन अभिलेखों में मेलुहा के साथ व्यापार का उल्लेख मिलता है जिसकी पहचान मोहनजोदड़ो से की जाती है। परन्तु यह उल्लेखनीय है कि मेलुहा से आयातित वस्तुओं की जो सूची दी गयी है उसमें कपास और वस्त्र उल्लेख नहीं है। जबकि कपास और वस्त्र हड़प्पा सभ्यता में उत्पादित सर्वप्रमुख उत्पाद था। लगभग २००० ई॰पू॰ के आसपास इस व्यापार में गिरावट आने लगा था।

अफगानिस्तान — अफगानिस्तान में मुंडीगाक और शोर्तुघई नामक स्थल हड़प्पा सभ्यता के उपनिवेश जैसे कार्य करते थे। बदख्शाँ क्षेत्र से लाजवर्द मणि प्राप्त होता था। इसके अतिरिक्त अफगानिस्तान से टिन और चाँदी प्राप्त की जाती थी।

फारस — यहाँ से संगाश्म / हरिताश्म ( zed ), फिरोजा ( turquoise ), टिन और चाँदी आदि की प्राप्ति होती थी।

मिश्र — इस अफ्रीकी देश से भी व्यापार होता था। यहाँ से सैंधव गुरियों के प्रमाण मिले हैं।

ढिल्मुन — सारगोन की मिट्टी की पट्टिकाओं पर इस देश का उल्लेख हुआ है। इसकी पहचान बहरीन से की जाती है। इसे इन सारगोनयुगीन अभिलेखों में इसे सूर्योदय का देश, हाथियों का देश और साफ-सुथरे नगरों का देश कहा गया है। यह मेसोपोटामिया और हड़प्पा सभ्यता के मध्य बिचौलिये के रूप में कार्य करता था।

रस-अल-फैल्का — यह मेसोपोटामिया और हड़प्पा के मध्य मध्यस्थ की भूमिका निभाता था।

तुर्कमेनिस्तान — कैस्पियन सागर तट पर स्थित अल्तिनडेपे, नामज्गा डेपे, अनाउ आदि से सैंधव प्रकार के मृद्भाण्ड, मुहरें, मनके, ताम्रपत्र आदि मिले हैं।

तिब्बत — यहाँ से सम्भवतः शीशे का आयात किया जाता था।

“यह व्यापार हड़प्पा सभ्यता वासियों के पक्ष में था।”

‘अभी तक चीन, श्रीलंका, दक्षिण-पूर्व एशिया और यूरोपीय देशों के साथ व्यापार या सम्पर्क अभी तक स्थापित नहीं हो पाया था।’

स्वर्ण, ताम्र, टिन और कई अर्ध-कीमती पत्थरों का आयात किया जाता था क्योंकि इनकी हड़प्पा सभ्यता में कमी थी। निर्यात के कृषि उत्पाद थे — गेहूँ, जौ, मटर, तिलहन और कपास के सामान, मिट्टी के बर्तनों, मनके, टेराकोटा, हाथीदांत के उत्पाद आदि। हड़प्पा और मेसोपोटामिया के मध्य व्यापार के पुरातात्विक साक्ष्य मिलते हैं। मेसोपोटामिया से हड़प्पा सभ्यता की कई मुहरें मिली हैं। व्यापार वस्तु विनिमय ( barter ) के आधार पर किया जाता था। व्यापार के साधन के रूप में बैलगाड़ियों और नावों का प्रयोग किया जाता था।

सामाजिक जनजीवन

सैंधव सभ्यता की सामाजिक दशा का अनुमान पुरातात्विक साक्ष्यों पर आधृत है। साक्ष्यों से सामाजिक विभेद का अनुमान लगाया गया है। विद्वानों का मत है कि यहाँ शासक वर्ग, पुरोहित वर्ग, वणिक् वर्ग और श्रमिक वर्ग थे जिसकी तुलना चार वर्णों से की जा सकती है।

हड़प्पा सभ्यता में ‘दास प्रथा’ प्रचलित थी। हड़प्पा के पश्चिमी गढ़ी से १ कमरे वाले मकानों की प्राप्ति को विद्वान इसके साक्ष्यों रूप में प्रस्तुत करते हैं। संगम काल को छोड़कर संपूर्ण भारतीय इतिहास में सदैव दास प्रथा प्रचलित रही है।

महिला – हड़प्पा सभ्यता में सर्वाधिक नारी मृण्मूर्तियाँ मिलने से ‘मातृसत्तात्मक समाज’ की कल्पना की जाती है। परन्तु इस संदर्भ में उल्लेखनीय है कि भारतीय क्षेत्रों से केवल बनावली से नारी मृण्मूर्तियाँ मिली हैं। नारी मृण्मूर्तियाँ अधिकांशतः पाकिस्तान के बलूचिस्तान आदि क्षेत्र से मिली हैं। इन नारी मृण्मूर्तियों में अधिकांशतः युवा नारियाँ हैं। लोथल और कालीबंगन से युग्मित शवाधान को कुछ विद्वान सती प्रथा के साक्ष्यों रूप में प्रस्तुत करते हैं। चन्हूदड़ो से प्रशाधन सामग्री और नौशारो से माँग में सिंदूर लगाने के प्रामाण मिले हैं।

वस्त्राभूषण, खानपान और मनोरंजन – सैंधव लोग सूती और ऊनी वस्त्रों का प्रयोग करते थे। मोहनजोदड़ो से हमें कपड़ों व कपास के प्रमाण मिले हैं। इन वस्त्रों पर सुइयों द्वारा बुनाई की जाती थी। पुरुष और महिला दोनों जो वस्त्र धारण करते थे उसके दो भाग थे — एक, ऊपरी वस्त्र और दूसरा निचला वस्त्र।

सुई और कंघी हाथी दाँत के बने थे। दर्पण ताँबे के बने थे। इन सभी के प्रमाण मोहनजोदड़ो से मिले हैं।

हड़प्पा सभ्यता के लोगों को रेशमी वस्त्र का ज्ञान नहीं था।

आभूषण विभिन्न प्रस्तरों, स्वर्ण, रजत व अन्य धातुओं से बने थे। सोना कर्नाटक के कोलार व हट्टी और कुछ कश्मीर से प्राप्त होता था। चाँदी का मुकुट कुणाल से मिला है। सैंधव लोग आमिष और निरामिष दोनों थे।

पुरुष और महिला दोनों मनकों ( beads ) की माला पहनते थे। पुरुष और महिला दोनों आभूषण धारण करते थे। आभूषणों में शामिल थे —  चूड़ी, कंगन, फीता, करधनी, कर्ण-फूल, अँगूठी आदि। ये आभूषण सोने, चांदी, तांबे, कांस्य और अर्द्ध कीमती प्रस्तरों से निर्मित होते थे।

सौंदर्य प्रसाधनों का प्रयोग किया जाता था। घरेलू वस्तुओं मृद्भाण्ड, प्रस्तर, सींप, शंख, हाथीदांत, धातु आदि निर्मित विभिन्न घरेलू वस्तुएँ मिलती हैं। तकली, सुई, कंघी, मछली पकड़ने का काँटा, चाकू आदि तांबे के बने होते थे। बच्चों के खिलौने मिट्टी के बने होते हैं।

मनोरंजन के लिए शतरंज, गेंद, पासे का खेल, रथदौड़, नृत्य, गायन आदि। वस्तुतः नृत्यगान सिंधु सभ्यता से लेकर आजतक मनोरंजन का सबसे महत्वपूर्ण साधन बना हुआ है। मछली पकड़ना एक नियमित व्यवसाय था जबकि शिकार करना और सांडों की लड़ाई मनोरंजन के साधन थे। युद्ध के हथियारों में शामिल थे — कुल्हाड़ी, भाला, खंजर, धनुष, आदि। इन हथियारों का निर्माण ताँबे और कांस्य से किया जाता था।

अंत्येष्टि संस्कार की विधियाँ

मोहनजोदड़ो, हड़प्पा, कालीबंगा, लोथल और रोपड़ आदि नगरों से प्राप्त खोजे गए श्मशानों से शवाधान प्रक्रियाओं का ज्ञान मिलता है। हड़प्पा सभ्यता से निम्न प्रकार की अंत्येष्टि पद्धतियाँ मिलती हैं —

(१) पूर्ण समाधीकरण – यह इस सभ्यता की सर्वाधिक प्रचलित विधि थी। शवों को ‘उत्तर-दक्षिण’ दिशा में रखकर उसके उपयोग की वस्तुओं के साथ दफना दिया जाता था। इससे उनके पारलौकिक जीवन में विश्वास की जानकारी मिलती है। वर्तमान में पूर्ण समाधीकरण ईसाई और मुस्लिम समुदाय में प्रचलित है। इसके कुछ अपवाद हैं —

  • कालीबंगन से दक्षिण-उत्तर में दफनाने के प्रमाण
  • लोथल से पूर्व- पश्चिम में दफनाने का प्रमाण
  • रोपड़ से पश्चिम-पूर्व में दफ़नाने का प्रमाण
  • हड़प्पा से एक ऐसी कब्र मिली है जिसमें लकड़ी की पेटिका में शव रखकर दफनाया गया था। यह किसी विदेशी का शव मालूम होता है।
  • लोथल से तीन और कालीबंगन से एक युग्मित शवाधान का प्रमाण मिला है। कुछ विद्वान इन युग्म शवाधानों को सती प्रथा का साक्ष्य मानते हैं।

(२) आंशिक समाधीकरण – बहावलपुर क्षेत्र से इसके साक्ष्य मिले है। वर्तमान में पारसी समुदाय में यह प्रथा प्रचलित है।

(३) दाह संस्कार — वर्तमान में यह हिन्दू समुदाय में प्रचलित है।

(४) कलश शवाधान – मोहनजोदड़ो और सुरकोटदा से इसके साक्ष्य मिले हैं। मार्शल और मैके ने इसे ‘प्रतीकात्मक समाधीकरण’ तो पिग्गट ने इसे ‘शोक पिट’ की संज्ञा है।

धर्मिक दशा

मुहरों, मृण्मूर्तियाँ, मृद्भाण्ड और ताम्र पट्टिकाओं से हड़प्पावासियों के धार्मिक जीवन का अनुमान मिलता है।

प्रायः धर्म के दो पहलू होते हैं –

  • एक, दार्शनिक या आध्यात्मिक या संकल्पात्मक या तत्त्वमीमांसात्मक या आंतरिक और
  • द्वितीय, व्यावहारिक या कर्मकाण्डीय या बाह्य।

धर्म के दार्शनिक पहलू का ज्ञान लेखन कला से होता है जबकि बाह्य रूप का ज्ञान भौतिक अवशेषों से होता है। हड़प्पा लिपि का वाचन न हो पाने के कारण धर्म के दार्शनिक पहलू के विषय में जानकारी नहीं हो पाती है यद्यपि भौतिक अवशेषों के प्रचुरता के विश्लेषण से धर्म के बाह्य रूप का ज्ञान मोटे तौर पर होता है।

हड़प्पा सभ्यता के लोग मुख्य रूप से एक पुरुष देव और एक स्त्री देवी की पूजा करते थे इस तरह हम ‘द्वंद्वात्मक धर्म’ के विकास की कल्पना कर सकते हैं।

यहाँ के भौतिक अवशेषों की प्राप्ति के आधार पर कर्मकाण्डीय धर्म की निम्न विशेषताएँ परिलक्षित होती हैं — (१) एक पुरुष देव की पूजा, (२) मातृ देवी की पूजा, (३) पशुओं, प्राकृतिक, अर्ध-मानवीय या काल्पनिक जीवों की पूजा, (४) वृक्ष पूजा, (५) प्रस्तर प्रतीकों ( लिंग-योनि ) की पूजा, (६) क्रीमेथीइज्म अर्थात् धूपदानों से पूजा, (७) ताबीजों, तंत्र-मंत्र, द्वारा भूत-प्रेत में विश्वास, (८) योगाभ्यास आदि।

  • पुरुष देव — मोहनजोदड़ो से प्राप्त एक मुहर जिसपर एक त्रिमुख देव योगमुद्रा में अंकित हैं। ये चार जानवरों से घिरे हैं — दायीं ओर बाघ और हाथी, बायीं ओर भैंसा और गैंड़ा एवं सिंहासन के नीचे दो हिरन खड़े हैं। इस देव के दो शृंग और बीच में एक उभार है। जिनकी पहचान पशुपति के रूप में की गयी है और मार्शल ने इसे आद्य-शिव कहा है। शिव की उपासना सर्वाधिक प्राचीन मानी जाती है।
  • मातृ देवी — हड़प्पा सभ्यता में मातृ देवी की उपासना सर्वाधिक प्रचलित थी। हड़प्पा से एक ऐसी मुहर मिली है जिसमें एक स्त्री को उल्टा दर्शाया गया है और उसके गर्भ से पौधा निकलते हुए दर्शाया गया है। हड़प्पा के लोग धरती को उर्वरा शक्ति मानकर उसकी पूजा करते थे जैसे मिश्र के लोग नील नदी को देवी आइरिस के रूप में पूजते थे।
  • लिंग एवं योनि की पूजा — हड़प्पा, मोहनजोदड़ो आदि से कुछ ऐसे प्रस्तर मिले हैं जोकि लिंग और योनि की आकृति सदृश हैं। यद्यपि संकालिया का कहना है कि अनेक लिंग नालियों में पड़े हुए मिले हैं, अगर उनकी धार्मिक महत्ता होती तो घरों के अंदर प्राप्त होते।
  • नागपूजा — यहाँ से कुछ मुहरों पर नागों को दूध पिलाते हुए अंकित किया गया है।
  • सूर्यपूजा — मोहनजोदड़ो से हमें स्वस्तिक के प्रमाण मिले हैं जोकि सूर्यपूजा को प्रदर्शित करते हैं। वर्तमान में स्वस्तिक का चिह्न सुख, समृद्धि और शान्ति का प्रतीक माना जाता है।
  • जल और अग्नि का महत्त्व — मोहनजोदड़ो से प्राप्त विशाल स्नानागार सामूहिक स्नान के महत्त्व को दर्शाता है। वर्तमान में भी विशेष अवसरों पर सामूहिक स्नान प्रचलित है और उसकी धार्मिक महत्ता भी है। कालीबंगन, लोथल व बनावली से प्राप्त अग्निवेदिकाएँ आग के महत्त्व हो को दर्शाता है। ऋग्वेद की पहली ऋचा ही आग को समर्पित है।
  • पशु-पक्षी पूजा — इस सभ्यता में कूबड़ वाले वृषभ की सर्वाधिक महत्त्व था यद्यपि मुहरों पर एकशृंगी पशु का सर्वाधिक अंकन किया गया है। इसके अतिरिक्त व्याघ्र, हाथी, भैंसा, हरिण आदि पशुओं का भी महत्त्व था। पक्षियों में फाख्ता, मयूर, काक आदि का भी महत्त्व था।
  • भूत-प्रेत में विश्वास — इस सभ्यता में बड़ी संख्या में ताबीजों आदि के मिलने से भूत-प्रेत, जादू-टोने आदि में विश्वास का पता चलता है।
  • मूर्तिपूजा — सिंधु सभ्यता से ही मूर्तिपूजा की जानकारी मिलती है। हमें कुछ ऐसी मूर्तियाँ प्राप्त हुई हैं जिसपर काले रंग का निशान है। सम्भवतः इनके सामने कोई दीपक जैसी कोई वस्तु जलाने का साक्ष्य मिलता है।
    • ऐतिहासिक काल में प्रथम शताब्दी ईसवी में कनिष्क के काल से मूर्ति की शुरुआत मानी जाती है जब मथुरा कला में सर्वप्रथम बैठी और खड़ी मुद्रा में मूर्तियाँ निर्मित की गयीं। जबकि मूर्तिपूजा का प्रचलन गुप्तकाल से मानी जाती जब बड़े पैमाने पर मंदिर निर्माण कर उनमें मूर्तियाँ स्थापित की गयीं।
  • इसके अतिरिक्त कुछ पशु-पक्षियों और वृक्षों को पवित्र माना जाता था आदि।

कला और प्रौद्योगिकी

हड़प्पा सभ्यता की कला और प्रौद्योगिकी में निम्न तत्व सम्मिलित हैं — मृण्मूर्ति, मृद्भाण्ड, प्रस्तर मूर्ति, धातु मूर्तियाँ, मनके, ताम्र पट्टिकाएँ, मुहरें और लिपि।

सैंधव मुहरें कला और प्रौद्योगिकी के सबसे अच्छे उदाहरण हैं।

मृण्मूर्तियाँ ( terracotta ) — मिट्टी की मूर्तियों का निर्माण ‘चिकोटी विधि’ से किया जाता था। ये मृण्मूर्तियाँ मानव, पशु-पक्षी आदि की मिली हैं। मानव मृण्मूर्तियाँ ठोस हैं जबकि पशु-पक्षियों की खोखली हैं। पशुओं में गाय और ऊँट की मृण्मूर्तियाँ सामान्यतः नहीं पायी गयी हैं। अपेक्षाकृत नारी की मृण्मूर्तियाँ अधिक पायी गयी हैं और इसीलिए सैंधव समाज को मातृसत्तामक समाज माना जाता है। यद्यपि भारतीय क्षेत्र बनावली से ही नारी मृण्मूर्तियाँ मिली हैं। अधिकांश नारी मृण्मूर्तियाँ पाकिस्तान के बलूचिस्तान व सिंध क्षेत्र से मिली हैं। हरियाणा के बनावली और पाकिस्तान के चोलिस्तान से हल का प्रतिरूप मिला है।

मृद्भाण्ड — मिट्टी के पात्रों का निर्माण कुम्हार के चाक पर किया जाता था और फिर इन्हें भट्ठों में पकाया जाता था। सैंधव सभ्यता में सामान्यतया लाल या गुलाबी रंग के मृद्भाण्ड मिले हैं जिसपर प्रायः काले रंग से विभिन्न पशु-पक्षियों, मानव और ज्यामितीय आकृतियों का अंकन हुआ है। इसमें सर्वाधिक ज्यामितीय आकृतियों का अंकन हुआ है। लोथल से प्राप्त एक मृद्भाण्ड पर पंचतंत्र की कथा चालाक लोमड़ी की याद ताज़ा करती है। हरियाणा के भगवानपुरा से हड़प्पा सभ्यता के परवर्ती अवस्था से चित्रित मृद्भाण्ड के प्रमाण मिले हैं।

प्रस्तर मूर्तियाँ — सिंधु सभ्यता से पाषाण निर्मित अनेक मूर्तियाँ मिली हैं। इसमें सर्वाधिक सेलखड़ी ( steatite ) का प्रयोग हुआ है। हमें हड़प्पा से एक नृत्यरत युवक की मूर्ति मिली है। मोहनजोदड़ो के डी॰के॰ ( D.K ) क्षेत्र से मंगोलॉयड प्रजाति की पुजारी का धड़ मिली है। हमें इस सभ्यता से कुछ पशुओं की संश्लिष्ट मूर्तियाँ भी प्राप्त होती हैं जोकि उनकी किसी अलौकिक कल्पना का प्रतीक लगती हैं। जैसे — मोहनजोदड़ो से एक भेड़ा की की शरीर और हाथी की सूँड़ वाली संश्लिष्ट मूर्ति मिली है।

धातु मूर्तियाँ  — सैंधव सभ्यता से हमें ताम्र और कांस्य के अनेक मूर्तियाँ प्राप्त हुई हैं। इन धातु मूर्तियों का निर्माण ‘मधूच्छिष्ट विधि’ या ‘लुप्त मोम विधि’ या ‘भ्रष्ट मोम विधि’ ( Lost wax method ) से किया जाता था। ताँबे की मूर्तियाँ अपेक्षाकृत अधिक पायी गयी हैं। कालीबंगन से प्राप्त ताँबे की वृषभ प्रतिमा और लोथल की श्वान प्रतिमा अत्यंत आकर्षक है। काँसे की मूर्तियों में चन्हूदड़ो से प्राप्त एक्कागाड़ी व बैलगाड़ी। मोहनजोदड़ो से कांस्य नर्तकी प्रतिमा, दायमाबाद से काँस्य का रथ अत्यंत महत्वपूर्ण है।

मनके / गुरिया ( beads ) — मनके सुवर्ण, रजत, मूल्यवान व अर्धमूल्यवान प्रस्तर से बनाये जाते थे। ये विभिन्न आकृतियों के होते थे। सेलखड़ी ( steatite ) की बेलनाकार मनके सर्वाधिक प्राप्त हुए हैं।

ताम्र पट्टिकाएँ — हड़प्पा, मोहनजोदड़ो आदि से ताम्र पट्टिकाएँ मिली हैं जिसपर सैंधव लिपि और विभिन्न पशु-पक्षियों की आकृतियाँ प्राप्त हुई हैं।

मुहरें — मुहरें इस सभ्यता की कला और प्रौद्योगिकी के सबसे अच्छे उदाहरण हैं। गोमेद, चर्ट, मिट्टी आदि की ये मुहरें बनायी जाती थीं परन्तु सर्वाधिक मुहरें सेलखड़ी ( steatite ) की बनायी जाती थीं। देसलपुर और लोथल से ताँबे की मूर्तियाँ मिली हैं। इन मुहरों का सामान्य आकार चौकोर है परन्तु इसमें भी वर्गाकार ( २·८ × २·८ सेंटीमीटर  ) सर्वाधिक संख्या में मिली हैं। इन्हीं मुहरों पर विभिन्न पशु-पक्षियों, देवी-देवताओं व सैंधव लिपियों का अंकन मिलता है। इन मुहरों का उपयोग बाहर भेजी जाने वाली वस्तुओं पर ठप्पा लगाने के लिए किया जाता था। लोथल से प्राप्त मुहरों पर नावों का अंकन भी मिलता है। मैके को मोहनजोदड़ो से प्राप्त पशुपति मुहर मिली है जिसे जॉन मार्शल ने आद्य शिव का रूप कहा है। हड़प्पा की एक मुहर से हमें मातृदेवी का अंकन मिलता है।

हड़प्पा की मूर्तिकला में उच्च स्तरीय शिल्पकला का पता चलता है। पुरुष और महिला, जानवर और पक्षी आदि की मृण्मूर्तियाँ और मुहरों पर उत्कीर्ण कला मूर्तिकारों की दक्षता का प्रमाण है।

मोहनजोदड़ो से कांस्य नर्तकी की मूर्ति ( ११·५ सेंटीमीटर = ४·५ इंच ) की कारीगरी उल्लेखनीय है। इसका दाहिना हाथ कूल्हे पर टिका हुआ है और बायाँ हाथ में चूड़ियों से ढका व घुटनों तक लटका हुआ है। यह मूर्ति नृत्य मुद्रा में है।

हड़प्पा से मिली दो प्रस्तर मूर्तियाँ मुख्य हैं — एक व्यक्ति के पीछे के दृश्य का प्रतिनिधित्व करती हैं और दूसरी नर्तक की मूर्ति हैं।

मृद्भाण्डों पर विभिन्न डिजाइनों को बनाकर रंगा गया था। ये चित्रांकन ज्यामितीय पैटर्न में हैं जैसे — क्षैतिज रेखाएँ, वृत्त, पत्ते, पौधे आदि। मृद्भांडों पर हमें मछली और मोर की आकृतियाँ भी मिलती हैं।

लिपि

सैंधव लिपि के प्रमाण हमें मुहरों, मृद्भाण्डों, ताम्र-पट्टिकाओं, कुल्हाड़ियों आदि पर मिलता है। इस लिपि का प्रारम्भिक नमूना १८६३ ई॰ में प्राप्त हुआ है। १९२३ ई॰ तक सम्पूर्ण सैंधव लिपि प्रकाश में आ गयी थी।

हड़प्पाई लिपि का अभी तक वाचन नहीं हो पाया है। ये लिपि चित्रात्मक ( pictorial ) है। इन चित्राक्षरों की संख्या ४०० से ६०० के बीच है जिनमें से ४० या ६० आधारभूत हैं और शेष उनके रूपांतर हैं। लिपि अधिकतर दाएँ से बाएँ लिखी जाती थी। परन्तु जब लेख एक अधिक पंक्तियों का हो तो पहली पंक्ति दायें से बायें और दूसरी पंक्ति बायें से दायें लिखी जाती थी इस पद्धति को गौमूत्रिका पद्धति ( boustrophedon system ) कहा जाता है। इस लिपि का वाचन इसलिए नहीं हो पाया है क्योंकि अभी तक कोई द्विभाषी अभिलेख प्राप्त नहीं हुआ है।

इस लिपि को पढ़ने का दावा – के॰एन॰वर्मा, एस॰आर॰राव, आई॰महादेवन और रेवेरेंड हेरेश ने किया है। इसमें से हेरेश ने न केवल इसे पढ़नेवाले दावा किया है बल्कि तमिल भाषा में अनुवाद करने का दावा भी किया है। परन्तु अभी तक सारे दावे खोखले ही साबित हुए हैं। वर्तमान में इसे आद्य द्रविड़ या आद्य संस्कृत का रूप माना जाता है।

पतन के कारण

हड़प्पा सभ्यता का उद्भव, विकास और पतन विद्वानों के मध्य विवाद का विषय रहा है। हड़प्पा और मोहनजोदड़ो में पतन के लक्षण २००० ई॰पू॰ से ही स्पष्ट होने लगे जबकि शेष नगरों में १७५० ई॰पू॰ से स्पष्ट होने लगे और १५०० ई॰पू॰ तक आते-आते इस सभ्यता का पतन हो गया। इस सभ्यता के पतन के निम्न कारण थे —

(१) बाढ़ — इस मत के समर्थक जॉन मार्शल, मैके और एस॰आर॰राव हैं। मार्शल ने मोहनजोदड़ो, मैके ने चन्हूदड़ो और एस॰आर॰ राव ने लोथल के पतन का प्रमुख कारण बाढ़ माना है। जॉन मार्शल को मोहनजोदड़ो के उत्खनन से यहाँ से ७ स्तर मिले हैं। हर बार मकानों को पहले से ऊँचे पर बनाया गया था। दो स्तरों के मध्य गाद व बालू की परत मिली है और यह बाढ़ की ओर संकेत करता है। यही प्रमाण चन्हूदड़ो और लोथल से क्रमशः मैके और एस॰आर॰राव को भी मिले हैं। वर्तमान में अधिकांश विद्वान इस मत सहमत हैं। परन्तु इसमें एक समस्या यह है कि नदी तट पर स्थित नगरों के पतन का कारण बाढ़ तो हो सकता है परन्तु वे नगर जो नदियों के किनारे से दूर थे उन नगरों का विनाश कैसे हुआ?

(२) आर्य आक्रमण — इस मत के समर्थक मार्टीमर व्हीलर, गार्डन चाइल्ड, पिग्गट जैसे विद्वान हैं। इन विद्वानों का यह मत निम्न तर्क पर आधृत है – एक, मोहनजोदड़ो के ऊपरी सतह से बड़ी संख्या में नरकंकाल मिले हैं। व्हीलर का मत है कि आर्यों ने आक्रमण करके सामूहिक जनसंहार किया था और ये नरकंकाल उसी के प्रमाण हैं। द्वितीय, बड़े नगरों को दुर्गीकृत किया गया था और ऋग्वेद में आर्यों के देवता इंद्र को पुरंदर कहा गया है। अतः आर्यों ने इंद्र के नेतृत्व में इन्हीं दुर्गीकृत नगरों को विजित किया होगा। तृतीय, ऋग्वेद में ‘हरियूपीया युद्ध’ का उल्लेख है जिसे ये विद्वान हड़प्पा पर आर्य आक्रमण से जोड़ते हैं।

  • परन्तु अब यह सिद्ध हो चुका है कि मोहनजोदड़ो से प्राप्त नरकंकाल मलेरिया जैसी किसी बीमारी से ग्रसित थे। इसी तरह ऋग्वेद के पुरन्दर, हरियूपिया आदिक शब्दों पर इन विद्वानों ने आवश्यकता से अधिक महत्व दिया है। क्योंकि ऋग्वेद की तिथि ही विवादास्पद है। ध्यातव्य है कि मानवविज्ञानियों ने शोधों में यह मत व्यक्त किया है कि भारतीय उप-महाद्वीप में ५००० ई॰पू॰ से ८०० ई॰पू॰ के बीच पश्चिमी या मध्य एशिया से सामूहिक आप्रवास या आक्रमण का कोई पुरातात्त्विक जैविक साक्ष्य उपलब्ध नहीं है।

(३) जलवायु परिवर्तन — इस मत के समर्थक ऑरेल स्टाइन, अमलानंद घोष आदि थे। अमलानंद घोष ने राजस्थान के शोध में यह पाया कि पहले ये क्षेत्र पर्याप्त रूप से हरा-भरा था। परन्तु २००० ई॰पू॰ के बाद यह सूखे की चपेट में आ गया। ऐसा प्रतीत होता है कि प्राकृतिक संसाधनों के अत्यधिक दोहन ( विशेषकर जंगल ) से इस क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन होने से सभ्यता धीरे-धीरे पतन की ओर बढ़ चली।

(४) भू-तात्त्विक परिवर्तन — इस मत के समर्थक एम॰ आर॰ साहनी, एच॰ टी॰ लैम्ब्रिक, माधोस्वरूप वत्स, जी॰ एफ॰ देल्स आदि हैं। इन विद्वानों का मानना है कि भू-तात्त्विक परिवर्तन के कारण नदियों के मार्ग में परिवर्तन हुए, जल-प्लावन जैसी घटनाएँ बार-बार होने लगी। भूमि दलदली और अनुपजाऊ होने लगी। लोग बार-बार विस्थापित होते रहे और सभ्यता का पतन प्रारम्भ हो गया।

(५) विदेशी व्यापार में गतिरोध — इस मत को डब्ल्यू॰ एल॰ अल्ब्राइट ने दिया। जब तक इस सभ्यता का व्यापार मेसोपोटामिया के साथ उन्नत दशा में था तब तक हड़प्पा सभ्यता भी उन्नत दशा में थी। २००० ई॰पू॰ के बाद जब इस व्यापार में गिरावट आयी तो यह सभ्यता भी पतन की ओर बढ़ चली। १७५० ई॰पू॰ के बाद इस सभ्यता का नगरीय स्वरूप ग्रामीण संस्कृति का आकार लेने लगा। ह्वीलर ने इस सभ्यता के पतन पतनावस्था के लक्षणों का उल्लेख किया है। मकानों में पुरानी और कच्ची ईंटों का प्रयोग किया जाने लगा। कमरे छोटे-छोटे बनने लगे।

(६) प्राशासनिक शैथिल्य — जॉन मार्शल के अनुसार इस सभ्यता के अंतिम चरण में हमें प्रशासनिक कमजोरी के लक्षण दृष्टिगोचर होते हैं। अब मकान व्यवस्थित ढंग से नहीं रह गये, उनमें कच्ची और पुरानी ईंटों का प्रयोग होने लगा। मृद्भाण्डों आदि की बनावट में भी गिरावट आने लगी।

(७) महामारी — इस मत को के॰ यू॰ आर॰ केनेडी ने दिया है। मोहनजोदड़ो से प्राप्त नरकंकालों के अध्यनोपरांत केनेडी ने यह मत व्यक्त किया कि इनकी मृत्यु किसी मलेरिया, महामारी जैसी ‘प्राकृतिक आपदा’ से हुई थी। इन आकस्मिक बीमारियों से इस सभ्यता का पतन हुआ होगा।

(८) एक समान प्रौद्योगिकी — विद्वान ए॰ एल॰ बाशम का कहना है कि अपने १००० वर्षीय कालक्रम में प्रौद्योगिकी के स्तर पर कोई परिवर्तन नहीं आया। अतः यह बाद की आवश्यकताओं को पूरी करने में असमर्थ रही और इसका धीरे-धीरे पतन होने लगा।

(९) भौतिक-रासायनिक विस्फोट ( अदृश्य गाज ) — इस मत को एम॰ दिमित्रदेव ने दिया। इस रूसी विद्वान का मानना है कि पर्यावरणीय परिवर्तन अदृश्य गाज और भयंकर विस्फोट के कारण तापमान लगभग १५००० ºC तक पहुँच गया और यह सभ्यता नष्ट हो गयी।

(१०) १९६० के दशक में मलिक, पौसेल जैसे विद्वान हड़प्पा सभ्यता के पतन की बात न करके नगरीय तत्त्व का रूपांतरण ग्रामीण लक्षणों में परिवर्तन की बात करते हैं।

हड़प्पा सभ्यता के पतन क कोई सर्वमान्य कारण नहीं है। विद्वानों ने कई मत दिये हैं। प्राकृतिक आपदाओं जैसे आवर्ती बाढ़, नदियों का सूखना, प्राकृतिक संशाधनों अत्यधिक दोहन आदि के कारण मिट्टी की उर्वरता में कमी आयी। कालीबंगन से तो भूकंप के भी साक्ष्य मिले हैं। कुल मिलाकर उपर्युक्त सभी कारण न्यूनाधिक रूप से इस सभ्यता के पतन के लिए उत्तरदायी थे। परन्तु विद्वानों ने बाढ़ को सर्वप्रमुख कारण माना है।

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