संस्कृत साहित्य के प्रमुख कवि तथा ग्रन्थ

परिचय

किरातार्जुनीय, शिशुपालवध और नैषधचरित को ‘संस्कृति साहित्य’ में बृहत्त्रयी कहा जाता है जिसे क्रमशः भारवि, माघ और श्रीहर्ष ने लिखा है । कालिदास के तीन काव्यों ( राघवंश , कुमारसम्भव और मेघदूत ) को लघुत्रयी कहा जाता है । इसमें से मेघदूत खंडकाव्य है शेष पांच महाकाव्य । इन छः काव्यों का ‘संस्कृत साहित्य परंपरा’ में विशेष महत्त्व है ।

अश्वघोष

अश्वघोष कनिष्क-प्रथम ( ७८ ई० ) की राजसभा में निवास करते थे । अश्वघोष बौद्ध विद्वान थे । वे ख्यातलब्धि कवि, दार्शनिक, नाटककार और  संगीतकार थे । अश्वघोष की प्रमुख रचनायें हैं – बुद्धचरित, सौन्दरनन्द तथा शारिपुत्र-प्रकरण ।

बुद्धचरित – इस महाकाव्य को अश्वघोष का कीर्तिस्तम्भ माना जाता है । इसमें महात्मा बुद्ध के जीवन का सरल एवं सरस विवरण प्राप्त होता है । यह बुद्ध के गर्भस्थ होने से प्रारम्भ होती है तथा धातु युद्ध , प्रथम संगीति तथा अशोक के राज्य तक इसका वर्णन जाता है ।

सौन्दरानन्द – यह अश्वघोष का दूसरा महाकाव्य है । इसमें बुद्ध के सौतेले भाई नन्द की धर्मदीक्षा ( प्रव्रज्या ) ग्रहण करने का वर्णन है । कवि ने इसके शुरुआती भाग में नन्द और पत्नी सुंदरी के अनुराग का शृंगारिक वर्णन किया है और जब नन्द ने बुद्ध के उपदेशों के प्रभाव में भिक्षु बन जाने के बाद उनकी मूक वेदनाओं का करुण वर्णन किया है ।

शारिपुत्र-प्रकरण – यह ९ अंकों का एक नाटक है जिसमें शारिपुत्र के बौद्धमत में दीक्षित होने की घटना का नाटकीय विवरण प्रस्तुत किया गया है ।

अश्वघोष बौद्ध दार्शनिक और सर्वास्तवादी संप्रदाय के विचारक थे । 

कालिदास

कालिदास ‘संस्कृत साहित्य’ के सर्वश्रेष्ठ कवि और नाटककार हैं । कालिदास गुप्तशासक चंद्रगुप्त-द्वितीय विक्रमादित्य के दरबार के नवरत्नों में से थे । भारतीय आलोचकों ने “उपमा कालिदासस्य” कहकर इस महाकवि के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित की है । कालिदास को स्मिथ ने ‘भारत का शेक्सपियर’ कहा है।

कालिदास के ७ ग्रन्थ प्राप्त होते हैं :- ऋतुसंहार , मेघदूत , कुमारसम्भव , रघुवंश , मालविकाग्निमित्रम् , विक्रमोर्वशीयम् , अभिज्ञानशाकुंतलम् ।

  • ऋतुसंहार और मेघदूत खंडकाव्य हैं।
  • कुमारसम्भव और रघुवंश महाकाव्य हैं।
  • मालविकाग्निमित्रम् , विक्रमोर्वशीयम् और अभिज्ञानशाकुंतलम् नाटक हैं।

ऋतुसंहार

यह कालिदास की प्रथम रचना है । यह छः सर्गों का एक खंडकाव्य है जिसमें अलग-अलग छः ऋतुओं ( ग्रीष्म , वर्षा , शरद् , हेमंत , शिशिर और वसंत ) का वर्णन है ।

मेघदूत

यह एक खंडकाव्य है । यह दो भागों में विभक्त है – पूर्वमेघ और उत्तरमेघ । इसमें धनपति कुबेर के शाप से निर्वासित रामगिरि पर्वत पर निवास करने वाले यक्ष ने वर्षा के आरम्भ में मेघ के माध्यम से अलकापुरी में निवास करने वाली अपनी विरही कांता को सन्देश भेजे जाने का वर्णन है । यह वियोग शृंगार की अत्युत्कृष्ट रचना है ।

कुमारसम्भव

यह १७ सर्गों का महाकाव्य है । इसमें शिव-पार्वती के पुत्र कुमार कार्तिकेय के जन्म की कथा का वर्णन है ।

रघुवंश

यह १९ सर्गों का कालिदास का सर्वोत्कृष्ट महाकाव्य है । इसमें दिलीप से लेकर अग्निवर्ण तक ४० इक्ष्वाकुवंशी राजाओं का चरित्र-चित्रण है । इसमें १०वें से १५वें सर्ग तक राम के चरित्र का चित्रण है । इसमें अज का विलाप करुण रस का उत्तम उदाहरण है ।

मालविकाग्निमित्रम

यह कालिदास की प्रथम नाट्य रचना है । इसमें ५ अंक हैं । इसमें शुंगवशीय राजा अग्निमित्र तथा मालविका की प्रणय की कथा है । मालविका रानी की सेविका थी ।

विक्रमोर्वशीयम

यह कालिदास का ५ अंकों का नाटक है । इसमें पुरुरवा और उर्वशी की प्रणय कथा का वर्णन है । पुरुरवा और उर्वशी आख्यान का वर्णन ऋग्वेद और शतपथ ब्राह्मण में मिलता है ।

अभिज्ञानशाकुंतलम्

यह नाटक महाकवि कालिदास की ही नहीं अपितु भारतीय एवं विश्व साहित्य में एक गौरवपूर्ण स्थान रखती है । इसके बारे में कहा गया है की , ‘काव्येषु नाटकम् रम्यं तत्र रम्या शकुन्तला।’  यह ७ अंकों का नाटक है । इसमें हस्तिनापुर के शासक दुष्यंत और कण्व ऋषि की पालिता कन्या शकुंतला के मिलन, वियोग और पुनर्मिलन की कथा का नाटकीय चित्रण है । इसका कथानक महाभारत के आदिपर्व से लिया गया है ।

भारवि

भारवि पल्लववंशी शासक सिंहविष्णु ( ५७५ – ६०० ई० ) के दरबार में रहते थे। पुलकेशिन द्वितीय के ऐहोल अभिलेख में कालिदास के साथ भारवि का उल्लेख मिलता है।

भारवि की कीर्ति का आधारस्तंभ उनकी एकमात्र रचना ‘किरातार्जुनीय महाकाव्य’ है जिसकी कथावस्तु महाभारत से ली गयी है । इस काव्य में महाभारत के महानायक अर्जुन और किरात वेशधारी भगवान शिव के बीच युद्ध का वर्णन है। अन्ततोगत्वा भगवन शिव प्रसन्न होकर अर्जुन को पाशुपतास्त्र प्रदान करते हैं ।

किरातार्जुनीय एक वीररस प्रधान १८ सर्गों का महाकव्य है । इसका प्रारम्भ ‘श्री’ शब्द से होता है और प्रत्येक सर्ग का अंत अंतिम श्लोक में ‘लक्ष्मी’ शब्द का प्रयोग मिलता है । यह कृति अपने अर्थ-गौरव के लिए प्रसिद्ध हैं इसीलिए यह कहा गया है कि, ‘भारवेथरर्थगौरवम्’। भारवि ने कहीं एक व्यंजन तो कहीं दो व्यंजनों से ही श्लोक की रचना कर दी है। भारवि की कविता को नारियल के समान कहा गया है जो ऊपर से कठोर जबकि अंदर से कोमल है ।

माघ

माघ राजस्थान के भीनमल / श्रीमाल के निवासी थे। इनका समय ६७५ ई० के आसपास का निर्धारित किया जाता है। इनकी प्रसिद्ध रचना ‘शिशुपालवध’ नामक महाकाव्य है। इसमें कुल २० सर्ग और १६५० श्लोक हैं। इसका कथानक महाभारत से लिया गया है। इसमें युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ के अवसर पर चेदि नरेश शिशुपाल का श्रीकृष्ण द्वारा वध करने का उल्लेख है।

माघ वैष्णवमतावलम्बी थे। माघ की इच्छा अपने वैष्णव काव्य शिशुपालवध के माध्यम से शैव भारवि से आगे बढ़ जाने की थी। माघ ने अपनी रचना किरातार्जुनीय के पद्धति पर की। शिशुपालवध का आरम्भ भी ‘श्री’ शब्द से होता है ( श्रियः पति श्रीमति शसितुं जगत् ) और प्रत्येक सर्ग का अंत भी श्री शब्द से किया है।

भारतीय आलोचक माघ में कालिदास जैसी उपमा, भारवि जैसा अर्थगौरव तथा दण्डी जैसा पदलालित्य, इन तीनों गुणों को पाते हैं – ‘माघे सन्ति त्रयो गुणाः।’

माघ का काव्य शब्दों का विश्वकोश प्रतीत होता है इसीलिए यह प्रसिद्ध है की ९वाँ सर्ग समाप्त होते-होते कोई नया शब्द बचता ही नहीं है – ‘नवसर्गगते माघे नवशब्दो न विद्यते।’

इस महाकाव्य को विद्वानों में बहुत प्रशंसा मिली है जिसका प्रमाण है यह सुभाषित –  ‘मेघे माघे गतं वयः।’

श्रीहर्ष

श्रीहर्ष १२वीं शती के कवि हैं और वे काशी और कन्नौज के राजपूत ( गहड़वाल ) शासकों – विजयचन्द्र और जयचंद्र – की राजसभा में रहते थे । उनकी प्रसिद्ध रचनायें हैं – नैषधचरित और खण्डनखण्डखाद्य ।

नैषधचरित महाकाव्य उनकी कीर्ति का आधारस्तम्भ है , इसमें २२ सर्ग और २८३० श्लोक हैं । इसमें निषध देश के शासक नल और विदर्भ के शासक भीम की कन्या दमयंती के प्रणय संबंधों तथा अन्ततोगत्वा उनके मिलान व विवाह का काव्यात्मक वर्णन मिलता है ।

श्रीहर्ष भारवि की परंपरा के कवी हैं । उन्होंने अपनी रचना विद्वज्जनों के लिए की है न की सामान्यजन के लिए । अतः विद्वानों की दृष्टि में उनका काव्य माघ और भारवि से भी बढ़कर है – “उदिते नैषधकाव्ये क्व माघः क्व च भारवि ” ।विद्वानों के गर्वरूपी रोग को दूर करने के लिए नैषधचरित को औषध मन गया है ( नैषधं विद्वद्दौषधम् ) । परन्तु आधुनिक विद्वान नैषधचरित को कृत्रिमता का भंडार मानते हैं । श्रीहर्ष अलंकृत शैली के सर्वश्रेष्ठ काव्यकार माने जाते हैं और उनका शृंगार वर्णन वात्स्यायन के कामसूत्र पर आधृत है ।

खण्डनखण्डखाद्य में श्रीहर्ष ने अद्वैतवाद का प्रतिपादन किया है । इसमें न्याय के सिद्धांतों का खंडन किया गया है ।

भट्टि

भट्टि वलभी मैत्रकवंशी शासक ( गुजरात ) श्रीधरसेन के संरक्षण में रहते थे । इस नाम के चार शासक ५०० से ६५० ई० के मध्य हुए है । अतः इनका समय इसी बीच में कहीं हो सकता है । अपने काव्य में भट्टि ने व्याकरण नियमों का प्रयोग करके संस्कृत शास्त्रकाव्य परंपरा की शुरू की । भट्टि काव्य के द्वारा सरलता से व्याकरण नियमों को सीखा देते हैं । इनकी रचना है “रावणवध या भट्टिकाव्य ।”

कुमारदास

कुमारदास छठीं अथवा आठवीं शताब्दी के मने जाते हैं । इनका जन्मस्थान सिंहल द्वीप ( श्रीलंका ) है । इनकी कृति “जानकीहरण” नामक महाकाव्य है ।

अन्य महाकाव्य

१ – हरिविजय – रत्नाकर ( कश्मीरी , ८५० ई० )

२ – कप्फणाभ्युदय – शिवस्वामी

३ – रामायणमञ्जरी , भारतमञ्जरी , बृहत्कथामञ्जरी , दशावतारचरित – क्षेमेन्द्र ( कश्मीरी , ९९५ – १०७० ई० )

४ – श्रीकण्ठचरित – मंख ( कश्मीरी , १२वीं शती )

५ – शिवलीलार्णव – नीलकंठ दीक्षित

६ – पतञ्जलिचरित – रामभद्र दीक्षित

७ – यादवाभ्युदय – वेंकटनाथ

८ – शत्रुञ्जय – धनेश्वर सूरि

९ – नेमिनिर्माणकाव्य – वाग्भट्ट

१० – चन्द्रप्रभचरित – वीरनंदी

११ – धर्मशर्माभ्युदय – हरिश्चन्द्र

१२ – कुमारपालचरित / द्वयाश्रयकाव्य – हेमचंद्र ( गुजरात , १०८८ – ११७२ ई० )

नाट्य साहित्य

कालिदास से लेकर भवभूति के समय को ‘संस्कृति साहित्य’ में ‘नाट्य विधा का स्वर्णकाल’ कहा जाता है ।

भास

संस्कृत साहित्य के नाटककारों में भास का नाम सर्वप्रथम उल्लेखनीय है। वे कालिदास के पूर्ववर्ती माने जाते हैं। यद्यपि उनका समय विवाद का विषय है। उनका समय ईसा पूर्व चौथी शताब्दी से सातवीं शताब्दी ईस्वी के मध्य माना जाता है। फिरभी संभवतः उनका आविर्भाव ईसा पूर्व पांचवी-चौथी शती में हुआ था ।

सबसे पहले १९०९ ईस्वी में गणपति शास्त्री ने भास के तेरह नाटकों की खोज की :- (१) प्रतिमा , (२) अभिषेक , (३) पञ्चरात्र , (४) मध्यम व्यायोम , (५) दूतघटोत्कच , (६) कर्णभार , (७) दूतवाक्य , (८) उरुभंग , (९) बालचरित , (१०) दरिद्रचारुदत्त , (११) अविमारक , (१२) प्रतिज्ञायौगन्धरायण और (१३) स्वप्नवासवदत्ता ।

प्रतिमा और अभिषेक की कथायें रामायण से ली गयी हैं ।

पञ्चरात्र , मध्यम व्यायोम , दूतघटोत्कच , कर्णभार , दूतवाक्य , और उरुभंग के कथानक महाभारत से लिया गया है ।

बालचरित में श्रीकृष्ण के चरित्र का वर्णन है ।

दरिद्रचारुदत्त में गरीब ब्राह्मण चारुदत्त और वसंतसेना की प्रमकथा का नाट्य रूपान्तरण है ।

अविमारक में अविमारक और कुरंगी के प्रेम का वर्णन है ।

प्रतिज्ञायौगंधरायण और स्वप्नवासवदत्ता में कौशाम्बी नरेश उदयन तथा अवन्तिराज की कन्या वासवदत्ता के प्रणयप्रसंग है । स्वप्नवासवदत्ता भारत का सबसे प्रसिद्ध नाटक है ।

कालिदास

कालिदास संस्कृत साहित्य के सर्वश्रेष्ठ कवि और नाटककार हैं । कालिदास गुप्तशासक चंद्रगुप्त-द्वितीय विक्रमादित्य के दरबार के नवरत्नों में से थे । भारतीय आलोचकों ने “उपमा कालिदासस्य” कहकर इस महाकवि के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित की है । कालिदास को स्मिथ ने ‘भारत का शेक्सपियर’ कहा है। कालिदास के ७ ग्रन्थ प्राप्त होते हैं :- ऋतुसंहार , मेघदूत , कुमारसम्भव , रघुवंश , मालविकाग्निमित्रम् , विक्रमोर्वशीयम् , अभिज्ञानशाकुंतलम् । इसमें से ऋतुसंहार और मेघदूत खंडकाव्य है । कुमारसम्भव और रघुवंश महाकाव्य है । मालविकाग्निमित्रम् , विक्रमोर्वशीयम् और अभिज्ञानशाकुंतलम् नाटक हैं ।

मालविकाग्निमित्र

यह कालिदास की प्रथम नाट्य रचना है । इसमें ५ अंक हैं । इसमें शुंगवशीय राजा अग्निमित्र तथा मालविका की प्रणय की कथा है । मालविका रानी की सेविका थी ।

विक्रमोर्वशीय

यह कालिदास का ५ अंकों का नाटक है । इसमें पुरुरवा और उर्वशी की प्रणय कथा का वर्णन है । पुरुरवा और उर्वशी आख्यान का वर्णन ऋग्वेद और शतपथ ब्राह्मण में मिलता है ।

अभिज्ञानशाकुन्तलम्

यह नाटक महाकवि कालिदास की ही नहीं अपितु भारतीय एवं विश्व साहित्य में एक गौरवपूर्ण स्थान रखती है । इसके बारे में कहा गया है की , ” काव्येषु नाटकम् रम्यं तत्र रम्या शकुन्तला ।” यह ७ अंकों का नाटक है । इसमें हस्तिनापुर के शासक दुष्यंत और कण्व ऋषि की पालिता कन्या शकुंतला के मिलन , वियोग और पुनर्मिलन की कथा का नाटकीय चित्रण है । इसका कथानक महाभारत के आदिपर्व से लिया गया है ।

इस नाटक का चतुर्थ अंक और उसमें भी ४ श्लोक जोकि विदायी से सम्बंधित हैं सर्वश्रेष्ठ माने जाते हैं :—

(१) यास्यत्यद्य शकुन्तलेति हृदयं संस्पृष्टमुत्कण्ठया,

कण्ठास्तम्भितवाष्पवृत्तिक्लुषश्चिन्ता जडं दर्शनम्।

वैक्लव्यं मम तावदीदृशमहो स्नेहादरण्यौकसः,

पीड्यन्ते गृहिणः कथं न तनया विश्लेषदुखैर्वैः॥

 

(२) पातुं न प्रथम व्यवस्यस्ति जले युष्मास्वपीतेषु या,

नादत्ते प्रियमण्डनापि भवतां स्नेहेन या पल्लवम्।

आद्य वः कुसुमप्रसूति समये यस्या भवत्युत्सवः,

सेयं याति शकुन्तला पतिगृहं सर्वेरनुज्ञायताम्॥

 

(३) उद्गलितदर्भकबला मृग्यः परित्यक्तनर्तना मयूरी।

अपसृतपाण्डुपत्रामुञ्चन्त्यश्रूणीवलताः॥

 

(४) अर्थो ही कन्या परकीय एव,

तमद्य सम्प्रेषित परिग्रहीतुः।

जाते ममायम् विशदः प्रकामं,

प्रत्यर्पितन्यास इवान्तरात्मा॥

 

अभिज्ञानशाकुन्तलम् की भारतीय और विदेशी दोनों ही आलोचकों ने मुक्तकण्ठ से प्रशंसा की है। जर्मन विद्वान गेटे लिखते हैं :—

“Wouldst thou the young year’s blossoms;

And the fruits of its decline;

And all by which the soul is charmed;

Enraptured, feasted, fed;

Wouldst thou the earth and heaven itself;

In one sole name combine;

I name thee, O Shakuntala !

And all at once is said.”

विशाखदत्त

विशाखदत्त गुप्तकाल की विभूति थे । इनके दो नाटक मिलते हैं – मुद्राराक्षस और देवीचंद्रगुप्तम् । विशाखदत्त ऐतिहासिक प्रवृत्ति के लेखक हैं । इनके नाटक वीररस प्रधान हैं । मुद्राराक्षस में चन्द्रगुप्त मौर्य के जीवन की कुछ जानकारी मिलती है जबकि देवीचंद्रगुप्तम् से गुप्तवंशी रामगुप्त के बारे में जानकारी मिलती है ।

शूद्रक

शूद्रक गुप्तकाल की विभूति थे । इनका प्रसिद्ध नाटक ‘मृच्क्षकटिक’ है । इस नाटक को सामाजिक नाटकों में प्रमुख स्थान प्राप्त है । गुप्तकालीन नाटक सुखांत होते हैं परन्तु मृच्छकटिक लीक से हटकर दुखान्त है और प्रथम बार संस्कृत में शूद्रक ने ही राजपरिवार को छोडकर समाज के माध्यम वर्ग को अपने पात्र बनाये हैं। इसका नायक चारुदत्त ब्राह्मण होकर भी व्यापारिक क्रियाकलाप करता है और इसकी नायिका वसंतसेना उज्जयिनी की एक गणिका है । इसमें लौकिक जीवन से जुड़े समस्त पात्रों का वर्णन है , यथा – राजा , ब्राह्मण , व्यापारी , वेश्या , रिश्वतखोरी , चोरी आदि ।

हर्षवर्धन

सम्राट हर्षवर्धन ( ६०६ – ६४७ ई० ) ने तीन नाटकों की रचना की है – रत्नवाली , नागानंद और प्रियदर्शिका ।

रत्नावली :- इसमें चार अंक हैं । इसमें सिंहल देश की राजकुमारी रत्नावली और वत्सराज उदयन की प्रणयकथा और अंततोगत्वा दोनों के विवाह का नाटकीय रूपांतरण है ।

नागानंद :- यह पांच अंकों का नाटक है । इसके दो भाग हैं । प्रथम भाग में विद्याधर कुमार जीमूतवाहन तथा सिद्धकन्या मलयवन्ती की प्रणय कथा है । द्वितीय भाग में जीमूतवाहन द्वारा गरुड़ से सर्पों की रक्षा के लिए आत्मत्याग का आदर्श प्रस्तुत करते हुए दिखाया गया है ।

प्रियदर्शिका :- यह चार अंकों का नाटक है । इसमें वत्सराज उदयन और महाराज दृढ़वर्मा की कन्या प्रियदर्शिका की प्रणयकथा का नाटकीय रूपांतरण है ।

प्रणय नाटकों में हर्षवर्धन का नाम सदैव अमर रहेगा । जयदेव ने हर्षवर्धन को “कविता कामिनी का हर्ष ” कहा है जबकि सोड्ढल उन्हें ” वाणी का हर्ष ” ( श्रीहर्ष ) कहते हैं । 

भवभूति

भवभूति कन्नौज शासक यशोवर्मन्/यशोवर्मा ( ७००-७४० ई० ) की राजसभा में रहते थे। भवभूति ने तीन नाटकों की रचना की थी – मालतीमधव, महावीरचरित और उत्तररामचरित।

मालतीमाधव

यह १० अंकों का नाटक है। इसमें कल्पित पात्र मालती और माधव के प्रेम का नाट्य रूपांतरण है। यह शृंगार रस प्रधान रचना है।

महावीरचरित

यह ६ अंकों का राम के जीवन पर आधृत वीररस प्रधान नाटक है। इसमें राम के राज्याभिषेक तक की घटनाओं का नाट्य रूपांतरण है।

उत्तररामचरित

यह ७ अंकों का भवभूति का सर्वश्रेष्ठ नाटक है और उनकी प्रसिद्धि का आधार भी। इस नाटक का मूल स्रोत रामायण का उत्तरकाण्ड है। परन्तु इसके कथानक में भवभूति ने परिवर्तन करके इसे सुखान्त बनाया है अर्थात् जहाँ मूल कथा में सीताजी का मिलन श्रीराम से न होकर पाताल लोक में प्रवेश होता है वहीं भवभूति अंत में दोंनों का पुनर्मिलन कराते हैं।

भवभूति करुण रस के आचार्य हैं उनके बारे में कहा गया है कि, “कारुण्यं भवभूतिरेव तुनते।” भवभूति स्वयं कहते हैं कि, “एको रस: करुण एव निमित्त भेदात्” (उत्तररामचरित)। भवभूति का शृंगार वर्णन संयमित और आदर्शवादी है न कि उच्छृंखल। वह प्रेम पर आधृत है और इसमें कामलिप्सा नहीं है। यह प्रेम जीवन पर्यंत आयु की प्रत्येक अवस्था में एकरस बना रहता है। भवभूति का प्रेम वर्णन दाम्पत्य जीवन से संबंधित है इसीलिए वह गंभीर एवं पवित्र है। पति-पत्नी के प्रेम के विषय में वो लिखते हैं, “प्रेयो मित्रं बन्धुता वा समग्रा, सर्वे कामाः शेवधिर्जीवितां वा। स्त्रीणां भर्ताधर्मदारश्च पुंसामित्यन्योन्यं वत्सयोर्ज्ञामस्तु।।” (मालतीमाधव)।

राजशेखर

राजशेखर कन्नौज के प्रतिहारवंशी शासकों महेन्द्रपाल ( ८९०-९०८ ई० ) और महीपाल ( ९१०-९४० ई० ) की राजसभा में थे। राजशेखर कवि अधिक और नाटककार कम हैं क्योंकि उनकी रचनाओं में काव्यों के गुण अधिक हैं साथ ही उनके नाटक रंगमंच की अपेक्षा पढ़ने के अधिक उपयुक्त हैं। राजशेखर शब्दकवि हैं क्योंकि भवभूति के समान उनके शब्दों में अर्थ की प्रतिध्वनि निकलती है। राजशेखर मुहावरों-लोकोक्तियों का उन्मुक्त प्रयोग करते हैं। राजशेखर की पाँच रचनायें हैं — (१) बाल रामायण, (२) बाल भारत ( प्रचंड पाण्डव ), (३) विद्धशालभञ्जिका, (४) कर्पूरमञ्जरी और (५) काव्यमीमांसा। इसमें से अंतिम अलंकारशास्त्र है और शेष चार नाटक।

बाल रामायण

इस नाटक में १० अंक हैं और यह रायायण के कथानक पर आधृत है।

बाल भारत ( प्रचंड पाण्डव )

यह २ अंकों का नाटक महाभारत के कथानक पर आधृत है।

विद्धशालभञ्जिका

यह ४ अंकों का नाटक है। इसमें राजकुमार विद्याधरमल्ल और मृगांकवती एवं कुबलयमाला नामक राजकुमारियोंके प्रेम का नाट्य रूपांतरण है।

कर्पूरमञ्जरी

यह ४ अंकीय नाटक है। प्राकृत भाषा में रचित होने के कारण इसे ‘राट्टक’ भी कहा जाता है। इसमें राजा चंद्रपाल और विदर्भ राजकुमारी कर्पूरमञ्जरी के प्रणय का नाट्य रूपांतरण है। ऐसी मान्यता है कि इस नाटक को राजशेखर ने अपनी पत्नी अवन्तिसुन्दरी के कहने पर लिखा था।

काव्यमीमांसा

यह १८ अधिकरणों में लिखा गया अलंकारशास्त्र पर विशाल ग्रंथ है परन्तु वर्तमान में इसका मात्र प्रथम अधिकरण ही मिलता है।

गद्य साहित्य

गद्य को कवियों की कसौटी कहा गया है — ‘गद्यं कवीनां निकषं वदन्ति।’ इसके सफल लेखक बाणभट्ट वास्तव में संस्कृत साहित्य में गद्य विधा के सम्राट हैं।

बाणभट्ट

बाणभट्ट सम्राट हर्षवर्धन ( ६०६-६४७ ई० ) के राजसभा में थे। इन्होंने हर्षचरित और कादम्बरी नामक दो रचनाएँ की हैं।

हर्षचरित

संस्कृत साहित्य में हर्षचरित ऐतिहासिक विषयों पर गद्यकाव्य लिखने का प्रथम सफल प्रयास था। इसमें ८ उच्छ्वास हैं। प्रथम तीन उच्छ्वासों में बाणभट्ट ने स्वयं की आत्मकथा लिखी है। शेष पाँच उच्छ्वासों में हर्षवर्धन के पूर्वजों और उनके जीवनवृत्त ( बचपन, राज्यारोहण, सैन्य अभियान आदि ) की जानकारी मिलती है। परन्तु इसकी सबसे बड़ी कमी यह है कि हर्षचरित महत्वपूर्ण विषयों पर मौन हो जाती है; जैसे – हर्ष-शशांक युद्ध, हर्ष-पुलकेशिन् युद्ध आदि।

कादम्बरी

यह संस्कृत साहित्य की गद्य विधा में लिखी गयी सर्वोत्कृष्ट रचना है। यह एक उपन्यास है। इसके दो भाग हैं— पूर्वार्ध एवं उत्तरार्ध। प्रथम भाग बाणभट्ट की रचना है जबकि द्वितीय भाग पुलिन्दभट्ट की रचना है। इसमें चन्द्रापीड और कादम्बरी की प्रणय कथा का वर्णन है।

दण्डी

दण्डी पल्लव शासक नरसिंह वर्मन् द्वितीय ( ७००-७२८ ई० ) की राजसभा में निवास करते थे। दण्डी अपने पदलालित्य के लिए प्रसिद्ध हैं — ‘दण्डिनः पद लालित्यम्”। अर्थ की स्पष्टता, पद-लालित्य, जनजीवन में प्रचलित शब्द का प्रयोग और रसों की सुन्दर अभिव्यक्ति के कारण कुछ विद्वान दण्डी को बाल्मीकि और व्यास की कोटि का कवि मानते हैं। इन्हें तीन रचनाओं का श्रेय है — काव्यादर्श, दशकुमारचरित और अवन्तिसुदरीकथा।

काव्यादर्श

यह एक शास्त्रीय रचना है जिसमें काव्यशास्त्र के नियमों का उल्लेख है। यह दण्डी का सर्वश्रेष्ठ प्रबंध है।

दशकुमारचरित

इसमें पाटलिपुत्र राजा राजहंस तथा उनके मंत्रियों के १० पुत्रों के साहसिक घटनाओं का वर्णन है। इस रचना में लौकिक जीवन से जुड़ी घटनाओं ( सत्य-असत्य, हिंसा-प्रतिहिंसा, राग-द्वेष आदि ) का यथार्थ वर्णन है।

अवन्तिसुन्दरी कथा

यह एक सौंदर्य प्रबंध है। इसमें मालव-नरेश मानसार की कन्या अवन्तिसुन्दरी की कथा का वर्णन है। यह दण्डी का प्रसिद्ध गद्यकाव्य है।

ऐतिहासिक कवि और ग्रंथ

पद्मगुप्त ‘परिमल’

पद्मगुप्त परमार शासकों वाक्पति मुञ्ज और सिन्धुराज के राजकवि थे। इनकी रचना ‘नवसाहसाड़्कचरित’ महाकाव्य का नायक सिन्धुराज है। इसमें मुञ्ज और सिंधुराज के समय की धटनाओं का वर्णन है। इसकी रचना वैदर्भी शैली में हुई है।

बिल्हण

कश्मीरी विद्वान बिल्हण प्रारम्भ में लोहारवंशी कश्मीरी शासक अनन्त ( १०२८ – १०६३ ई० ) की राजसभा में थे परन्तु बाद में वो कल्याणी के उत्तरकालीन पश्चिमी चालुक्यवंशी शासक विक्रमादित्य षष्ठ ( १०७६-११२६ ई० ) के राजसभा में चले गये थे। इन्होंने ‘विक्रमांकदेवचरित’ नामक महाकाव्य की रचना की और यह अपने आश्रयदाता विक्रमादित्य षष्ठ को समर्पित किया है।

कल्हण

कल्हण ने ‘राजतरंगिणी’ की रचना की, जोकि कश्मीर के लोहारवंश के अंतिम शासक जयसिंह ( ११२७ – ११५९ ई० ) के शासनकाल में पूर्ण हुई। इससे विशेषकर कश्मीर और गौणतः उत्तरी भारत के इतिहास की जानकारी मिलती है।

इसमें ८ तरंग और ८,००० श्लोक हैं। इसकी रचना महाभारत की शैली पर की गयी है। इसके प्रथम तीन तरंगों में कश्मीर का प्राचीन इतिहास है। चौथे, पाँचवें और छठें तरंग में कार्कोट और उत्पल वंश का इतिहास वर्णित है। बाद के सातवें एवं आठवें तरंग में लोहार वंश का इतिहास वर्णित है। चौथे से आठवें तरंगों का वर्णन अपेक्षाकृत प्रामाणिक माना जाता है।

संस्कृत साहित्य में राजतरंगिणी को भारत की पहली वास्तविक ऐतिहासिक रचना मानी जाती है। इसमें लेखक ने घटनाओं का तिथि-क्रमानुसार वर्णन किया है। कल्हण यथासम्भव पुरातात्विक साक्ष्यों का प्रयोग भी करते हैं। कल्हण के विवरण में निष्पक्षता और यथार्थता है। वह शासकों के गुणावगुणों और राजकर्मचारियों में व्याप्त भ्रष्टाचार की स्पष्टता से उल्लेख करते हैं। कल्हण स्वयं कहते हैं कि —

“शलाघ्यः स एव गुणवान रागद्वेष वहिष्कृता।

भूतार्थकथने यस्य स्थेयस्मेव सरस्वती॥”

राजतरंगिणी को आगे बढ़ाने का कार्य जौनाराय और श्रीधर ने किया और जैन-उल-आबदीन ( १४२० – १४७० ई० ) के समय इसे ‘द्वितीय-राजतरंगिणी’ के नाम से लिखा गया। जैन-उल-आबिदीन को कश्मीर का अकबर भी कहा जाता है। प्राग्भट्ट ने इस कार्य को ‘तृतीय-राजतरंगिणी’ नाम से बढ़ाया ।

हेमचन्द्र

हेमचन्द्र गुजरात के चौलुक्य/सोलंकी वंशी शासकों जयसिंह सिद्धराज ( १०९४ – ११४३ ई० ) एवं कुमारपाल ( ११४३ – ११७२ ई० ) के राजसभा में थे। कुमारपाल ने हेमचन्द्र के प्रभाव में जैन धर्म अपना लिया था, यद्यपि इनके सभी लेखों में शिवजी स्तुति की गयी है। हेमचन्द्र ने ‘कुमारपालचरित’ की रचना की, इसे द्वयाश्रयकाव्य भी कहा जाता है।

अन्य प्रमुख ऐतिहासिक ग्रंथ

  • हम्मीरकाव्य — नयचन्द्र सूरि
  • पृथ्वीराजविजय — जयानक
  • गौडवहो — वाक्पतिराज
  • रामपालचरित — संध्याकर नन्दी

कथा साहित्य

गुणाढ्य

गुणाढ्य सातवाहन नरेश हाल ( प्रथम – द्वितीय शती ) के राजसभा में कवि थे। इन्होंने ‘बृहत्कथा’ पैशाची-प्राकृत भाषा में लिखी है। यह रचना वर्तमान में अपने मूलरूप में अप्राप्य है। इसके विषय में धनपाल, सोड्ढल, दण्डी आदि से जानकारी मिलती है। कालांतर में अनेक विद्वानों ने बृहत्कथा से सामग्री लेकर रचनाएँ की हैं; जैसे — विशाखदत्त, भास, हर्षवर्द्धन, बाण, दण्डी आदि। दण्डी का दशकुमारचरित स्पष्टतः बृहत्कथा पर आधृत है। धनंजय ने अपने दशरूपक में बृहत्कथा को एक उपजीव्य मानते हुए इसे रामायण की कोटि में रखा है। क्षेमेन्द्र और सोमदेव ने बृहत्कथा का संस्कृत भाषा में अनुवाद किया जिनके नाम क्रमशः बृहत्कथामञ्जरी और कथासरित्सागर है।

क्षेमेन्द्र

क्षेमेन्द्र कश्मीरी विद्वान थे और वह लोहारवंशी नरेश अनन्त( १०२८ – १०६३ ई० ) की राजसभा में रहते थे। क्षेमेन्द्र कृत ‘बृहत्कथामञ्जरी’, बृहत्कथा का अनुवाद है यद्यपि इसके मूलकथा में कुछ अन्य कथाओं का भी समावेश किया गया है। इसमें १६ लम्बक ( सर्ग ) और ७,५०० श्लोक हैं। क्षेमेन्द्र ने हास्य और व्यंग्य शैली में पाखण्डियों की खिल्ली उड़ाई है और सामान्य जन-जीवन को नैतिकता का उपदेश भी देती है अतः यह एक उपदेशात्मक कार्य भी करती है।

सोमदेव

सोमदेव ने ‘कथासरित्सागर’ की रचना की है। यह रचना गुणाढ्य के बृहत्कथा का सर्वाधिक लोकप्रिय अनुवाद है। यह रचना कश्मीर नरेश अनन्त ( १०२८ – १०६३ ई० ) की रानी सूर्यमती के मनोरंजन के लिए की थी।

कथासरित्सागर में १८ लम्बक ( सर्ग ) और २१,६८८ श्लोक हैं। इसमें सामाजिक जीवन के विविध पहलुओं सम्यक् वर्णन किया है; यथा — समाज के निकृष्ट पात्रों का चित्रण ( जुआरी, चोर, धूर्त, लम्पट, ठग, रंगीले भिक्षु आदि ), स्त्रियों की पतनोन्मुख सामाजिक स्थिति का विवरण आदि। इसमें जीव-जन्तुओं और पृथ्वी-रचना सम्बंधी अनेक प्राचीन आख्यान भी मिलते हैं।

इस तरह कथासरित्सागर तत्कालीन सामाजिक जीवन के दर्पण जैसा है। कथासरित्सागर का व्यापक प्रभाव पाश्चात्य कथाओं पर पड़ा है। सोमदेव ने स्थान-स्थान पर नीति-विषयक उपदेशों की भरमार है; जैसे —

(१) कन्दुको भित्ति निःक्षिप्त इव प्रतिफलम् मुहुः।

आपातत्यात्मनि प्रायो दोषोऽन्यस्य चिकीर्षितः॥

(२) विद्येव कन्यका मोहादपात्रे प्रतिपादिता।

यशसे न न धर्माय जायेतानुशयाय यु॥

विष्णु शर्मा

पञ्चतन्त्र गुप्तकालीन विभूति विष्णु शर्मा की रचना है। यह एक कथा संग्रह है। इसकी रचना अमरकीर्ति नामक राजा के मूर्ख पुत्रों को शिक्षित करके विद्वान बनाने के उद्देश्य से की गयी थी। इस कार्य में विष्णु शर्मा सफल रहे।

इसकी कहानियाँ सदाचार एवं नीति विषयक हैं। इसका कथानक गद्य में जबकि उपदेशपरक सूक्तियाँ पद्य में हैं। इसके पद्यात्मक भाग रामायण, महाभारत एवं प्राचीन नीति ग्रंथों से लिये गये हैं।

पञ्चतन्त्र में पाँच तन्त्र ( भाग ) हैं —

  • मित्रभेद,
  • मित्रलाभ,
  • सन्धि-विग्रह,
  • लब्ध-प्रमाण और
  • अपरिक्षित कारक।

प्रत्येक तन्त्र ( भाग ) में एक मुख्य कथा है और उसकी पुष्टि के लिए कई अवान्तर कथायें हैं।

पञ्चतन्त्र के ४ संस्करण मिलते हैं —

  • पह्लवी संस्करण, अनुपलब्ध है, किन्तु इसकी जानकारी सीरियाई और अरबी अनुवादों से मिलती है।
  • गुणढ्य की बृहत्कथा में संकलित संस्करण।
  • तन्त्राख्यायिका और उससे जुड़े जैन आख्यान।
  • दक्षिणी पञ्चतन्त्र जिसके प्रतिनिधि नेपाली पञ्चतन्त्र और हितोपदेश है।

पञ्चतन्त्र की लोकप्रियता के कारण इसका ५० से अधिक भाषाओं में अनुवाद किया जा चुका है। बाइबिल के बाद यह दूसरी पुस्तक है जिसका सर्वाधिक अनुवाद हुआ है।

नारायण भट्ट

इनकी रचना का नाम ‘हितोपदेश’ है। यह संस्कृत साहित्य में पञ्चतन्त्र के बाद द्वितीय प्रसिद्ध कथा संग्रह है। इसकी रचना भी पञ्चतन्त्र शैली में की गयी है। हितोपदेश का मुख्य उद्देश्य बालकों को लोककथाओं के माध्यम से नीतिपरक शिक्षा देना था।

इसमें ६७९ नैतिक श्लोक हैं जिसे महाभारत, धर्मशास्त्र, पुरण चाणक्य-नीति आदि से लिया गया है। हितोपदेश को संस्कृत शिक्षण का पहला ग्रंथ माना जाता है। इसका कई यूरोपीय भाषाओं में अनुवाद हो चुका है। इसके रचनाकाल को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं है फिरभी इसके रचनाकाल को ११वीं से १४वीं शताब्दी में मध्य रखा जा सकता है। हितोपदेश के ४ भाग हैं —

  • मित्रलाभ,
  • मित्रभेद,
  • विग्रह और
  • सन्धि।

अन्य कथा संग्रह

  • बैताल पञ्चविंशतिका
  • शुकसप्तति
  • सिंहासन-द्वात्रिंशिका

शब्दकोश

अमरसिंह

गुप्तकालीन विभूति अमरसिंह ने ‘अमरकोश’ की रचना की। अमरसिंह गुप्तनरेश चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य द्वितीय ( ३७५ – ४१५ ई० ) के नवरत्नों में से एक थे। यह संस्कृत साहित्य का सबसे बड़ा कोश है। इसे विश्वकोश कहा जाता है। इसकी रचना अत्यन्त वैज्ञानिक ढंग से हुई है। इसकी प्रमाणिकता ( वर्तमान में भी ) के कारण इसपर कई टीकाएँ प्रकाशित हो चुकी हैं। इसकी टीकाओं में ‘क्षीरस्वामी भट्ट’ ( १०५० ई० ) की टीका सर्वाधिक लोकप्रिय है।

 

प्राचीन भारतीय साहित्य

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