श्रावस्ती ( सहेत-महेत)

भूमिका

श्रावस्ती कोसल महाजनपद की राजधानी थी। बौद्ध ग्रंथ ‘महपरिनिर्वाणसूत्र’ के अनुसार यह छठीं शताब्दी ई०पू० की प्रसिद्ध छः महानगरों में से एक थी। श्रावस्ती की पहचान उत्तर प्रदेश के श्रावस्ती जनपद के ‘सहेत-महेत’ से की गयी है। यहाँ पर इसके ध्वंसावशेष प्राप्त होते हैं। श्रावस्ती राप्ती नदी ( अचिरावती नदी ) के दायें तट पर बसी हुई थी। उत्तर प्रदेश के इस स्थल की पहचान विश्व के कोने-कोने में आज बौद्ध तीर्थ स्थल के रूप में है।

श्रावस्ती ( सहेत-महेत ) की भौगोलिक स्थिति

श्रावस्ती हिमालय की तलहटी में स्थित है। यह वर्तमान भारत-नेपाल सीमा के पास है। वर्तमान में श्रावस्ती एक जनपद के रूप में संगठित है जिसकी अंतरराष्ट्रीय सीमा उत्तर में नेपाल देश से मिलती है। जनपदीय सीमा पश्चिम, दक्षिण और पूर्व में क्रमशः बहराइच, गोण्डा और बलरामपुर जनपदों से मिलती है।

सहेत-महेत पहुँचने के लिये निम्न स्थानों से दूरी मोटेतौर पर इस प्रकार है –

  • उत्तर प्रदेश के बहराइच जनपद मुख्यालय से महज ४० किलोमीटर।
  • वर्तमान श्रावस्ती जनपद के मुख्यालय भिनगा से प्राचीन श्रावस्ती ५५ किमीमीटर।
  • बलरामपुर जनपद मुख्यालय से १८ किलोमीटर।
  • गोण्डा जनपद मुख्यालय से ५० किलोमीटर की दूरी पर यह स्थित है।
श्रावस्ती ( सहेत-महेत )
श्रावस्ती ( सहेत-महेत )

श्रावस्ती का नामकरण

श्रावस्ती के नाम के विषय मे कई मत मिलते हैं।

  • बौद्ध ग्रंथो के अनुसार ‘अवत्थ’ श्रावस्ती नामक एक ऋषि यहाँ रहते थे, जिनके नाम के आधार पर इस नगर का नाम श्रावस्ती पड़ गया था।
  • महाभारत के अनुसार श्रावस्ती नाम ‘श्रावस्त’ या ‘श्रावस्थ’ नाम के एक राजा के नाम पड़ गया। ब्राह्मण साहित्य, महाकाव्यों एवं पुराणों के अनुसार श्रावस्त का नामकरण ‘श्रावस्त’ या ‘श्रावास्तक’ के नाम के आधार पर हुआ था। श्रावस्तक युवनाय के पुत्र थे और पृथु की छठी पीढ़ी में उत्पन्न हुए थे। वही इस नगर के जन्मदाता थे और उन्हीं के नाम पर इसका नाम श्रावस्ती पड़ गया।
  • महाकाव्यों एवं पुराणों में श्रावस्ती को राम के पुत्र लव की राजधानी बताया गया है।
  • जैन साहित्य मे इसके लिये चंद्रपुरी तथा चंद्रिकापुरी नाम भी मिलते है। साथ ही जैन धर्म में इसके लिये सावत्थि अथवा सावत्थीपुर के प्रचुर उल्लेख मिलते है।
  • कालिदास कृत ‘रघुवंश’ में श्रावस्ती के लिये ‘शरावती’ नाम का प्रयोग मिलता है और भागवान राम के पुत्र लव की राजधानी बताया गया है।
  • इसे पुराने समय में कुणाल नगरी नाम से भी पुकारा जाता था ( श्रावस्ती जनपद वेबसाइट पर उल्लिखित )।

विभिन्न धर्मों से सम्बन्ध

श्रावस्ती का सम्बन्ध हिन्दू, जैन और बौद्ध धर्म के साथ-साथ आजीवक सम्प्रदाय से था। इसका विवरण सम्बन्धित धार्मिक साहित्यों में भी मिलते हैं :

हिन्दू साहित्यों की दृष्टि से श्रावस्ती

वाल्मीकि कृत रामायण के उत्तरकाण्ड (१०७/१७) में वर्णन है कि भगवान श्रीरामचन्द्रजी ने कोसल राज्य को दो भागों में विभाजित किया – एक, उत्तर-कोसल और दूसरा, दक्षिण-कोसल। उन्होंने अपने पुत्र कुश को दक्षिण-कोसल का राजा बनाया और लव को उत्तर-कोसल का राजा बनाया था : ‘कोसलेषुकुशं वीरमुतरेषु तथा लवम्, अभिषिच्य महात्मानावुभौरामः कुशीलवौ’।

रामायण के उत्तरकाण्ड (१०८/५) के अनुसार लव की राजधानी श्रावस्ती में थी : ‘श्रावस्तीति पुरीरम्या श्राविता च लवस्यह अयोध्यां विजना कृत्वा राघवोभरतस्तथा’ अर्थात् मधुपुरी में शत्रुघ्न को सूचना मिली लव के लिये श्रावस्ती नामक नगरी राम ने बसायी है और अयोध्या को जनहीन करके (उन्होंने स्वर्ग जाने का विचार किया है)।

इस वर्णन से प्रतीत होता है कि श्रीराम के स्वर्गारोहण के पश्चात् अयोध्या उजड़ गयी थी और कोसल की नयी राजधानी श्रावस्ती में बनायी गयी थी।

श्रावस्ती की स्थापना पुराणों के अनुसार, श्रवस्त नाम के सूर्यवंशी राजा ने की थी।*

  • दे० ‘युग-युग में उत्तर प्रदेश’ पृ० ४०*

कालिदास कृत रघुवंश (१५/९७) में लव को शरावती नामक नगरी का राजा बनाये जाने का विवरण मिलता है : ‘स निवेश्यकुशावत्यां रिपुनागांकुशं कुशम् शरावत्यां सतांसूक्तैर्जनिताश्रुलवंलवम्’। कालिदास द्वारा उल्लिखित शरावती का समीकरण श्रावस्ती से किया गया है, क्योंकि विद्वानों के अनुसार यहाँ केवल उच्चारण-भेद है।

इन विवरणों से ज्ञात होता है कि लव ने यहाँ कोसल की नई राजधानी बनायी और श्रावस्ती धीरे-धीरे उत्तर कोसल की वैभवशाली नगरी बन गयी।

बौद्धकाल में श्रावस्ती के पश्चात् अयोध्या का उपनगर साकेत, कोसल का दूसरा प्रमुख स्थान था।

बौद्ध धर्म की दृष्टि से श्रावस्ती

श्रावस्ती से भगवान बुद्ध के जीवन और कार्यों का विशेष सम्बम्ध था। उल्लेखनीय है की बुद्ध ने अपने जीवन के सर्वाधिक वर्षाकाल में निवास श्रावस्ती में ही व्ययतीत किये थे। भगवान बुद्ध के प्रथम निकायो के ८७१ सुत्तों का उपदेश श्रावस्ती में दिया था, जिसमें ८४४ जेतवन मे, २३ पुब्बाराम मे और ४ श्रावस्ती के आस-पास के अन्य स्थानो पर उपदेशित किये गये।

बुद्धकाल में यहाँ के प्रसिद्ध शासक प्रसेनजित थे। प्रसेनजित भगवान बुद्ध के समान आयु के थे। प्रसेनजित ने सपरिवार गौतम बुद्ध की शिष्यता ग्रहण की थी। उन्होंने संघ के लिये पुब्बाराम ( पूर्वाराम ) विहार दान किया। भगवान बुद्ध बारी-बारी से पूर्वाराम और जेतवन विहार में विश्राम करते थे।

बौद्ध साहित्य में श्रावस्ती की समृद्धि एवं वैभव का उल्लेख मिलता है। इसकी गणना भारत के प्रमुख नगरों में की गयी है जहाँ धनाढ्य ब्राह्मण, क्षत्रिय एवं वैश्य निवास करते थे। श्रावस्ती नगरी बौद्ध धर्म का केन्द्र थी। भगवान बुद्ध को यह नगरी बहुत प्रिय थी। यहाँ पर उन्होंने सर्वाधिक २१ वर्षावास किये। प्रसिद्ध व्यापारी ‘अनाथपिण्डक’ ( सुदत्त ) श्रावस्ती के ही थे जिन्होंने भगवान बुद्ध की शिष्यता ग्रहण की और जेतवन विहार संघ को दान किया था। भरहुत से मिले एक कलाकृति के ऊपर इस दान का विवरण सुरक्षित है — ‘जेतवन अनाथपिण्डकों देति कोटिसम्थतेनकेता’।

श्रावस्ती में तीन प्रसिद्ध विहार थे जिनके नाम इस प्रकार हैं :

  • जेतवन।
  • पूर्वाराम।
  • मल्लिकाराम।

जेतवन विहार : जेतवन विहार अन्य दो विहारों की अपेक्षा अधिक प्रसिद्ध था। जेतवन एक उद्यान था जिसे राजकुमार जेत ने आरोपित करवाया था इसीलिये इसका नाम ‘जेतवन’ पड़ा। श्रावस्ती के व्यापारी (श्रेष्ठि) अनाथपिण्डक ने इसे १८ करोड़ स्वर्ण मुद्राओं में खरीदकर बौद्ध संघ को दान किया तथा यहाँ एक विहार निर्मित करवाया। बौद्ध अनुश्रुतियों के अनुसार सुदत्त ने जेतवन को स्वर्ण मुद्रओं को बिछाकर क्रय किया था। यह महात्मा बुद्ध का प्रिय निवास स्थल था। वे यहीं ठहरते तथा प्रवचन देते थे।

राजकुमार जेत ने इन स्वर्ण मुद्राओं को प्राप्त कर इस धन से श्रावस्ती में सात तलों का एक प्रासाद बनवाया था जो चंदन, छत्र और तोरणों से सुसज्जित था। इसमें चारों ओर फूल ही फूल बिखरे रहते थे और इतना अधिक प्रकाश किया जाता था कि रात भी दिन के समान ही प्रतीत होती थी। फाह्यान लिखता है कि एक दिन एक मुषक एक दीपक की बत्ती को उठा कर इधर-उधर दौड़ने लगा जिससे इस महल में आग लग गयी और यह सत-मंजिला भवन जलकर राख हो गया। बौद्धों के विश्वास के अनुसार इस दुर्घटना का कारण वास्तव में जेत की लालची मनोवृत्ति ही थी जिसके वशीभूत होकर उसने बुद्ध के निवास स्थान के लिये भूमि देने में आनाकानी की थी और उसके लिये इतना अधिक धन माँगा था।

सहेत-महेत के दक्षिण-पश्चिम की ओर जेतवन-विहार से आधा मील दूर सोमनाथ नाम का एक ऊँचा ढूह ( स्तूप ) है। जेतवन से एक मील दक्षिण-पूर्व में एक दूसरा टीला है जिसे ओराझार कहा जाता है। यह वही स्थान है। जहाँ मिगार श्रेष्ठी की पुत्रवधू विशाखा ने अपार धन-राशि व्यय करके पूर्वाराम विहार बनवाया था।

पूर्वाराम विहार : इसका निर्माण नगर श्रेष्ठि मिगार की पुत्रवधू विशाखा ने करवाया था। यह दुमंजिला भवन था जिसमें ५०६ कमरे बने थे।

मल्लिकाराम विहार : इसका निर्माण मल्लिका नामक साम्राज्ञी द्वारा करवाया गया था। इसमें भी कई कमरे थे।

श्रावस्ती में रहते हुए ही गौतम बुद्ध ने ‘अंगुलिमाल’ नामक डाकू को अपने मत में दीक्षित किया था। इस डाकू का नाम अंगुलिमाल इसलिये पड़ा था क्योंकि वह व्यक्ति की हत्या करता और उनकी अंगुलियों को काटकर माला के रूप में पहन लेता था।

बौद्ध धर्म का सर्वाधिक प्रचार-प्रसार श्रावस्ती में ही हुआ। कोसल महाजनपद में बौद्ध धर्म के सर्वाधिक अनुयायी हो गये थे। दिव्यावदान से पता चलता है कि यहाँ चार पवित्र स्तूप थे।

जैन धर्म की दृष्टि में श्रावस्ती

श्रावस्ती में जैन मतावलंबी भी रहते थे। इसका सम्बन्ध कई जैन तीर्थंकरों से है :

  • तीसरे तीर्थंकर सम्भवनाथ का जन्म श्रावस्ती में हुआ था। इनको कैवल्य की प्राप्ति भी श्रावस्ती में हुई थी।
  • छठवें तीर्थंकर पद्मप्रभु का सम्बन्ध इसी स्थान से बताया गया है।
  • आठवें तीर्थंकर चन्द्रप्रभु की जन्मस्थली श्रावस्ती को ही माना गया है और इन्हीं के नाम पर श्रावस्ती को चन्द्रपुरी या चन्द्रिकापुरी भी कहा जाता है।
  • २४वें तीर्थंकर महावीर स्वामी स्वयं यहाँ कई बार आये थे। उन्होंने एक बार वर्षाकाल यहाँ व्यतीत किया था और अनेक प्रकार की तपस्याएँ की थीं।

बौद्ध मतावलंबीयो की भाँति जैन धर्मानुयायी भी इस नगर को प्रमुख धार्मिक स्थान मानते थे। इस नगर में कई जैन मंदिर और स्तूप (स्तंभ) मौजूद थे। जैन ग्रंथ ‘विविधतीर्थकल्प’ में श्रावस्ती का जैन तीर्थ के रूप में वर्णन किया गया है। श्री सम्भवनाथ की मूर्ति से विभूषित एक चैत्य यहाँ था जिसके द्वार पर एक रक्ताशोक दिखायी देता था।

जैन साहित्य में श्रावस्ती को चंद्रपुरी और चंद्रिकापुरी भी कहा गया है क्योंकि इसे तीर्थंकर चंद्रप्रभानाथ की जन्मभूमि माना गया है।

जैन धर्म में सावत्थि अथवा सावत्थीपुर के प्रचुर उल्लेख मिलते है। जैन धर्म भगवतीसूत्र के अनुसार श्रावस्ती नगर आर्थिक क्षेत्र में भौतिक समृधि के चर्मोत्कर्ष पर थी। यहाँ के व्यापारियों में शंख और मकखली मुख्य थे, जिन्होने नागरिकों के भौतिक समृद्धि के विकास मे महत्त्वपूर्णयोगदान दिया था।

महाराज जितशत्रु का पुत्र मद्र भी यहाँ आकर साधु हो गया था और तत्पश्चात् उसे परम ज्ञान प्राप्त हुआ था।

जैन वाङ्मय श्रावस्ती तीर्थ का इतिहास युगादिदेव श्री आदिश्वर प्रभु द्वारा जनपद के गठन से प्रारम्भ करते हैं। यह स्थान उत्तर कोशल जनपद की राजधानी जिसका वर्णन हमें जैन, बौद्ध व संस्कृति ग्रंथों में भी मिलता है। कई जैन राजा जैसे राजा जितारी, तीसरे तीर्थंकर श्री संभवनाथ भगवान के पिता और अन्य लोग भगवान आदिनाथ के बाद यहाँ से सम्बन्धित रहे।

भगवान महावीर के समय यहाँ राजा प्रसेनजित का शासन था। उन्हें प्रभु महावीर के निष्ठावान अनुयायी बताया गया है। यह आश्चर्य की बात नहीं है कि बौद्ध हो या जैन दोनों तत्कालीन राजाओं को अपना-अपना-अपना अनुयायी बताते हैं और यह बात मगध शासक हो या लिच्छवि गण प्रमुख अथवा कोसल नरेश सभी के बारे में मिलती है।

भारतवर्ष में एक बात तो स्पष्ट है कि शासक कोई भी हो वे सभी धर्मों का सम्मान करते थे। यह बात मात्र साहित्यों से ही नहीं ज्ञात होता वरन् अभिलेखों से भी प्रमाणित है। उदाहरणार्थ अशोक के अभिलेखों को हम देख सकते हैं जिसमें वे ब्राह्मण, निर्ग्रंथों, आजीवकों व बौद्धों का उल्लेख करते हैं। यहाँ तक कि वे आजीवकों के लिये गुहा दान भी करते हैं। अतः यह भ्रम होना कि अमुक राजा हमारे धर्म का अनुयायी है अपेक्षित ही है। इसीलिये बौद्ध और जैन दोनों तत्कालीन शासकों को अपना-अपना अनुयायी बताते हैं।

जैन जनश्रुति से तथा सहेत-महेत के खंडहरों के अवशेषों से विदित होता है कि श्रावस्ती में जैनों का पर्याप्त समय तक प्रभाव रहा था। यहाँ कई प्राचीन जैन मंदिरों के खंडहर मिले हैं।

कल्पसूत्र’ के एक उल्लेख से सूचित होता है कि अंतिम तीर्थंकर महावीर स्वामी ने मख्खलिपुत्र गोसाल से सम्बन्ध विच्छेद होने के बाद सर्वप्रथम श्रावस्ती में ही भेंट की थी।

आजीवक सम्प्रदाय से सम्बन्ध

जैन ग्रंथ ‘उपासकदशा’ में श्रावस्ती की शरवन नामक बस्ती या सन्निवेश का उल्लेख है जहाँ आजीवक सम्प्रदाय के मुख्य उपदेष्टा मख्खलिपुत्र गोसाल का जन्म हुआ था।

जैन श्रोतों से पता चलता है कि कालांतर में श्रावस्ती आजीवक संप्रदाय के एक प्रमुख केंद्र बन गया। आजीवक सम्प्रदाय के संस्थापक मक्खलिपुत्त गोशाल थे। पहले ये स्वामी महावीर थे परन्तु उनसे मतभेद हो जाने पर आजीवक सम्प्रदाय की स्पापना की। उन्होंने श्रावस्ती को अपना केन्द्र बनाया। इनकी शिक्षा का मूल आधार नियतिवाद ( भाग्यवाद ) था। यद्यपि ये घोर तप और संन्यास में विश्वास करते थे।

व्यापारिक केन्द्र के रूप में

बौद्ध ग्रंथों के अनुसार श्रावस्ती में ५७,००० कुल रहते थे और कोसल नरेशों की आमदनी सबसे ज्यादा इसी नगर से हुआ करती थी। यह चौड़ी गहरी खाईं से घिरा हुआ था। इसके अतिरिक्त इसके इर्द-गिर्द एक सुरक्षा दीवार थी, जिसमें हर दिशा में प्रवेश द्वार बाने हुए थे। हमारी प्राचीन कलाओं में श्रावस्ती के दरवाजों का अंकन हुआ है। चीनी यात्रियों फाह्यान और हवेनसांग ने भी श्रावस्ती के दरवाजों का उल्लेख किया है।

यहाँ मनुष्यों के उपयोग की सभी वस्तुएँ सुलभ थी इसलिये इसे सावत्थी कहा जाता है। श्रावस्ती की भौतिक समृद्धि का प्रमुख कारण यह था कि यहाँ पर तीन प्रमुख व्यापारिक मार्ग मिलते थे जिससे यह व्यापार का प्रमुख केंद्र बन गया था। बौद्ध साहित्य जहाँ क ओर सुदत्त ( अनाथपिण्डक ) नामक व्यापारी का विवरण देते हैं वहीं जैन ग्रंथों में शंख और मकखली नामक व्यापारियों का विवरण मिलता है।

फाह्यान व युवानच्वांग का विवरण

चीनी यात्री फाह्यान और युवानच्वांग ने श्रावस्ती का विस्तृत वर्णन किया है।

फाह्यान के समय ( ५वीं शती का पूर्वार्ध) में श्रावस्ती उजाड़ हो चली थी और यहाँ केवल दो सौ कुटुंब निवास करते थे। फाह्यान लिखते हैं कि यहाँ बुद्ध के समय प्रसेनजित् का राज्य था और तथागत से सम्बन्धित स्मारक अनेक स्थलों पर बने हुए थे। उसने सुदत्त के विहार का भी वर्णन किया है और इसके मुख्य द्वार के दोनों ओर दो स्तंभों की स्थिति बतायी है जो संभवतः अशोक के बनवाये हुए थे। इनके शीर्ष पर वृषभ तथा चक्र की प्रतिमाएँ जटित थीं। फाह्यान को देखकर और उसे चीन से आया जान श्रावस्ती के निवासी विस्मित हुए थे क्योंकि उससे पहले उनके नगर में चीन से कभी कोई नहीं आया था। फाह्यान ने श्रावस्ती में ९८ विहार देखे थे।

युवानच्वांग के समय ( ७वीं शती के पूर्वार्ध ) में तो यह नगरी सर्वथा ही खंडहरों के रूप में परिणत हो गयी थी और उसने केवल एक ही बौद्ध विहार को यहाँ स्थित पाया था। वास्तव में गुप्तकाल में उत्तर-पूर्व भारत के बौद्ध धर्म के सभी प्राचीन केंद्र अव्यवस्थित तथा उजाड़ हो गये थे।

श्रावस्ती का इतिहास

गौतम बुद्ध के पूर्व ही कंस नामक राजा ने काशी राज्य को विजित किया था। जातक ग्रंथों में कंस को ‘बारानसिग्गहो’ अर्थात् बनारस पर अधिकार करने वाला कहा गया है।

कंस का पुत्र तथा उत्तराधिकारी ‘महाकोशल’ हुए। उसके समय में कोशल का काशी महाजनपद पर पूर्ण अधिकार हो गया। काशी के मिल जाने से कोशल का प्रभाव अत्यधिक बढ़ गया।

काशी व्यापार और वस्त्रोद्योग का एक महत्त्वपूर्ण केन्द्र था। तक्षशिला, सौवीर तथा अन्य दूरवर्ती स्थानों के साथ काशी का व्यापारिक सम्बन्ध था। इस राज्य के मिल जाने से कोशल की राजनैतिक तथा आर्थिक समृद्धि बढ़ गयी थी।

काशी को लेकर मगध और कोसल में एक लम्बा संघर्ष चला। गौतम बुद्ध के समय कोशल के शासक प्रसेनजित थे और उनकी आयु भी समान थी। वे ( प्रसेनजित ) महाकोशल के पुत्र थे। उसने मगध को संतुष्ट करने के लिये अपनी सहोदरा महाकोशला अथवा कोशलादेवी का विवाह मगध नरेश बिम्बिसार के साथ कर दिया तथा दहेज के रूप में काशी अथवा उसके कुछ ग्राम दिये। अतः बिम्बिसार के समय तक इन दोनों राज्यों में मैत्री सम्बन्ध कायम रहा।

परन्तु बिम्बिसार के पुत्र अजातशत्रु के समय में कोशल और मगध में पुनः संघर्ष छिड़ गया। ‘संयुक्त निकाय’ में प्रसेनजित तथा अजातशत्रु के इस संघर्ष का विवरण मिलता है। ज्ञात होता है कि प्रथम युद्ध में अजातशत्रु ने प्रसेनजित को परास्त किया तथा उसने भाग कर श्रावस्ती में शरण ली। परन्तु दूसरी बार अजातशत्रु पराजित हुआ और बन्दी बना लिया गया। कालान्तर में प्रसेनजित ने मगध से संधि कर लेना ही श्रेयस्कर समझा और उसने अपनी दुहिता ‘वाजिरा’ का विवाह अजातशत्रु से कर दिया। काशी के ग्राम जिसे प्रसेनजित ने बिम्बिसार को मृत्यु के पश्चात् वापस ले लिये थे पुनः अजातशत्रु को लौटा दिये।

प्रसेनजित के समय में कोशल का राज्य अपने उत्कर्ष पर था। काशी के अतिरिक्त कपिलवस्तु के शाक्य, केसपुत्त के कालाम, पावा और कुशीनारा के मल्ल, रामगाम के कोलिय, पिप्पलिवन के मोरिय आदि गणराज्यों पर भी कोशल का अधिकार था। बौद्ध ग्रन्थ संयुक्त निकाय के अनुसार वह पाँच राजाओं के एक गुट का नेतृत्व करता था।

प्रसेनजित के पुत्र तथा उत्तराधिकारी विड्डूभ हुए। संयुक्त निकाय के अनुसार प्रसेनजित के मंत्री दीघचारन ने विड्डूभ के साथ मिलकर कोशल नरेश के विरुद्ध षड्यन्त्र किया। विड्डूभ ने अपने पिता की अनुपस्थिति में राजसत्ता पर अधिकार कर लिया। प्रसेनजित ने भागकर मगध राज्य में शरण ली। परन्तु राजगृह नगर के समीप पहुँचने पर थकान से प्रसेनजित की मृत्यु हो गयी।

विड्डूभ ने कपिलवस्तु के शाक्यों पर आक्रमण किया था। इस आक्रमण का कारण बौद्ध साहित्य में यह बताया गया है कि कोशल नरेश प्रसेनजित महात्मा बुद्ध के कुल में सम्बन्ध स्थापित करने को काफी उत्सुक था। इस उद्देश्य से उसने शाक्यों से यह माँग की कि वे अपने कुल की एक कन्या का विवाह उसके साथ कर दें। शाक्यों को यह प्रस्ताव अपने वंश की मर्यादा के प्रतिकूल लगा। परन्तु वे कोशल नरेश को रुष्ट भी नहीं करना चाहते थे। अतः उन्होंने छल से ‘वासभखत्तिया’ नामक एक दासी की पुत्री को प्रसेनजित के पास राजकुमारी बनाकर भेज दिया। प्रसेनजित ने उससे विवाह कर लिया। विदूडभ उसी दासी ‘वासभखत्तिया’ से उत्पन्न प्रसेनजित का पुत्र था।

जब विड्डूभ को इस छल का पता लगा तब वह बड़ा कुपित हुआ तथा शाक्यों से बदला लेने का निश्चय किया। यह भी कहा जाता है कि एक बार वह स्वयं शाक्य राज्य में गया था तो शाक्यों ने ‘दासी पुत्र’ कहकर उसका अपमान किया था। इसी अपमान का बदला लेने के लिये राजा बनते ही उसने शाक्यों पर आक्रमण कर दिया।

इस आक्रमण में शाक्यों की पराजय हुई तथा नगर के पुरुषों, स्त्रियों और बच्चों का भीषण संहार किया गया। उनमें से अनेक ने भागकर अपने-अपने प्राणों की रक्षा की। परन्तु विड्डूभ को अपने दुष्कृत्यों का यथोचित फल मिला। शाक्यों के संहार के बाद जब वह अपनी पूरी सेना के साथ वापस लौट रहा था तो अचिरावती (राप्ती) नदी की बाढ़ में अपनी पूरी सेना के साथ नष्ट हो गया। रिज डेविड्स ने इस कथा की प्रामाणिकता को स्वीकार किया है।* यह घटना महात्मा बुद्ध के परिनिर्वाण के कुछ पहले की है।

  • Buddhist India. p. 11 — T.W.Rhys Davids.*

विड्डूभ के उत्तराधिकारी के विषय में हमें ज्ञात नहीं है। लगता है उसके साथ ही कोशल का स्वतन्त्र अस्तित्व भी समाप्त हो गया तथा मगध साम्राज्य का अंग बन गया।

इतिहास में वर्णित है कि महान राजा सम्राट अशोक और उनके पोते राजा संप्रति ने भी इस पवित्र स्थान पर कई मंदिरों और स्तूपों का निर्माण कराया था। इस तीर्थ स्थान का वर्णन ‘बृहत्कल्प’ में भी है।

कोसल महाजनपद के मगध साम्राज्यवाद का शिकार होने के बाद श्रावस्ती का गौरव भी समाप्त होता चला गया। यद्यपि धार्मिक नगरी के रूप में यहाँ का विवरण हमें कालांतर में भी मिलता रहता है। गुप्तकाल तक यह नगर बहुत कुछ निर्जन हो चुका था। फाहियान ने यहाँ बहुत कम नागरिक देखे थे। सातवीं शती में हुएनसांग ने इस नगर को पूर्णतया नष्ट-भ्रष्ट पाया था।

गुप्त अभिलेखों में ‘श्रावस्तीभुक्ति’ का उल्लेख मिलता है। गुप्तकाल में इसकी स्थिति श्रावस्ती नगरी के परिवर्ती प्रदेश में रही होगी जिसको वर्तमान के गोण्डा, बलरामपुर, श्रावस्ती व बहराइच जनपदों से मोटेतौर पर समीकृत किया जा सकता है।

चीनी यात्री फाह्यान ने भी ५वीं शताब्दी ई० में भारत यात्रा की अपनी स्मृतियों में इस पवित्र स्थान का वर्णन किया है। ७वीं शताब्दी ई० के एक और चीनी यात्री ह्वेन त्सांग ने इस स्थान का वर्णन जेतवन मठ के रूप में किया है। बाद में इसे मणिकापुरी कहा जाने लगा।

जैन अनुश्रुतियों के अनुसार १०वीं शताब्दी के निम्न शाशकों के नाम मिलते हैं; यथा – इस पर ९०० ई० के दौरान राजा मयूरध्वज, ९२५ ई० के दौरान राजा हंसध्वज, ९२५ ई० के दौरान राजा मकरध्वज, ९७५ ई० के दौरान राजा सुधावध्वज और १००० ई० के दौरान राजा सुहरिध्वज का शासन था। इस सभी को भरतवंश से सम्बन्धित बताया गया है।

डॉ० बेनेट ( Dr. Bennet ) और डॉ० विंसेंट स्मिथ ( Dr. Vincent Smith ) ने भी इन्हें जैन राजाओं के रूप में निर्दिष्ट किया है। राजा सुहरिध्वज द्वारा धर्म को मजबूत करने और अपने साम्राज्य में मंदिरों को मुस्लिम आक्रमण से बचाने के लिये किये गये कार्य हमेशा इतिहास की एक महान याद के रूप में लिये जाएँगे। उन्होंने मोहम्मद गजनवी को भी हराया।

जैन वाङ्मय में उल्लिखित ‘सुहिरध्वज’ की पहचान राजा सुहेलदेव से की गयी है। वे बहराइच के राजा थे। श्रावस्ती का धार्मिक क्षेत्र उन्हीं के अधिकार क्षेत्र में आता था। इनका वही समय है जब आततायी महमूद गजनवी के आक्रमण हो रहे थे। उन्हीं के समय उनके एक सेनापति आततायी आक्रांता सैय्यद सालार मसूद ने इस क्षेत्र आक्रमण किया था ( १०३३ ई० के आसपास )। राजा सुहेलदेव ने इसको हराकर मार डाला था। सम्प्रति इसकी दरगाह बहराइच में है।

आचार्य जिनप्रभ सूरी जी ने १४वीं शताब्दी में अपने ग्रंथ ‘विविध तीर्थ कल्प’ में इस तीर्थ को महिथ के रूप में निर्दिष्ट किया है। उन दिनों इस नगर में बड़ी-बड़ी चारदीवारी, मूर्तियाँ एवं देवकुलों से युक्त अनेक जैन मंदिर विद्यमान थे। सूर्यास्त के समय मंदिर के दरवाजे अपने आप बंद हो जाते थे और सुबह होते ही खुल जाते हैं। इसे श्री मणिभद्र यक्ष का प्रभाव बताया गया। एक शेर वार्षिक सभा के अवसर पर मंदिर में आता था और आरती समाप्त होने के बाद ही जाता था। अलाउद्दीन खिलजी और उसके सैनिकों ने इस मंदिर को क्षतिग्रस्त कर दिया। पंडित विजयसागरजी एवं श्री सौभाग्य विजयजी ने इस तीर्थ का वर्णन १८वीं शताब्दी में किया है।

विपश्यना ध्यान केन्द्र

यह ध्यान केंद्र राज्य राजमार्ग २६ पर, बुद्ध इंटर कॉलेज के सामने, जेतवन पुरातत्त्व उद्यान से कुछ मिनट की पैदल दूरी पर स्थित है। चूँकि जेतवन वह स्थान है जहाँ बुद्ध ने किसी भी अन्य जगह (२१ वर्षावास) की तुलना में अधिक समय बिताया था। यह केंद्र ध्यान सीखने वालों के लिये तो अत्यधिक अनुशंसित तो है ही साथ ही अनुभवी ध्यानियों के लिये भी।

यह विपश्यना ध्यान केंद्र दस-दिवसीय पाठ्यक्रम प्रदान करता है, जो महीने में दो बार आयोजित किया जाता हैं। यह पूरी तरह से आवासीय पाठ्यक्रम हैं और प्रत्येक पाठ्यक्रम में लगभग ५० छात्र रह सकते हैं। इस तकनीक के पुराने छात्रों का छोटे पाठ्यक्रमों में भी स्वागत है, जो समय-समय पर पेश किये जाते हैं। पाठ्यक्रमों की पूरी अनुसूची, पालन की जाने वाली अनुशासन संहिता और ऑनलाइन आवेदन की सुविधा सम्बन्धित वेबसाइट पर उपलब्ध करायी गयी है।

पुरातात्त्विक अवशेष

श्रावस्ती के प्राचीन इतिहास को प्रकाश मे लाने का प्रथम प्रयास जनरल कनिंघम ने किया। उन्होंने वर्ष १८६३ ई० मे उत्खनन प्रारम्भ करके लगभग एक वर्ष के कार्य में जेतवन का थोड़ा भाग साफ कराया इसमें उनको बोधिसत्व की ७ फुट ४ इंच ऊँची प्रतिमा प्राप्त हुई, जिस पर अंकित लेख में इसका श्रावस्ती विहार में स्थापित होना ज्ञात होता है। इस प्रतिमा के अधिष्ठान पर अंकित लेख मे तिथि नष्ट हो गयी है। परंतु लिपि शस्त्र के आधार पर यह लेख कुषाण काल का प्रतीत होता है।

श्रावस्ती गाँव के पास सहेत-महेत क्षेत्र की खुदाई के बाद कई प्राचीन मूर्तियाँ और शिलालेख प्राप्त हुए। इन्हें लखनऊ और मथुरा के संग्रहालयों में रखा गया है। पुरातत्त्व विभाग ने महेत किले के पास मौजूद एक प्राचीन मंदिर का अधिग्रहण कर लिया है। इस स्थान को भगवान श्री संभवनाथ का जन्मस्थान बताया गया है। सहेत-महेत में बचा हुआ क्षतिग्रस्त हिस्सा इस जगह की प्राचीनता की याद दिलाता है। वर्तमान में इस तीर्थ स्थान पर यह एकमात्र मंदिर मौजूद है।

सम्प्रति यह बौद्ध धर्म का प्रसिद्ध तीर्थ स्थल है। यहाँ पर देश-विदेश से तीर्थयात्रियों का ताँता लगा रहता है। बोद्ध धर्म अनुयायियों द्वारा यहाँ बौद्ध मंदिरो का निर्माण कराया गया है; जिसमें वर्मा बौद्ध मंदिर, लंका बौद्ध मंदिर, चीन मंदिर, दक्षिण कोरिया मंदिर के साथ–साथ थाई बौद्ध मंदिर है। थायलैंड द्वारा महामंकोल विपश्ना ध्यान केन्द्र भी निर्मित कराया गया, जहाँ पर भरी संख्या मे विदेशी पर्यटको का आवागमन होता है।

सम्प्रति सहेत-महेत में स्थित खण्डहर प्राचीन नगर के वैभव को प्रमाणित करते हैं। सहेत-महेत के खडहरों से जान पड़ता है कि इस नगर का आकार अर्ध-चंद्राकार था। बुद्ध के जीवन से सम्बन्धित अनेक स्थलों के खण्डहर यहाँ उत्खनन द्वारा प्रकाश में लाये गये हैं। इन स्थलों का पालि ग्रंथों के अतिरिक्त चीनी यात्री फाह्यान और युवानच्वांग ने भी उल्लेख किया है।

इनमें से कुछ प्रमुख स्थल थे —

  • प्रसेनजित् के मंत्री सुदत्त (अनाथपिण्डक) का स्तूप – इसकी पहचान ‘कच्ची कुटी’ से की गयी है।
  • क्रूर दस्यु अंगुलिमाल के नाम का स्तूप – इसकी पहचान ‘पक्की कुटी’ से की गयी है।
  • जेतवन-विहार के खंडहर मुख्य हैं।

कच्ची कुटी ( Kacchi Kuti )

यह महेत के अंदर स्थित महत्त्वपूर्ण उत्खनन संरचनाओं में से एक है। यह महेत क्षेत्र में स्थित दो टीलों ( mounds ) में से एक है। कच्ची कुटी के दक्षिण-पूर्व दिशा में कुछ मीटर आगे पक्की कुटी स्थित है। इस स्थान से उत्खनन में प्राप्त बोधिसत्व की एक छवि के निचले हिस्से पर मिले शिलालेख से पता चलता है कि यह संरचना कुषाण काल ​​की है। साक्ष्य बताते हैं कि इस स्थल का बाद में कई बार नवीनीकरण किया गया है। कुछ विद्वानों द्वारा इस स्थल को ब्राह्मण मंदिर से संबद्ध माना गया है, जबकि विद्वानों का एक अन्य समूह कुछ चीनी तीर्थयात्रियों फा-हिएन और ह्वेन त्सांग के हवाले से इस स्थल को सुदत्त (अनाथपिंडक) के स्तूप से जोड़ता है।

कच्ची कुटी दूसरी शताब्दी ईस्वी से लेकर १२वीं शताब्दी ईस्वी तक के विभिन्न कालखंडों के संरचनात्मक अवशेषों का प्रतिनिधित्व करता है। संरचना के विभिन्न स्तर इसकी पहचान को समझना बहुत जटिल बना देते हैं। इस स्थल से बड़ी संख्या में प्राप्त पुरावशेषों और अनावृत संरचनाओं की प्रकृति के आधार पर ऐसा प्रतीत होता है कि कुषाण कालीन बौद्ध स्तूप के ऊपर गुप्त काल से संबंधित एक मंदिर का अधिरोपण किया गया। मार्ग इस संरचना को शहर के द्वार से जोड़ता है जिसे नौशहरा ( Naushahra ) और कांडभारी ( Kandbhari ) द्वार के नाम से जाना जाता है।

पक्की कुटी ( Pakki Kuti  )

यह महेत क्षेत्र में पाये गये सबसे बड़े टीलों में से एक है। इसकी पहचान अंगुलिमाल के स्तूप के अवशेष के रूप में की गयी है। जैसा कि प्रसिद्ध चीनी यात्री फाह्यान ( Fa-hien ) और ह्वेन त्सांग ( Hiuen Tsang ) के साथ-साथ एलेक्जेंडर कनिंघम ने भी उल्लेख किया है। जबकि कुछ अन्य विद्वान इसे ‘हॉल ऑफ लॉ’ ( Hall of Law ) का खंडहर मानते हैं जिसे प्रसेनजीत ने भगवान बुद्ध के सम्मान में बनवाया था। संरचना में बाद में कई परिवर्तन और परिवर्धन हुए हैं। यह आयताकार योजना पर बना एक सीढ़ीदार स्तूप प्रतीत होता है। उत्खनन के समय संरचना को हानि से बचाने के लिये निवारक उपाय किये गये हैं; यथा – संरचना को आधार और नालियाँ प्रदान की गयीं हैं। संरचनात्मक अवशेषों का सामान्य विन्यास संकेत मिलता है कि यहाँ निर्माण गतिविधियाँ विभिन्न कालखंडों की हैं, जिनमें से सबसे प्रारंभिक निर्माण कुषाण काल ​​का बताया गया है।

जेतवन विहार

यह बौद्ध अवशेषों में सर्वप्रमुख है। इसमें बहुत सारे अवशेष प्राप्त होते हैं। जेतवन के खंडहरों में बुद्ध के निवासगृह गंधकुटी तथा कोशंबकुटीनामक दो विहारों के अवशेष देखे जा सकते हैं। इसी में आनन्द बोधि वृक्ष भी है। इस वृक्ष को संरक्षित रखने के लिये लोहे के बड़े-बड़े स्तम्भों के द्वारा डालियों को सहारा दिया गया है।

कौशाम्बी

चम्पा ( मालिनी )

राजगृह ( राजगीर )

महाजनपद काल

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