विविधता में एकता (Unity in Diversity)

भूमिका

विविधता में एकता (Unity in Diversity) भारतवर्ष की मौलिक विशेषता है। भारत एक विशाल देश है जहाँ प्राकृतिक व सामाजिक स्तर की अनेक विषमतायें दृष्टिगोचर होती हैं। एक ओर उत्तुंग शिखर है तो दूसरी ओर समतल मैदान है, एक ओर अत्यन्त उर्वर प्रदेश तो दूसरी ओर अनुर्वर रेगिस्तान है। यहाँ सभी प्रकार की जलवायु पायी जाती है तथा प्राणियों एवं वनस्पतियों की संख्या विश्व में सबसे अधिक है। कुछ भागों में घनघोर वर्षा होती है तो कुछ भाग नाममात्र की वर्षा प्राप्त करते हैं।

भारत में विश्व के प्रायः सभी प्रमुख धर्मों के लोग निवास करते हैं। यहाँ के लोगों को भाषाएँ भी भिन्न-भिन्न हैं। ये समस्त विषमतायें किसी भी बाहरी पर्यवेक्षक को खटक सकती है तथा उसे यह संदेह हो सकता है कि भारत एक देश न होकर छोटे-छोटे खण्डों का विशाल समूह है जहाँ प्रत्येक की अपनी अलग-अलग संस्कृति है। किन्तु इन प्राकृतिक एवं सामाजिक स्तर को विभिन्नताओं के मध्य एकता की एक अविच्छन कड़ी है जिसकी हम उपेक्षा नहीं कर सकते। हर्बर्ट रिजले ने उचित ही लिखा है —

Beneath the manifold diversity of physical and social type, language, custom and religion, which strikes the observers in India, there can still be discerned a certain underlying uniformity of life from the Himalayas to the Cape Comorin. There is, in fact, an Indian character, a general Indian personality which we can not resolve into component elements.

( Herbert Hope Risley )

भारत में अनेक प्राकृतिक एवं सामाजिक विविधताओं, भाषा, प्रथाओं तथा धार्मिक विभिन्नताओं के बीच हिमालय से कन्याकुमारी तक एक निश्चित आधारभूत समरूपता अब भी देखी जा सकती है। वस्तुत यहाँ एक समान भारतीय चरित्र एवं व्यक्तित्व है जिसे हम घटकों में विभाजित नहीं कर सकते।

( हर्बर्ट होप रिजले )

एक मजे की बात यह है कि भारत एक राष्ट्र नहीं है, यह कभी राष्ट्र नहीं बन सकता, भारत को एक राजनीतिक इकाई के रूप में केवल अँग्रेज ही बनाये रख सकते हैं। अँग्रेजों के जाते ही यह टूटकर बिखर जायेगा। भारतीयों में राष्ट्र जैसी कोई भावना ही नहीं… जैसे विचार औपनिवेशिक विचारकों ने बार-बार दोहराये हैं। इस तरह विविधता में एकता को अँग्रेज स्वहित में सिरे से नकारते रहे। साथ ही उनका यह भी प्रयास रहा कि यह पनपने भी न पाये।

भारतीयों ने प्राचीन काल, मध्यकाल और स्वातंत्र्योत्तर काल में इस भ्रामक धारणा ( औपनिवेशिक विचार ) को सिरे नकारा ही नहीं बल्कि धरातल पर सिद्ध करके भी दिखा दिया है। भारतीयों ने अँग्रेजों की इस कुटिल चालों को पहचाना और जहाँ एक ओर वे विविधता को मान्यता देते हैं वहीं दूसरी ओर इस विविधता में एकता के लक्षणों सशक्त करने पर निरन्तर प्रयास भी करते हैं।

भारतीय संस्कृति की विविधता में एकता हमें निम्नलिखित स्वरूपों में देखने को मिलती है :—

  • भौगोलिक एकता
  • राजनीतिक एकता
  • सांस्कृतिक एकता

औपनिवेशिक विचारधारा

औपनिवेशिक शासकों विचारकों ने भारतीय विविधता पर आवश्यकता से अधिक बल देकर अपने पक्षों भुनाने का प्रयास किया तो एकता जैसे तत्त्वों को सिरे से नकार दिया। वे विविधता में एकता जैसी विचारधारा को अपने हित में नहीं मानते थे क्योंकि १८५७ की इसी एकता ने अँग्रेजी साम्राज्य की चूलें हिला दीं थीं। अतः उनके हित में यही था कि ‘विविधता में एकता’ की धारणा को नेपथ्य में भेज दिया जाय और फूट डालकर राज्य किया जाय।

कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में ‘सर जॉन स्ट्रेची’ कई व्याख्यान दिये जो बाद में इंडिया नाम की पुस्तक के रूप में प्रकाशित किये गये। ‘सर जॉन स्ट्रेची’ ने भारतीय उपमहाद्वीप में कई साल बिताये थे और वह वायसराय के काउंसिल का सदस्य तक बना था।

यह पुस्तक ( इण्डिया ) उन लोगो के लिए आवश्यक शुरुआती किताब थी जो कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में पढ़ायी करने के बाद अधिकारियों के रूप में भारत आनेवाले थे। मजे की बात तो यह है कि इस पुस्तक का में एक बड़ा भाग यह सिद्ध करने में तर्क देता है कि भारत मात्र एक सुविधाजनक नाम था, यह एक विशाल क्षेत्र का नाम था जिसमें कई सारे राष्ट्र साथ-साथ रह रहे थे।

आगे स्ट्रेची दावा करते हैं कि यूरोप के देशों में आपसी विवधिता जितना ज्यादा नहीं था उससे ज्यादा अन्तर भारत के भूभागों के बीच था उसने कहा ‘पंजाब और बंगाल की तुलना में स्कॉटलैंड और स्पेन ज्यादा नजदीक हैं।’ भारत में भाषा, नस्ल और धर्म की विविधता बहुत ज्यादा थी। यूरोप के विपरीत भारत के ये ‘क्षेत्र’ कोई अलग राष्ट्र नहीं है, न ही उनमें कोई अलग राजनीतिक और सामाजिक पहचान की चेतना हैं। इससे भी आगे स्ट्रैची घोषणा करता है कि “एक भारतीय राष्ट्र का कभी भी अस्तित्व नहीं था, न ही यूरोपीय विचारों के मुताबिक कोई ऐसी भौतिक, राजनीतिक, सामाजिक या धार्मिक रूप से एकीकृत अवधारणा ही मौजूद थी।”

वर्तमान में जब हम निरपेक्ष रूप से औपनिवेशिक विचारधारा का अवगाहन करते हैं तो हमें अँग्रेजों की कुटिल चाल समझ में आती है। ऐसी विचारधारा के दो निहितार्थ थे –

  • भारत में आने वाले अँग्रेजो जो कि अधिकारियों के रूप में आते थे की इच्छाशक्ति को सम्बल देना। जिन्हें ब्रिटिश राज के अधिकारियों के तौर पर भारत में शासन-प्रशासन के दायित्व का निर्वहन करना था।
  • भारतीय एकत्व की अवधारणा को अमान्य करके भारतीयों को शासित बनाये रखना क्योंकि नये ‘राष्ट्र’ के उदय का अर्थ ही था ब्रिटिश साम्राज्य की शक्ति और उसकी प्रतिष्ठा को चुनौती।

अँग्रेजों को अपनी निरन्तरता का इतना अतिविश्वास हो गया था कि वे बार-बार यह तर्क देते नहीं थकते थे कि फ्रांस, जर्मनी या इटली की तरह भारतवर्ष में कोई राष्ट्रीय चेतना नहीं थी, ऐसा कोई बंधन नहीं था जो लोगों को एक सूत्र में आबद्ध रख सके और उन्हें उद्देश्यपरक ढंग से भविष्य की तरफ ले जा सके। और अंततः वे यह दावा करते कि यह ब्रिटिश शासन ही था जिसने भारत और भारत की जनता को एकता के सूत्र में बांधा।

रूडवर्ड किपलिंग ने सन् १८९१ ई० में ऑस्ट्रेलिया में एक पत्रकार के जिसमें उनसे भारत में ‘स्वशासन की संभावनाओं के बारे में पूछा गया गया था के उत्तर में कहा कि —

‘ओह नहीं… वे चार हजार साल पुराने लोग हैं। वे इतने पुराने हैं कि इस प्रणाली को सीख नहीं सकते। उन्हें कानून और व्यवस्था ही चाहिए न… । हम उन्हें ये देने को तैयार हैं और हम उन्हें ये सीधे तौर पर दे रहे हैं।’

Oh no!… They are 4000 years old out there, much too old to learn that business. Law and order is what they want and we are there to give it to them and we give it them straight.

Interview in the Adelaide Advertiser, November 1981.

जहाँ एक ओर रूडयर्ड किपलिंग ने भारतीय सभ्यता की प्रचीनता की बात तो करती हैं परन्तु साथ में भारतीयों की अपरिपक्विता का सहारा लेकर औपनिवेशिक शासन का औचित्य यह कहकर सिद्ध करती हैं कि भारतीय शासन करने के अयोग्य हैं।

अल्बर्ट हॉल में ‘अवर डयूटी टू इंडिया’ नामक के व्याख्यान में विंस्टन चर्चिल ने तर्क दिया कि —

‘भारत का अंग्रेजों द्वारा छोड़ दिया जाना और उसे ब्राह्मणों की सत्ता में जाने दिया जाना (जो उनके विचार में कांग्रेस पार्टी में प्रभुत्व स्थापित किए हुए थे) एक क्रूर और धूर्तत्तापूर्ण नजरअंदाजी होगी। उसने भविष्यवाणी की कि ‘अगर ब्रिटिश भारत से चले जाते हैं तो उनके द्वारा निर्मित, न्यायपालिका, स्वास्थ्य सेवाएं, रेलवे और लोक निर्माण की संस्थाओं का पूरा तंत्र खत्म हो जाएगा और हिंदुस्तान बहुत तेजी से शताब्दियों पहले की बर्बरता और मध्ययुगीन लूट-खसोट के दौर में वापस चला जाएगा।’

 ‘to abandon India to the rule of the Brahmins [who in his opinion dominated the Congress Party] would be an act of cruel and wicked negligence’. If the British left, he predicted, then the entire gamut of public services created by them – the judicial, medical, railway and public works departments – would perish, and ‘India will fall back quite rapidly through the centuries into the barbarism and privations of the Middle Ages’.

Winston Churchill, India : Speeches and an Introduction ( London – Thornton Butterworth, 1931 )

भौगोलिक एकता

प्रकृति ने भारत को एक विशिष्ट भौगोलिक इकाई प्रदान की है। उत्तर में हिमालय पर्वत एक ऊँची दीवार के समान इसकी रक्षा करता है। इसके पूर्व, पश्चिम और दक्षिण में विशाल सागर है। देश की इन प्राकृतिक सीमाओं ने यहाँ के निवासियों के मन व मस्तिष्क में समान मातृभूमि के निवासी होने का भाव जागृत किया तथा उन्होंने इस समस्त भूमिखण्ड को ‘भारतवर्ष’ को संज्ञा से विभूषित किया। इस विशाल भूखण्ड में समान संस्कृति विकसित हो सकी।

जिस जाति के पास अपनी कोई सुनिश्चित भूमि नहीं होती उसकी कोई भी सभ्यता विकसित नहीं हो पाती। बर्बर और यायावर जातियाँ कभी भी संस्कृति का विकास नहीं कर पाती है। हिब्रुओं के संस्कृति के विकास में सबसे बड़ी बाधा यही रही कि उनकी कोई सुनिश्चित भूमि नहीं थी।

भूमि का देश के लिये वही महत्व है जो मनुष्य के लिये उसके शरीर का होता है। राष्ट्र निर्माण के तत्वों में भूमि सर्वप्रधान और महत्त्वपूर्ण है। अतः भारतीय संस्कृति के विकास के लिये प्रथमतः समान भूमि का तत्त्व ही उत्तरदायी रहा है। भारत के निवासियों ने प्रारम्भ से ही उत्तर में हिमालय से लेकर दक्षिण में समुद्रतट तक के विशाल भूखण्ड को अपनी मातृभूमि माना है। प्राचीन साहित्य में स्थान-स्थान पर इस एकता के दर्शन होते हैं।

विष्णुपुराण में स्पष्टरूपेण वर्णित है — “समुद्र के उत्तर तथा हिमालय के दक्षिण में जो भूखण्ड है वह भारतवर्ष है तथा यहाँ की सन्ताने भारतीय है।”

उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्।

वर्षम् तद् नाम भारती यत्र सन्तति॥

( विष्णुपुराण )

भूमि की यह एकता भारतीय संस्कृति के लिये सबसे बड़ा वरदान सिद्ध हुई है। इसी ने भारतीय संस्कृति को सुरक्षित रखा है, अन्यथा घटनाओं के तूफान और समय के प्रवाह में सब कुछ नष्ट हो गया होता।

यही देश को मौलिक एकता का सवल आधार है। अथर्ववेद के पृथ्वीसूक्त में ‘भूमि माता है तथा में पुत्र हूँ’ कहकर देशप्रेम के भारतीय दृष्टिकोण को स्पष्टतः व्यक्त किया गया है।

माताभूमिः पुत्रोऽहम् पृथिव्याः।

भूमि की तुलना एक ऐसी ‘धेनु’ ( गाय ) से की गयी है जो अपनी विभिन्न सन्तानों को भाषा, धर्म एवं विश्वास में विभिन्नता के होते हुए भी समभाव से दुग्धपान कराती है।

जनं बिभ्रती बहुधा विवाचसं नाना धर्माणं पृथिवी यथौकसम्।

सहस्रधारा द्रविणस्य में दुहां ध्रुवेव धेनुरनपस्फुरंती॥

(अथर्ववेद )

राजनैतिक एकता

भारतीय भूमि की एकता की इस अवधारणा ने राजनैतिक एकता को प्रोत्साहन प्रदान किया। यहाँ के महान सम्राटों ने इसे चरितार्थ करने का सफल प्रयास किया। प्राचीन ग्रन्थों में सम्राटों के लिये एकराट्, राजाधिराज, सार्वभौम जैसे विरुदों का प्रयोग मिलता है। कौटिल्य ने अर्थशास्त्र में हिमालय से लेकर समुद्रतट तक विस्तृत सहस्त्रयोजन भूमि को चक्रवर्ती सम्राट का क्षेत्र’ बताया है।

तस्यां हिमवत् समुद्रान्तरम् उदीचीनं योजन सहस्रपरिमानं अतिर्यक् चक्रवर्तिक्षेत्रम्।

(अर्थशास्त्र  )

राजसूय, वाजपेय, अश्वमेध जैसे वैदिक यज्ञों के अनुष्ठान का विधान चक्रवर्ती सम्राटों के लिए किया गया है। प्राचीन इतिहास के प्रतिनिधि महान सम्राटों, जैसे चन्द्रगुप्त मौर्य, अशोक, समुद्रगुप्त, चन्द्रगुप्त द्वितीय विक्रमादित्य आदि के मस्तिष्क में एकता का यही आदर्श रहा तथा उन्होंने अपनी विजयों द्वारा इसे यथार्थ रूप में प्राप्त भी किया। प्राचीन साहित्य में राजशासन विषयक सभी मान्यतायें इस बात की पुष्टि करती है कि हिमालय से लेकर हिन्द महासागर तक का विशाल भूखण्ड एक है।

सांस्कृतिक एकता

भौगोलिक तथा राजनीतिक एकता के साथ ही साथ हमें भारतीय उपमहाद्वीप में धर्म, भाषा व साहित्य और सामाजिक परम्पराओं में एकता भी दिखायी देती है। प्राचीन साहित्य में भारत को सात नदियों गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु तथा कावेरी एवं सात पवित्र नगरियो– अयोध्या, मथुरा, माया (हरिद्वार), काशी, काची, अवन्तिका तथा द्वारावती की भूमि मानकर प्रार्थना करने का उपदेश दिया गया है। स्नान के समय श्लोक पढ़कर सात नदियों का आवाहन किया जाता था। इनके अन्तर्गत प्रायः समस्त भारतीय भूखण्ड आ जाता है।

गंगा च यमुने चैव गोदावरी सरस्वती।

नर्मदे सिन्धु कावेरी जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरु॥

XXX

अयोध्या मथुरा माया काशी काञ्ची अवंतिका।

पुरी द्वारावती चैव सप्तैता मोक्षदायिका॥

हिन्दू धर्म में तीर्थयात्रा के द्वारा भी पुण्यार्जन का विधान किया गया है। महाभारत के वनपर्व में वर्णन मिलता है कि “तीर्थों में जाने का पुण्य यज्ञों से भी अधिक है। जो पुण्य बहुत दक्षिणा वाले अग्निष्टोमादिक यज्ञों को करने से भी नहीं मिलता वह तीर्थ में जाने से प्राप्त होता है।” इस अवधारणा ने भी भारतीय एकता को सुदृढ़ किया। प्रत्येक धर्म में तीर्थस्थलों को जो सूची मिलती है वे किसी क्षेत्र विशेष में सीमित न होकर सम्पूर्ण देश में फैले हुए थे। उत्तर के निवासियों के लिये सुदूर दक्षिण के तीर्थ उतने हो श्रद्धेय थे जितने कि दक्षिण के निवासी उत्तरी तीर्थों को मानते थे। पुराणों के अनुसार चार तीर्थ माने गये थे —

  • पूर्व में श्वेत गंगा,
  • पश्चिम में गोमती कुण्ड (द्वारका स्थित गोमती नदी),
  • उत्तर में तप्तकुण्ड (बदरी नाथ स्थित) तथा
  • दक्षिण में धनुषतीर्थ

इसी प्रकार चार विशाल सरोवर

  • पम्पासर,
  • विन्दुसर,
  • नारायणसर तथा
  • मानसरोवर

ये सभी देश की चारों दिशाओं में स्थित थे। भारत के विभिन्न भागों में एकता स्थापित करने के उद्देश्य से ही महान् दार्शनिक शंकराचार्य ने चारों दिशाओं में चार मठों की स्थापना की थी —

  • उत्तर में बदरीकेदारनाथ, ज्योतिर्मठ
  • दक्षिण में मुंगेरी (मैसूर), शृंगेरीमठ
  • पूर्व में पुरी (ओडिशा), गोवर्धनमठ तथा
  • पश्चिम में द्वारका, शारदा मठ।

ये मठ समस्त देश की हिन्दू जनता के लिये समान रूप से पवित्र व पूजनीय रहे हैं। हिन्दू इन तीर्थों की यात्रा कर आज भी अपने को धन्य मानते है।

मनुस्मृति और भागवत पुराण में भारत को देवनिर्मित देश कहा गया है। महाकवि कालिदास ने हिमालय को ‘देवतात्मा’ कहा है।देश के सभी जनों ने इस देवत्व को स्वीकार किया।

अस्ति उत्तरस्यां दिशि देवतात्मा हिमालयो नाम नगाधिराजः।

विष्णुपुराण में भारत भूमि की प्रशंसा करते हुये कहा गया है ‘धन्य है वे लोग जो भारत-भूमि में उत्पन्न हुये हैं। यहाँ की भूमि स्वर्ग से भी बढ़कर है क्योंकि यहाँ स्वर्ण के साथ-साथ अपवर्ग (मोक्ष) की भी साधना होती है। देवता भी स्वर्ग का सुख भोग लेने के बाद मोक्ष की साधना के लिये भारत में पुनः जन्म लेते हैं।’

गायन्ति देवा किल गीतकानि, धन्यास्तु ते भारत भूमि भागे।

स्वर्गापवर्गास्पद हेतु भूते, भवन्ति भूयः पुरुषाः सुरत्वात्॥

विष्णुपुराण ॥

भारतीय परम्परा में जननी तथा जन्मभूमि को स्वर्ग से उच्चतर स्थान दिया गया है।

जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी।

राजशेखर कृत काव्यमीमांसा में गुरुकुल से लौटने के पश्चात् सम्पूर्ण भारत भूमि का पर्यटन छात्र के व्यक्तित्व के सर्वांगीण विकास के लिये आवश्यक बताया गया है। ऐसे उल्लेख निश्चित ही भारतीयों के मन में जन्मभूमि के प्रति महती श्रद्धा को सुदृढ़ करते है।

धर्म के क्षेत्र में हम पाते हैं कि त्रिदेवों व त्रिदेवियों की पूजा सम्पूर्ण देश में होती है। सन्त, महात्माओं, धर्मोपदेशको आदि के द्वारा इस धार्मिक एकता को पुष्टि हुई है। शंकर, रामानुज, वल्लभाचार्य आदि का पूरे देश में सम्मान था।

दार्शनिक विचारों में भी समरूपता मिलती है। ज्ञान, भक्ति, उपासना, कर्म सम्बंधी विचार पूरे देश के दर्शन में मिलते हैं।

यह सही है कि भारत में भाषाओं को विविधता है। किन्तु भारतीय भाषाओं की लिपियों का उद्गम बाह्मी लिपि से हुआ है। सभी भाषायें संस्कृत से उद्‌भूत अथवा प्रभावित है। इसमें लिखित साहित्य प्राचीन भारतीय ज्ञान का भंडार है। संस्कृत भाषा वस्तुतः भारतीय संस्कृति की वाहिका है। वैदिक वाङ्मय, रामायण, महाभारत, पुराण आदि का पठन-पाठन सम्पूर्ण देश में होता रहा है।

लौकिक साहित्य भी एकता के साधन रहे हैं। कालिदास का काव्य समस्त देश का गौरव है। पंचतंत्र की कथायें, नीतिग्रन्थ, सुभाषित साहित्य का पूरे देश में प्रचार-प्रसार था। पाणिनि, पतंजलि आदि के ग्रन्थ कश्मीर से कन्याकुमारी तक शिक्षा के समान माध्यम थे। प्राचीन भारत के विश्वविद्यालयों में देश के प्रत्येक कोने से विद्यार्थी एकत्र होकर इस तथ्य को पुष्टि करते थे कि विविधताओं के होते हुए भी भारत देश एक है।

देश की मौलिक एकता को प्रोत्साहन देने में कला का भी योगदान रहा है। ब्रह्मा, विष्णु, शिव, सूर्य, बुद्ध, तीर्थङ्कर आदि की प्रतिमायें सम्पूर्ण देश में प्रायः एक ही लक्षण तथा मुद्रा में प्राप्त होती है। इन्हें देखने से ऐसा लगता है कि समान कलाकारों द्वारा ये निर्मित हुई हैं। कला के कुछ मौगलिक प्रतीकों यथा – स्वस्तिक, धर्मचक्र, कमल, पूर्णघट आदि को सम्पूर्ण देश में मान्यता प्रदान की गयी थी। पाषाण और गुहा स्थापत्य में भी क्षेत्रीय विशेषताओं के साथ-साथ समान भारतीय तत्व परिलक्षित होते हैं।

भारतीय सामाजिक और आर्थिक जीवन में भारी विषमताओं के बावजूद हमें एक प्रकार की एकता के दर्शन होते हैं। वर्णाश्रम व्यवस्था, संस्कार व्यवस्था, पुरुषार्थ आदि सभी समाजों के लिए आदर्श स्वरूप रहे हैं जिन्हें स्थापित एवं प्राप्त करने के निमित्त न्यूनाधिक रूप में सर्वत्र प्रयास हुए हैं।

वर्णाश्रम व्यवस्था तो हिन्दू संस्कृति का आधार स्तम्भ है। भौतिक सुख व वैभव के प्रति भारतीयों का दृष्टिकोण प्रायः समान रहा है। धर्म के अनुसार धन का उपार्जन, उससे अपना और परिवार का पोषण, योग्य पात्रों को दानादि व अन्य धार्मिक कार्यों में उसका व्यय ही धन के प्रति भारतीयों का दृष्टिकोण रहा है।

आर्थिक संगठन और संस्थाएँ भी प्रायः सम्पूर्ण देश में समान थीं। एक भाग के व्यापारी एवं व्यवसायी दूसरे भाग में जाते तथा व्यवसाय करते थे। इन सबका राष्ट्रीय एकता को पुष्ट करने में योगदान रहा। व्यापारियों के पारस्परिक लेन-देन में राज्यों की सीमाएँ बाधक नहीं होती थीं। राज्यों व राजाओं के परिवर्तन होते रहने पर भी आर्थिक ढाँचा सामान्यतः एक समान बना रहा।

निष्कर्ष रूप में कह सकते है कि भारतीय संस्कृति में बाह्य व दृश्यमान विषमताओं के मध्य एक सारभूत मौलिक एकता है जिसकी उपेक्षा नहीं की जा सकती है। यह विभिन्नता में एकता ही भारतीय संस्कृति की सर्वप्रमुख विशेषता है।१०

This unity in diversity is the keynote of the tangled history of India and forms the background against which the seemingly complex developments in various aspects of Indian civilisation must be viewed.१०

( The Vedic Age )

विविधता में एकता : संक्षिप्त विश्लेषण

“भारतीय संस्कृति की प्रवाहमान धारा की तुलना गंगाजल से किया जा सकता है। जैसे गंगा में दायें से बायें से छोटी-बड़ी सरिताएँ मिलती है और मिलकर एकमेव हो जाती हैं। इसी तरह यहाँ पर विभिन्न जातीय समूह अपनी-अपनी सांस्कृतिक पहचान के साथ आयीं और यहाँ की सभ्यता और संस्कृति से क्रिया-प्रतिक्रिया करते हुए कुछ लेती हुई और कुछ देती हुई भारतीय संस्कृति की प्रवाहमान धारा को और शक्तिशाली बनाती चली गयीं।”

भारतीय उप-महाद्वीप में आने विभिन्न प्रजातियों ( वाले यूनानी, सीथियन, शक, कुषाण, पह्लव, हूण आदि ) के लिए एक गलन-पात्र ( melting-pot ) जैसा ही है। प्रत्येक जातीय समूह ( ethnic group ) ने भारतीय संस्कृति के निर्माण में अपना-अपना योगदान दिया।

वैदिक साहित्यों में द्रविड़ शब्द मिलते हैं। इसी तरह संगम साहित्य में अनेक संस्कृत और पालि के शब्द मिलते हैं।

भारत भूमि हिंदू, जैन और बौद्ध धर्म की जन्मस्थली है। परन्तु ये धर्म परस्पर जुड़े हुए हैं। हालाँकि भारतीय अलग-अलग भाषा-भाषी हैं, विभिन्न धर्मावलम्बी हैं और विविध सामाजिक रीति-रिवाजों का पालन करते हैं, परन्तु वे पूरे देश में जीवन की कुछ सामान्य शैलियों का पालन करते हैं। इसलिए, भारतवर्ष में विविधता के बावजूद एक अंतर्निहित एकता दिखती है।

प्राचीनकाल से ही भारतीयों ने भारतीय उप-महाद्वीप को एकता के रूप में पिरोने का कार्य राजनीतिक और सांस्कृतिक रूप से किया है। भरत नामक एक प्राचीन वैदिक जनजाति के नाम पर भारतवर्ष पड़ा। मौर्य और गुप्त शासकों ने प्राचीन में कम से कम दो बार राजनीतिक एकता स्थापित की थी। हमारे प्राचीन कवियों, दार्शनिकों और लेखकों ने सम्पूर्ण भारतवर्ष को एक सांस्कृतिक इकाई के रूप में देखा।

विदेशी पहले सिंधु क्षेत्र के लोगों के संपर्क में आए और इसलिए उन्होंने भारत के जो भी नाम दिये वह इसी सिंधु नदी के नाम से व्यूत्पन्न नाम दिये। हिंद शब्द संस्कृत शब्द सिंधु से लिया गया है। ग्रीक में इंडिया, फारसी और अरबी भाषाओं में हिंद नाम दिया गया। चीनियों ने तिएन-चू या चुआंतू नाम दिया। लेकिन सातवीं शताब्दी में आने वाले चीनी यात्री हुएनसांग ने भारत को यिन-तू नाम दिया है।

देश की भाषाई और सांस्कृतिक एकता के लिए सतत प्रयास किए गए। तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व में प्राकृत भाषा ने देश की भाषा के रूप में कार्य किया। लगभग पूरे भारतीय उप-महाद्वीप में अशोक के शिलालेख प्राकृत भाषा में पाये गये हैं। यही स्थान गुप्तकाल में संस्कृति भाषा को प्राप्त हुआ। रामायण और महाभारत का पूरे देश में सम्मान प्राप्त है। मूल रूप से संस्कृत में रचित इन महाकाव्यों को विभिन्न स्थानीय भाषाओं में अनूदित किया गया। हालाँकि भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों और विचारों को विभिन्न रूपों में व्यक्त किया गया था, लेकिन उनका सार समान रहा था।

इसलिए, भारतवर्ष एक बहु भाषा-भाषी, बहु-धार्मिक और बहु-सांस्कृतिक देश है। भारतीय की अंतर्निहित एकता व अखंडता और और उसकी बहुलतावादी चरित्र देश की कमजोरी नहीं बल्कि शक्ति है।

एन॰ के॰ बोस ने अपनी कृति ‘पीजेंट लाइफ इन इंडिया’ में लिखा है, ‘भारतीय एकता की तुलना …पिरामिड से की जा सकती है। यहाँ जीवन के भौतिक आधार में अधिक अंतर है और जैसे-जैसे हम ऊपर बढ़ते जाते हैं, यह अंतर कम होता जाता है।’

भारतीय इतिहास की भौगोलिक पृष्ठभूमि या भारतीय इतिहास पर भूगोल का प्रभाव

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