मीमांसा दर्शन

मीमांसा दर्शन

परिचय

वेदों के दो भाग हैं — कर्मकाण्ड और ज्ञानकाण्ड। ब्राह्मण ग्रंथों में वैदिक कर्मकाण्डों का वर्णन है जबकि उपनिषद् ज्ञानमार्ग से सम्बंधित हैं। मीमांसा को ‘पूर्व-मीमांसा’ भी कहा जाता है। इस दर्शन का उद्देश्य वैदिक कर्मकाण्डों की दार्शनिक महत्ता को प्रतिपादित करना है। यह मत वेदों को अपौरुषेय और नित्य मानता है। उपनिषद् ( वेदांत ) को ‘उत्तरमीमांसा’ कहा गया है और इसमें ज्ञानमार्ग का प्रतिपादन है।

मीमांसा के प्रणेता ‘महर्षि जैमिनि’ हैं और उनकी कृत ‘मीमांसा सूत्र’ इस दर्शन की आधारभूत रचना है। शबरस्वामी ने इसपर टीका लिखी है। कुमारिल भट्ट और प्रभाकर इसके प्रमुख दार्शनिक हुए हैं एवं इन्हीं के नाम पर इस दर्शन के दो उप-दर्शन विकसित हो गये। 

मीमांसा का प्रधान विषय धर्म है — “धर्मख्यं विषयं वक्तुं मीमांसायाः प्रयोजनम्।” मीमांसा के अनुसार वेद ही धर्म के मूल हैं।

मीमांसा के प्रमुख सिद्धान्त

प्रमाण विचार

ज्ञान के रूप और साधन

मीमांसा दर्शन में दो प्रकार के ज्ञान माने गये हैं — प्रत्यक्ष और परोक्ष। परोक्ष ज्ञान के पुनः ५ प्रकार हैं — अनुमान, शब्द, उपमान, अर्थापत्ति और अनुपलब्धि। इस तरह मीमांसा में कुल ६ प्रमाणों की स्वीकार्यता है। अंतिम प्रमाण ( अनुपलब्धि ) को केवल भट्टमीमांसक मानते हैं, प्रभाकर नहीं।

मीमांसकों का प्रत्यक्ष और अनुमान सम्बंधित विचार नैयायिकों जैसा ही है।

प्रत्यक्ष प्रमाण

प्रत्यक्ष ज्ञान केवल सत् पदार्थों का हो सकता है। किसी ज्ञानेन्द्रिय के साथ सत् ( वर्तमान ) पदार्थ या विषय का सम्पर्क होने पर ही प्रत्यक्ष या यथार्थ ज्ञान आत्मा को हो सकता है। इस तरह के ज्ञान को सभी दोषों से मुक्त माना गया है। कुमारिल भट्ट ने साक्षात् प्रतीति को प्रत्यक्ष ज्ञान बताया है — “साक्षात् प्रतीति प्रत्यक्षः।” 

परोक्ष / अप्रत्यक्ष प्रमाण
अनुमान प्रमाण

किसी पूर्व-ज्ञान के आधार पर वस्तुओं का अटकल लगाना अनुमान है।

उपमान प्रमाण

जब हम पहले देखी गयी वस्तु के समान बाद में दूसरी वस्तु देखकर जान लेते हैं कि स्मृत-वस्तु प्रत्यक्ष- वस्तु के समान है, तभी उपमान प्रमाण होता है। जैसे कोई व्यक्ति पूर्व में देखी गयी गाय के अपने पूर्वज्ञान के आधार पर वर्तमान में देखी गयी नीलगाय से यह निष्कर्ष निकालता है कि, ‘गाय नीलगाय के समान होती है’ , तो यह ज्ञान उपमान कहा जाता है।

मीमांसा का उपमान नैयायिकों से भिन्न है। न्याय दर्शन में किसी विश्वसनीय व्यक्ति द्वारा पूर्ववर्णित ज्ञान के आधार पर वस्तु की पहचान होती है जबकि मीमांसा में प्रत्यक्ष दर्शन आवश्यक है। मीमांसा में किसी आप्त वचन की आवश्यकता नहीं है, अपितु स्व-स्मृति के आधार पर ज्ञान प्राप्त किया जाता है।

शब्द प्रमाण

मीमांसा दर्शन में शब्द प्रमाण का सर्वाधिक महत्व है। विश्वसनीय व्यक्तियों के वचन ( आप्त वाक्य ) और वैदिक विवरण शब्द प्रमाण हैं। आप्त-वाक्य पौरुषेय और वेद-वाक्य अपौरुषेय हैं। वेद को स्वतः प्रमाण माना गया है जोकि नित्य और समस्त ज्ञान का आधार है। ऋषि वैदिक मंत्रों द्रष्टामात्र है न कि रचयिता।

वेदवाक्य दो प्रकार के माने गये हैं — सिद्धार्थ और विधायक। सिद्धार्थ अर्थात् जिससे किसी सिद्ध विषय का ज्ञान हो। विधायक अर्थात् वे वाक्य जो किसी क्रिया के लिए आज्ञापित करते हैं। विधायक वाक्यों में ही यज्ञीय विधि-विधानों का निर्देशन है। मीमांसक विधायक वाक्यों को ही सर्वाधिक महत्व देते हैं। सिद्धार्थ वाक्य वहीं तक मान्य हैं जब तक वे विधायक वाक्यों का समर्थन करते हैं।

प्रभाकर केवल वेद-वाक्यों को ही शब्द प्रमाण मानते हैं और आप्त-वाक्यों को अनुमान की श्रेणी में रखते हैं।

अर्थापत्ति प्रमाण

ज्ञान अर्थ की व्याख्या के लिये अज्ञात अर्थ की कल्पना अर्थात् जिसकी सहायता के बिना ज्ञात अर्थ की उत्पत्ति न हो सके उसे अर्थापत्ति ( Presumption ) कहते हैं। उदाहरणार्थ यदि कोई व्यक्ति दिन में भोजन नहीं करता फिरभी वह स्वस्थ्य है तो अर्थापत्ति द्वारा हम जान लेते हैं कि वह रात्रि में भोजन करता है। मीमांसक इस ज्ञान को स्वतंत्र प्रमाण मानते हैं।

अनुपलब्धि प्रमाण

उपलब्धि ( प्राप्ति ) के अभाव के अभाव को अनुपलब्धि ( Negation ) कहते हैं।  इसके विषय में हम किसी विषय के न होने ( अभाव ) का ज्ञान प्राप्त करते हैं। उदाहरणार्थ ‘कोठरी में घट नहीं है’ यह ज्ञान हमें वहाँ घड़े की अनुपलब्धि से प्राप्त हुआ है। यह  ज्ञान हमें किसी अन्य प्रमाण से नहीं हो सकता है।

परन्तु किसी वस्तु का न होना अनुपलब्धि का प्रमाण नहीं हो सकता है। घने अन्धकार में हम घट नहीं देख पाते हैं। इसी प्रकार पाप, पुण्य, परमाणु, आकाश आदि भी दिखायी नहीं देते, किन्तु इसे हम अभाव नहीं मान सकते हैं।

अभाव का अर्थ है ‘जिस परिस्थिति में जो वस्तु होनी चाहिए उसका न होना।’ इसको ‘योग्यानुपलब्धि’ कहते हैं। 

अनुपलब्धि प्रमाण को कुमारिल भट्ट और उनके अनुयायी मानते हैं जबकि प्रभारकर और उनके अनुयायी इसे नहीं मानते हैं। प्रभाकर अभाव का बोध कराने के लिए किसी स्वतंत्र प्रमाण की आवश्यकता नहीं समझते हैं और वे केवल ५ प्रामणों को ही मान्यता देते हैं।

प्रामाण्य विचार

स्वतः प्रामाण्यवाद

दोषरहित कारण-सामग्री के पर्याप्त होने पर जो ज्ञान उत्पन्न होता है वह यथार्थ ज्ञान होता है। यह यथार्थ ज्ञान निश्चयात्मक / विश्वासजनक होता है और इसमें भ्रम / संशय का कोई स्थान नहीं है; जैसे — सूर्य के प्रकाश में हमें दृष्टिगोचर वस्तु का प्रत्यक्ष ज्ञान। ऐसे प्रत्यक्ष ज्ञान की पुष्टि के लिए किसी अन्य साधन की आवश्यकता नहीं होती है। अतः ज्ञान की प्रामाणिकता उस ज्ञान की उत्पादक वस्तु में ही विद्यमान रहती है। इसके विपरीत, जब उस ज्ञान की उत्पत्ति के लिए पर्याप्त कारण-सामग्री में दोष / त्रुटि होने पर ज्ञान उत्पन्न ही नहीं होता है; जैसे — पाण्डुरोगी को यथार्थ का ज्ञान नहीं होता है। मीमांसकों का यह मत ‘स्वतः प्रमाण्यवाद’ कहलाता है। इसके अन्तर्गत दो बातें आती हैं —

  • ‘प्रमाणं स्वतः उत्पद्यते’ अर्थात् ज्ञान की प्रामाणिकता उसकी उत्पादक सामग्री में ही विद्यमान रहती है।
  • ‘प्रामाण्यं स्वतः ज्ञायते च’ अर्थात् प्रामाणिकता का ज्ञान हमें उस ज्ञान के उत्पन्न होते ही हो जाता है। किसी अन्य स्रोत से हमें इसकी परीक्षा नहीं कंपनी पड़ती।

यथार्थता या विश्वसनीयता ज्ञान का स्वभाव है।

न्याय दर्शन में ज्ञान की प्रामाणिकता सिद्ध करने के लिए अन्य युक्तियों का सहारा लेना पड़ता है और इसे ‘परतः प्रामाण्यवाद’ कहा गया है। मीमांसा दर्शन इसका खंडन करता है। मीमांसक ज्ञान को ‘स्वतः प्रमाण’ और ‘स्वतः प्रकाश’ मानते हैं। मीमांसक वेदों को स्वतः प्रमाण मानते हैं।

भ्रम

मीमांसा दर्शन में भ्रम का अस्तित्व अस्वीकार्य है। इस सम्बन्ध में दो मत हैं — अख्यातिवाद और विपरीत-ख्यातिवाद। दोनों मत मानते हैं कि भ्रम का प्रभाव ज्ञानी की अपेक्षा हमारे जीवन पर अधिक पड़ता है। दोनों भ्रम को अपवाद के रूप में ग्रहण करते हैं। जगत् का सामान्य नियम हैं कि प्रत्येक ज्ञान सत्य और यथार्थ होता है। इसी आधार पर मानव का दैनिक कार्य-कलाप चलता है। परन्तु कभी-२ इसमें जो अपवाद मिलता है वहीं भ्रम है।

अख्यातिवाद

इस मत को प्रभाकर और उनके अनुयायी मानते हैं। सभी ज्ञान सत्य होते हैं। जिसे हम भ्रम समझते हैं उसमें दो प्रकार के ज्ञान का समावेश होता है। जैसे रज्जु में सर्पाभास; इसमें हमें एक टेढ़ी-मेढ़ी वस्तु का प्रत्यक्ष ज्ञान और पूर्व में देखे गये सर्प की स्मृति, ये दोनों एकमेव हो जाती है। यहाँ दोनों बातें सत्य हैं। दोष केवल हमारी स्मृति का है। हम प्रत्यक्ष और स्मृति का भेद नहीं कर पाते और प्रत्यक्ष में स्मृति का आरोप करके रज्जु में सर्प का आभास कर लेते हैं। स्मृति-लोप के कारण हमें दोनों के भेद का पता नहीं चल पाता है। इसे ही अख्यातिवाद कहा जाता है जोकि भ्रम की सत्ता का निषेध करता है।

विपरीत ख्यातिवाद

कुमारिल भट्ट अनुसार कभी-२ मिथ्या वस्तु में सत्य की प्रतीति होने लगती है। रज्जु में सर्प के आभास की अवस्था में दोनों की ही सत्ता है। भ्रम केवल यह है कि हम दो अलग-२ पदार्थों में उद्देश्य-विधेय का सम्बन्ध स्थापित कर देते हैं। विषय तो सत्य होता है परन्तु संसर्ग का भ्रम उत्पन्न हो जाता है। यह एक वस्तु में दूसरी वस्तु के रूप में गलत समझने का है, जोकि ज्ञान के कारणों में कुछ दोष के कारण उत्पन्न होता है और कालान्तर में दूर हो जाता है। परन्तु जब तक भ्रम की प्रतीति होती रहती है यह ज्ञान स्वयं में वैध रहता है। यही विपरीत ख्यातिवाद है। इसमें कार्यता की प्रतीति अकार्य में हो जाती है अर्थात् जिस तरह का ज्ञान होना चाहिए वह किसी दोष के कारण नहीं हो पाता है, अपितु वह दूसरी तरह का होता है। इसी विपरीत ज्ञान को ‘विपरीत ख्यात’ कहा गया है।

जगत् और उसके विषय

इस दर्शन में जगत् और उसके समस्त विषयों की सत्यता को स्वीकार्यता है। प्रत्यक्ष विषयों के अतिरिक्त स्वर्ग, नरक, आत्मा और वैदिक यज्ञीय देवों के अस्तित्व को भी प्रमाणों के आधार पर मान्यता है। कर्म सिद्धान्त को यह मत मान्यता देता है। कर्म के अनुसार ही सृष्टि की रचना होती है।

इस मत में जगत् की सृष्टि और प्रलय की मान्यता नहीं है अर्थात् संसार की न तो उत्पत्ति होती है और न ही विनाश। केवल इसके मनुष्य तथा पदार्थों की उत्पत्ति और विनाश होता रहता है। जगत् की सत्ता निरन्तर विद्यमान रहती है — ‘न कदाचित् अनीद्रिशम् जगत्।’ 

कुछ मीमांसक वैशेषिक के परमाणुवाद को भी मानते हैं परन्तु परमाणुओं के संचालक वे ईश्वर को नहीं मानते हैं। यह कर्म का सिद्धान्त का है जो उन्हें प्रवर्तित करता है और जीवात्माओं के कर्मफल भोग के लिए संसार की रचना होती है। इस तरह मीमांसा दर्शन अनेकवादी और वस्तुवादी है।

इहलौकिक यज्ञादि से एक अदृष्ट शक्ति उत्पन्न होती है जिसे ‘अपूर्व’ कहा गया है। यह कर्मफल प्राप्त कराने वाली शक्ति है जो आत्मा में निवास करती है। यह भविष्य में व्यक्ति को उसके कृत कर्म का फल प्रदान करती है। हम जो इहलौकिक कर्म करते हैं उसका फल परलोक में प्राप्त कर सकते हैं। जगत् का संचालक ‘अपूर्व’ है।

आत्मा, बन्धन और मोक्ष

अनेकात्मवाद’ को मीमांसा दर्शन में मान्यता है। आत्मा चैतन्य का आश्रय है और यह नित्य, सर्वगत, विभु और व्यापक द्रव्य है। आत्मा ज्ञाता, भोक्ता और कर्त्ता है। शरीर आत्मा का भोगायतन है, बाह्य वस्तुएँ भोग्य हैं और इन्द्रियाँ भोग कराने की साधन हैं। चैतन्य आत्मा का स्वाभाविक गुण नहीं है, अपितु यह एक आगन्तुक गुण हैं जो मन और इन्द्रियों के संयोग से उत्पन्न हो जाता है। 

जीवात्मा ही बन्धनग्रस्त होता है और उसे ही मोक्ष प्राप्त होता है। बन्धन और मोक्ष सम्बन्धी मीमांसकों के विचार न्याय-वैशेषिकों जैसे ही हैं। आत्मा का शरीर, इन्द्रियों और बाह्य पदार्थों से मुक्ति ही मोक्ष है। मीमांसक वेदान्त के मोक्ष सम्बन्धी विचार से असहमत हैं। वेदान्त में आत्मा मोक्ष की अवस्था में जगत् से परे हो जाता है। सांख्य-योग की तरह मीमांसक जगत् और आत्मा के सम्बन्ध को मिथ्या भी नहीं मानता है।

मीमांसा में संसार नित्य माना गया है और आत्मा की मुक्ति के बाद भी वह जगत् में बना रहता है। मोक्षावस्था में मात्र यह ज्ञान होता है कि आत्मा समस्त गुणों, सुख, दुःख, आनन्द, चैतन्य आदि से विहीन होकर शुद्ध द्रव्य के रूप में रह जाता है। किन्तु बाद में कुछ भाट्ट ( कुमारिल भट्ट ) मीमांसक मोक्ष की अवस्था को आनन्दमय मानने लगे।

धर्म

मीमांसा दर्शन में धर्म का बहुत अधिक महत्व है। जैमिनि के अनुसार ‘धर्म वह आदेश है जो मनुष्य को कर्म के लिए प्रेरित करता है’ ( चोदना लक्षणोंऽर्थोधर्मः )। धर्म का ज्ञान केवल अपौरुषेय वेदों से होता है। वेद जिसका विधान करते हैं वह धर्म है और जिसका निषेध वह अधर्म है।

मीमांसा दर्शन में वैदिक कर्मकाण्डों पर अत्यधिक बल देते हुए प्रत्येक व्यक्ति के लिए उन्हें अनिवार्य रूप से करणीय बताया गया है। वेद-विहित यज्ञों और उनके कर्मकाण्डों का ठीक-२ अनुष्ठान करने का उपदेश मीमांसक देते हैं।

कर्म के तीन प्रकार बताये गये हैं — 

  • अनिवार्य कर्म- ये भी दो प्रकार के हैं :- नित्य और नैमित्तिक ( विशेष ) अवसरों पर किये जाने वाले कर्म।
  • ऐच्छिक कर्म- इसको काम्य कहा जाता है।
  • निषिद्ध कर्म- इसको करने से पाप की प्राप्ति होती है।

प्रारम्भिक मीमांसक धर्म में ही विश्वास करते थे और उनका आदर्श स्वर्ग की प्राप्ति थी। कालान्तर में मीमांसकों ने स्वर्ग के स्थान पर अपवर्ग ( मोक्ष ) को मान्यता दी। परन्तु यहाँ मोक्ष लिए ज्ञान के स्थान पर वैदिक कर्मकाण्डों के अनुष्ठान को साधन के रूप में मान्यता दी गयी है। ज्ञान को कर्मकाण्डों में सहायक माना गया है।

मीमांसा दर्शन में कर्म को ही महत्व देता है जो अपनी शक्ति ( अपूर्व ) से फल प्रदान करने में सक्षम है। इसके लिए मीमांसक ईश्वर की सत्ता को अनिवार्य नहीं मानते हैं। मीमांसकों का ईश्वर विषयक विचार स्पष्ट नहीं है। इस दर्शन का प्रधान लक्ष्य कर्म की महत्ता का प्रतिपादन करना है।

 

भारतीय दर्शन

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