भारत में ‘प्रौद्योगिकी का विकास’

प्राचीन भारत में प्रौद्योगिकी का विकास
प्रौद्योगिकी का विकास

भूमिका

भारत में ‘प्रौद्योगिकी का विकास’ मानव सभ्यता के साथ विकास-यात्रा का अभिन्न अंग है। इसकी शुरुआत प्रस्तर काल से हो जाती है। प्रस्तर प्रौद्योगिकी के बाद ‘धातु प्रौद्योगिकी के विकास का युग आता है।

प्रस्तर युग में ‘प्रौद्योगिकी का विकास’

उपकरण बनाने की तकनीक

‘पाषाणकाल के उपकरण क्रोड ( Core ), शल्क ( Flake ) और फलक ( Blade )के बने होते थे।’

( १ ) इन प्रस्तर उपकरणों के निर्माण को निम्न प्रकार ( तकनीक ) से किया जाता था —

  • उपकरण निर्माण हेतु एक उपयुक्त प्रस्तर का चुनाव किया जाता था और उसपर गोल-मटोल पत्थर ( Pebble ) से हथौड़े की तरह चोट की जाती थी। इस प्रक्रिया में कई छोटे-२ टुकड़े निकाले जाते थे। बचे हुए आन्तरिक भाग को बार-२ चोट करके अभीष्ट आकार प्रदान किया जाता था और इसे ही क्रोड कहते हैं। जबकि अलग हुए टुकड़े शल्क हैं। शल्क के किनारों को घिसकर धारदार बना देने पर वे फलक कहलाते थे।
  • यदि किसी स्थल से अधिकांश उपकरण-प्रारूप शल्कों से निर्मित हों, तो यह माना जाता है कि वह मानव समुदाय उन्नत-प्रौद्योगिकी का प्रयोग करता था।

( २ ) क्रोड पर बेतरतीब प्रहार करके शल्क उतारने की सामान्य विधि के अतिरिक्त दो अन्य महत्वपूर्ण तकनीकें भी हैं —

  • क्लैक्टोनी तकनीक ( clactonian technique ) – सर्वप्रथम लगभग ४ लाख वर्ष पूर्व क्लैक्टोन-ऑन-सी ( इंग्लैंड ) नामक स्थान पर मिलने के कारण इसका यह नाम पड़ा है। इसमें क्रोड से पहले एक बड़ा शल्क उतारते थे जिससे अगले शल्क के लिए आधार तल बन जाता था। उसी आधार तल से अन्य शल्क भी उतारे जाते थे। क्लैक्टोनी शल्क मोटे और बड़े होते थे। शल्क-निशान और आधार तल में निर्मित कोण सामान्यतः ९०­° से अधिक होता था।
  • लवाल्वाई तकनीक ( levalloisean technique ) – इसका विवरण सर्वप्रथम लगभग २ लाख वर्ष पूर्व लवाल्वाई ( फ्रांस ) से मिला है। इसके अन्तर्गत क्रोड सके एक तल से केन्द्रोन्मुख शल्क निकाले जाते थे। तदुपरांत निर्मित तल के शीर्ष पर प्रहार करके उस क्रोड बाह्य एवं पृष्ठभूमि तल से और शल्क उतारे जाते थे। इसलिए इसको ‘निर्मित क्रोड तकनीक’ भी कहते हैं। इस तकनीक से प्राप्त शल्क प्रायः मध्यम से छोटे आकार के होते थे। इसमें आधार तल और शल्क-चिह्न में लगभग ९०° का कोण बनता था।

 उपकरण के प्रकार

( १ ) क्रोड उपकरण ( Core Tools ) —

  • गँडासा और खंडक उपकरण ( chopper and chopping tools ) – ये दोनों क्रोड ( core ) उपकरण हैं। बाटिकाश्म से जब एक ओर से गहरे शल्क उतारकर धार बना ली जाती थी तो वह गँडासा बन जाता था। लेकिन जब बाटिकाश्म से दोनों ओर गहरे शल्क उतारकर धार बनायी जाती था तो वह खंडक कहलाता था। अर्थात् गँडासा में एक ओर धार होती थी और खंडक में दोनों ओर।
  • हस्तकुठार / कुल्हाड़ी एवं विदारणी ( hand axe and cleaver ) – ये दोनों क्रोड उपकरण हैं। ये अतीत काल के सबसे पुराने और परिचित औजार है। हस्तकुठार दो तरह के होते हैं – एक, एबेवेली हस्तकुठार ( abbevillin hand axe ) और दूसरा, एशूली हस्तकुठार ( acheulion hand axe )। पहला वाला लंबा-चौड़ा, भारी-भरकम और अनगढ़ होता था क्योंकि इसका निर्माण केवल प्राथमिक शल्क निकालकर किया जाता था। दूसरा वाला छोटा और सुडौल होता था क्योंकि इसे तैयार करने के लिए बाटिकाश्म से कई द्वितीयक शल्क उतारे जाते थे।

( २ ) शल्क या फलक उपकरण ( Flake or Blade Tools ) —

  • खुरचनी ( scraper ) – यह शल्क / फलक उपकरण है।
  • बेधनी ( point ) – शल्क / फलक उपकरण है।
  • तक्षणी ( burin ) – शल्क / फलक उपकरण है।
  • बेधक ( borer ) – शल्क / फलक उपकरण है।

प्रस्तर युग का वर्गीकरण

प्रस्तर युग में प्रस्तर ‘प्रौद्योगिकी का विकास’ क्रमशः उन्नत होता गया। औजार या उपकरण प्रारूप ( tool types ) के आधार पर प्रस्तर काल को तीन कालखण्डों में बाँटा गया है —

  • पुरापाषाणकाल
  • मध्यपाषाणकाल
  • उत्तर या नवपाषाणकाल

( १ ) पुरापाषाणकाल के मानव ने पत्थरों के अभीष्ट उपकरण बनाने में दक्षता प्राप्त कर ली थी। इसे भी पूर्व, मध्य और उत्तर पुरापाषाणकाल में विभाजित किया गया है।

  • पूर्व पुरापाषाणकाल का मानव मूलतः क्वार्टजाइट पत्थर का उपयोग करता था। इस काल के उपकरणों को दो भागों में बाँटा गया है :— एक, चापर-चापिंग पेबुल संस्कृति और द्वितीय, हस्त-कुठार संस्कृति।
  • मध्य पुरापाषाणकाल के मानव ने क्वार्टजाइट के स्थान पर जैस्पर, चर्ट, फ्लिंट आदि पत्थरों का उपयोग करने लगा। इस काल की मुख्य पौद्योगिकीय विशेषता थी — शल्क निर्मित औजार प्रौद्योगिकी। फलकों की अधिकता के कारण इसे फलक संस्कृति भी कहते हैं।
  • उत्तर / उच्च पुरापाषाणकाल की दो बुनियादी विशेषतायें हैं — एक, चकमक पत्थर का प्रयोग और द्वितीय, आधुनिक मानव का उदय। प्रौद्योगिकी के स्तर पर मानव ने क्रोड के समानांतर पक्षीय फलक ( Parallel sided blade ) बनाने में दक्षता पा ली थी। इसमें एक अच्छी क्रोड बना लेने के बाद उस पर से बहुत-से समांतरपक्षीय फलक बिना किसी और तैयारी के या बिल्कुल थोड़ी-सी तैयारी के बनाये जा सकते हैं।

( २ ) मध्यपाषाणकाल में अपेक्षाकृत छोटे उपकरण तैयार किये गये जिन्हें ‘लघु पाषाणोपकरण’ ( Microliths ) कहा जाता है। इस काल में प्रक्षेपास्त्र तकनीकी का विकास हुआ इसी पर आधृत तीर-कमान हैं।

( ३ ) नवपाषाणकाल की प्रमुख विशेषताएँ हैं :—

  • कृषि कार्य,
  • पशुपालन,
  • मृद्भाण्ड निर्माण और
  • प्रस्तर के औजारों का घर्षण और उन पर पॉलिश करना।

धातुकाल में ‘प्रौद्योगिकी का विकास’

परिचय

मानव ने सर्वप्रथम ताँबा धातु का प्रयोग किया उसके बाद क्रमशः कांस्य और लौह धातु का प्रयोग किया।

बहुत समय तक मनुष्य प्रस्तर और ताँबे का प्रयोग साथ-२ करती रही इसी कारण इस अवस्था को ‘ताम्रापाषाणिक काल’ कहते हैं। यह संस्कृति प्राक् हड़प्पा, हड़प्पा और उत्तर हड़प्पा काल तक फैली हुई थी।

ताम्रपाषाणिक और काँस्यकाल

जब मानव ने ताँबे के साथ टिन को मिलाकर कांस्य धातु का प्रयोग शुरु किया तो इसे कांस्यकाल कहा गया। भरतीय संदर्भ में इसके अन्तर्गत हड़प्पा संस्कृति आती है। मोहेनजोदड़ो से प्राप्त कांस्य नर्तकी की मूर्ति धातु शिल्प का सर्वश्रेष्ठ नमूना है। मूर्ति निर्माण की मधूच्छिष्ट विधि ( Lost wax ) का विकास हुआ। हड़प्पा काल में पाषाण फलकों का उत्पादन, मनका उत्पादन, सेलखड़ी की आयताकार मुहरें, इष्टिका उद्योग आदि के सुविकसित होने का प्रमाण मिलता है।

सैन्धव सभ्यता के पूर्व, समानांतर और उत्तर कालीन समय में भारतीय संदर्भ में ताम्रपाषाणिक संस्कृतियाँ भी विद्यमान रहीं। राजस्थान में ताम्र उद्योग विकसित अवस्था में था। अहाड़ का उपनाम ताम्बवती भी मिलता है और इसी के समीप गणेश्वर से बड़ी मात्रा में ताम्र उपकरण मिलते हैं। इस काल में भारत के विविध भागों से ताम्र निधियाँ ( Copper hoards ) मिलती हैं। ताम्र निधियों की वस्तुओं का सम्बंध गैरिक मृदभाण्डों से जोड़ा जाता है।

लौहकाल

लौहकाल का सम्बन्ध ‘चित्रित धूसर मृद्भाण्ड’ से जोड़ा जा सकता है। सामान्यतः यह समय ‘उत्तर-वैदिक काल’ से शुरू होता है। शनैः शनैः लौह धातु का प्रयोग बढ़ता गया। ई॰ पू॰ छठीं शताब्दी में गंगा घाटी में द्वितीय नगरीकरण और मगध साम्राज्यवाद की सफलता का तकनीकी आधार लौह तकनीक ही थी। पहले इस धातु का उपयोग युद्ध में हुआ परन्तु शीघ्र ही कृषि क्षेत्र में होने लगा। युद्ध तकनीक से साम्राज्यवाद को बढ़ावा मिला जबकि कृषि क्षेत्र से अधिशेष मिलने लगा।

“बरार के माहुरझारी के एक वृहत्पाषाणिक / महापाषाणिक स्थल से लोहे की कुल्हाड़ी मिली है जिसमें ६% कार्बन की मात्रा है। अतः इसे इस्पात ही कहा जा सकता है। इस तरह इस्पात बनाने की कला सर्वप्रथम भारत में ही विकसित हुई।”

ऐतिहासिक काल में ‘प्रौद्योगिकी का विकास’

मौर्यकाल

मौर्यकाल में पाषाण और लौह प्रौद्योगिकी का पर्याप्त विकास हुआ। सम्राट अशोक के एकाश्मक स्तम्भ पाषाण तराशने की कला की उत्कृष्टता के साक्षी हैं। लगभग ५० टन वजन और ३० फीट से अधिक ऊँचाई के स्तम्भों को भारत के विभिन्न भागों में लेजाकर स्थापित करना तत्कालीन अभियांत्रिकी कुशलता का प्रमाण है। इसी तरह सुदर्शन झील का निर्माण इस काल की उपलब्धि है जिसका बाद में तीन बार जीर्णोद्धार कराया गया।

ऐतिहासिक काल में पक्की ईंटों और मण्डल-कूपों ( ring-wells ) का प्रयोग सबसे पहले मौर्यकाल में ही हुआ।

  • पक्की ईंटों से आवास का निर्माण स्थायी रूप से होने लगा।
  • मण्डल कूपों के निर्माण से अब बस्तियाँ जल स्रोतों से दूर भी बसने लगी अर्थात् नदी तट या जल स्रोत के किनारे मानव आवास के पुरातन तरीके में बदलाव आने लगा। इस तकनीकी विकास से जल-प्रदाय ( water supply ) की समस्या जल स्रोतों से दूर-दराज की बस्तियों में सुलझाना आसान हो गया। तंग बस्तियों में ये मंडल-कूप सोख्तों या शोषगर्तों ( soakage pits ) की तरह भी काम करते थे।

मौर्योत्तर काल

‘मौर्योत्तर काल’ प्रौद्योगिकी के विकास की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। महावस्तु में राजगृह में निवास करने वाले ३६ प्रकार के शिल्पियों का उल्लेख मिलता है। मिलिन्दपञ्हों में ७५ प्रकार के व्यवसायों का वर्णन है जिसमें से ६० विभिन्न प्रकार के शिल्पियों से सम्बद्ध थे। इनमें से ८ शिल्प स्वर्ण, रजत, टिन, ताम्र, पीतल, लौह और हीरे-जवाहरातों जैसे उत्पादों से संबद्ध थे। पेरीप्लस ऑफ द इरिथ्रियन सी में अबीसीनियायी बन्दरगाहों पर भारत से आयातित वस्तुओं की सूची में लौह और इस्पात का भी उल्लोख है।

गुप्तकाल

‘गुप्तकालीन’ कृति अमरकोश में लोहे के ७ नाम दिये गये हैं जिनमें से ५ का नाम हल के फाल से सम्बंधित है। मेहरौली का लौह स्तम्भ  ( ७.३२ मीटर ) भारतीय लौह कर्म का जीवन्त स्मारक है। इस पर मैगनीज ऑक्साइड ( MgO ) की पतली परत चढ़ाकर इसे जंगरहित बना दिया गया। यह स्तम्भ आज भी मौसमी परिवर्तन को मात देकर १५०० वर्षों से जंगरहित खड़ा है। इस काल से प्राप्त सुल्तानगंज ( भागलपुर, बिहार ) की बौद्ध प्रतिमा जोकि साढ़े सात फुट ऊँची है और ताम्र निर्मित है। इस काल के सिक्के अत्यंत कलात्मक है। वात्स्यायन कृत कामसूत्र में धातुविद्या को ६४ कलओं में स्थान दिया गया है। कलाविद् आनन्दकुमार स्वामी इस काल को पोत निर्माण का महानतम् युग मानते हैं।

गुप्तोत्तर और पूर्व-मध्यकाल

‘गुप्तोत्तरकाल’ में प्रौद्योगिकी स्तर पर कोई क्रांतिकारी परिवर्तन नहीं हुआ। कृषि की व्यापकता के कारण सिंचाई तकनीक में सुधार अवश्य हुए। राजतरंगिणी से पता चलता है कि ‘खूया’ नामक अभियन्ता नें झेलम नदी पर बाँध बनवाकर सिंचायी के लिए नहरें निकलवायी थीं। चन्देल और परमार शासकों ने बड़ी-२ झीलों और तालाबों का निर्माण कराया। अधिकतर सिंचाई रहट ( अरघट्ट ) से की जाती थी। १३वीं शती के संग्रह रसरत्न समुच्चय में कई तरह की लौह किस्मों का उल्लेख है — मुण्ड, तीक्षा, कान्त आदि। बड़ी-२ शहतीरों ( Beams ) का निर्माण किया जाता था। युद्धास्त्रों के निर्माण कुशलता से किये जाते थे। धातुकार विभिन्न प्रकार के बर्तन, आभूषण, मूर्तियाँ आदि ढालते थे। इनसे सम्बंधित अलग-२ शिल्पकार थे। मूर्ति बनाने वाले के ‘रूपकार’ और पीतल कर्मक को ‘पीतलकार’ कहा गया है। मार्कोपोलो गुजरात के सुविकसित चर्म उद्योग का उल्लेख करता है। वास्तुशास्त्र से सम्बंधित ग्रंथ अपराजितपृक्षा से विदित होता है कि प्रत्येक नगर में पाषाण काम करने वाले दक्ष शिल्पी निवास करते थे। बढ़ई लकड़ी पर नक्काशी करके सुन्दर-२ वस्तुएँ बनाते थे।

दक्षिण भारत में बने तालाब और बाँध तत्कालीन अभियांत्रिक कुशलता के उदाहरण हैं। कावेरी नदी में चोलकालीन श्रीरंगम् द्वीप  के नीचे बनवाया गया बाँध एक उत्कृष्ट उदाहरण है। पल्लव और चोलकालीन कलाकृतियाँ उच्चतम् तकनीकी प्रगति दर्शाती हैं। इसका उत्कृष्ट उदाहरण चोलकालीन नटराज की मूर्तियाँ हैं।

 

प्राचीन भारत में विज्ञान का विकास

 

प्राचीन भारत में गणित का विकास

 

चिकित्सा शास्त्र

 

ज्योतिष और खगोल विद्या

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