भारतीय संस्कार व्यवस्था

भूमिका

’संस्कार’ शब्द का अर्थ है – परिष्कार, पवित्रता या शुद्धता। भारतीय चिंतकों ने संस्कारों की व्यवस्था शरीर को परिष्कृत या संस्कारित करने के उद्देश्य से की है जिससे वह वैयक्तिक और सामाजिक रूप से योग्य बन सके। शबर मुनि के शब्दों में — ‘संस्कार वह क्रिया है जिसके संपन्न होने पर कोई वस्तु किसी उद्देश्य के योग्य बनती है।’ 

संस्कार की प्रमुख विशेषताएँ हैं – पवित्रता, शुद्धता, धार्मिकता और आस्तिकता।

भारतीय चिंतनधारा में यह माना गया है कि व्यक्ति जन्मना असंस्कृत होता है और संस्कारों के माध्यम से वह सुसंस्कृत बनता है। संस्कारों के द्वारा व्यक्ति के अंतर्निहित शक्तियों का विकास या प्रस्फुटन होता है। इन शक्तियों के प्रस्फुटित होने से व्यक्ति अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने में सक्षम हो पाता है। इन्हीं संस्कारों से मनुष्य जीवन की भावी चुनौतियों के लिए तैयार हो पाता है। इसके द्वारा उसका आध्यात्मिक विकास भी होता है। आचार्य मनु के अनुसार – ‘संस्कार व्यक्ति को शुद्ध करके उसके आत्मा का उपयुक्त स्थल बनाता हैं।’

इस तरह मनुष्य-व्यक्तित्व के सर्वांगीण विकास हेतु भारतीय चिंतकों ने संस्कारों की व्यवस्था की है।

संस्कार व्यवस्था की उत्पत्ति

संस्कार शब्द का उल्लेख वैदिक व ब्राह्मण वाड़्मय में नहीं मिलता है। मीमांसक इस शब्द का प्रयोग यज्ञीय सामग्रियों को शुद्ध करने के लिए प्रयोग करते हैं।

वस्तुतः संस्कार व्यवस्था का विधान हमें सूत्र-साहित्यों विशेषकर ‘गृह-सूत्रों’ में मिलता है। सूत्रकाल ( ६०० ई॰पू॰ – ३०० ई॰पू॰ ) में यह व्यवस्था समाज में लोकप्रिय हो चली थी। अधिकांश गृह-सूत्रों में अंत्येष्टि संस्कार का उल्लेख नहीं मिलता है।

स्मृति ग्रन्थों में संस्कारों का उल्लेख मिलता है। इनकी संख्या को लेकर मतभेद है। कहीं ४० तो कहीं ४८ ( गौतम धर्म सूत्र ) संस्कारों का उल्लेख मिलता है। मनुस्मृति में १३ संस्कारों का विवरण मिलता है। बाद की स्मृतियों में संस्कारों की संख्या १६ स्वीकार की गयी। यही १६ संस्कार सर्वप्रचलित और सर्वमान्य हो गये।

संस्कारों के उद्देश्य

भारतीय चिंतकों ने संस्कारों का विधान सोच समझकर किया था। इन संस्कारों के उद्देश्यों को हम दो वर्गों में विभाजित कर सकते हैं —

  • लोकप्रिय उद्देश्य
  • सांस्कृतिक उद्देश्य

लोकप्रिय उद्देश्य

संस्कारों के लोकप्रिय उद्देश्य निम्न थे —

  • शुभता को बढ़ावा और अशुभता का शमन करना
  • भौतिक समृद्धि प्राप्त करना
  • लोकभावनाओं की अभिव्यक्ति

शुभता को बढ़ावा और अशुभता का शमन करना

प्राचीन भारतीयों का विश्वास था कि जहाँ एक शुभ और दैवी शक्तियाँ हमारे जीवन को सकारात्मक रूप से प्रभावित करती वहीं दूसरी ओर अशुभ एवं आसुरी शक्तियाँ नकारात्मक रूप से प्रभावित करने का प्रयास करती रहती हैं।

संस्कारों के माध्यम से इसी शुभता का प्रसस्तीकरण और अशुभता के शमन का विधान किया गया था। इस उद्देश्य के लिए प्रेतात्माओं और आसुरी शक्तियों को आहुति, अन्न आदि देकर शान्त करने का विधान किया गया। गर्भाधान, जन्म, बाल्यकाल आदि समय ऐसी आहुतियाँ दी जाती थीं। साथ ही देवताओं की मंत्रों द्वारा आराधना करके अशुभ शक्तियों के निराकरण किये जाने की भी व्यवस्था की गयी।

ऐसी मान्यता है कि जीवन का प्रत्येक काल किसी देवता द्वारा नियंत्रित होता है। इसीलिए प्रत्येक अवसर पर मंत्रों द्वारा देवताओं का आह्वान किया जाता था जिससे सम्बंधित देवता मनुष्य को आशीर्वाद एवं वरदान प्रदान कर सके। गर्भाधान के समय विष्णुजी, उपनयन के समय बृहस्पति, विवाह के समय प्रजापति आदि का आह्वान करने का विधान है।

भौतिक समृद्धि प्राप्त करना

भारतीयों का ऐसा दृढ़ विश्वास है कि प्रार्थनाओं से देवता प्रसन्न होते हैं और परिणामस्वरूप भौतिक सुख-सुविधा के संसाधन – संतान, पशुधन, दीर्घायु, शक्ति, बुद्धि, सम्पत्ति आदि प्रदान करते हैं। व्यक्ति अपनी भौतिक इच्छा को संस्कारों में की गयी प्रार्थनाओं के माध्यम से पहुँचाता है।

लोकभावनाओं की अभिव्यक्ति 

इस संस्कारों से मनुष्य की भावनाओं का व्यक्तिकरण कह सकते हैं। क्योंकि जन्म, विवाह आदि अवसरों पर व्यक्ति परिवार और समाज के साथ हर्ष और उल्लास व्यक्त करने के लिए समारोह करता है। इसी तरह मृत्यु जैसे दुःख में भी मृतक के संबंधी शोक व्यक्त करते थे। इस तरह की अभिव्यक्ति प्रायः संस्कारों के माध्यम से की जाती है।

सांस्कृतिक उद्देश्य

इन संस्कारों के पीछे उच्च आदर्श निहित हैं। मनुस्मृति के अनुसार संस्कार व्यक्ति की अशुद्धियों का नाश करके उसके शरीर को पवित्र करते हैं। यह मान्यता है कि गर्भस्थ शिशु में कुछ अशुद्धियाँ होती हैं जिसे संस्कारों के माध्यम से दूर किया जाता है।

‘अध्ययन, व्रत, होम, यज्ञ, पुत्रोत्पत्ति से शरीर ब्रह्ममय हो जाता है।’( १ ) ‘प्रत्येक व्यक्ति जन्म से शूद्र होता है, संस्कारों से द्विज हो जाता है, विद्यार्जन से विप्रत्व प्राप्त करता है और इन तीनों द्वारा ही श्रोत्रिय कहा जाता है।’( २ )

’स्वाध्यायेनव्रतैर्होमैस्त्रैविद्येनेज्ययासुतैः। महायज्ञैश्य ब्राह्मीयं क्रियते तनुः॥’( १ )

×× ×× ××

’जन्माना जायते शूद्रः संस्काराद्द्विज उच्यते। विद्यया यातिविप्रत्वं त्रिभिः श्रोत्रियं एवं च॥( २ )

संस्कारों से व्यक्ति को सामाजिक अधिकार और सुविधाओं की प्राप्ति होती है;- यथा – उपनयन संस्कार के बाद व्यक्ति को विद्यारंभ का अधिकार मिलता था और वह द्विज कहलाता था, इसी तरह विवाह संस्कार के बाद वह गृहस्थाश्रम में प्रवेश पाता था और सामाजिक कर्त्तव्यों का वहन करता था।

संस्कार मोक्ष अथवा अपवर्ग प्राप्ति के साधन माने गये हैं। संस्कारों से व्यक्ति का शरीर पवित्र और शुद्ध हो जाता था जिससे कि वह परम पद तक पहुँचता था।

सांस्कारिक उद्देश्यों को हम निम्न बिन्दुओं में देख सकते हैं —

  • नैतिक उद्देश्य
  • व्यक्तित्व का निर्माण और विकास
  • आध्यात्मिक प्रगति

नैतिक उद्देश्य 

संस्कारों से व्यक्ति के जीवन में नैतिक गुणों का विकास होता है। आचार्य गौतम ने चालीस संस्कारों के साथ-साथ आठ गुणों का भी विवरण दिया है और कहा है कि संस्कारों के साथ इन गुणों का आचरण करनेवाला व्यक्ति ही ब्रह्मत्व को प्राप्त करता है। ये गुण हैं — दया, सहिष्णुता, ईर्ष्या न करना, शुद्धता, शान्ति, सदाचरण, लोभ से मुक्ति और लिप्सा का त्याग। प्रत्येक संस्कार के साथ कोई न कोई नैतिक आचरण संयुक्त रहता है।

व्यक्तित्व का निर्माण और विकास

भारतीय संस्कृति में संस्कारों का विधान कुछ इस तरह से किया गया है कि मनुष्य के व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास हो सके। जीवन पथ में ये संस्कार मार्ग दर्शन का कार्य करते हैं। ये संस्कार जीवन की शुरुआत होते ही चरित्र निर्माण पर अनुकूल प्रभाव डालना प्रारम्भ कर देते हैं और प्रतिकूलता का शमन करने के लिए व्यक्ति को तैयार करते हैं। यथा – मुंडन संस्कार से स्वच्छता, उपनयन से शिक्षार्जन, तो विवाह से गृहस्थ आश्रम में प्रवेश करके सामाजिक दायित्वों के निर्वहन को व्यक्ति तैयार होता है। इस तरह संस्कारों को व्यक्ति के लिए अनिवार्य बनाकर मनुष्य के सर्वांगीण विकास का मार्ग प्रशस्त किया गया है।

आध्यात्मिक प्रगति

व्यक्ति के भौतिक प्रगति में सहायक होने के साथ-साथ ये संस्कार आध्यात्मिक उन्नति में भी सहायक हैं। संस्कारों के साथ धार्मिक क्रिया-कलाप भी संबद्ध हैं। इनको सम्पन्न करके मनुष्य भौतिक सुख के साथ-साथ आध्यात्मिक सुख भी प्राप्त करने की कामना करता है। व्यक्ति को यह महसूस होता है कि ये समस्त क्रियाएँ आध्यात्मिक सत्य को प्राप्त करने के साधन हैं। संस्कारहीन एक भारतीय का जीवन नितान्त भौतिक हो जाता। हमारे ऋषियों का दृढ़ विश्वास है कि संस्कारों के विधिवत पालन करने से मनुष्य भौतिक बाधाओं से बचता है और अंततः भवसागर को पार कर जाता है। इस तरह हम कह सकते हैं कि संस्कार व्यक्ति के भौतिक और आध्यात्मिक जीवन के बीच एक सेतु का कार्य करता है।

षोडश संस्कार

ये १६ संस्कारों क्रमशः निम्न हैं :—

१- गर्भाधान, २- पुंसवन, ३- सीमान्तोन्नयन, ४- जातकर्म, ५- नामकरण, ६- निष्क्रमण, ७- अन्नप्राशन, ८- चूड़ाकरण, ९- कर्णवेध, १०- विद्यारम्भ, ११- उपनयन, १२- वेदारम्भ, १३- केशांत, १४- समावर्त्तन, १५- विवाह और १६- अंत्येष्टि।

इस १६ संस्कारों में से प्रथम तीन — गर्भाधान, पुंसवन और सीमान्तोन्नयन जन्म से पूर्व जबकि अंतिम संस्कार अंत्येष्टि मृत्यु के बाद किये जाने वाले संस्कार हैं। अर्थात् कुल १४ संस्कार व्यक्ति के जीवनकाल में किये जाते हैं जबकि ४ संस्कार जन्म पूर्व या मृत्यु के बाद किये जाते हैं।

इन १६ संस्कारों का संक्षिप्त विवरण निम्न है :—

( १ ) गर्भाधान 

१६ संस्कारों में से यह ‘प्रथम संस्कार’ हैं। इसमें पुरुष अपनी भार्या के गर्भ में बीज स्थापित करता है। इस संस्कार का प्रचलन ‘उत्तर-वैदिक काल’ में हुआ। सूत्र साहित्यों और स्मृतियों में गर्भाधान की विस्तृत चर्चा मिलती है। इसके लिए उपयुक्त समय और वातावरण बताये गये हैं।

गर्भाधान के लिए यह आवश्यक है कि स्त्री ऋतुकाल में हो। ऋतुकाल के बाद चौथी से लेकर सोलहवीं रात्रियों को उपयुक्त बताया गया है। अधिकतर गृहसूत्रों और स्मृतियों में चौथी रात को सबसे पवित्र माना गया है। ८वीं, १५वीं, १८वीं और ३०वीं रात तो गर्भाधान के लिए निषिद्ध किया गया है। १६ रात में से प्रथम चार, ११वीं और १३वीं को निंदित जबकि शेष १० को अच्छा बताया गया है।

गर्भाधान के लिए रात के समय को उपयुक्त कहा गया है। दिन में यह संस्कार वर्जित किया गया है। दिन में गर्भ धारण करने पर अभागी, दुर्बल और अल्पायु संतानें प्राप्त होती हैं।( ३ ) परन्तु जो व्यक्ति अपनी पत्नी से दूर विदेश में वास करता है उसके लिए इस नियम में छूट प्रदान की गयी है।

”नार्तवे दिवा मैथुनमर्जयेदल्पभाग्याः अल्पवीर्याश्च दिवाप्रसूयन्तेऽल्पायुषश्चेति।”( ३ )

( प्रश्नोपनिषद )

गर्भाधान के लिए रात का अंतिम प्रहर अभीष्ट माना गया है। समरात्रियों में गर्भाधान होने से पुत्र और विषम रात में पुत्री की प्राप्ति होती है, ऐसी मान्यता है।

विशेष परिस्थितियों में ‘नियोग प्रथा’ द्वारा संतान प्राप्ति का विधान प्राचीन काल में किया गया था। इसमें पति की मृत्यु या नपुंसक होने पर स्त्री सगोत्र पुरुष या पति के भाई से गर्भाधान करवाती थी। परन्तु अधिकांश ग्रंथों में इसकी निंदा की गयी है। मनुस्मृति में इसको पशुधर्म ( ४ ) कहके निंदा की गयी है।

“अयंद्विजैर्हि विद्वद्भिः पशुधर्मो विगर्हितः।”( ४ )

इस संस्कार को प्रत्येक विवाहित दम्पति के लिए अनिवार्य बताया गया है। इसका उद्देश्य स्वस्थ, सुंदर, सुशील और गुणवान संतान प्राप्त करना था। मुनि पाराशर के अनुसार जो पुरुष स्वस्थ होते हुए भी अपनी ऋतुवती भार्या से समागम नहीं करता है वह निःसंदेह भ्रूण हत्या का भागी होता है।( ५ ) इसी तरह ऋतुकाल के स्नान के बाद पत्नी को अपने पति के पास जाना चाहिए। पाराशर के अनुसार ऐसा न करने वाली महिला का अगला जन्म शूकरी के रूप में होता है।

”ऋतुस्नातां तु यो भार्यां सन्निधौ नोपगच्छति।

घोरायां भ्रूणहत्यायां युज्यते नात्र संशयः॥”( ५ )

सामाजिक-धार्मिक रूप से इस संस्कार का महत्त्व है। पुत्र-प्राप्ति के लिये गर्भाधान संस्कार प्रथम महत्त्वपूर्ण संस्कार था। वैदिक युग से ही स्वस्थ और बलिष्ठ संतान उत्पन्न करना प्रत्येक आर्य का कर्तव्य बताया जाता रहा है। निःसंतान मनुष्य समाज में आदर का पात्र नहीं होता था। प्राचीन काल से लोगों की यह धारणा रही थी कि पिता के जितने अधिक पुत्र होंगे वह स्वर्ग में उतना ही सुख पायेगा। ‘पितृ-ऋण’ से मुक्ति भी पुत्र-रत्न की प्राप्ति से मिलती है।

( २ ) पुंसवन

गर्भाधान संस्कार के तृतीय माह में ‘पुत्र-प्राप्ति’ के लिए पुंसवन संस्कार सम्पन्न किया जाता था। पुंसवन का अर्थ है — ‘वह अनुष्ठान अथवा कर्म जिससे पुत्र की प्राप्ति हो।’ ( ६ )

”पुमान् प्रसूयते येन कर्मणा तत्पुंसवनमीरितम्।”( ६ )

इस संस्कार में देवताओं को पूजा द्वारा प्रसन्न किया जाता था। ये देवता गर्भस्थ शिशु की रक्षा करते थे। जब चंद्रमा पुष्य नक्षत्र में होता था तब पुत्र प्राप्ति के लिए यह संस्कार सम्पन्न किया जाता था।

इस संस्कार में रात्रि के समय वटवृक्ष की छाल से रस निकालकर स्त्री की नासिका के दाहिने छिद्र में डाला जाता था। इससे गर्भपात की शंका समाप्त हो जाती थी और विध्न-बाधायें भी समाप्त हो जाती थीं।

तत्कालीन संघर्षरत आर्य जनजीवन में पुत्र प्राप्ति का बड़ा महत्व था। पुत्र की उत्पत्ति से ही एक व्यक्ति पितृ-ऋण से उऋण होता था और परिवार की निरंतरता का वाहक भी वही होता था।

अतः पुंसवन संस्कार का उद्देश्य परिवार तथा इसके माध्यम से समाज कल्याण करना होता था।

( ३ ) सीमान्तोन्नयन

गर्भाधान संस्कार के चौथे से आठवें मास के बीच सीमान्तोन्नयन संस्कार सम्पन्न किया जाता था। इस संस्कार में गर्भस्थ स्त्री के सीमान्त ( केश ) को ऊपर उठाया जाता था।( ७ )

”सीमन्त उन्नीयते यस्मिन्कर्मणि तत्सीमन्तोन्नयनमिति कर्मनामधेयम्।”( ७ )

( वीरमित्रोदय, संस्कार प्रकाश )

ऐसी मान्यता थी कि गर्भवती महिला के शरीर पर अशुभ शक्तियों का प्रभाव होता है इसके निवारण के लिए कुछ धार्मिक कृत्य किये जाने का विधान किया गया था। इसके माध्यम से गर्भवती नारी और गर्भस्थ शिशु दोनों के स्वास्थ और दीर्घायु की कामना की जाती थी।

इस संस्कार के संपन्न होने के दिन स्त्री व्रत रखती थी। पुरुष मातृपूजा करता था और प्रजापति देवताओं को आहुतियाँ दी जाती थीं। इस पूजा के समय वह अपने साथ कच्चे ‘उदुम्बर फलों’ का एक गुच्छा और सफेद चिह्न वाले शाही के काँटे रखे जाते थे। महिला अपने केशों में सुगंधित तेल डालकर यज्ञ मण्डप में प्रवेश करती थी जहाँ वैदिक मन्त्रोंच्चार के बीच उसका पति उसके बालों को ऊपर उठाता था। बाद में गर्भवती स्त्री के शरीर पर लाल चिह्न अंकित किया जाता था जिससे कि अशुभ शक्तियाँ दूर रहें। इस संस्कार के साथ स्त्री को सुख और सांत्वना दी जाती थी।

( ४ ) जातकर्म

शिशु के जन्म के तुरंत बाद और गर्भनाल को काटे जाने से पूर्व ही जातकर्म संस्कार सम्पन्न किया जाता था। इसमें शिशु का पिता सविधि स्नान करके उसे गोद में लेकर सूँधता और उसके कान में आशीर्वचन कहकर बुद्धि और दीर्घायु की कामना करता था। इसके बाद शिशु को मधु और घृत चटाया जाता था। इसके पश्चात् शिशु स्तनपान करता था।

जातकर्म संस्कार के पश्चात ब्राह्मणों को उपहार दिये जाते और भिक्षा दी जाती थी। सभी लोग जच्चा-बच्चा के स्वास्थ्य और दीर्घायु की कामना करते थे।

( ५ ) नामकरण या नामधेय 

शिशु के जन्म के १०वें या १२वें दिन नामकरण संस्कार सम्पन्न किया जाता था। इस संस्कार में शिशु को एक ‘नाम’ दिया जाता था।

आचार्य बृहस्पति के अनुसार नाम ही लोक व्यवहार का प्रथम साधन है। यह गुण और भाग्य के आधार पर रखा जाता है। इसी से मनुष्य को यश प्राप्त होता है। ( ८ )

”नामाखिलस्य व्यवहार हेतुः शुभावहं कर्मसु भाग्य हेतुः।

नाम्नैव कीर्ति लभते मनुष्यस्ततः प्रशस्तं खलु नामकर्म॥”( ८ )

नामकरण संस्कार के लिये शुभ तिथि, नक्षत्र और मुहूर्त का चयन किया जाता था। बच्चे का नाम परिवार, समुदाय और वर्ण को इंगित करनेवाला रखा जाता था। बच्चे को व्यावहारिक नाम दीये जाने की भी परम्परा थी। कन्या का नाम मनोहर, मंगल-सूचक और स्पष्ट और नाम का अंत दीर्घ अक्षर वाला होता था।

मनुस्मृति के अनुसार बच्चे का नाम वर्ण सूचक होना चाहिए। ब्राह्मण का नाम मंगल-सूचक, क्षत्रिय का नाम बल-सूचक, वैश्य का नाम धन-सूचक और शूद्र का नाम निंदा सूचक होना चाहिए।( ९ ) विष्णु पुराण के अनुसार ब्राह्मण अपने नाम के अंत में शर्मा, क्षत्रिय वर्मा, वैश्य गुप्त और शूद्र दास लिखें।( १० )

”मंगलं ब्राह्मणस्य स्यात्क्षत्रियस्य बलान्वितम्।

वैश्यस्य धन संयुक्तं शूद्रस्य तु जुगुप्तसितम्॥”( ९ )

××       ××

”शर्मेति ब्राह्मणस्योक्तं वर्मेतिक्षत्रसंश्रयम्।

गुप्तदासात्मकम् नाम प्रशस्तं वैश्यशूद्रयोः॥”( १० )

नामकरण के संस्कार से पहले गृह की साफ-सफाई की जाती है। माता और शिशु स्नान करते हैं। माता बालक के सिर को जल से भिगोकर एक स्वच्छ कपड़े से ढँककर पिता के गोद में देती है। फिर देवताओं को मंत्रोच्चार व हव्य द्वारा प्रसन्न किया जाता है। पिता बालक के श्वास का स्पर्श करता है और उसका नाम रखा जाता है। संस्कार के बाद ब्राह्मण और सामान्य भोज दिया जाता है।

( ६ ) निष्क्रमण

बालक को उसके जन्म के तृतीय या चतुर्थ माह में यह संस्कार सम्पन्न होता था। इस संस्कार में बालक को पहली बार घर से बाहर निकाला जाता है। यह संस्कार माता-पिता स्वयं सम्पन्न करते थे।

निष्क्रमण संस्कार में घर को स्वच्छ किया जाता है। घर के आँगन में एक चौकोर भाग गोबर और मिट्टी से लीपा जाता था। इस चौक पर स्वस्तिक का चिह्न बनाकर धान छींट दिया जाता है। बच्चे को स्नान कराकर नये परिधान पहनाकर यज्ञ वेदी के सामने करके वैदिक मंत्रों का पाठ किया जाता है। तत्पश्चात् माँ बालक को लेकर घर से बाहर निकलती है और सूर्य का प्रथम बार दर्शन कराती है। इस संस्कार से बालक का घर के बाहरी वातावरण से सम्पर्क प्रारम्भ हो जाता था।

( ७ ) अन्नप्राशन

बालक के जन्म के छठवें माह में अन्नप्राशन संस्कार होता है। इस संस्कार में पहली बार बालक को पका हुआ अन्नप्राशन कराया जाता था।

इसमें दुग्ध, घृत, दही और पका हुआ चावल खिलाने का विधान किया गया है। गृह सूत्रों में इस संस्कार के समय विभिन्न पक्षियों एवं मछलियों के माँस खिलाये जाने का विधान मिलता है। उसकी वाणी में प्रवाह लाने के लिये भारद्वाज पक्षी का माँस और कोमलता लाने के लिये मछली खिलाये जाने का विधान मिलता है। इस संस्कार का उद्देश्य बच्चे को शारीरिक एवं बौद्धिक दृष्टि से स्वस्थ्य बनाना था। कालांतर में दूध और चावल खिलाने की प्रथा प्रचलित हो गयी।

अन्नप्राशन से पूर्व भोज्य पदार्थ को पवित्र वैदिक मंत्रों के बीच पकाया जाता था। सबसे पहले वाग्देवी को आहुति दी जाती थी। अन्त में बालक का पिता सभी भोज्य पदार्थ को मिलाकर बच्चे को खिलाता था।

इस संस्कार के बाद ब्राह्मणों को भोजन कराया जाता था।

इस संस्कार का मुख्य उद्देश्य है कि एक उचित समय पर बच्चा माँ का दुग्ध ( स्तनपान ) छोड़कर अन्नादि से अपना निर्वाह करने के योग्य बन सके।

( ८ ) चूड़ाकरण या चौलकर्म

अन्नप्राशन संस्कार के बाद चौलकर्म संस्कार का विधान किया गया है। इस संस्कार में बालक के बाल काटे जाते हैं। प्राचीन ग्रंथों में इसके समय के बारे में विस्तृत चर्चा की गयी है। गृहसूत्रों में यह कहा गया है कि जन्म के प्रथम या तृतीय वर्ष की समाप्ति से पहले यह संस्कार सम्पन्न किया जाना चाहिए। कुछ स्मृतिकार इसकी अवधि को ५ या ७ वर्ष में बताते हैं। आचार्य आश्वलायन के अनुसार चौलकर्म तृतीय या पंचम वर्ष में करने को प्रशंसनीय कहा गया है फिरभी इसको ७वें या उपनयन संस्कार के समय भी किया जा सकता है।( ११ )

”तृतीय पञ्चमे वाऽब्दे चौलकर्म प्रशस्यते।

प्राग्वासमे सप्तमे वा सहोपनयनेन वा॥”( ११ )

कुछ विद्वानों के अनुसार कुल और धर्म के रीति-रिवाज के अनुसार इसे करना चाहिए — ‘यशाकुलधर्मा वा।’ शुरुआत में यह संस्कार घर में ही सम्पन्न किया जाता था परन्तु बाद में इसको किसी मंदिर या कुलदेवता के समक्ष सम्पन्न किया जाने लगा।

चौलकर्म के लिए एक शुभ दिन और मुहूर्त का चुनाव करके इसको सम्पन्न किया जाता था। शुरू में संकल्प, गणेश पूजन, मंगल श्राद्ध इत्यादि किये जाते थे। माँ बच्चे को स्नान कराकर नये परिधान पहनाकर यज्ञीय अग्नि के पश्चिम की ओर बैठती थी। तत्पश्चात् मंत्रोच्चार और मंगलगान के बीच बालक का चौलकर्म किया जाता था। कटे हुए बाल को गाय के गोबर में रखकर छुपा दिया जाता था। मुंडित सिर पर दही या मक्खन का लेप किया जाता था।

बालों को गोबर में ढँकने के पीछे यह धारणा थी कि बाल भी शरीर के अंग होते हैं, अतः वे शत्रुओं के द्वारा जादू-टोने का शिकार न हो जायें। इसीलिए कटे बाल को सबके पहुँच से बाहर रखा जाता है।

इसको मुंडन संस्कार भी कहा जाता है। इसका उद्देश्य है – बालक स्वच्छता और स्वास्थ्य के महत्त्व से परिचित कराना।

( ९ ) कर्णवेध

कर्णवेध संस्कार में बालक का कान छेदकर उसमें कुंडल या बाली पहनाया जाता है। चिकित्सक सुश्रुत ने कर्णवेध का उद्देश्य रक्षा और अलंकरण बताया है।( १२ ) आगे वे बताते हैं कि कान बिंधा होने से अंडकोश वृद्धि ( Hydrocele ) और आंत्रवृद्धि ( Hernia ) के रोगों से बचाता है।

“रक्षाभूषणनिमित्तं बालस्य कर्णो विध्येत्।”( १२ )

कर्णवेध संस्कार का समय कब हो इस सम्बन्ध में मतभेद हैं। इसे जन्म के १०वें दिन से लेकर ५ वर्ष की आयु के मध्य किये जा सकता है।

कान को वेधने के लिए किस धातु की सुई का प्रयोग किया जाये इसका सम्बन्ध व्यक्ति के सामर्थ्य के अनुसार निर्धारित किया गया है। या यूँ कहें वर्ण के अनुसार वह सूई का प्रयोग करता है। यथा — ब्राह्मण और वैश्य के लिए रजत, क्षत्रिय के लिए स्वर्ण, शूद्र के लिए लोहे की सुई के प्रयोग का विधान किया गया है।( १३ )

”सौवर्णी राजपुत्रस्य राजती विप्रवैश्ययोः।

शूद्रस्य चायसी सूची मध्यमाष्टांगुलात्मिका॥”( १३ )

बालक को पूर्व की ओर मुख करके बिठाया जाता था। उसे मिष्ठान खाने को दिया जाता था। वैदिक मंत्रोच्चार के बीच पहले दाहिना कान तत्पश्चात् बायाँ कान छेदा जाता था।

कर्णवेध संस्कार एक अनिवार्य संस्कार बताया गया है। इसे न करना पाप समझा जाता है। स्मृतिकार देवल के अनुसार — ‘जिस ब्राह्मण का कर्णवेध संस्कार न हो उसे दक्षिणा नहीं देनी चाहिए। जो ऐसे व्यक्ति को दक्षिणा देता है वह असुर या राक्षस होता है।’

( १० ) विद्यारम्भ या अक्षरारम्भ 

जब बालक का मस्तिष्क शिक्षा ग्रहण करने के योग्य हो जाता है तब बच्चे को अक्षरज्ञान कराया जाता है। इसका समय जन्म के ५वें वर्ष या उपनयन संस्कार के पूर्व बताया गया है।

इस संस्कार के लिए कोई शुभ दिन या शुभ मुहूर्त का चुनाव किया जाता है। बालक को स्नान कराकर नये परिधान पहनाकर सुगंधित द्रव्यों से सजाया जाता था। पहले गणेश जी, सरस्वती जी, लक्ष्मी जी और कुलदेवी की पूजा की जाती है। इसके बाद शिक्षक पूर्व दिशा की ओर बैठकर एक पट्टिका पर बालक से ॐ, स्वस्ति, नमः सिद्धाय आदि लिखाता था और इनका तीन बार उच्चारण करवाता है। बालक गुरू की पूजा करता था और वस्त्राभूषण प्रदान करता है। बालक देवताओं की तीन प्रदक्षिणा करता था। उपस्थित ब्राह्मण बालक को आशीर्वाद देते है। संस्कार के सम्पन्न होने पर गुरु को पगड़ी भेंट की जाती है।

इस संस्कार का सम्बन्ध बालक की बुद्धि और ज्ञान है। विद्यारम्भ संस्कार से बालक के अंतर्निहित बौद्धिक गुण प्रकट होकर सामने आते है।

( ११ ) उपनयन

सोलह संस्कारों में से सबसे महत्वपूर्ण यही संस्कार है। इस संस्कार के पश्चात् बालक सम्पूर्ण ज्ञान प्राप्त करने के योग्य या अधिकारी बनता है। बालक के बौद्धिक उत्कर्ष का प्रारम्भ इसी संस्कार से होता है।

उपनयन का अर्थ है — समीप ले जाना। दूसरे शब्दों में शिक्षार्जन के लिए बालक को गुरू के पास ले जाना ही उपनयन है। इसे एक संस्कार के माध्यम से सम्पन्न किया जाता है।

उपनयन की प्राचीनता प्रागैतिहासिक काल तक जाती है। वैदिक काल से ही इसके पर्याप्त विवरण मिलने लगते हैं। ऋग्वेद में ब्रह्मचर्य शब्द का प्रयोग दो स्थानों पर धार्मिक विद्यार्थी के रूप में किया गया है। अथर्ववेद में सूर्य को ब्राह्मण विद्यार्थी के रूप में वर्णित करते हुए अपने गुरु के पास भिक्षा और समिधा के साथ जाते हुए बताया गया है। शतपथ ब्राह्मण में उद्दालक नामक छात्र का उल्लेख मिलता है। सूत्र और स्मृति साहित्यों में इस संस्कार का विस्तार से वर्णन किया गया है।

उपनयन संस्कार की आयु —

  • ब्राह्मण वर्ण के बालक का उपनयन संस्कार ८ वर्ष की आयु में
  • क्षत्रिय वर्ण के बालक का उपनयन संस्कार ११ वर्ष की आयु में
  • वैश्य वर्ण के बालक का उपनयन संस्कार १२ वर्ष की आयु में
    • आचार्य बौधायन के अनुसार उपनयन संस्कार ८ से १६ वर्ष की अवस्था मध्य सम्पन्न हो जाना चाहिए।

यहाँ यह ध्यान देने की बात है कि आयु का विभेद वर्ण के आधार पर नहीं था। इसका कारण यह था कि ब्राह्मण वर्ण का बालक अपने घर पर ही विद्यार्जन शुरु कर देता था अतः उसका उपनयन कम आयु में ही हो जाता था। जबकि अन्य वर्ण के बालक को अपना गृह त्यागकर शिक्षक के घर जाना होता था। इसलिए जब वह माता-पिता से अलग रहने के योग्य हो जाता था तब गुरु के आश्रम को जाता था। यही कारण था कि उसका उपनयन थोड़ा बाद में होता था।

उपनयन संस्कार का उद्देश्य —

  • इसका प्रमुख उद्देश्य शैक्षणिक है।
  • याज्ञवल्क्य के मत से इसका सर्वोच्च ध्येय वेदों का अध्ययन है। उपनयन के बाद आचार्य को अपने शिष्य को वेद और आचार की शिक्षा देनी चाहिए।
  • आपस्तम्ब और भरद्वाज ने भी इसका उद्देश्य शिक्षार्जन बताया है – ‘उपनयनं विद्यार्थस्य श्रुतितः संस्कार इति।’
  • कालांतर में उपनयन संस्कार का उद्देश्य धार्मिक हो गया और इसको एक कर्मकाण्ड की तरह सम्पन्न किया जाने लगा।
  • मनुस्मृति के अनुसार यह संस्कार इहलौकिक और पारलौकिक दोनों को पवित्र बनाता है।

उपनयन संस्कार की विधि —

  • बालक का उपनयन संस्कार एक शुभ घड़ी में सम्पन्न किया जाता है।
  • इस संस्कार के शुभ समय वर्ण के आधार पर विहित किया गया था, यथा –
    • ब्राह्मण बालक का उपनयन संस्कार बसंत ऋतु में किया जाता था।
    • क्षत्रिय बालक का उपनयन संस्कार ग्रीष्म ऋतु में किया जाता था।
    • वैश्य बालक का उपनयन संस्कार पतझड़ ऋतु में किया जाता था।
  • संस्कार से एक दिन पहले की रात्रि में बालक मौन व्रत रखता था और सुबह अपनी माँ के साथ एक ही थाली में भोजन ग्रहण करता था। यह बालक का अपनी माँ के साथ अंतिम भोजन होता था। इसके पश्चात् सिद्धांत रूप में वह अपनी माँ के साथ भोजन नहीं कर सकता था।
    • विद्वान ए॰ एस॰ अल्तेकर कृत ‘Education in Ancient India’ में वे लिखते हैं कि, ‘यह क्रिया बालक को यह याद दिलाने के उद्देश्य से थी कि उसका अनियमित बचपन का जीवन समाप्त हो गया है और आगे उसे नियमित और अनुशासित जीवन व्यतीत करना है।’
    • डॉ॰ राजबली पाण्डेय कृत ‘हिन्दू संस्कार’ के अनुसार – ‘यह माता और पुत्र विदाई-भोज भी कहा जा सकता है जो पुत्र के प्रति माँ के वात्सल्य का द्योतक है।’
  • संस्कार सम्पन्न होने से एक दिन पहले बालक गणेश, मेधा, लक्ष्मी, धृति, श्रद्धा, सरस्वती आदि की पूजा करता था।
  • संस्कार के दिन बालक का मुंडन करवाकर स्नान कराके कौपीन वस्त्र पहनाया जाता था। उसके कमर के चारों ओर एक मेखला बाँध दी जाती थी। इस मेखला में तीन डोरियाँ होती थीं। इस तीन डोरी का प्रतीकात्मक यह अर्थ था कि वह अब तीन वेदों से घिरने वाला है – ‘वेदत्रयेणावृत्तोहमिति मन्यते स द्विजः।’
  • इस अवसर पर वैदिक मंत्रोंच्चार के द्वारा बालक को यह बताया जाता है कि – ‘मेखला श्रद्धा की पुत्री और ऋषियों की भगिनी है, उसकी शुद्धता और पवित्रता की रक्षा करने की शक्ति से युक्त है एवं बुराइयों से उसे दूर रखेगी।’
  • अब बालक गुरु प्रदत्त उत्तरीय वस्त्र धारण करता था।
  • इसके पश्चात् बालक जनेऊ ( यज्ञोपवीत ) धारण करता था।
    • गृहसूत्रों से ज्ञात होता है कि जनेऊ धारण करने प्रथा नहीं थी। जनेऊ के स्थान पर उत्तरीय ही पहना जाता था। परन्तु समय के साथ उत्तरीय का स्थान जनेऊ ने ले लिया।
    • जनेऊ के प्रकार का निर्धारण वर्ण के आधार पर विहित किया था – ‘ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य वर्ण के विद्यार्थी क्रमशः कपास, ऊन और सन की जनेऊ धारण करें।’( १४ ) कालान्तर में सभी के लिए कपास की जनेऊ धारण करने को मान्यता दे दी गयी।

‘कर्पासमुपवीतं स्याद्विप्रस्योर्ध्यवृतं त्रिवृत्।

शणसूत्रमयं राज्ञो वैश्यस्याविक सूत्रजम्॥’( १४ ) ( मनुस्मृति )

    • जनेऊ में तीन धागे या डोरियाँ होती हैं —
      • यह त्रिगुणों – सत, रज और तम का प्रतीक होतीं हैं।
      • साथ ही यह ये भी याद दिलाती हैं कि उसे त्रिऋणों – ऋषि, देव और पितृ ऋण से मुक्त या उऋण होना है।
    • गुरू बालक को जनेऊ पहनाते समय उसके बल, दीर्घायु और तेज का कामना करता है।( १५ )

‘यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं प्रजापतेर्यत्सहजं पुरस्तात्।

आयुष्यमग्रयं प्रतिमुञ्च शुभ्रं यज्ञोपवीतं बलमस्तु तेजः॥’( १५ ) ( पारस्कर गृहसूत्र )

    • ब्रह्मचारी केवल एक जनेऊ पहनता था जबकि गृहस्थ के लिए दो जनेऊ पहनने का विधान किया गया था।
  • जनेऊ या यज्ञोपवीत के बाद विद्यार्थी को मृगचर्म ( अजिन् ) और दण्ड दिया जाता था। ये दण्ड किस लकड़ी के होंगे इसका विधान भी वर्णानुसार विहित किया गया था –
    • ब्राह्मण विद्यार्थी के लिए पलाश का दण्ड।
    • क्षत्रिय विद्यार्थी के लिए उदुम्बर ( गूलर ) का दण्ड।
    • वैश्य विद्यार्थी के लिए विल्व ( बेल ) का दण्ड।
  • इस विधि से तैयार विद्यार्थी के अंजलि में गुरु द्वारा जल डाला जाता था और इससे वह पवित्र होता था।
  • अब उसे सूर्य का दर्शन कराया जाता था। सूर्य दर्शन से विद्यार्थी को अनुशासन और कर्त्तव्य-परायणता का बोध कराया जाता है।
  • गुरु विद्यार्थी के हृदय को स्पर्श करके अपनत्व का भाव दर्शाता है।
  • विद्यार्थी को एक पाषाण शिला पर खड़ा किया जाता है। इसका उद्देश्य अपने उद्देश्य में दृढ़ रहने से है।
  • तत्पश्चात् गुरु विद्यार्थी का दायाँ हाथ अपने हाथ में लेकर उसे गायत्री मंत्र के उपदेश के साथ अंगीकृत कर लेता है। सावित्री मंत्र के ज्ञान से बालक का दूसरा जन्म होता है। अबसे आचार्य उसका पिता और सावित्री उसकी माँ मानी जाती हैं।( १६ )

’तत्रास्य माता सावित्री पिता त्वाचार्य उच्यते।’( १६ ) ( मनुस्मृति )

  • गायत्री मंत्र ऋग्वेद के तृतीय मंडल में है जिसके द्रष्टा ऋषि विश्वामित्र हैं। यह मंत्र इस प्रकार है – ‘हम परब्रह्म और उसकी महिमा का ध्यान करते हैं, जिसने ब्रह्माण्ड ( भूलोक – भूर, भुव – अंतरिक्ष / अधोलोक, स्वाह – स्वर्गलोक ) को बनाया है, जो पूजा के योग्य है, जो सभी पापों और अज्ञानता को दूर करनेवाले हैं। वह हमारी बुद्धि को प्रेरित करें।’( १७ )

‘ॐ भूर्भुवः स्वः,

तत् सवितुर्वरेण्यम्,

भर्गो देवस्य धीमहि।

धियो यो नः प्रचोदयात्॥’( १७ )

  • सावित्री का ज्ञान ( गायत्री मंत्र ) मिलने के बाद यज्ञीय अग्नि प्रज्ज्वलित की जाती है और उसमें आहुतियाँ डाली जाती है।
  • तत्पश्चात् विद्यार्थी भिक्षाटन के लिए जाता है। भिक्षाटन उसमें नम्रता और सदाचारिता का पोषण करती है। अबसे वह समाज पर आश्रित हो जाता है और उसके निर्वहन का उत्तरदायित्व समाज उठाता है।

उपनयन संस्कार का महत्व —

हिन्दू समाज का यह प्राचीन काल से ही अनिवार्य अंग रहा है। इसका विधान समाज के तीन वर्णों – ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य के लिए ही किया गया था। इन तीनों को संयुक्त रूप से द्विज कहा जाता था। द्विज का शाब्दिक अर्थ है – द्वितीय जन्म, अर्थात् उपनयन संस्कार के बाद बालक का दूसरा जन्म होता है।

उपनयन संस्कार का सामाजिक और आध्यात्मिक दोनों प्रकार से महत्व है –

  • उपनयन संस्कार के बाद ही बालक अपने वर्ग और समाज का पूर्ण सदस्य बनता था। इसी के बाद उसे अपने पूर्वजों के सांस्कृतिक विरासत को प्राप्त करने का अधिकार मिलता था।
  • इस संस्कार के बाद वह वेद और वेदांगों के अध्ययन का अधिकार पा जाता था। वह सावित्री मंत्र का उच्चारण अब कर सकता था।
  • बालक की सामाजिक प्रतिष्ठा बढ़ जाती थी और वह ‘आर्य’ के सभी अधिकारों का उपभोग कर सकता था।
  • बालक को निर्धारित कर्त्तव्यों और उत्तरदायित्वों का वहन करना होता था साथ ही उसके लिए आशाओं व आकांक्षाओं के नये द्वार खुलते थे।
  • यहाँ से बालक के समाज के पूर्व ज़िम्मेदार नागरिक बनने की यात्रा की शुरुआत होती थी। जिसमें उसके व्यक्तित्व का सम्पूर्ण विकास होता था।
  • बालक का चंचल जीवन अब कठोर और अनुशासित जीवन में बदल जाता था।
  • बालक एक विद्यार्थी या ब्रह्मचारी के रूप में जब यह सांस्कारिक यात्रा पूर्ण करके निकलता था तब एक प्रकाण्ड विद्वान और सामाजिक नागरिक बनकर उभरता था।

‘अतः निष्कर्ष रूप में हम कह सकते हैं कि उपनयन संस्कार के आदर्श अत्यंत उच्च कोटि के थे।’

( १२ ) वेदारम्भ

वेदारम्भ संस्कार का उल्लेख सर्वप्रथम ‘व्यास स्मृति’ में प्राप्त होता है। शुरुआती चरण में उपनयन और वेदाध्ययन प्रायः एक साथ ही प्रारम्भ हो जाता था। वैदिक अध्ययन ‘गायत्री मन्त्र’ से शुरू हो जाता था। शनैः शनैः इस स्थिति में बदलाव आने लगा। वैदिक अध्ययन मंद पड़ने लगा। संस्कृत बोलचाल की भाषा नहीं रही। उपनयन एक शारीरिक एक शारीरिक संस्कार बन गया और विद्यार्थी वेदों के अध्ययन के स्थान पर अपनी भाषा में शिक्षा ग्रहण करने लगा। ऐसी स्थिति में व्यवस्थाकारों ने वैदिक अध्ययन परम्परा को बनाये रखने के लिए एक नवीन संस्कार का सृजन किया। इस संस्कार से वेदों के अध्ययन का प्रारम्भ होता था अतः इसको वेदारम्भ संस्कार नाम दिया गया। यह पूर्णरूप से एक ‘शैक्षणिक संस्कार’ था।

  • इस संस्कार की शुरुआत ‘मातृपूजा’ से की जाती थी।
  • इसके बाद शिक्षक लौकिक अग्नि प्रज्ज्वलित करके विद्यार्थी को उसके पश्चिम दिशा में बिठाता था और यज्ञवेदी में विद्यार्थी आहुतियाँ देता था जो इस प्रकार है —
    • ऋग्वेद के अध्ययन की शुरुआत के लिए पृथ्वी और अग्नि को घृत आहुतियाँ दी जाती थीं।
    • यजुर्वेद के अध्ययन की शुरुआत के लिए अंतरिक्ष और वायु को घृत आहुतियाँ दी जाती थीं।
    • सामवेद के अध्ययन की शुरुआत के लिए द्यौस और सूर्य को घृत की आहुतियाँ दी जाती थीं।
    • अथर्ववेद के अध्ययन की शुरुआत के लिए दिशाओं और चंद्रमा को घृत की आहुतियाँ दी जाती थीं।
    • यदि सभी वेदों का अध्ययन प्रारम्भ करना हो तो सभी देवताओं आहुतियाँ देने का नियम था।
  • इन विधियों के करने के बाद पुरोहित अर्थात् स्थानापन्न पुरोहित को दक्षिणी जाती थी।
  • अब गुरू विद्यार्थी को वेद का ज्ञान देना शुरू करता था।
  • स्मृतिकार मनु का विचार है कि वेद अध्ययन के शुरुआत में और अंत में ‘ॐ’ का उच्चारण करना चाहिए। उनका मत है कि शुरू और अंत में प्रणव शब्द का उच्चारण न करने से अध्ययन नष्ट हो जाता है और नहीं ठहरता है।( १८ )

’ब्रह्मणः प्रणवः कुर्यादादावन्ते च सर्वदा।

स्रवत्यनोङ्कृतं पूर्वं पुरस्ताच्च विशीर्ति॥’( १८ )

( १३ ) केशान्त या गोदान

शिक्षक के पास रहकर अध्ययन करते करते जब छात्रा आयु १६ वर्ष की हो जाती थी तब उसकी प्रथम बार दाढ़ी और मूँछ बनवायी जाती थी। इसको ‘केशान्त संस्कार’ नाम दिया गया था। इस संस्कार के अवसर पर गुरू को एक गाय दक्षिणा के रूप में दी जाती थी इसलिए इसको ‘गोदान संस्कार’ भी कहा जाता था।

केशान्त संस्कार का उद्देश्य विद्यार्थी को ब्रह्मचर्य जीवन के नियमों को पुनः याद दिलाने के लिए किया जाता था। इसके माध्यम से वह इन कठोर विधियों के पालन का पुनः संकल्प करता था।

यह संस्कार एक प्रकार से चूड़ाकर्म जैसा ही था। इसमें नापित वैदिक मन्त्रोंच्चार के वातावरण में विद्यार्थी का दाढ़ी-मूँछ काटता था। बालों को पानी में प्रवाहित कर दिया जाता था।

तदुपरांत विद्यार्थी अपने गुरु को एक गाय का दान करता था।

अंत में विद्यार्थी मौन व्रत धारण करता था।

साथ ही वह एक वर्ष हेतु कठोर अनुशासित जीवनचर्या का पालन करता था।

( १४ ) समावर्तन 

समावर्तन संस्कार का शाब्दिक अर्थ है – ‘गुरू के आश्रम से अपने घर लौटना।’ गुरुकुल में शिक्षापद लेने के बाद समावर्तन संस्कार सम्पन्न किया जाता था। इसको ‘स्नान’ भी कहा जाता था। इसका कारण यह था कि इस अवसर पर स्नान एक प्रमुख कार्य था। इसी संस्कार के बाद विद्यार्थी ‘स्नातक’ बनता था।

इस संस्कार हेतु आयु का निर्धारण नहीं किया गया था। इसके लिए यही आवश्यक था कि जब विद्यार्थी अपना अध्ययन पूर्ण कर लेता था तब इस संस्कार को सम्पन्न किया जाता था।

विद्वान राजबली पाण्डेय जी का मत है कि यह कुछ-कुछ आधुनिक दीक्षान्त समारोह जैसा ही था।

यह उन्हीं छात्रों का होता था जो ब्रह्मचर्य आश्रम के व्रतों का पालन करते हुए विधिवत् अपनी शिक्षा पूरी कर लेता था।

‘तत्र समावर्तनं नाम वेदाध्ययनान्तरम् गुरुकुलात् स्वगृहागमनम्।’

यह संस्कार किसी शुभ दिन को किया जाता था। इस दिन विद्यार्थी प्रातःकाल एक कमरे में निरुद्ध हो जाता था। ऐसा इसलिए किया जाता था क्योंकि यह मान्यता थी कि सूर्य ब्रह्मचारी के तेज से ही प्रकाशित होता है अतः वह अवमानित न हो।

दिन के मध्याह्न में विद्यार्थी कमरे से बाहर निकलता और अपने गुरु के चरण स्पर्श करता है। वैदिक अग्नि में समिधा डालकर अपने गुरु के प्रति विद्यार्थी श्रद्धांजलि व्यक्त करता था।

आठ कलशों में जल रखे जाते थे जो इस बात का सूचक है कि ब्रह्मचारी को आठों दिशाओं से प्रशंसा और सम्मान प्राप्त है। इस कलश के जलों से विद्यार्थी स्नान करता है और देवताओं की प्रार्थना करता है।

स्नानोपरांत विद्यार्थी दण्ड, मेखला, मृगचर्म आदि का परित्याग करके नया कौपीन वस्त्र धारण करता है। दाढ़ी-मूँछ, बाल, नाखून आदि कटवाकर वह पवित्र बनता था।

यह संस्कार एक प्रकार से उसके कठोर जीवन के समाप्ति की घोषणा जैसी होती है।

गुरू उसे आनन्द और विलासिता की सामग्रियाँ प्रदान करते हैं। उसके शरीर पर सुगंधित लेपन किया जाता है। उसको नये वस्त्र, आभूषण, छत्र आदि दिये जाते है। सुरक्षा के लिए उसको बाँस का डण्ड भी दिया जाता है।

इस अवसर पर स्नातक अपने आचार्य को अपने सामर्थ्य के अनुसार गुरु दक्षिणा देता है। प्राचीन साहित्यों में ऐसा भी उल्लेख मिलता है कि कभी-कभी गुरू विद्यार्थी की सेवा से प्रसन्न होकर उसकी सेवा और भक्ति को ही गुरु दक्षिणा मान लेता था।

अंत में स्नातक अपने आचार्य की आज्ञा और आशीर्वचन लेकर अपने घर को प्रस्थान करता है।

इसी संस्कार से व्यक्ति गृहस्थ आश्रम में प्रवेश के योग्य बनता था।

( १५ ) विवाह

सोलह संस्कारों में से विवाह संस्कार सबसे महत्वपूर्ण संस्कार है। गृहस्थ आश्रम में प्रवेश इसी संस्कार के माध्यम से होता है।

विवाह शब्द ‘वि’ उपसर्ग और ‘वह’ धातु से मिलकर बना है। विवाह का शाब्दिक अर्थ है — ‘वधू को वर के गृह ले जाना अथवा पहुँचाना।’

भारतीय समाज में विवाह को एक पवित्र संस्था माना गया है। विवाह पति और पत्नी को एक पवित्र बंधन में आबद्ध करते हैं। इसका उद्देश्य दोनों ( पति व पत्नी ) के द्वारा पारस्परिक सहयोग से विभिन्न पुरुषार्थों का वहन करना और सामाजिक दायित्वों का निर्वहन करना है।

विवाह को एक यज्ञ के समान माना गया है। यहाँ तक कहा गया है की ‘एकाकी जीवन एकांगी है वह पूर्ण तभी होता है जब भार्या का सहयोग उसे प्राप्त हो।’( १९ )

‘अयो अर्द्धो व एव आत्मनः यत्पत्नीः।’ ( १९ ) 

( तैत्तिरीय ब्राह्मण )

जब समाज में त्रि-ऋणों की अवधारणा लोकप्रिय हुई तो विवाह संस्कार और अधिक मजबूत हुई। क्योंकि पितृ-ऋण से उऋण विवाहोपरान्त ही हुआ जा सकता था।

पाश्चात्य संस्कृति में विवाह को एक संविदा ( contract ) माना गया है जबकि भारतीय संस्कृति में इसे कभी न समाप्त होने वाली संस्था मानी गयी है।

विवाह संस्कार मात्र यौन सुख के लिए नहीं है बल्कि इससे बढ़कर है। विवाह के साथ व्यक्तिगत विकास तो होता ही था साथ ही वह सामाजिक दायित्वों का भी निर्वहन करता था। विवाहोपरान्त ही एक व्यक्ति समाज का पूर्ण और सम्यक् सदस्य बनता था।

विवाह को सभी के लिए अनिवार्य बताया गया है। याज्ञवल्क्य ने इस सम्बन्ध में कहा है — ‘ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र कोई भी हो, यदि वह अविवाहित हैं तो कर्म के योग्य नहीं है।’( २० )

’अपत्नीको नरो भूप कर्मयोग्यो न जायते।

ब्राह्मणः क्षत्रियो वापि वैश्यः शूद्रोऽपि वा नृपः॥’( २० )

( १६ ) अन्त्येष्टि संस्कार

अन्त्येष्टि मानव जीवन का अंतिम संस्कार है। यह मृत्यु के समय किया जाने वाला संस्कार है। इसका उद्देश्य मृतात्मा को परलोक में सुख और शान्ति प्रदान करना है।

इस सम्बन्ध में बौधायन का विचार है — ‘जन्म के बाद के संस्कारों से व्यक्ति इहलोक जीतता है और इस ( अंत्येष्टि ) संस्कार द्वारा वह परलोक की विजय करता है।’( २१ )

’जातसंस्कारेणेमं लोकमभिजयति, मृत संस्कारेणामुं लोकम्।’( २१ )

अंतिम संस्कार की प्राचीनता प्रागैतिहासिक काल तक जाती है। उस समय के मानव का भी यह विश्वास रहा है कि मृत्यु के बाद भी शरीर का सम्पूर्ण विनाश नहीं होता है, बल्कि व्यक्ति का अस्तित्व किसी न किसी रूप में बना रहता है। प्रागैतिहासिक काल के मिले विभिन्न शवाधानों में रखी गयीं उपयोगी सामग्रियों के अवशेष इसी तथ्य की पुष्टि करती हैं।

जैसे-जैसे मानव संस्कृति का विकास हुआ इन मान्यताओं का भी परिष्कार हुआ। कालान्तर में भारतीय संस्कृति में आत्मा की नित्यता का सिद्धान्त प्रतिपादित किया गया। इसी आत्मा की शान्ति और परलोक में सुखपूर्वक निवास के लिए अन्त्येष्टि संस्कार का विधान किया गया है।

भारतीय संस्कृति के हड़प्पा सभ्यता के कालखंड में हमें जलाना, गाड़ना, अस्थिमंजूषा ( कलश शवाधान ), आंशिक शवाधान जैसी विधियों के साक्ष्य मिलते हैं। ये सभी विधियाँ भारतीय समाज में आज भी प्रचलित हैं। हिन्दूओं ने दाह संस्कार को अपनाया।

अंतिम संस्कार कोई एक दिन होने वाली प्रक्रिया नहीं है। यह तो मृत्यु के समय से १३ दिन तक चलती है। मृत्यु के समय गोदान व मरणासन्न व्यक्ति को पवित्र तुलसी का पत्ता व गंगा जल पिलाया जाता है। मृतक को मुखाग्नि उसका सबसे नजदीकी व्यक्ति ( पुत्र / पौत्र / भाई / पति आदि में से कोई ) करता है। अस्थि अवशेष को संग्रह करके पवित्र गंगा नदी में प्रवाहित किया जाता है। १३ दिवसीय कार्यक्रमों में भाई को भोज ( कुल के सदस्यों को ), महाभोज ( १०वें दिन ) और १३वें दिन तेरहवीं की जाती है। इन तेरह दिनों में प्रत्येक दिन पिंडदान किया जाता है और १३वें दिन अंतिम पिंडदान होता है।

यह अंतिम संस्कार यहीं समाप्त नहीं होता है। हिन्दू पंचांग के सातवें माह अर्थात् आश्विन माह में पितृ पक्ष आता है जिसमें वह अपने पित्रों का तर्पण और श्राद्ध करता है। यह प्रक्रिया तब तक चलती है जब तक वह सपत्नी जाकर बिहार राज्य के गया में पिण्डदान नहीं कर देता है।

निष्कर्ष 

इस सम्पूर्ण विवेचन से स्पष्ट होता है कि संस्कारों के आदर्श बड़े ही उदात्त हैं। इनको व्यक्ति के सर्वांगीण विकास के लिए विहित किया गया है। इनके माध्यम से व्यक्ति का भौतिक और आध्यात्मिक दोनों तरह की प्रगति होती है। जीवनयात्रा के विविध चरणों में सम्पन्न होने वाली इन संस्कारों से मनुष्य के व्यक्तित्व का परिष्कार होता है। व्यक्ति इनको सम्पन्न करते हुए स्वयं की उन्नति करते हुए परिवार और समाज के विकास में सहायक बनता है। वह धार्मिक जीवन जीते हुए अंततः परम लक्ष्य मोक्ष को उपलब्ध होता है।

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