भारतीय दर्शनों की सामान्य विशेषताएँ

भूमिका

भारतीय दर्शनों को सामान्यतः दो वर्गों में रखा गया है — आस्तिक और नास्तिक। चार्वाक, बौद्ध और जैन दर्शन को छोड़कर शेष छः दर्शन आस्तिक वर्ग में रखे गये हैं। इन दर्शनों में परस्पर विभिन्नताएँ होते हुए भी सर्व-निष्ठता पायी जाती है। कुछ सिद्धान्तों की प्रामाणिकता को सभी मान्यता देते हैं। एक जैसी भौगोलिक भूमि पर पनपने के कारण इन सभी पर भारतीयता की छाप स्पष्ट दिखती है। इस तरह भारतीय दर्शनों में अंतर्निहित साम्यता दिखायी देती है उसे ही ‘भारतीय दर्शनों की सामान्य विशेषताएँ’ कहा जाता है।

भारतीय दर्शनों की सामान्य विशेषताएँ

भारतीय दर्शनों की सामान्य विशेषताएँ निम्न हैं :-

  • दुःखमय संसार
  • आत्मा की सत्ता में विश्वास
  • कर्म सिद्धान्त
  • पुनर्जन्म
  • व्यावहारिकता
  • मोक्ष विचार
  • अज्ञान बंधन का मूल कारण
  • ज्ञान का महत्त्व
  • अनवरत चिन्तन, अभ्यास और योग को महत्त्व
  • संसार एक रंगमंच है
  • आत्म-संयम
  • धर्म और दर्शन का समन्वय
  • प्रमाण-विज्ञान
  • भूत के प्रति दृष्टिकोण
  • जगत् विचार

दुःखमय संसार

भारतीय दर्शनों की एक प्रमुख विशेषता है कि संसार को दुःखमय माना गया है। भारतीय दर्शन का विकास आध्यात्मिक असंतोष से हुआ है। विभिन्न दुःखों; यथा – रोग, जरा-मृत्यु आदि जैसे दुःखों के कारण मानव का मन सदैव अशांत बना रहा।

बुद्ध का प्रथम आर्य सत्य ही स्पष्ट रूप से कहता है — सब्बं दुःखं, अर्थात् सभी वस्तुएँ दुःखमय हैं। वे कहते हैं — जन्म भी दुःख है, जरा भी दुःख है, व्याधि भी दुःख है, मृत्यु भी दुःख है, अप्रिय मिलन भी दुःख है और प्रिय वियोग भी दुःख है। इस तरह संसार दुःखमय है।

बुद्ध के प्रथम आर्य सत्य को सांख्य, योग, न्याय, वैशेषिक, शंकर, रामानुज, जैन आदि सभी मानते हैं।

सांख्य दर्शन में संसार को ‘दुःख का सागर’ कहा गया है।

यहाँ पर दुःखों के तीन प्रकार बताये गये हैं :-

  • आध्यात्मिक दुःख – अर्थात् मानसिक और शारीरिक दुःख।
    • मानसिक दुःख – क्रोध, लोभ जैसे मनोविकार।
    • शारीरिक दुःख – रोग, व्याधि आदि।
  • आधि-भौतिक – अर्थात् बाह्य जगत् के प्राणियों से प्राप्त दुःख ; जैसे – मच्छर, सर्प आदि का काटना।
  • आधि-दैविक – अप्राकृतिक शक्तियों से मिलने वाले दुःख; जैसे – प्राकृतिक शक्तियों, भूत-प्रेत आदि से प्राप्त।

भारतीय दार्शनिकों ने सुखानुभूति को भी अंततः दुःखमय बताया है। उपनिषद् और श्रीमद्भागवदगीता में संसार की अपूर्णता की ओर संकेत किया गया है। सांसारिक सुखों को वास्तविक व स्थायी समझना अदूरदर्शिता का परिचायक बताया गया है।

अब प्रश्न यह उठता है कि क्या भारतीय दर्शन निराशावादी ( Pessimistic ) हैं?

कुछ पाश्चात्य विचारकों ने भारतीय दर्शन को निराशावादी माना है।

निराशावाद के अनुसार संसार विषादमय है। इसके अनुसार संसार में आशा का संदेश नहीं है। संसार अंधकारयुक्त व दुःखमय है।

निराशावाद का विपरीत सिद्धान्त है – आशावाद, जिसके अनुसार संसार सुखमय है और व्यक्ति आशावान रहता है।

निःसंदेह यहाँ के दर्शनों ने संसार को दुःखमय कहा है। परन्तु वे यह कहकर रुक नहीं गये, वरन् दुःख से मुक्ति पाने के लिए प्रयत्नशील होते हैं और प्रत्येक दार्शनिक दुःख से छुटकारा पाने के लिए आश्वस्त करता है। दुःख निरोध के लिए विभिन्न मार्ग बताये गये और सभी का लक्ष्य अंततः दुःख से मुक्ति पाना है। इसी दुःख से मुक्ति की अवस्था को ‘मोक्ष’ कहा गया है।

चार्वाक को छोड़कर सभी दर्शनों में मोक्ष की मान्यता है।

मोक्ष को एक ऐसी अवस्था बताया गया है जिसमें दुःखों का पूर्णतः अभाव है। कुछ इस अवस्था को आनन्दमय बताते हैं।

प्रत्येक दर्शन मोक्ष तक पहुँचने के मार्ग को बताते हैं :-

  • बुद्ध ने अष्टांगिक मार्ग बताया।
  • महावीर ने त्रिरत्न के अनुशीलन को कहा।
  • गीता में ज्ञान, भक्ति और कर्म की त्रिवेणी मिलती है। इत्यादि ।

इस तरह भारतीय दर्शनों में मोक्ष और मोक्ष तक पहुँचने के मार्ग की सम्यक् चर्चा होने के कारण इन्हें निराशावादी नहीं कहा जा सकता है।

जर्मन विद्वान मैक्समूलर के शब्दों में —

”If, therefore, all Indian philosophy profess its ability to remove pain, it can hardly be called pessimistic in the ordinary sense of world.”

Prof. Maxmuller- Six System of Indian Philosophy.

निराशावाद का अर्थ है – ‘कर्म का परित्याग कर देना।’ निराशावादी दर्शन उसे ही कहा जा सकता है जो कर्म से पलायन की बात करता हो। परन्तु भारतीय चिंतनधारा ऐसा विचार नहीं प्रस्तुत करते है, बल्कि सम्यक् कर्म या निष्काम कर्म करने को निर्देशित करते हैं। अतः इस अर्थ में भारतीय दर्शन निराशावादी नहीं है।

”There was not the slightest tendency to shrink the duties of this life.”

Dr. Das Gupta- A history of Indian Philosophy.

भारतीय दर्शन आध्यात्मिकता से ओतप्रोत है। अतः इस दृष्टिकोण से भी इसे निराशाजनक नहीं कहा जा सकता है।

”Spiritualism means the affirmation of an eternal moral order and letting loose of hope.”

Prof. Maxmuller – Pragmatism.

भारतीय के समसामयिक नाटक सुखान्त हैं जो कि निराशावादी दृष्टिकोण के विपरीत है। भारतीय साहित्य जब आशावाद का संचार करते हों तो यहाँ के दर्शन को निराशावादी कैसे कहा जा सकता है?

तो फिर भारतीय दर्शनों पर निराशावादी होने का आक्षेप क्यों किया जाता है? भारतीय चिंतक सांसारिक कष्टों को देख कर विकल होकर सब्बं दुःखं जैसी बात करता है परन्तु वह यहीं रुकता नहीं है बल्कि उसे दूर करने का मार्ग सुझाता है। इस तरह भारतीय दर्शन शुरू में निराशावादी दिखता है, पर अंततः वह है नहीं।

“Indian thinkers are pessimistic in so far as they look upon the world as an evil and lie; they are optimistic since they feel that there is a way out of it.”

Dr. Radhakrishnan- Indian Philosophy.

अतः निराशावाद भारतीय दर्शन का आधार-वाक्य ( Premise ) है, निष्कर्ष नहीं।

भारतीय दर्शन की तुलना एक ऐसे वियोगीनी से की गयी है, जो अपने प्रियतम् से अलग है, परन्तु मिलन का दृढ़ विश्वास भी उसे है। ( भारतीय दर्शन का इतिहास – डॉ० देवराज, डॉ० तिवारी )

अतः भारतीय दर्शन का प्रारम्भ निराशावाद से होता है परन्तु उसका अंत आशावाद में होता है। भारतीय दर्शन की शुरुआत तो दुःख से होता है परन्तु अंततः चिंतक दुःख से छुटकारा पाने को प्रयासरत होते हैं।

भारतीय दर्शन की शुरुआत निराशावादी क्यों है?

  • इस सम्बन्ध में प्रो० बोसांके का कहना है कि — I believe in optimism, but I add that no optimism is worth its salt that does not go all the way with pessimism. ( Social and International Ideas )
  • Optimism seems to be more immoral than pessimism, for pessimism warns us of dangers, while optimism lulls into fals security. — G.H. PALMER; Contemporary American Philosophy.

इस प्रकार भारतीय दर्शन का प्रारम्भ निराशावाद से होता है और यह प्रमाण-पुष्ट है। निराशावाद, आशावाद को सार्थकता प्रदान करता है। अतः पाश्चात्य विद्वानों द्वारा भारतीय दर्शनों को पूर्णतः निराशावादी कहना भ्रान्तिमूलक है।

आत्मा की सत्ता में विश्वास

चार्वाक दर्शन को छोड़कर प्रत्येक दर्शन में आत्मा की सत्ता में विश्वास व्यक्त किया गया है। भारतीय मनीषियों का कहना है कि आत्मनं विद्धि ( Known thyself ).

आत्मा में विश्वास करने के कारण भारतीय दर्शन आध्यात्मिक हो जाते हैं।

आत्मा के सम्बन्ध में विभिन्न विचारकों ने विभिन्न विचार दिये हैं —

  • यहाँ पर आत्मा को सामान्यतः अमर माना गया है। आत्मा शरीर से भिन्न है, वह अविनाशी है जबकि शरीर का विनाश होता है।
  • चार्वाक् आत्मा और शरीर को अलग नहीं मानते हैं। उनके अनुसार चैतन्यविशिष्ट शरीर ही आत्मा है। शरीर विनाशी है और आत्मा भी। शरीर के विनाश के साथ आत्मा का भी विनाश हो जाता है अर्थात् आत्मा अविनाशी नहीं है। चार्वाक के इस मत को देहात्मवाद कहा गया है। इस तरह चार्वाक् के आत्मा सम्बन्धी विचार को भौतिकवादी मत कहा जाता है।
  • बुद्ध क्षणिक आत्मा की सत्ता को मानते हैं। बुद्ध कहते हैं की आत्मा चेतना का प्रवाह ( stream of consciousness ) है। वे वास्तविक आत्मा ( real self ) को भ्रम कहते हैं जबकि व्यवहारवादी आत्मा ( emperical self ) जो कि सदैव परिवर्तनशील रहती है, को माना है। बुद्ध के आत्मा सम्बंधित विचार को अनुभववादी ( emperical ) मत कहा जाता है।
  • जैन दर्शन में आत्मा को अनन्त और भिन्न-भिन्न बताया गया है जोकि संसार की सभी वस्तुओं ( जीव व अजीव ) में विद्यमान है। इस संसार में आत्मा के अतिरिक्त कुछ भी असीम नहीं है।
  • न्याय-वैशेषिक दर्शन में आत्मा को स्वभावतः अचेतन बताया गया है। चेतना आत्मा का आगन्तुक गुण ( accidental property ) है। आत्मा में चेतना का संचार मन, शरीर और इंद्रियों के सम्पर्क से होता है। मोक्ष की अवस्था में आत्मा चैतन्य-गुण से परे होती है। इस तरह न्याय-वैशेषिक दर्शन में आत्मा सम्बंधित विचार यथार्थवादी मत ( realistic view ) कहलाता है।
  • मीमांसा दर्शन में भी न्याय-वैशेषिक मत की तरह आत्मा को चेतना रहित माना गया है। चेतना आत्मा का आगन्तुक गुण है। मीमांसा में आत्मा को नित्य और विभु कहा गया है।
  • सांख्य दर्शन में आत्मा को चैतन्य स्वरूप बताया गया है। सांख्य में चेतना को आत्मा का मूल लक्षण ( essential property ) कहा गया है। अचेतन आत्मा अकल्पनीय है। आत्मा निरंतर ज्ञाता रहता है अतः वह ज्ञान का विषय नहीं हो सकता है। आत्मा अकर्त्ता है। आत्मा आनन्द-रहित है, क्योंकि आनन्द गुण का फल है और आत्मा तो त्रिगुणातीत है।
  • वेदांत दर्शन में शंकराचार्य ने चेतना को आत्मा का मूल लक्षण माना है। उन्होंने आत्मा को सच्चिदानन्द बताया है। यहाँ पर आत्मा न तो ज्ञाता और न ही ज्ञान का विषय। शंकराचार्य को छोड़कर सभी दार्शन में आत्मा को अनेक बताया गया है परन्तु यहाँ पर परमार्थिक सत्य के रूप में आत्मा एक ही है।

कर्म सिद्धान्त

चार्वाक दर्शन को छोड़कर शेष सभी आठ दर्शन ( छः आस्तिक और दो नास्तिक ) कर्म के सिद्धान्त को मानते हैं। कर्म के सिद्धान्त में विश्वास करना भारतीय चिंतनधारा की आध्यात्मिकता का प्रमाण है।

कर्म सिद्धान्त ( law of karma ) का अर्थ है “जैसा करोगे वैसा भरोगे।” शुभ कर्मों का फल शुभ जबकि अशुभ कर्मों का फल अशुभ होता है।

कृत प्रणाश अर्थात् किये गये कर्म का फल नष्ट नहीं होता और अकृतम्युपगम् अर्थात् अकृत कर्म के फल नहीं मिलते हैं।

सुख और दुःख क्रमशः अच्छे और बुरे कर्मों के अवश्यम्भावी फल माने गये हैं।

अतः कर्म सिद्धान्त ‘करण नियम’ है जो नैतिकता के क्षेत्र में काम करता है।

कर्म सिद्धान्त कहता है कि है कि हमारा वर्तमान जीवन अतीत-कर्मों का परिणाम है और भविष्य वर्तमान पर निर्भर है। अतः अतीत, वर्तमान और भविष्य कारण-कार्य शृंखला से नियमित है। इस प्रकार मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता स्वयं है। दूसरे शब्दों में हम वर्तमान में क्या है यह हमारे भूतकाल में कृत कर्मों का फल है और आगे क्या होंगे यह वर्तमान में हमारे द्वारा किये जाने वाले कर्मों पर निर्भर है।

कर्म का सिद्धान्त हमें बीज-रूप में ऋग्वेद में मिलता है। यहाँ पर नैतिक व्यवस्था के प्रति श्रद्धा व्यक्त की गयी है। ऋत् को यहाँ जगत् की व्यवस्था कहा गया है। इसमें नैतिक व्यवस्था भी समाहित है। उपनिषद् काल में यह ऋत् कर्मवाद का रूप ले लेता है।

न्याय-वैशेषिक मत में इसी कर्म-सिद्धान्त को ‘अदृष्ट’’ कहा गया है, क्योंकि यह दृष्टिगोचर होता नहीं है। संसार की कोई भी वस्तु इस नियम से बाहर नहीं है, यहाँ तक कि परमाणु भी नहीं।

मीमांसकों ने कर्म-सिद्धान्त को ‘अपूर्व’ कहा है।

न्याय-वैशेषिक मतानुसार ‘अदृष्ट’ का संचालक ईश्वर है। अदृष्ट अचेतन होने के कारण स्वतः फलवान नहीं होता है। इसके विपरीत मीमांसकों का कहना है कि कर्म-सिद्धान्त स्वतः संचालित होता है अतः इसे ईश्वर की आवश्यकता नहीं है।

परन्तु यहाँ यह उल्लेखनीय है कि कर्म का सिद्धान्त सभी कर्मों पर लागू नहीं होता है अतः भारतीय दार्शनिकों ने कर्म सिद्धान्त के क्षेत्र को सीमित करते हुए दो भागों में बाँटा है :—

  • एक, वे कर्म जिन पर कर्म सिद्धान्त लागू होता है। वे कर्म जो किसी उद्देश्य की भावना से किये जाते हैं उनपर कर्म का सिद्धान्त लागू होता है। अर्थात् राग, द्वेष, वासना आदि से संचालित किये गये कार्य कर्म सिद्धान्त की परिधि में आते हैं।
  • द्वितीय, वे कर्म जिन पर कर्म सिद्धान्त लागू नहीं होते हैं। वे कर्म जो निष्काम भावना से किये जाते हैं, कर्म सिद्धान्त से मुक्त हो होते हैं। निष्काम कर्म को भूने हुए बीज से की गयी है जो फल देने में असमर्थ होते है।

कर्म तीन प्रकार के होते हैं :—

  • संचित कर्म
  • प्रारब्ध कर्म
  • संचीयमान कर्म

संचित और प्रारब्ध दोनों कर्मों का सम्बन्ध अतीत से है। अन्तर यह है कि संचित कर्मों का फल मिलना अभी शेष है या मिलना शुरू नहीं हुआ है, जबकि प्रारब्ध कर्मों का फल मिलना प्रारम्भ हो चुका है।

संचीयमान कर्म वर्तमान में किये जा रहे कर्मों का हो रहा संचय है जिसका फल भविष्य में मिलेगा।

कर्म-सिद्धान्त की आलोचना

कर्म-सिद्धान्त ईश्वरवाद ( Theism ) का खंडन करता है। ईश्वरवाद के अनुसार ईश्वर संसार का स्रष्टा है। वह कर्मफल दाता है। उसी ने मानव को सुखी और दुःखी बनाया है। परन्तु कर्म-सिद्धान्त के अनुसार मानव के सुख या दुःख का कारण स्वयं उसके कर्म है, न कि ईश्वर। इस तरह यह ईश्वरवादी मत का विरोधी है।

कर्म-सिद्धान्त ईश्वर के गुणों को नकारता है। ईश्वर को सर्वशक्तिमान, सर्वज्ञ, करुणानिधि आदि कहा गया है। परन्तु कर्म-सिद्धान्त के अनुसार शुभ कर्मों का शुभ और अशुभ कर्मों का फल अशुभ होता है जिसे ईश्वर बदल नहीं सकता और न ही हस्तक्षेप सकता है।

कर्म-सिद्धान्त मानवीय सामाजिक दायित्वों के निर्वहन में शिथिलता आयेगी, क्योंकि हरेक व्यक्ति अपने कर्मों का फल भोग रहा है तो किसी लाचार-पीड़ित की मदद करना बेकार है।

कर्म-सिद्धान्त भाग्यवाद ( Fatalism ) को एक हद तक मान्यता देते हैं। हरेक व्यक्ति अपने पूर्ववर्ती कर्मों का फल भुगत रहा है इसलिए किसी तरह की संशोधन की संभावना नहीं रह जाती है।

आलोचना का प्रति-उत्तर

कर्म-सिद्धान्त न तो भाग्यवाद को प्रश्रय देता है न ही सामाजिक दायित्वों से मुँह मोड़ने को कहता है। यह तो निरंतर निष्काम कर्म करने को प्रेरित करता है। जिस तरह परीक्षा में अच्छे परिणाम पाने के लिए पहले से मेहनत करना होता है, तब परीक्षाफल अच्छा आता है। एक कृषक जिस फसल की खेती करता है उसके लिए खेत को अच्छी तरह तैयार करता है, फिर बीज-वपन करता है, समय-समय पर खाद-पानी देता है तब जाकर फसल कटाई करके फल पाता है। यहाँ यह ध्यान देने वाली बात है कि इसके साथ-साथ जलवायु, कीट, वर्षा आदि प्राकृतिक अवस्थाओं की भी भूमिका भी होती है जिसपर कृषक का बस नहीं होता है। कुछ इसी तरह ही कर्म-सिद्धान्त कार्य करता है।

कर्म-सिद्धान्त का महत्व

  • कर्म-सिद्धान्त व्यक्तियों के जीवन में विषमता का कारण बताता है। कोई क्यों सुखी-सम्पन्न है और कोई क्यों दुःखी-विपन्न है।
  • कर्म-सिद्धान्त व्यावहारिक है। यह बिना लाग-लपेट के कहता है कि जैसा बोओगे वैसा काटोगे।
  • कर्म-सिद्धान्त मानव मात्र में आशा का संचार करके निष्काम कर्म हेतु प्रेरित करता है।
  • कर्म-सिद्धान्त भाग्य भरोसे नहीं बैठता न ही अपने दुःख के लिए किसी अदृश्य शक्ति पर दोषारोपण करता है।
  • मानव स्वयं अपना भाग्य निर्माता है।

पुनर्जन्म

चार्वाक दर्शन को छोड़कर शेष सभी आठ दर्शन ( छः आस्तिक और दो नास्तिक ) पुनर्जन्म या जन्मांतरवाद में विश्वास व्यक्त करते हैं।

पुनर्जन्म का अर्थ है — बार-बार जन्म लेना। चिन्तकों के अनुसार संसार जन्म और मृत्यु की क्रमबद्ध शृंखला है। पुनर्जन्म का ‘सिद्धान्त कर्मवाद के सिद्धान्त’ और ‘आत्मा की अमरता’ से निकलता है।

आत्मा स्वकर्मों का फल एक जन्म में नहीं भोग सकती इसलिए वह पूर्वजन्मों का फल भोगने के लिए जन्म लेती है। पुनर्जन्म का सिद्धान्त आत्मा की अमरता को पुष्ट करता है। आत्मा नित्य और अविनाशी है। आत्मा मृत्यु के बाद कर्मानुसार दूसरे शरीर में प्रवेश करती है। मृत्यु से शरीर का अंत होता है, न कि आत्मा का। इस तरह आत्मा का एक शरीर छोड़कर दूसरे शरीर में प्रवेश करना ही पुनर्जन्म कहलाता है।

चार्वाक आत्मा की अमरता को नहीं मानते हैं। चार्वाक का कहना है कि मृत्यु के साथ ही शरीर व आत्मा दोनों का नाश हो जाता है। वे शरीर व आत्मा को भिन्न नहीं मानते हैं। इसलिए वे पुनर्जन्म के सिद्धांत को भी नहीं मानते हैं।

वैदिक ऋषियों की धारणा थी कि मूर्छावस्था में आत्मा शरीर का साथ छोड़ देती है। इसी क्रम में वे मानने लगे कि मृत्यु के उपरांत आत्मा दूसरा शरीर धारण कर लेती है। वे यह भी विश्वास करते थे कि जो व्यक्ति अपने कर्म को पूर्ण-ज्ञान के सम्पादित नहीं करता है, वह पुनर्जन्म के चक्र में घूमता रहता है।

उपनिषदों में इस पुनर्जन्म सिद्धान्त का विकसित रूप मिलता है। यहाँ पर विभिन्न उपमानों के द्वारा पुनर्जन्म की व्याख्या की गयी है। यथा —

“अन्न की भाँति मानव का नाश होता है और अन्न की तरह उसका पुनर्जन्म भी होता है।”

कठ उपनिषद्।

श्रीमद्भागवदगीता में पुनर्जन्म की व्याख्या बड़े ही सुन्दर ढ़ंग से की गयी है —

“वासांसि जीर्णानि यथा विहाय, नवानि गृहणाति नरोऽपराणि।

तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्यन्यानि संयाति नवानि देही॥”

श्रीमद्भागवदगीता।

बौद्ध दर्शन में आत्मा अनित्य है। यहाँ पुनर्जन्म के सम्बन्ध में मिलिंदपण्हो में कहा गया है कि जिस प्रकार पानी में एक लहर उठकर दूसरे को जन्म देकर स्वयं समाप्त हो जाती उसी तरह कर्मफल चेतना के रूप में पुनर्जन्म का कारण होती है। इसे दूसरे तरह से भी कहा गया है जैसे एक दीपक से दूसरा दीपक जलता है, उसी तरह वर्तमान जीवन की अंतिम अवस्था में अगले जीवन की प्रथम अवस्था का निर्माण होता है।

न्याय-वैशेषिक मत में पुनर्जन्म की व्याख्या नवजात बालक के हँसने व रोने से की गयी है। नवजात बालक का हँसना और रोना उसके पूर्व-जन्म की व्याख्या की अनुभूतियों का परिचायक कहा जा सकता है।

सांख्य दर्शन में पुनर्जन्म की व्याख्या सूक्ष्म शरीर ( subtle body ) से की गयी है। सूक्ष्म शरीर ही स्थूल के नाश के पश्चात् दूसरे शरीर में प्रवेश करके पुनर्जन्म को पूर्ण करता है।

मीमांसा और वेदांत दर्शन भारतीय दर्शन की पुनर्जन्म सम्बन्धी सामान्य विचारधारा को ही मानते हैं।

आलोचना

मानव अपनी पूर्व-जन्म की अनुभूतियों को याद नहीं रख पाता है अतः पुनर्जन्म की बात भ्रांतिमूलक है।

पुनर्जन्म का सिद्धान्त वंश परम्परा सिद्धान्त का विरोध करता है।

यह मानव को लौकिक को छोड़ पारलौकिक के प्रति चिंतनशील बनाता है।

यह सिद्धान्त अवैज्ञानिक है।

प्रति-आलोचना

पूर्व-जन्म की अनुभूतियों का विस्मरण हो जाना पुनर्जन्म को नकारता नहीं, क्योंकि जब हम वर्तमान जीवन की बहुत सारी बातों को भुला बैठते हैं तो पूर्व-जन्म की अनुभूतियों का विस्मरण होना स्वाभाविक है। विस्मृति के आधार पर जब हम वर्तमान जीवन में घटी घटनाओं को बारे में यह नहीं कह सकते कि उन घटनाओं का अस्तित्व नहीं था तो विस्मृति-अनुभूति के आधार पर पुनर्जन्म को भ्रांति कैसे कहा जा सकता है?

वंश परम्परा सिद्धान्त ( theory of hereditary ) कहता है कि मानव का मन व शरीर अपने माँ-बाप के अनुरूप बनता है। परन्तु मानव में बहुत सारे ऐसे गुण पाये जाते हैं उसे उसके पूर्वजों से आये हुए नहीं माने जा सकते हैं।

यह आक्षेप की पुनर्जन्म मानव को परलोक के प्रति चिंतनशील बना लौकिक जीवन से विमुख कर देगा। परन्तु यह आलोचना भ्रामक है क्योंकि जब वह यह जान जाता है कि जो हम हैं वह पूर्व-कर्मों का फल है और कल जो होंगे वह वर्तमान में किये जा रहे कर्मों के अनुरूप होगा। इसलिए वह कर्मपथगामी बनेगा न कि विरक्त।

पुनर्जन्म को अवैज्ञानिक इस आधार पर कहना कि जो हम अब कर रहे हैं वह भविष्य में मिलेगा। अर्थात् वर्तमान शरीर का कर्म भविष्य का शरीर भुगतेगा। परन्तु सूक्ष्मता से विचार करने पर कि शरीर तो बदली परन्तु आत्मा तो वही है। इसलिए यह कहना कि यह अवैज्ञानिक है; निराधार है।

महत्त्व

पुनर्जन्म के सिद्धांत का व्यावहारिक महत्त्व है। समान परिस्थितियों में जन्म लेने वाले मानवों की स्थिति में भेद क्यों है? इसकी व्याख्या पुनर्जन्म सिद्धान्त करती है। जो सुखी है वह पूर्व जन्मों के शुभ कर्मों का फल भोग रहा है और जो दुःखी हैं वह अशुभ फलों का।

पुनर्जन्म का सिद्धान्त भारतीय चिंतनधारा के आध्यात्मिक होने का प्रमाण है।

व्यावहारिकता

भारतीय दर्शन की सामान्य विशेषताओं में से उसका व्यावहारिक होना है। भारतीय दर्शनों का जीवन से घनिष्ठ सम्बन्ध है। भारतीय चिंतकों का दार्शनिक विचार मात्र मानसिक कुतूहल की निवृत्ति मात्र नहीं है, वरन् जनजीवन सम्बन्धी समस्याओं का यहाँ गहन चिंतन व समाधान मिलता है। यहाँ पर दर्शन जीवन का अभिन्न अंग बताया गया है। इसकी पुष्टि प्रो० हिरियाना, डॉ० राधाकृष्णन और चार्ल्स मूर करते हैं।

“Philosophy thereby becomes a way of life not merely a way of thought.”

Prof. Hiriyanna; Outlines of Indian Philosophy.

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”In India Philosophy is way of life.”

Dr. Radhakrishnan and Moore; A source book of Indian Philosophy.

भारतीय दर्शनों का विकास मानवीय दुःखों को दूर करने के प्रयास में हुआ है। दुःखों के समाधान के लिए चिंतकों ने अनेकों प्रयास किया जिससे विभिन्न दार्शनिक पद्धतियों का मार्ग प्रशस्त होता गया। इसलिए यह बात महत्वपूर्ण है कि भारतीय चिंतन में दर्शन ‘साधन’ है, साध्य नहीं; साध्य तो है दुःखों से निवृत्ति।

भारतीय दर्शन का व्यवहारिक होना पाश्चात्य विद्वान विलियम जेम्स के व्यवहारवाद ( Pragmatism ) से भिन्न है।

भारतीय चिंतकों ने चार पुरुषार्थ बताये हैं — धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। इनमें से मोक्ष जीवन का चरम लक्ष्य बताया गया है। प्रत्येक चिंतक अपने विचार में यह बताता है कि उसके दर्शन से इन पुरुषार्थों में क्या सहायता मिलेगी।

चार्वाक नितांत भौतिकवादी दर्शन है, अतः वे धर्म और मोक्ष में विश्वास नहीं करते हैं। चार्वाक ने अर्थ और काम को ही पुरुषार्थ माना है।

चार्वाक को छोड़कर अन्य आठ दर्शन किसी न किसी रूप में मोक्ष को मान्यता देते हैं; अतः भारतीय दर्शन को मोक्ष दर्शन भी कहा जाता है।

मोक्ष का सामान्य अर्थ है — दुःख-निवृत्ति।

भारतीय चिंतक न सिर्फ़ मोक्ष पर विचार करते हैं बल्कि इसका मार्ग भी प्रशस्त करते हैं। इसका कारण है कि दर्शन का मुख्य उद्देश्य ही मोक्ष पाना है। दर्शन का अध्ययन ज्ञानार्जन के लिए न होकर मोक्ष पाने के लिए है। प्रो० मैक्समूलर के शब्दों में :—

“Philosophy was recommended in India not for the sake of knowledge but for the highest purpose that man can strive after this life.”

Max Muller; Six System of Indian Philosophy.

क्या भारतीय दर्शनों में सिद्धान्त पक्ष की अवहेलना की गयी है? क्या भारतीय दर्शन नीति-शास्त्र और धर्मिक उक्तियों का संकलन मात्र बनकर रह गये हैं?

कुछ विद्वानों ने भारतीय दर्शन में व्यावहारिकता की प्रधानता को आधार बनाकर यह आक्षेप किया है की भारतीय चिंतन पद्धतियों में सिद्धान्तों ( theories ) की उपेक्षा की गयी है, परिणामतः यह नीति-शास्त्र ( ethics ) और धर्म ( religion ) का स्वरूप ग्रहण कर लेता है। — Thilly कृत History of Philosophy.

परन्तु पर यह आक्षेप निराधार है क्योंकि यहाँ पर तत्त्व-प्रमाण, प्रमाण-विज्ञान एवं तर्क-शास्त्र की गहन व सम्यक् चर्चा मिलती है। अतः भारतीय दर्शन को धर्म व नीतिशास्त्र कहना भ्रांतिमूलक है।

मोक्ष विचार

चार्वाक दर्शन को छोड़कर मोक्ष को सभी किसी न किसी रूप में मान्यता देते हैं।

बौद्ध दर्शन में मोक्ष को निर्वाण कहा गया है, जिसका अर्थ है दीपक का बुझ जाना अर्थात् जीवन-मरण चक्र से मुक्ति। बौद्ध दर्शन का निर्वाण वैदिक मोक्ष से भिन्न है। वैदिक मोक्ष विचार में कहा गया है कि सत्कर्मी व्यक्ति की आत्मा परब्रह्म में लीन हो जाती है और उसे पुनर्जन्म के चक्र से मुक्ति जाती है। जबकि बौद्ध धर्म के अनुसार निर्वाण इसी जीवन में प्राप्त हो सकता है लेकिन महापरिनिर्वाण मृत्यु के बाद ही प्राप्त होता है।

जैन दर्शन में मोक्ष अर्थ है अपनी स्वाभाविक स्थिति को प्राप्त करना। जैन दर्शन में कहा गया है कि प्रत्येक जीव में दो तत्त्व विद्यमान रहता है — एक,आत्मा और द्वितीय, उसे घेरने वाला भौतिक तत्त्व। प्रत्येक जीव का लक्ष्य आत्मा को भौतिक तत्त्व से मुक्त होकर अपने स्वाभाविक स्थिति को पाना है और यही मोक्ष है। मोक्ष की अवस्था में आत्मा अनंत चातुष्ट्य की स्वाभाविक अवस्था पा लेता है। वह आवागमन के चक्र से मुक्त हो जाता है और यही मोक्ष है।

न्याय-वैशेषिक दर्शन में मोक्ष अवस्था में दुःख का उच्छेद हो जाता है। यहाँ यह ध्यान देनेवाली बात है कि चैतन्य आत्मा का आगन्तुक गुण है, न कि स्वाभाविक। इसलिए मोक्ष की आत्मा अचेतन अवस्था में रहती है; अतः यहाँ न तो सुख है, न ही दुःख। इस अवस्था ( मोक्ष ) की प्राप्ति तत्त्व ज्ञान से ही सम्भव है।

सांख्य दर्शन में मोक्ष का अर्थ है तीन तरह के दुःखों से निवृत्ति। बंधन का मूल कारण अज्ञान या अविवेक को बताया गया है। पुरुष, प्रकृति और उसकी विकृतियों से अलग है परन्तु अज्ञान के वशीभूत होकर वह स्वयं को प्रकृति और उसकी विकृतियों से स्वयं को सम्बद्ध कर लेता है। मोक्ष का अर्थ है इस वैभिन्य की अनुभूति। वह मोक्षावस्था में यह ज्ञान लेता है कि बंधन तो प्रतीति मात्र है और वह तो स्वाभाविक रूप से मुक्त है। यहाँ यह माना गया है कि मोक्ष की अवस्था आत्मा को आनन्द की अनुभूति नहीं होती है।

मीमांसा दर्शन के अनुसार मोक्ष अवस्था में आत्मा को कोई अनुभूति नहीं होती है। वह सुख और दुःख दोनों से परे हो जाती है। मोक्षावस्था में आत्मा अचेतन अवस्था में रहती है और यही इसका स्वभाविक गुण है।

अद्वैत-वेदान्त दर्शन के अनुसार मोक्ष अवस्था में आत्मा, परमात्मा में विलीन हो जाती है। इस अवस्था में कोई द्वैत नहीं रहता है। आत्मा वस्तुतः परमात्मा ही है, परन्तु वह अज्ञानतावश स्वयं को उससे अलग समझ बैठता है। यही द्वैतभाव बंधन है। शंकर के अनुसार मोक्ष की प्राप्ति ज्ञान से ही सम्भव है। यहाँ मोक्ष अवस्था आनन्द की अवस्था कहा गया है। मोक्ष आत्मा के लिए नया नहीं है, इसलिए उसे ‘प्राप्तस्य प्राप्ति’ कहा गया है।

विशिष्टाद्वैतवाद दर्शन में मोक्षावस्था में दुःख-निवृत्ति तो होती है परन्तु यहाँ आत्मा और परमात्मा में द्वैतभाव बना रहता है। आत्मा परमात्मा का सानिध्य प्राप्त करती है जिससे दुःख का विनाश हो जाता है और वह परमात्मा के आनन्द का अनुभव करती है। यहाँ मोक्ष पाने का मार्ग भक्ति को बताया गया है।

भारतीय चिंतन में दो प्रकार की मुक्ति की बात कही गयी है :—

  • जीवन मुक्ति या सशरीर मुक्ति – अर्थात् जीवनकाल में ही मुक्ति पाना।
  • विदेह मुक्ति – अर्थात् शरीर के नाश या मृत्यु के बाद मुक्ति मिलना।

बौद्ध, जैन, सांख्य, योग और वेदांत ( शंकराचार्य ) ने उपर्युक्त दोनों प्रकार की मुक्ति को सत्य माना है। जबकि न्याय, वैशेषिक, मीमांसा और विशिष्टाद्वैत में केवल विदेह मुक्ति को मान्यता दी गयी है।

यहाँ यह उल्लेखनीय है कि जो दार्शनिक पद्धतियाँ सशरीर मुक्ति को मानती हैं वे विदेह मुक्ति को भी मानती हैं, परन्तु इसका विपरीत सत्य नहीं है।

अज्ञान बंधन का मूल कारण

भारतीय चिंतनधारा में अज्ञान को बंधन का कारण माना गया है। चार्वाक मत इसका अपवाद है।

हालाँकि, अज्ञानता को चार्वाक को छोड़कर सभी बंधन का मूल कारण मानते हैं, परन्तु इसकी व्याख्या अलग-अलग ढ़ंग से की गयी है।

बौद्ध दर्शन में चार आर्य सत्यों का ज्ञान न होना ही अज्ञान है।

जैन दर्शन में अज्ञान बंधन का कारण है। हमारी कुप्रवृत्तियों के कारण, जोकि की अज्ञानता से उत्पन्न होती है, कर्म जीव की ओर आकर्षित होने लगता है। इस कर्म का जीव की ओर प्रवाह आस्रव कहलाता है। कर्म का जीव से संयोग ही बंधन है। इस बंधन से मुक्ति के लिए त्रिरत्नों का अनुशीलन का विधान है जिससे कर्म का जीव की ओर प्रवाह रुक जाता है। कर्म का जीव की ओर प्रवाह रुकना संवर कहलाता है। अगली अवस्था में संचित या व्याप्त कर्मों विनाश होने लगता है, जिसे निर्जरा कहते हैं। इस तरह त्रिरत्नों के पालन से जीव आस्रव, संवर और निर्जरा अवस्था से गुजरता है और अंततः कर्म का अवशेष समाप्त हो जाता है तब वह कैवल्य / मोक्ष को प्राप्त कर लेता है।

सांख्य-योग दर्शन अज्ञान को अविवेक ( Non-discrimination ) कहा गया है। अज्ञान के वशीभूत होकर पुरुष स्वयं को प्रकृति से सम्बद्ध मानने लगता है, यही बंधन है। वस्तुतः पुरुष और प्रकृति भिन्न हैं। पुरुष निष्क्रिय एवं त्रिगुणातीत ( निस्त्रैगुण्य ) है, जबकि प्रकृति सक्रिय और त्रिगुणमयी है।

अद्वैत वेदांत दर्शन में शंकराचार्य के अनुसार आत्मा का अज्ञान के वशीभूत हो स्वयं के मूल स्वरूप का भूल जाना है।

ज्ञान का महत्त्व

भारतीय चिंतनधारा में ज्ञान को बड़ा महत्त्व दिया गया है। जिस तरह से बादल के हटने से सूर्य का प्रकाश अंधकार को नष्ट होने से सब कुछ स्पष्ट दिखता है, उसी तरह ज्ञानोदय से अज्ञान रूपी बादल छँट जाते हैं और बंधन का नाश हो जाता है।

जैन मत में सम्यक् ज्ञान, बौद्ध मत में सम्यक् दृष्टि, न्याय-वैशेषिक दर्शन में तत्त्व-ज्ञान, सांख्य दर्शन में विवेक-ज्ञान तो शंकराचार्य के अद्वैत वेदांत में विद्या कहकर इसे बंधन-मुक्ति का मुख्य साधन बताया गया है।

यहाँ यह उल्लेखनीय है कि रामानुज के विशिष्टाद्वैत मत में भी भक्ति की प्रमुखता को मानते हुए ज्ञान के महत्त्व को अस्वीकार नहीं किया गया है, बल्कि उसे भक्ति के सहायक के रूप में मान्यता दी गयी है।

अनवरत चिंतन, अभ्यास और योग को महत्त्व

अज्ञान को दूर करने के लिए मात्र तत्त्व-ज्ञान को पर्याप्त नहीं माना गया है, बल्कि प्राप्त सिद्धान्तों का निरंतर चिंतन करके उसे स्थायित्व देना भी होता है। अतः भारतीय चिंतनधारा में किसी न किसी रूप में अभ्यास और योग की चर्चा की गयी है। ज्ञान की प्राप्ति के लिए मन और शरीर दोनों की साधना पर बल दिया गया है। जितना महत्त्व ज्ञान-पक्ष को प्रदान किया गया है उतना ही साधना-पक्ष को भी महत्त्व दिया गया है

संसार एक रंगमंच है

चार्वाक को छोड़कर सभी मत संसार को एक प्रकार से नैतिक रंगमंच मानते हैं। इस संसार रूपी रंगमंच पर मानव मन और इंद्रियों से युक्त होकर अपने कर्मों का प्रदर्शन करता है। मानव-कर्मों पर मूल्यांकन के उद्देश्य से अवलोकन किया जाता है। मानव वर्तमान में संसार रूपी मंच पर कर्मों के मंचन करके भविष्य जीवन को अच्छा या बुरा बनाता है। अतः प्रत्येक व्यक्ति को नैतिक व्यवस्था में आस्थावान रहते हुए वैश्विक रंगमंच पर अपना किरदार अच्छे से निभाना चाहिए।

आत्म-संयम

चार्वाक दर्शन को छोड़कर अन्य चिंतनधारा में आत्म-संयम ( self-control ) को पर्याप्त महत्त्व दिया गया है। आत्म-संयम का अर्थ मनोवृत्तियों के उच्छृंखल प्रयोग को नियंत्रित या संयमित करना है, न कि इनका पूर्णतया निरोध कर देना।

इसका अर्थ आत्म-निग्रह ( Self-abnegation ) और संन्यास नहीं लगाना चाहिए। यहाँ पर इंद्रिय दमन नहीं इंद्रिय नियंत्रण की बात को कहा गया है। जैसे –

  • उपनिषदों में आत्मा को सर्वोच्च महत्त्व देते हुए भी शरीर, मन और इंद्रियों की उपयोगिता मानी गयी है।
  • इसी तरह गीता में कहा गया है कि इंद्रियों का संचालन विवेकनुसार करना चाहिए।

अतः आत्म-संयम का अर्थ इंद्रिय-वृत्ति उन्मूलन नहीं, बल्कि उनका संयमित उपयोग है।

धर्म और दर्शन का समन्वय

भारत में दर्शन व धर्म में अविछिन्न सम्बन्ध पाया जाता है। चार्वाक को छोड़कर सभी दर्शनों में धर्म के महत्त्व को स्वीकार किया गया है।

इसके पारस्परिक सम्बंध का मूल कारण है — दोनों का मूल उद्देश्य ( मोक्ष / दुःख-निवृत्ति ) एक होना है।

यह उल्लेखनीय है कि पाश्चात्य विचारकों में दर्शन और धर्म अलग-अलग माना गया है और विरोधी भी।

हालाँकि भारतीय दर्शन व धर्म का पारस्परिक सम्बंध रहा है, परन्तु दार्शनिक चिंतन व विकास को धर्म ने बाधित नहीं किया है। डॉ० राधाकृष्णन का इस सम्बन्ध में कहना है —

“Though philosophy in India has not as a rule completely freed itself from the fascinations of religious speculation, yet the philosophical discussion have not been hampered by religious form.”

Dr. Radhakrishnan- Indian Philosophy.

प्रमाण-विज्ञान

भारतीय दर्शनों में प्रमाण-विज्ञान ( Epistemology ) पर सम्यक् विचार किया गया है और इसका कोई अपवाद नहीं है। सही ज्ञान को ‘प्रमा’ कहते हैं और जिसके द्वारा यथार्थ ज्ञान प्राप्त होता है उसे ‘प्रमाण’ कहते हैं।

चार्वाक प्रत्यक्ष को एकमात्र प्रमाण मानते हैं। बौद्ध दर्शन में प्रत्यक्ष और अनुमान को प्रमाण माना गया है। सांख्य दर्शन में प्रत्यक्ष, अनुमान और शब्द जैसे कुल तीन प्रमाण माने गये हैं। शेष प्रमाणों को सांख्याचार्यों ने इन्हीं तीन में सम्मिलित कर लिया है। नैयायिकों ने प्रत्यक्ष, अनुमान, शब्द और उपमान को प्रमाण के रूप में स्वीकार किया है। मीमांसा और अद्वैत वेदांत में प्रत्यक्ष, अनुमान, शब्द, उपमान, अर्थापत्ति और अनुपलब्धि को प्रमाण माना है।

इस प्रकार प्रमाण की संख्या और उनकी स्वीकारोक्ति के सम्बन्ध में भारतीय दर्शनों में वैभिन्य है। परन्तु प्रमाणों का इन सबमें अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्थान है, क्योंकि हरेक दर्शन का तत्त्व-विज्ञान उसके प्रमाण-विज्ञान पर ही निर्भर है।

भूत के प्रति दृष्टिकोण

भारतीय दर्शनों की एक प्रमुख विशेषता है — भूत ( Past ) के प्रति दृष्टिकोण। भूत के प्रति दृष्टिकोण से यहाँ अर्थ है वेदों के प्रति दृष्टिकोण। इस आधार पर दो वर्ग बन गये।

  • आस्तिक दर्शन जो कि वेदों की प्रामाणिकता को मान्यता देते हैं — षड्दर्शन।
  • नास्तिक दर्शन जो कि वेदों की प्रामाणिकता को मान्यता नहीं देते हैं — चार्वाक, बौद्ध व जैन दर्शन।

यहाँ यह उल्लेखनीय है कि नास्तिक दर्शनों ने यद्यपि वेदों को मान्यता नहीं दी परन्तु इनपर भी वेदों का नकारात्मक प्रभाव पड़ा है। इस तरह इन दर्शनों में भी वेदों के महत्त्व को किसी न किसी रूप में माना गया है।

वेदों को आस्तिक दर्शनों में प्रमाण इसलिए माना गया है क्योंकि वेद में साक्षात् दर्शन अन्तर्ज्ञान ( Intuition ) के माध्यम से माना गया है। अन्तर्ज्ञान को तार्किक ज्ञान से उच्च स्थान दिया गया है। अंतर्ज्ञान संदेहरहित होता है। वेद, द्रष्टा ऋषियों के अन्तर्ज्ञान के भण्डार हैं।

वेदों में आस्था रखने के कारण षड्दर्शनों पर रूढ़िवादी ( Dogmatism ) और गतिहीनता ( Stagnation ) का आक्षेप किया गया है।

  • तो क्या सच में भारतीय दर्शन रूढ़िवादी हैं?

भारतीय दर्शन वेद और उपनिषदों का अंधानुकरण नहीं करते हैं। यहाँ के चिंतक तर्क-वितर्क के माध्यम से अपने मत को पुष्ट और दूसरे मतों का खंडन करते हैं। वैदिक विचारों को यथारूप स्वीकार नहीं किया गया है अपितु तर्क के द्वारा जिस तत्त्व-विषय को स्थापित किया गया है उसकी पुष्टि के लिए वेदों को उद्धृत किया गया है।

इस तरह ये चिंतन एक-दूसरे से टकरा-टकराकर विकसित होते गये। हरेक दर्शन में प्रमाण-विज्ञान का सम्यक् विचार मिलता है और तद्नुरूप तत्त्व-विज्ञान का विकास हुआ है।

आस्तिक दर्शनों में श्रुति को प्रमाण माना गया है, तथापि उन्हें तर्क की कसौटी पर कसा गया है और खंडन भी किया गया है।

षड्दर्शनों में विभिन्न पहलुओं पर निष्पक्ष चिंतन मिलता है। युक्तियों का युक्तियुक्त प्रयोग किया गया है।

यही कारण है कि वेदों को प्रामाणिक मानते हुए भी शंकर और रामानुज अलग-अलग दर्शन दे पाते हैं

अतः हम कह सकते हैं कि भारतीय दर्शन रूढ़िवादी ( dogmatic ) न होकर समालोचनात्मक है।

  • क्या भारतीय दर्शन पर गतिहीनता ( Stagnation ) का लगाया गया आरोप सत्य है?

वैदिक सत्यों को चिंतकों ने स्वतंत्र विचार की सहायता से सिद्धान्त के रूप में विकसित किया है।

यहाँ पर आध्यात्मवाद, भौतिकवाद, द्वैतवाद, अद्वैतवाद, विशिष्टाद्वैतावाद इत्यादि विचारधारा विकसित हुए जो कि गतिहीनता के आक्षेपों स्पष्ट रूप से नकारते हैं।

ईश्वर और जगत् के विषय में अनेक विचार मिलते हैं; जैसे — ईश्वरवाद, सर्वेश्वरवाद ( Pantheism ), निमित्तोपादानेश्वरवाद ( Panentheism ), अनेकेश्वरवाद ( Polytheism )।

इस तरह विचारों की बहुलता गतिहीनता के आरोप को निर्मूल सिद्ध कर देता है।

साथ ही ये दर्शन एक-दूसरे की समालोचना करते हैं। आपस में टकराकर अपने को पुष्ट करते हैं व दूसरे की कमियों को उजागर करते हैं। अतः भारतीय दर्शन गतिहीन नहीं प्रगितिशील है।

जगत् विचार

यहाँ के प्रत्येक दर्शन में जगत् पर विचार किया गया है।

शंकराचार्य और योगाचार ( बौद्ध ) पद्धति को छोड़कर प्रत्येक मत में संसार को सत्य माना गया है।

चार्वाक के अनुसार जगत् का निर्माण पृथ्वी, जल, वायु और अग्नि के परमाणुओं के आकस्मिक संयोग से हुआ है। ईश्वर में अविश्वास के कारण उसके योगदान का प्रश्न ही नहीं उठता है। चैतन्य भी भूतों के आकस्मिक संयोग का परिणाम है। ये भूत ही संसार का उपादान और निमित्त कारण है।

बौद्ध दर्शन में जगत् को सत्य व प्रत्यक्ष का विषय कहा गया है।

जैन मतानुसार जगत् एक वास्तविक तथ्य है जो अनादि काल से अस्तित्व में है। यहाँ स्पष्ट रूप से कहा गया है कि जो वस्तु है उसका न होना ( अभाव ) सम्भव नहीं है।

न्याय-वैशेषिक मतों में संसार को सत्य माना गया है जोकि दिक् और काल में स्थित है। जगत् का निर्माण परमाणुओं के संयोग से होता है।

सांख्य-योग दर्शन भी संसार को सत्य मानता है। जगत् का निर्माण त्रिगुणात्मक प्रकृति के विकास से हुआ है।

मीमांसा मत भी जगत् को सत्य मानता है। यह परमाणुओं और कर्म के नियमों पर निर्मित हुई है।

विशिष्टाद्वैत दर्शन में भी जगत् को सत्य माना गया है। जगत् त्रिगुणात्मक प्रकृति के विकास का परिणाम है।

योगाचार ( बौद्ध ) में जगत् को विज्ञानमात्र कहा गया है। अर्थात् जगत् का अस्तित्व अनुभूति पर निर्भर है। संसार के अस्तित्व को अनुभवकर्त्ता के मन से स्वतंत्र नहीं माना गया है।

शंकराचार्य के वेदान्त में एकमात्र ब्रह्म को सत्य माना गया है। यद्यपि वे व्यावहारिक स्तर पर जगत् के अस्तित्व को स्वीकार करते हैं, परन्तु पारमार्थिक स्तर पर एकमात्र सत्ता ब्रह्म है।

निष्कर्ष

इस विवेचन से स्पष्ट है कि भारतीय परिवेश में विकसित होने के कारण सभी दर्शनों में कुछ सामान्य विशेषताएँ परिलक्षित होती हैं। वे एक जैसी समस्या को विभिन्न रूप से समाधान करने का प्रयास करते हैं। एक-दूसरे से इस क्रम में वैचारिक स्तर पर टकरा-टकराकर विकसित होते हैं।

भारतीय दर्शन : एक सामान्य परिचय

चार्वाक दर्शन या लोकायत दर्शन

बौद्ध दर्शन

जैन दर्शन

शंकराचार्य और उनका दर्शन

रामानुजाचार्य का विशिष्टाद्वैतवाद

वल्लभाचार्य का शुद्धाद्वैतावाद

वेदान्त दर्शन

मीमांसा दर्शन

वैशेषिक दर्शन

न्याय दर्शन

योग दर्शन

सांख्य दर्शन

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