भारतीय इतिहास की भौगोलिक पृष्ठभूमि या भारतीय इतिहास पर भूगोल का प्रभाव

भारतीय इतिहास की भौगोलिक पृष्ठभूमि
प्राकृतिक भारत

भूमिका

इतिहास की दो आंखें होती हैं – एक कालक्रम और दूसरी भूगोल। अर्थात् इतिहास के निर्धारण में समय और स्थान दो महत्वपूर्ण कारक हैं। भूगोल ऐतिहासिक घटनाओं को निर्धारित करता है। भारतीय इतिहास भी इसका अपवाद नहीं है। इसलिए ‘भारतीय इतिहास की भौगोलिक पृष्ठभूमि’ का अध्ययन अनिवार्य हो जाता है।

भारतीय उप-महाद्वीप का क्षेत्रफल लगभग ४४ लाख वर्ग किलोमीटर है, जोकि विश्व का लगभग ३% और एशिया का लगभग १०% है। यह यूरोप को छोड़कर समस्त यूरोप के बराबर है।

भारतीय उप-महाद्वीप ( Indian sub-continent ) एक सुपरिभाषित और स्पष्ट भौगोलिक इकाई है। इसका आकार ‘विषम चतुर्भुज’ जैसा है। इसे तीन प्रमुख क्षेत्रों में विभाजित किया जा सकता है —

  • हिमालय पर्वतमाला,
  • सिंधु-गंगा-ब्रह्मपुत्र के मैदान और
  • दक्षिणी प्रायद्वीप।

उपमहाद्वीप में निम्न देश आते हैं – भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, भूटान, श्रीलंका और मालदीव। पश्चिमोत्तर में हिन्दूकुश भारतीय उप-महाद्वीप की सीमा निर्धारित करता है। यह पर्वतमाला अफगानिस्तान में फैला है। इसलिए अफगानिस्तान का भी बड़ा भाग इसके तहत आता है।

भारत उनमें सबसे बड़ा है और इसमें अट्ठाईस राज्य और आठ केंद्र शासित प्रदेश शामिल हैं। २०११ की जनगणना के अनुसार भारत की जनसंख्या एक सौ इक्कीस करोड़ से अधिक है।

भारतीय उप-महाद्वीप का निर्माण

भारतीय उप-महाद्वीप एक सुपरिभाषित भू-खण्ड है। परन्तु इसको वर्तमान स्वरूप प्राप्त करने में लम्बा समय लगा है। पृथ्वी की आयु लगभग ४·६ अरब वर्ष है। वर्तमान से २० करोड़ वर्ष पहले पैंजिया नामक एक ही भू-खण्ड था। इसी के विभाजन और पुनर्विभाजन से वर्तमान द्वीप और महाद्वीप अस्तित्व में आये। इस प्रकिया के निम्न प्रकार समझ सकते हैं :—

  • सन् १९२१ में अल्फ्रेड वेगनर ने ‘महाद्वीपीय विस्थापन का सिद्धान्त’ ( the continental drift theory ) दिया। इसके अनुसार वर्तमान से लगभग २० करोड़ वर्ष पूर्व पैंजिया नामक एकमात्र महा-महाद्वीप ( super continent ) था।
  • लगभग १५ करोड़ वर्ष पूर्व यह पैंजिया महा-महाद्वीप ‘टेथीस भू-अभिनति’ ( Tethys geosyncline ) के कारण दो भागों में बँट गया — एक, उत्तरी महाद्वीप जिसे लॉरेशिया नाम दिया गया और द्वितीय, दक्षिणी महाद्वीप जिसे गोण्डवानालैंड नाम दिया गया।
  • अंगारालैंड /  लॉरेशिया से उत्तरी अमेरिका, ग्रीनलैंड, यूरोप, हिमालय के उत्तर का एशियाई भूभाग बना।
  • गोण्डवानालैण्ड से दक्षिणी अमेरिका, अफ्रीका, आस्ट्रेलिया, अंटार्कटिका और भारतीय उप-महाद्वीप का निर्माण हुआ है।
  • अफ्रीकी महाद्वीप से भारतीय उप-महाद्वीप टूटकर अलग हो गया और उत्तर-पूर्व दिशा की ओर बढ़ा। भरतीय प्लेट उत्तर-पूर्व दिशा में बढ़ती हुई आकर युरेशियाई प्लेट से टकरायी। लगभग ४ करोड़ वर्ष पूर्व वर्तमान भारतीय उप-महाद्वीप अस्तित्व में आया।
  • विभाजन की यह प्रक्रिया लगभग २० करोड़ वर्ष पूर्व शुरू हुई और कोई ४ करोड़ वर्ष पूर्व पूर्ण हुई। परिणामस्वरूप विभिन्न महाद्वीप अस्तित्व में आये। स्वतंत्र भारतीय उप-महाद्वीप अस्तित्व भी इसी का परिणाम है। परन्तु प्लेटों का संचलन अभी भी जारी है और भारतीय प्लेट का संचलन इसका अपवाद नहीं है। भारतीय प्लेट का उत्तर की ओर संचलन अभी तक जारी है।
  • कोई ५.८ से ३.७ करोड़ वर्ष पूर्व भारतीय प्लेट यूरेशियाई प्लेट से आ टकरायी। इस टकराव से हिमालय का उत्थान हुआ। हिमालय का निर्माण कई चरणों में हुआ है। यह उत्थान ४ चरणों में हुआ। हिमालय का अंतिम उत्थान ( चौथा उत्थान ) अत्यंतनूतन युग  ( Pleistocene epoch ) में हुआ। अत्यंत नूतन युग का समय वर्तमान से लगभग २०,००,००० वर्ष पूर्व  से १२,००० ई॰पू॰ तक रहा।
  • हिमालय का उत्थान अभी भी हो रहा है। हिमालय वलित पर्वत है। इससे सतत-वाहिनी नदियों से लायी गयी जलोढ़ मिट्टी से भारत का उत्तरी विशाल मैदान का निर्माण अत्यंतनूतन या अभिनूतन युग (Pleistocene epoch ) में हुआ।

इतिहास के अध्ययन का भौगोलिक दृष्टिकोण

भूगोल के दृष्टकोण से इतिहास के अध्ययन के विविध पक्ष हैं; जैसे :—

( १ ) भारतवर्ष के उत्तर में हिमवान और दक्षिण में प्रायद्वीप को तीन दिशाओं से समुद्र से घिरा है। यह भारतीय इतिहास को विशिष्ट रूप से प्रभावित करता रहा है। जिससे कि सीमापार की घटनाओं से कुछ सीमा तक अप्रभावित रहा।

  • परन्तु पर्वतीय दर्रों और उपयुक्त समुद्री तटों से वह बाह्य संसार के अन्य क्षेत्रों से निरन्तर सम्पर्क बनाये रखा।
  • प्रागैतिहासिक काल से ही पर्वतीय दर्रों से जनसमुदाय आते रहे हैं। यह ध्यातव्य है कि जो जनसमुदाय यहाँ आये वो यहीं के होकर रह गये।

( २ ) जलवायु और प्राकृतिक परिवर्तनों ने इतिहास को निरन्तर प्रभावित किया। निर्जलीकरण ( desiccation ) के कारण मध्य एशिया की कुछ जातियाँ भारत के पश्चिमोत्तर सीमा से भारत आने पर विवश हो गयीं थीं ( कुषाण )।

  • यद्यपि वैश्विक स्तर पर ९,००० ई॰पू॰ से मोटे तौर पर जलवायु समान बना रहा। हालाँकि क्षेत्रीय स्तर पर छोटे-मोटे परिवर्तन होते रहते थे। लगभग तृतीय और द्वितीय सहस्राब्दी ई॰पू॰ के आसपास मध्य एशिया में सूखेपन व ठंडापन ( extreme aridity and freezing temperature ) के दौर आने के संकेत मिलते हैं। इसके प्रभाव से वहाँ की जनसंख्या के बहिर्गामी प्रवास के संकेत मिलते हैं। कुछ विद्वान भारत में आर्यों के आगमन का एक कारण इसे मानते हैं। यद्यपि यह मत अत्यंत विवादित रहा है और इसपर और अनुसंधान की आवश्यकता है।
  • इसी तरह विद्वानों ने हड़प्पा सभ्यता के पतन के कारणों में जलवायु परिवर्तन को प्रमुख कारण माना है। इस मतानुसार पहले इस क्षेत्र में यथोचित वर्षा होती थी परन्तु प्राकृतिक संसाधनों के अत्यधिक दोहन से जलवायु को प्रभावित किया और शनैः शनैः बारिश कम होने से इस सभ्यता का पतन हो गया।
  • इसी तरह हड़प्पाकाल और पूर्व-वैदिक काल में सरस्वती एक शक्तिशाली नदी थी। सतलज और यमुना इसकी सहायक नदियाँ थीं। भूगर्भीय परिवर्तन ( भूकम्प के प्रमाण कालीबंगन से मिलते हैं ) से इस क्षेत्र में परिवर्तन आया। सतलज और यमुना ने अपना मार्ग बदल लिया। सतलज सिंधु की तो यमुना गंगा की सहायक नदी बन गयी। दूसरी ओर वर्षा भी कम होने लगी थी। इस तरह सरस्वती एक मौसमी नदी बनकर मरुभूमि में खो गयी। इसे आजकल घग्घर-हकरा पाट कहते हैं।
  • ताम्रपाषाणिक स्थल ‘इनामगाँव’ ( पुणे, महाराष्ट्र ) से मिले वनस्पतियों व पशुओं के अवशेषों से ज्ञात होता है कि १,००० ई॰पू॰ के आसपास यहाँ अत्यंत शुष्क जलवायु की शुरुआत होने के संकेत मिलते हैं। परिणाम यह हुआ कि कृषक समुदाय को स्थायी जनजीवन छोड़कर यायावर जीवन को अपनाना पड़ा।

( ३ ) मध्य एशिया में विभिन्न जनजातियों के मध्य संघर्ष से वे विस्थापित हुए और पश्चिमोत्तर दर्रों से होकर होकर भारतीय सीमा में प्रवेश करते रहे; जैसे — शक, कुषाण आदि का आगमन और मध्यकाल में मुगलों की मध्य एशिया में निरन्तर पराजय ने उसे भारत की ओर उन्मुख किया।

( ४ ) विभिन्न शासक संसाधनों और कच्चे माल पर अधिकार के लिए संघर्षरत रहे; जैसे —

  • दक्षिण में मौर्य साम्राज्य का प्रसार कोलार के स्वर्ण-क्षेत्र को अपने अधिकार में करना।
  • दक्षिण में उपजाऊ रायचूर दोआब पर अधिकार के लिए निरन्तर द्रविड़ शासक और दक्कन के शासक संघर्षरत रहे; जैसे – पल्लव व वातापी के चालुक्य, चोल व कल्याणी के चालु्क्य और मध्यकाल में विजयनगर साम्राज्य व बहमनी संघर्ष।

( ५ ) प्राचीनकाल के अभिलेख के प्राप्ति के स्थानों से नगरों, मार्गों आदि के महत्व का पता चलता है।

( ६ ) एक निश्चित कालक्रम में मानव-संस्कृति एक दूसरे को प्रभावित करने वाले तीन कारकों — जीवोम, आवास और मानव-संस्कृति के मध्य संतुलन रखती है। जब इसमें असंतुलन होता है तो नवीन संतुलन की प्रक्रिया आरम्भ हो जाती है। यह ’पारिस्थितिक दृष्टिकोण’ कहलाता है।

( ७ ) कुछ विद्वानों ने प्राकृतिक क्षेत्रों को ऐतिहासिक दृष्टि से तीन भागों में विभाजित किया है —

  • आकर्षण क्षेत्र — गंगा का मैदान, कावेरी नदी द्रोणी जैसे उपजाऊ कृषि क्षेत्र आकर्षक क्षेत्र रहे और यही साम्राज्यों के उत्थान और पतन का आधार रहे हैं।
  • अपेक्षाकृत अलग-थलग क्षेत्र ( कम आकर्षक क्षेत्र ) — आकर्षक और अलग-थलग क्षेत्र के मध्य का क्षेत्र।
  • अलग-थलग क्षेत्र — पर्वतीय और दुर्गम जंगली क्षेत्र अलग-थलग रहे हैं।
  • अन्य कारकों में सम्मिलित हैं – कुछ क्षेत्र ‘कच्चे माल’ के कारण महत्व के रहे तो कुछ ‘व्यापार’ के कारण तो कुछ का ‘धार्मिक महत्व’ रहा।

हिमालय पर्वत

हिमालय पर्वत भारतीय उप-महाद्वीप की उत्तरी सीमा का निर्धारण करती है। हिमालय पर्वत शृंखला पश्चिमोत्तर में पामीर से शुरू होकर पूर्व में म्यांमार तक फैली हुई है। २५० से ३२० किलोमीटर की औसत चौड़ाई के साथ-साथ इसकी लंबाई लगभग २,४०० किलोमीटर है। हिमवान में लगभग ११४ चोटियाँ ऐसी हैं, जिनकी ऊँचाई २०,००० फुट ( ६,०९६ मीटर ) से अधिक उत्तुंग हैं। यह एक ‘प्राकृतिक दीवार’ के रूप में कार्य करता है।

पश्चिमोत्तर में पामीर के पठार से हिंदुकुश शुरू होकर भारतीय उप-महाद्वीप की प्राकृतिक सीमा का निर्धारण करता है। सफेद कोह, सुलेमान और किरथर की पर्वत शृंखलाएँ भारतीय उप-महाद्वीप की पश्चिमी सीमा बनाती है।

पूर्वोत्तर में पटकाई पहाड़ी, नगा पहाड़ी, मिजो पहाड़ी, अराकान योमा आदि मिलकर भारतीय उप-महाद्वीप की प्राकृतिक सीमा बनाती हैं।

हिमालय उत्तर की ओर से विदेशी आक्रमणों को रोकने वाली अभेद्य प्राकृतिक दीवार का कार्य करता है। परन्तु भारतवर्ष शेष विश्व से पूर्णतया विलग नहीं रहा बल्कि प्रागैतिहासिक काल से ही विभिन्न दर्रों के माध्यम से यहाँ मानव समुदायों का निरन्तर आगमन होता रहा। कुछ प्रमुख दर्रे हैं :—

  • खैबर, बोलन, कुर्रम और गोमल जैसे उत्तर-पश्चिमी पहाड़ों में दर्रे भारत और मध्य एशिया के बीच आसान मार्ग प्रदान करते हैं।
  • जेलेप ला, नाथु ला, लिपुलेख दर्रा, नीति दर्रा, माना दर्रा, शिपकी ला, कराकोरम दर्रा आदि उत्तर में।
  • तुजू दर्रा, दिफू दर्रा आदि पूर्वोत्तर में।

ऐतिहासिक काल में खैबर और बोलन दर्रों का प्रयोग करके आक्रमणकारी बार-बार यहाँ आते रहे। इसमें से भी खैबर दर्रे का सर्वाधिक प्रयोग किया गया।

पूर्वोत्तर की पहाड़ियाँ भारी वर्षा के कारण घने जंगलों से आच्छादित रहती थीं और अधिकतर दुर्गम बनी रहीं। अतः इस क्षेत्र के कई हिस्से सापेक्षिक रूप से अलगाव में रहे हैं।

हिमालय की गोद में ‘कश्मीर’ और ‘काठमांडू’ की घाटियाँ हैं। ये चारों ओर से ऊँची पर्वत शृंखलाओं से घिरी है। जिससे कि यहाँ पर अपनी पहचान लिए एक अलग तरह की जीवन पद्धति विकसित हुई, परन्तु इसका यह अर्थ नहीं है कि ये घाटियाँ पूर्णतया अलग-थलग रहीं। विभिन्न दर्रों से यहाँ लोग प्राचीनकाल से ही आते जाते रहे। इस अलगाव का परिणाम यह हुआ कि यहाँ पर बाह्य आक्रमण कम हुए जिससे कि यहाँ पर बहुत सारी संस्कृति की पाण्डुलिपियाँ सुरक्षित रहीं।

‘ऋतुजन्य प्रवास’ यहाँ की प्रमुख विशेषता आज भी पायी जाती है। जब शीत ऋतु अपने चरम पर होती है तो जनजातियाँ निचले गर्म स्थानों की ओर चले आते हैं और जब बर्फ के पिघलने से चारागाह उपलब्ध हो जाते हैं तो ये लोग अपने मवेशियों के साथ हिमालय के ऊपरी क्षेत्रों चले जाते हैं।

कश्मीर का मध्य एशिया से निरन्तर सम्पर्क बना रहा। यहीं से बौद्धधर्म का प्रसार मध्य एशिया और वहाँ से चीन में पहुँचा।

कश्मीर घाटी में मानव नवपाषाणकाल में ही आ बसा था। इसके साक्ष्य हमें बुर्जहोम और गुफकराल से मिलते हैं। अत्यधिक ठंड से बचने के लिए मानव यहाँ गर्तावासों में रहा करता था।

गंगा के मैदान से काठमांडू घाटी में जाया जाता था। एक ओर जहाँ इसका सम्पर्क भारत की मुख्य भूमि से बना रहता था वहीं इसका सम्पर्क तिब्बत से भी बना रहता था।

हिमालय का भारतीय इतिहास में महत्व

  • उत्तर की ओर से विदेशी आक्रमणों को रोकने वाली अभेद्य प्राकृतिक दीवार का कार्य करता है।
  • साइबेरिया से होकर आनेवाली ठंडी ध्रुवीय पवनों से भारतीयों की रक्षा करता है। जिससे की उत्तरी भारत के मैदानी क्षेत्र की जलवायु अपेक्षाकृत पूरे साल गर्म रहता है।
  • दक्षिण-पश्चिम मानसूनी हवाओं को रोककर वर्षा कराता है।
  • सतत वाहिनी नदियाँ और इनसे निर्मित उपजाऊ सिंधु-गंगा-ब्रह्मपुत्र का मैदान हिमालय का वरदान स्वरूप ही है, जिसके लिए भारतवासी इसकी देवरूप में पूजा करते हैं।

सिंधु-गंगा-ब्रह्मपुत्र का विशाल मैदान

हिमवान के दक्षिण में विशाल मैदान स्थित है। यह विशाल मैदान तीन महत्वपूर्ण नदी प्रणालियों — सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र से सिंचित है। इस मैदान की लम्बाई ३,२०० किलोमीटर और चौड़ाई २४० से ३२० किलोमीटर तक है। यह विशाल उपजाऊ मैदान हिमालय से निकलने वाली सैकड़ों नदी-सरिताओं द्वारा लाई गयी जलोढ़ मिट्टी से बना है।

सिंधु नदी प्रणाली हिमालय से आगे निकलती है और इसकी प्रमुख पाँच सहायक नदियाँ ( पंचनद ) हैं — सतलज ( शतद्रु ), व्यास ( विपासा ), रावी ( परुष्णी ), चिनाब ( अस्किनी ), झेलम ( वितस्ता )। पंचनद से सिंचित क्षेत्र ही पंजाब कहलाया। ‘पंजाब’ ( पंच + आब ) शब्द का शाब्दिक अर्थ पांच नदियों की भूमि है। सिंध का मैदान सिंधु नदी  की निचली घाटी में स्थित है।

थार का विशाल मरुस्थल और अरावली की पहाड़ियाँ सिंधु और गंगा की प्राणालियों के मध्य विभाजक है।

गंगा नदी प्रणाली हिमालय से निकलती है और इसकी सहायक नदियाँ हैं —  यमुना, गोमती, सरयू, घाघरा, गंडक, सोन आदि हैं।

ब्रह्मपुत्र नदी प्रणाली की सहायिकाएँ हैं — सुबनसिरी, धरसिरी, मानस, तिस्ता आदि।

महत्व

  • यही नदी प्रणालियाँ भारतीय संस्कृति और सभ्यता की पालना रहीं।
  • सैंधव ( हड़प्पा ) सभ्यता का उद्भव सिंधु-सरस्वती नदी घाटी में हुआ।
  • द्वितीय नगरीकरण का उद्भव गंगा नदी घाटी में हुआ।
  • साम्राज्यों के उत्थान-पतन का आधार गंगा का विशाल मैदान रहा।
  • वैदिक सभ्यता का उत्थान हो या छठीं शताब्दी ई॰पू॰ का धार्मिक आन्दोलन इन सबका आधार यही उपजाऊ विशाल मैदान रहा है।
  • ऋग्वैदिक संस्कृति सप्तसैंधव क्षेत्र में फलीफूली तो उत्तर-वैदिक संस्कृति का आधार गंगा घाटी रही।
  • महाजनपदकाल में १६ में से १३ महाजनपद गंगा घाटी में, दो वर्तमान भारत के बाहर पाकिस्तान सिंधु नदी घाटी और एक दक्षिण भारत के गोदावरी नदी घाटी में स्थित थे।
  • जैसे शरीर के लिए ‘रक्त वाहिकाएँ’ होती है वैसे ही शरीर रूपी भू-खण्ड के लिए ये नदियाँ ‘संचार का माध्यम’ आधुनिक रेलवे के विकास तक कार्य करती रहीं।

प्रायद्वीपीय पठार

प्रायद्वीपीय पठार को निम्न भागों में बाँटा जा सकता है :— मध्यवर्ती उच्च भूमि, प्रायद्वीपीय पठार, तटीय मैदान और द्वीप समूह।

मध्यवर्ती उच्च भूमि

पश्चिम में अरावली पर्वत श्रेणी और पूर्व में विंध्य की कगारी भूमि ( कैमूर शृंखला ) से सीमांकित पर्वतीय क्षेत्र की पट्टी को मध्यवर्ती उच्च भूमि कहते हैं। इसकी दक्षिणी सीमा पर नर्मदा नदी की भ्रंश घाटी है। नर्मदा और ताप्ती नदियों के साथ विंध्य और सतपुड़ा पर्वत श्रेणियाँ उत्तरी और दक्षिणी भारत के बीच महान विभाजन रेखा बनाते हैं।

इस क्षेत्र में अरावली के पूर्व में राजस्थान की उच्च भूमि, मालवा का पठार, विंध्य की कगारी भूमि, बुंदेलखंड आदि इसमें सम्मिलित हैं। इस क्षेत्र पर बनास, चंबल, सिंद, बेतवा, केन आदि नदियाँ जल का वहन करती हैं और गंगा नदी प्रणाली का अंग बनती हैं।

ये पठार पर्याप्त रूप से उपजाऊ है और यहाँ पर प्राचीन काल से सभ्यता और संस्कृति का विकास हुआ।

प्रस्तर युग में भीमबेटका और नर्मदा घाटी में आदमगढ़ के शैलाश्रयों से मानव कृति चित्रकारियाँ मिलती हैं।

मालवा के उपजाऊ भूमि पर ताम्रपाषाणिक ‘मालवा संस्कृति’ और ‘कायथा संस्कृति’ का विकास हुआ था।

मालवा के पठार को मोटे तौर पर दो भागों में बाँटा जा सकता है – एक, पूर्वी मालवा और द्वितीय, पश्चिमी मालवा।

पश्चिमी मालवा ६ठीं शताब्दी ई॰पू॰ से मानव गतिविधियों का केन्द्र रहा। यहीं पर शक्तिशाली अवंति महाजनपद स्थित था। गुजरात के बंदरगाहों के लिए मालवा पृष्ठीय प्रदेश के रूप में महत्व रखता था। उपजाऊ मालवा और गुजरात के व्यापार पर अधिकार के लिए राजनीतिक शक्तियों में निरंतर संघर्ष होता रहता था; जैसे – शक-सातवाहन संघर्ष और १८वीं शताब्दी में राजपूत-मराठा संघर्ष।

पूर्वी मालवा को गुप्त काल में जाकर महत्त्व मिला। ध्यातव्य है कि गुजरात के समृद्ध व्यापार और उपजाऊ मालवा पर अधिकार करने के लिए गुप्त शासक चंद्रगुप्त द्वितीय ने शकों का उन्मूलन कर दिया था।

गंगा और राजमहल के मध्य चुनार अर्थात् उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर से पूर्व में तेलियागढ़ी तक एक संकरा मार्ग है। यही मार्ग पश्चिम और पूर्व के मध्य सम्पर्क का काम करता था। इस मार्ग का सामरिक महत्व था इसीलिए पूर्व में रोहतासचुनार के दुर्ग और पश्चिम में कालिंजरग्वालियर के दुर्गों का निर्माण किया गया था।

दक्कन का पठार

विंध्य और सतपुड़ा पर्वत शृंखला के दक्षिण में स्थित उच्च भूमि को दक्कन का पठार कहा जाता है। यह ज्वालामुखीय उद्गार से बनी है। ऐतिहासिक काल में इन चट्टानों को काटकर शैलाश्रय, मंदिर आदि बनाये गये।

पूर्वी घाट और पश्चिमी घाट, दक्कन का पठार को घेरता है।

पश्चिमी घाट में थाल घाट, भोर घाट, पाल घाट, और सेनकोट्टाह जैसे दर्रे हैं।

  • थाल घाट और भोर घाट कोंकण तट को दक्कन के पठार से जोड़ते हैं।
  • पाल घाट और सेनकोट्टाह मालाबार तट को कावेरी नदी घाटी से जोड़ते हैं।

उत्तर और दक्षिण भारत के बीच दक्कन का पठार एक सेतु का काम करता है। विंध्य, सतपुड़ा जैसे प्राकृतिक बाधा के कारण इस क्षेत्र में विशेष स्थानीय संस्कृति का विकास हुआ। यहाँ पर सुदूर दक्षिण और उत्तर की संस्कृति के समामेलन से एक विशेष पहचान मिली जैसे कि नागर और द्रविड़ वास्तुकला से बेसर शैली का विकास आदि।

अनाईमुडी ( २६९५ मीटर ) और दोदाबेट्टा ( २६३७ मीटर ) दक्षिणी प्रायद्वीप की दो प्रमुख सर्वाधिक ऊँची चोटियाँ हैं।

पूर्वी घाट, पश्चिमी घाट से अपेक्षाकृत कम ऊँचे हैं और असतत भी है। इसे नदियों ने जगह-जगह काट-छाँट दिया है।

  • नर्मदा व ताप्ती पूर्व से पश्चिम की ओर बहती हुई अरब सागर में मिलती हैं।
  • महानदी, गोदावरी, कृष्णा, तुंगभद्रा और कावेरी जैसी अन्य नदियाँ पश्चिम से पूर्व की ओर बहती हुई बंगाल की खाड़ी में मिलती हैं। इन नदियों की उपजाऊ घाटियों में चावल की पैदावार के लिए प्रसिद्ध है।
  • ऐतिहासिक काल में रायचूर दोआब ( कृष्णा और तुंगभद्रा के बीच का स्थान ) के अधिकार के लिये सतत राजनैतिक संघर्ष का क्षेत्र रहा।
  • यहाँ पर सभ्यता और संस्कृति का प्रसार मौर्य साम्राज्य के प्रसार के साथ शुरू हुआ और मौर्योत्तर काल में सुदूर दक्षिण में रोमन संपर्क से तटवर्ती क्षेत्रों में कई नगरों और पत्तनों का विकास हुआ।
  • कावेरी नदी घाटी सुदूर दक्षिण में एक विशिष्ट भौगोलिक और सांस्कृतिक क्षेत्र का गठन करता है। यहीं पर संगमकालीन सभ्यता और संस्कृति फली-फूली।

तटवर्ती क्षेत्र

पूर्वी और पश्चिमी घाट के समानांतर उपजाऊ संकरा तटवर्ती मैदान है जोकि समुद्री क्रियाकलापों और व्यापारिक गतिविधियों का केन्द्र रहा है।

कोरामंडल तट और उत्तरी सरकार पूर्वी घाट और बंगाल की खाड़ी के बीच स्थित है। प्राचीनकाल में कोरोमंडल तट पर अरिकामेडु, महाबलीपुरम्, कावेरीपत्तनम् ( पुहार ) जैसे बंदरगाह नगरों ( पत्तन नगरों ) का विकास हुआ था।

पूर्वी तटीय मैदान से आंतरिक प्रायद्वीप में जाना आसान है क्योंकि पूर्वी घाट एक तो अधिक ऊँचा नहीं है दूसरे बंगाल की खाड़ी में गिरने वाली नदियों ने इसे जगह-जगह काट दिया है। ये नदियाँ उपजाऊ डेल्टा का निर्माण करती हैं। ये उपजाऊ डेल्टा चावल की खेती के लिए प्रसिद्ध हैं।

पश्चिम का तटवर्ती मैदान पूर्व की अपेक्षा संकरा है। इसको उत्तर से दक्षिण की ओर क्रमशः कोंकण, कन्नड़ ( कनारा या कर्नाटक तट ) और मालाबार तट कहते हैं। ताप्ती से गोवा तक कोंकण, कर्नाटक का तट कन्नड़ और केरल का तट मालाबार तट कहलाता है।

पश्चिमी घाट की नदियाँ छोटी और क्षिप्र हैं। ये डेल्टा नहीं बल्कि ज्वारनदमुख ( estuary ) बनाती हैं।

पश्चिमी घाट सतत और ऊँचा है इसलिए प्रायद्वीप के पृष्ठभाग से आवागमन आसान नहीं था। हालाँकि थालघाट, भोरघाट, पालघाट और सेनकोट्टाह जैसे दर्रों से आवागमन होता था।

प्रायद्वीप भारत को प्रकृति ने एक लंबी तटरेखा उपहार में दी गई है, इसलिए यह क्षेत्र समुद्री गतिविधियों का केन्द्र प्राचीनकाल से ही रहा है। पूर्व में यहाँ से नाविक स्वर्ण द्वीप तो पश्चिम में रोमन साम्राज्य तक जाते थे। व्यापार के अलावा स्वर्ण द्वीप में उन्होंने भारतीय कला, धर्म और संस्कृति का प्रसार किया। दक्षिण भारत और ग्रीको-रोमन देशों के बीच व्यापारिक और सांस्कृतिक संबंध साथ-साथ विकसित हुए।

प्रायद्वीप के दक्षिण-पूर्व में श्रीलंका का द्वीप है यह राम सेतु ( आदम के पुल ) द्वारा जुड़ा हुआ है। आम के आकार के इस श्रीलंका द्वीप को प्राचीनकाल में ‘ताब्रपर्णी’ नाम से जाना जाता है। संस्कृति शब्द ताब्रपर्णी का अर्थ तांबूल या पान के पत्ते के आकार वाला है। इसको सिंहलद्वीप भी कहा गया है। रामायणकाल में रावण यहीं का शासक था। ऐतिहासिक काल से ही यहाँ से सांस्कृतिक संबंध रहा है। चोल काल में तो यह राजनीतिक रूप से भी चोल साम्राज्य का अंग रहा।

जलवायु और मानसून की भूमिका

कर्क रेखा भारतीय उप-महाद्वीप के मध्य से गुजरती है। भारतीय उप-महाद्वीप में कर्क रेखा के दक्षिण उष्णकटिबंधीय जलवायु, उत्तर में उपोष्ण जलवायु और पर्वतीय प्रदेशों में पर्वतीय जलवायु पायी जाती है। फिरभी भारतीय उप-महाद्वीप की जलवायु मोटे तौर पर ‘मानसूनी प्रकार की जलवायु’ है।

भारतीय जलवायु के निर्धारण में निम्न कारकों का योगदान है : —

  • कर्क रेखा का भारतीय उप-महाद्वीप के लगभग मध्य से गुजरना,
  • अत्यधिक ऊँचे हिमालय की उत्तरी सीमा पर स्थिति,
  • दक्षिण भारत की प्रायद्वीपीय आकृति,
  • पश्चिमोत्तर की समुद्र से दूरी, और
  • अन्य पर्वत शृंखलाएँ।

हिमवान भारतवर्ष को साइबेरिया से होकर आने वाली उत्तरी-ध्रुवीय ठंडी हवाओं से सुरक्षा करके यहाँ के जलवायु को लगभग पूरे वर्ष गर्म बनाये रखती है।

साहित्यों में वर्ष को दो-दो माह की छः नियमित ऋतुएँ और चार-चार महीने के तीन मौसम में बाँटा गया है।

पश्चिमोत्तर के कुछ भागों क्षेत्रों में गर्मी में तापमान ४८° सेंटीग्रेड तक तो कुछ हिमालयी क्षेत्रों में -४०° सेंटीग्रेड तक गिर जाता है।

जहाँ एक ओर चेरापूंजी और मासिनराम में ११,॰॰॰ मिलीमीटर से अधिक की वर्षा, तो लद्दाख और थार के मरुस्थल में २० सेंटीमीटर से कम होती है।

दक्षिण-पश्चिम मानसून भारतीय उप-महाद्वीप की विशेषता है। दक्षिण-पश्चिम मानसूनी हवाओं की जानकारी प्रथम शताब्दी ईसवी में ‘हिप्पॉलस’ नामक यूनानी नाविक ने दी थी। इससे समुद्री व्यापार को गति मिली।

मानसून अरबी भाषा के ‘मौसिम’ शब्द से व्युत्पन्न हुआ है। इसका अर्थ है — ‘पवनों की दिशा का मौसम के अनुसार उलट जाना।’

भारतीय जलवायु की स्पष्ट रूप से दो ऋतुएँ हैं — एक, दक्षिण-पश्चिम मानसून और द्वितीय, उत्तर-पूर्व मानसून। प्रथम से उप-महाद्वीप के अधिकांश भू-भाग पर वर्षा होती है, जबकि दूसरे से कोरोमंडल तट पर बारिश होती है। इन दो ऋतुओं को आधार बनाकर ‘भारतीय मौसम विज्ञान’ के अनुसार वर्ष को चार ऋतुओं में बाँटा गया है —

  • शीत ऋतु : दिसंबर से फरवरी
  • ग्रीष्म ऋतु : मार्च से मई
  • दक्षिण-पश्चिम मानसूनी ऋतु : जून से सितंबर
  • पीछे हटते मानसून की ऋतु या उत्तर-पूर्व मानसून या पश्चमानसून ऋतु : अक्टूबर से नवंबर

दक्षिण-पश्चिम मानसून से भारतीय भूभाग पर विभिन्न मात्रा में वर्षा होती है। उत्तरी मैदान में पूर्व से पश्चिम की वर्षा की मात्रा क्रमशः घटती जाती है। एक ओर पश्चिमोत्तर भारत में मुश्किल से २० सेंटीमीटर वर्षा होती है तो वहीं पूर्व में २५० सेंटीमीटर से अधिक वार्षिक वर्षा।

शीत ऋतु में ‘पश्चिमी विक्षोभ’ से उत्तरी भारत में कुछ वर्षा होती है। वहीं कोरोमंडल तट पर लौटते मानसून से पर्याप्त वर्षा होती है। यही जलाभाव या जलाधिक्य कृषि और फसलों की निर्धारक रही है।

भारतीय कृषि को ‘मानसून का जुआ’ कहा जाता है। यहाँ पर वर्षा के आधार पर फसलों की कृषि का निर्धारण हुआ।

उत्तरी भारत में खरीफ, रबी और जायद फसलों की कृषि का स्पष्ट विभाजन दिखता है। जिन क्षेत्रों में बारिश पर्याप्त होती थी वहाँ चावल जैसी फसलें बोई जाती थीं। जहाँ वर्षाभाव था वहाँ मोटे अनाजों की कृषि की गयी। जबकि जहाँ मध्यम वर्षा होती थी वहाँ पर गेहूँ और जौ की कृषि की गयी।

यह ध्यान देने वाली बात है कि मानव की प्रारम्भिक बस्तियाँ पश्चिमी भू-भाग में बसी थीं और यहाँ पर गेहूँ व जौ की कृषि की जाती थी।

चावल की खेती तब शुरू हुई जब मानव बस्तियाँ गंगा घाटी में बसना शुरू हुई क्योंकि यहाँ पर्याप्त वर्षा होती थी।

भारतवर्ष विविधतापूर्ण वनस्पतियों और मौसमों की नियमित शृंखला वाला देश है। यह मानव आवास के लिए सर्वथा अनुकूल देश है। इसीलिए विश्व के अन्यान्य भागों से आकर यहाँ जनसमुदाय आकर बसते रहे हैं।

मानसून ने भारतीय सभ्यता और संस्कृति के विकास में महती भूमिका निभाई है। इसने त्योहार, रहन-सहन, जीवन पद्धति, कृषि आदि को निर्धारित करके एक भारतीय संस्कृति के निर्माण में योगदान दिया है।

नदियों का महत्व

नदियाँ व्यापार और संचार का माध्यम थीं। प्रचीन काल में सड़क और नदियों पर पुल बनाना कठिन था। इसलिए परिवहन के लिए नदियों का प्रयोग होता था। ईस्ट इण्डिया कम्पनी के आने तक नदियाँ परिवहन और संचार का सर्वाधिक महत्वपूर्ण साधन बनी रहीं। अशोक के विशाल एकाश्मक स्तम्भ नदियों द्वारा ही देश के विभिन्न भागों में पहुँचाये गये थे।

नदियों के तट और संगम प्रारम्भिक मानव बस्तियों के केन्द्र बने। पूर्व-औद्योगिक युग के नगर, राजधानियाँ, बड़े नगर आदि नदी तट या नदी के संगम पर बसते थे।

  • गंगा और घाघरा नदी के संगम पर नवपाषाणकालीन स्थल ‘चिरांद’ स्थित था।
  • हड़प्पा सभ्यता के नगर ( हड़प्पा, मोहनजोदड़ो, चन्हूदड़ो, लोथल आदि ) नदी तट पर ही विकसित हुए थे।
  • गंगा घाटी में ६०० से ३०० ई॰पू॰ के मध्य में द्वितीय नगरीय क्रांति हुई जिसमें लगभग ६० नगरों के अस्तित्व का प्रमाण मिलता है। इनमें से भी ६ नगर प्रमुख ( चंपा, राजगृह, श्रावस्ती, साकेत, कौशाम्बी और वाराणसी ) थे जिनका उल्लेख बौद्ध साहित्य में मिलता है। इसमें से राजगृह को छोड़कर शेष सभी नदियों के तट पर विकसित हुए थे।
  • मगध साम्राज्य की राजधानी ‘पाटलिपुत्र’ एक तरह से जलदुर्ग ही था जिसे तत्कालीन परिस्थितियों में विजित करना लगभग असम्भव था। पाटलिपुत्र गंगा और सोन नदी के संगम पर स्थित थी। इसमें उत्तर से गंडक नदी आ मिलती तो दक्षिण से पाटलिपुत्र के पूर्व में पुनपुन नदी मिलती थी। वर्तमान में सोन नदी वर्तमान पटना से कुछ पश्चिम की ओर खिसक गयी है। इस तरह चारों ओर से घिरी मगध की राजधानी पाटलिपुत्र भारतवर्ष का ‘प्रथम महानगर’ था।

वर्षा ऋतु में नदियों द्वारा मैदानी भागों में उपजाऊ जलोड़ मिट्टी जमा कर दी जाती थी जिससे फसल अच्छी होती थी।

नदियाँ नहरों और जलाशयों के लिए जलापूर्ति का काम भी करती थीं। इतिहास प्रसिद्ध ‘शुदर्शन झील’ जिसका निर्माण चन्द्रगुप्त मौर्य के समय हुआ था जिसका बाद में अशोक, रुद्रदामन और स्कंदगुप्त के शासनकाल में पुनरुद्धार कराया गया था। दक्षिण में चोल शासकों ने भी कावेरी नदी पर बाँध बनवाकर नहरें निकलवायीं थीं।

गंगा के विशाल मैदान में वर्षा ऋतु में बाढ़ का आना एक विशेषता सी थी। जहाँ एक ओर इस बाढ़ से धरती की उर्वरा शक्ति बनी रहती थी वहीं कई बार किनारे स्थित नगर या बस्तियाँ नष्ट हो जाया करती थी। जैसे –

  • हस्तिनापुर नगर गंगा के बाढ़ में नष्ट हो गया था तब यहाँ के शासक निचक्षु ने यमुना तट पर आकर कौशाम्बी की स्थापना की थी।
  • हड़प्पा सभ्यता के कई नगर नदियों के किनारे विकसित हुए थे। हड़प्पा, मोहनजोदड़ो, चन्हूदड़ो आदि नगरों के उत्खनन से बाढ़ के बार-बार आने के प्रमाण मिलते हैं। जिसने इस सभ्यता के पतन में प्रमुख भूमिका निभायी।

नदियाँ राजनीतिक और सांस्कृतिक सीमा का निर्धारण भी करती थीं :—

  • प्राचीन कलिंग राज्य की सीमा उत्तर में महानदी और दक्षिण में गोदावरी द्वारा निर्धारित था।
  • आंध्र प्रदेश सामान्यतः गोदावरी और कृष्णा नदी डेटा में बसा था।
  • कृष्णा-गोदावरी डेल्टा को मौर्योत्तर काल में सातवाहनों के काल में महत्त्व मिला।
  • संगम संस्कृति का पालना कावेरी नदी रही जोकि ईसवी सन् की प्रारम्भिक शताब्दियों में फली फूली।
  • मोटे तौर पर कृष्णा नदी के दक्षिण में द्रविड़ संस्कृति का विकास हुआ और दक्कन व द्रविड़ शासकों के बीच रायचूर दोआब पर अधिकार के लिए निरंतर संघर्ष होता रहा। इस संघर्ष में दक्कन से पहले वातापी के चालुक्य और बाद में कल्याणी के उत्तरकालीन चालुक्यों ने हिस्सा लिया। दूसरी ओर द्रविड़ शासकों में पहले पल्लवों ने तो बाद में चोलों ने हिस्सा लिया था। मध्यकाल में यहीं संघर्ष विजयनगर और बहमनी साम्राज्यों के बीच हुआ।

बसावट ( Settlement )

हिमालय के तराई इलाके में बसना आसान था। इसके दो कारण थे –

  • एक तो तराई में जंगल को मैदानी भाग की अपेक्षा साफ करना आसान था।
  • दूसरे यहाँ नदियाँ कम चौड़ी थीं और उन्हें पार करना आसान था।
    • यही कारण है कि प्राचीन आवागमन के मार्ग पूर्व से पश्चिम दिशा में हिमालय की तराई में विकसित हुए थे।
    • कृषक समाज की जो बस्तियाँ ६ठीं शताब्दी ई॰पू॰ अस्तित्व में आयी वे इसी तलहटी में बसना शुरू हुई थीं।

मनसूनी वर्षा से उत्तरी भारत की नदियों में बाढ़ आ जाया करती थी। यहाँ यह ध्यान देने वाली बात है कि पश्चिम से पूर्व की ओर वर्षा की मात्रा क्रमशः घटती जाती है।

  • सिन्धु के मैदान में २५ से ३७ सेंटीमीटर वार्षिक वर्षा होती है।
  • गंगा के मैदान को तीन भागों में बाँटा जा सकता है—
    • ऊपरी गंगा का मैदान – ३७ से ६० सेंटीमीटर वार्षिक वर्षा
    • मध्य गंगा का मैदान – ६० से १२५ सेंटीमीटर वर्षिक वर्षा
    • निचला गंगा का मैदान – १२५ सेंटीमीटर से अधिक वार्षिक वर्षा
  • ब्रह्मपुत्र नदी के मैदान में २५० सेंटीमीटर अधिक वार्षिक वर्षा होती है।

इन्हीं कारकों ने बसावट को भी प्रभावित किया।

  • सैंधव क्षेत्र में हड़प्पा सभ्यता का विकास हुआ और सप्तसैंधव क्षेत्र पूर्व-वैदिक सभ्यता की पालना रही। क्योंकि कम वर्षा ( २५ से ३७ सेंटीमीटर वार्षिक वर्षा ) के कारण विरल वनस्पतियों को साफ करके इस क्षेत्र में बसना आसान था।
  • उत्तर-वैदिक काल में लोहे का ज्ञान हो चुका था। जिसकी सहायता से बसावट का क्रम गंगा की घाटी में भी पश्चिम से पूर्व की ओर होने लगा। इस बात की पुष्टि ‘शतपथ ब्राह्मण’ के ‘विदेघ माधव’ आख्यान से भी होता है कि अग्नि की सहायता से किस प्रकार जंगलों को जलाते हुए आर्य सदानीरा ( बिहार की गंडकी नदी ) के तट तक जा पहुँचे थे।
  • ब्रह्मपुत्र नदी घाटी में अधिक वर्षा होने के कारण यह सघन वनस्पतियों से ढँकी होने से दुर्गम बनी रही।
  • १६वीं – १७वीं शताब्दी तक दोआब घने जंगलों से ढके थे जहाँ पर पशुओं के शिकार किये जाते थे।
  • मानव समाज का विकास ( प्रारम्भिक ) वनों और पशुओं की कीमत पर हुआ।

‘इस तरह सामान्य भाषा में कहें तो भारतीय उप-महाद्वीप के उत्तरी मैदान में बसावट का क्रम क्रमशः पश्चिम से पूर्व और हिमालय की तलहटी से दक्षिणी की ओर हुआ।’

सिन्धु के मैदान और ऊपरी गंगा घाटी में सामान्यतः गेहूँ और जौ की खेती की जाती थी। मध्य और निचली गंगा नदी घाटी में मुख्यरूप से चावल की कृषि होती थी।

इस प्रकार बसावट का क्रम :—

  • हड़प्पा सभ्यता सैंधव क्षेत्र में फली-फूली।
  • पूर्व-वैदिक संस्कृति सप्तसैंधव क्षेत्र में विकसित हुई।
  • उत्तर-वैदिक आर्य संस्कृति का मुख्य केन्द्र ऊपरी गंगा घाटी बनी।
  • वैदिकोत्तर काल में बढ़ते लोहे के प्रयोग ने मध्य गंगा घाटी को केन्द्र में ला दिया।
  • उत्तरी बंगाल और निचली गंगा घाटी को वास्तव में गुप्तकाल में महत्व मिला।
  • ब्रह्मपुत्र घाटी को तो मध्यकाल में महत्व मिला।

अरावली पर्वत श्रेणी सिंधु और गंगा नदी तंत्र के मध्य एक जल विभाजक का काम करती है। अरावली के पश्चिम और सिंधु नदी के पूर्व में विशाल थार का मरुस्थल स्थित है।

मरुभूमि में बसावट कठिन था, फिरभी यहाँ पर मरु-उद्यानों ( oasis ) की उपस्थिति के कारण जहाँ-तहाँ मानव बस्तियाँ सम्भव हो सकी थीं। राजस्थान का दक्षिण-पूर्व भाग उपजाऊ था और यहाँ पर बनास नदी घाटी में ताम्रपाषाणिक संस्कृति की बस्तियाँ थीं। खेतड़ी की खानों से ताँबा प्राप्त किया जाता था।

गुजरात के दंतुरित तट ( indented coast ) पर बंदरगाहों का स्थिति व्यापार के लिए अनुकूल थी। हड़प्पा काल में लोथल ( भोगवा नदी ) और ऐतिहासिक काल में भृगुकच्छ ( तापी नदी ) जैसे बंदरगाहों का विकास हुआ।

मानव बस्तियों के आकार और स्थान कई पर्यावरणीय कारकों पर निर्भर करते थे :

  • यथोचित वर्षा, उपजाऊ मृदा, जलस्रोत ( नदी, झील ), प्राकृतिक संसाधनों से युक्त वन और पहाड़ियाँ, खनिज संसाधनों की उपलब्धता आदि मानव बस्तियों के लिए आकर्षण केन्द्र रहे हैं।
    • मानव बस्तियाँ शुरू से ही वहाँ बसती आयी हैं जहाँ जलस्रोत हो और आसपास शिकार व खाद्य-संग्रहण की सुविधा भी उपलब्ध हो।
    • नवपाषाणकाल में जब मानव ने कृषि और पशुपालन से खाद्य-सुरक्षा पा ली तो वह जलस्रोतों के पास मैदानी क्षेत्रों बसने लगा जहाँ उर्वर भूमि हो।
    • मौर्यकाल से मंडलकूपों ( ring-wells ) और सोख्तों या शोषगर्तों ( soakage pits ) के प्रयोग से जल-प्रदाय की समस्या का समाधान सम्भव हो सका और अब नदी तट पर ही बस्तियों की स्थापना की प्रचीन परम्परा में धीरे-धीरे परिवर्तन आने लगा।
  • दूसरी ओर संसाधन रहित शुष्क मरुस्थल लोगों की बसावट को हतोत्साहित करते थे।

वर्षा और मानवीय प्रयास

वर्षा ने मानवीय बसावट, कृषि, घरों के प्रकार, सांस्कृतिक जनजीवन, दैनिक कार्य-कलापों, त्योहारों, समारोहों आदि को गहरे से प्रभावित किया। वर्षा के चार माह ( आषाढ़, श्रावण, भाद्रपक्ष और आश्विन ) में उत्तरी भारत की अधिकांश नदियाँ उफान पर होती थीं अतः इससे मानवीय कार्य-कलाप भी प्रभावित होते थे –

  • गौतम बुद्ध इस चार माह में वर्षावास करते थे। वे राजगृह, वैशाली, श्रावस्ती आदि जगहों पर रुकते थे। उन्होंने श्रावस्ती में सर्वाधिक २६ वर्षावास किये।
  • सिकन्दर के आक्रमण के समय अत्यधिक वर्षा के कारण झेलम ( वितस्ता ) में बाढ़ आयी थी। पोरस की हार में वर्षा से हुई दलदली भूमि को भी एक कारण माना जाता है।
  • चौसा के युद्ध में गंगा और कर्मनाशा नदी की बाढ़ ने हुमायूँ की हार शेरशाह सूरी की विजय में निर्णायक भूमिका अदा की थी।
  • वर्षाकाल में सभी बड़े बड़े कार्यकलाप बंद रहते हैं जैसे –
    • रामायण में उल्लेख आता है कि सुग्रीव के राजा बनाने के बाद श्रीराम ने वर्षाकाल बीतने तक सीताजी के खोज कार्य स्थगित रखा था। वे लक्ष्मणजी से चिंतित होते हुए कहते हैं कि – ‘वर्षा बीत शरद ऋतु आयी’
    • आल्ह खंड में गाया जाता है कि – ‘सावन चिरैया न घर छोड़ै, न बंजारा बनिज को जाय’
    • विवाह जैसे बड़े मांगलिक कार्य वर्षाकाल में स्थगित रहते थे। वर्तमान में मानव ने अत्यधिक प्रगति कर ली है शहरों में बर्षा हो अत्यधिक शीत ऋतु हर समय मांगलिक कार्य किये जाते हैं। परन्तु हिन्दू पंचांग आज भी शुभ लग्न जैसी विधियों का जलवायु का अनुसरण करते हैं।
  • वर्तमान में अकाल कोई बड़ी आपदा नहीं रही परन्तु स्वतंत्रता के पूर्व तक यह एक बहुत बड़ी आपदा थी। अकाल से पूरे के पूरे गाँव निर्जन हो जाया करते थे। मौर्यकाल के सोहगौरा ताम्रलेख ( गोरखपुर जनपद, उ॰प्र॰ ) और महास्थान ताम्रलेख ( बोगरा जनपद, बाँग्लादेश ) में अकाल के समय अनाज वितरण का निर्देश राज्यकर्मियों को दिये जाने का उल्लेख है।

उत्तर-दक्षिण विभाजन

  • विंध्य व सतपुड़ा पर्वत श्रेणियाँ, नर्मदा व तापी की भ्रंश घाटियाँ भारतवर्ष को दो भागों में – उत्तरी और दक्षिणी भारत में बाँटती हैं।
  • प्राचीन काल में आवागमन इतना आसान नहीं था। अतः इन भौतिक अवरोधों का प्रभाव सांस्कृतिक रूप से भी परिलक्षित होता है।
  • उत्तर भारत में आर्य संस्कृति का विकास हुआ।
  • सूदूर दक्षिण ( कृष्णा नदी के दक्षिण ) में द्रविड़ संस्कृति का विकास हुआ।
  • दक्कन में आर्य और द्रविड़ संस्कृति का समामेलन दिखता है।
  • इसका उदाहरण हम वास्तुकला में भी देख सकते हैं; जैसे —
    • उत्तरी भारत में वास्तुकला की नागर शैली का विकास हुआ।
    • सुदूर दक्षिण में द्रविड़ शैली में मंदिर बनाये गये।
    • दक्कन में इन दोनों शैलियों के समामेलन से बेसर शैली ( चालुक्य शैली ) का विकास हुआ।
  • परन्तु ये प्राकृतिक बाधाएँ अलंध्य नहीं थीं। प्राचीनकाल से ही इन क्षेत्रों के मध्य सांस्कृतिक आदान-प्रदान होता रहा है।

प्राकृतिक संसाधनों की दृष्टि से इतिहास

  • आद्यैतिहासिक काल में भारतीय उप-महाद्वीप जंगलों से आच्छादित था। इन वनों से जलावन, पशुधन के लिए चारागाह, वनोत्पाद, शिकार आदि प्राप्त होते थे। कठोर धातु ( लोहा ) के अभाव में बड़े पैमाने पर इनका दोहन सम्भव नहीं था।
  • यद्यपि आद्यैतिहासिक काल में ( हड़प्पा सभ्यता ) में पकाई हुई ईंटों का प्रयोग हुआ था। परन्तु प्रारम्भिक ऐतिहासिक काल में लकड़ी के मकान ही बनाये जाते थे। चंद्रगुप्त मौर्य का पाटलिपुत्र का राजप्रासाद इसका उदाहरण है।
  • ऐतिहासिक काल में प्रस्तर मूर्तियाँ और शैलाश्रय अपेक्षाकृत दक्षिण भारत में अधिक बनाये गये थे।
  • ताँबे के भण्डार भारत में उपलब्ध थे। झारखंड का सिंहभूमि, हजारीबाग, राजस्थान के खेतड़ी आदि से ताँबा प्राप्त किया जाता था। मानव द्वारा उपयोग में लायी गयी ताँबा पहली धातु थी।
    • भारतीय उप-महाद्वीप में ताम्र-प्रस्तर संस्कृतियाँ ( chalcolithic culture ) विभिन्न भागों में अस्तित्व में आयीं :-
      • राजस्थान में बनास संस्कृति ( आहाड़ संस्कृति )
      • मालवा संस्कृति
      • दक्कन में जोरवे संस्कृति
  • काँसा का निर्माण ताँबे में टिन को मिलाने से होता है। हड़प्पा सभ्यता को काँस्ययुगीन सभ्यता भी कहा जाता है।
    • टिन का आयात किया जाता था क्योंकि यहाँ पर टिन की कमी थी। टिन का आयात हड़प्पावासी अफगानिस्तान से करते थे। यही कारण है कि समकालीन सभ्यताओं की अपेक्षा यहाँ पर काँसे का कम प्रयोग हुआ था।
    • ईसवी सन् की प्रारम्भिक शताब्दियों में भारत का सम्बन्ध दक्षिण-पूर्व एशिया से हुआ तो वहाँ से टिन का आयात होने से काँसे का प्रयोग बड़े पैमाने पैमाने पर होने लगा। दक्षिण में चोलकालीन कला का प्रसिद्ध नमूना काँस्य की नटराज की मूर्ति है।
  • भारत लौह धातु के अयस्क में समृद्ध है।
    • उत्तर-वैदिक काल में आर्यों को इसका ज्ञान हो चुका था। इसी धातु की सहायता से वे जंगलों को साफ करते हुए गंगा घाटी में बसने लगे।
    • गंगा घाटी में लोहे के प्रयोग से कृषि उत्पादन बढ़ा। मगध के साम्राज्यवाद का उदय हुआ, आर्थिक क्रांति, धार्मिक आंदोलन, द्वितीय नगरीय क्रांति व्यापारी और शस्त्रधारी क्षत्रिय वर्ग की शक्ति में वृद्धि आदि लौह धातु के प्रयोग के परिणाम थे।
  • सीसा भारत में उपलब्ध था। सातवाहनों ने तो सीसे के सिक्के भी चलाये थे। कुछ सीसा राजस्थान के जेवर से भी प्राप्त किया जाता था।
  • चाँदी विरल धातु थी। मुंगेर और खड़कपुर की पहाड़ियों से कुछ चाँदी प्राप्त की जाती थीं। छठीं शताब्दी में जारी किये गये आहत सिक्के ( punch-marked coins ) मुख्यतया चाँदी के ही थे।
  • स्वर्ण धातु की भारत में कमी थी —
    • कुछ सोना नदी निक्षेपों से मिलता था, इसे प्लेसर्स कहा जाता है।
    • सोना कर्नाटक की खानों से मिलता था। मौर्यों के दक्षिणी प्रसार के कारणों में से एक कारण यह भी था कि कोलार की स्वर्ण खानों पर अधिकार कर लिया जाये।
    • सोने की कमी के कारण यहाँ सोना या तो आयातित किया जाता था अथवा व्यापार अधिशेष के रूप में प्राप्त किया जाता था।
    • मौर्योत्तर काल में एक तो कुषाणों ने अंतरराष्ट्रीय साम्राज्य की स्थापना की दूसरे, रोमन साम्राज्य से व्यापार अधिशेष में यह भारत को प्राप्त हुआ।
    • कुषाण शासक अल्टाई की पहाड़ियों से और रोमन व्यापार से स्वर्ण प्राप्त करते थे। कुषाणों ने प्राचीनकाल में सर्वाधिक शुद्ध स्वर्ण सिक्कों के जारीकर्ता थे।
    • सुदूर दक्षिण से रोमन सिक्के मिलते हैं।
    • गुप्तकाल में स्वर्ण के सर्वाधिक सिक्के जारी किये गये जो कि अत्यंत कलात्मक हैं।
    • गुप्त साम्राज्य के पतन ( ५५० ई॰ ) के बाद बाह्य व्यापार में गिरावट के कारण स्वर्ण आयात अवरुद्ध हो गया जिससे स्वर्ण ही क्या सभी प्रकार के सिक्के दुर्लभ होते गये।
  • रत्न और मोती
    • दक्षिण भारत के नीलगिरी से नीला पत्थर हड़प्पा सभ्यता में आयात किया जाता था।
    • मध्य प्रदेश के पन्ना और आंध्र प्रदेश के गोलकुंडा से हीरा प्राप्त होता था।
    • दक्षिण भारत के समुद्री तटों से मोती मिलता था। इसके लिए रोमन बहुत लालायित रहते थे।

भारतीय इतिहास पर भूगोल का प्रभाव

कई मायनों में भौगोलिक विशेषताएँ मनुष्य की गतिविधियों और प्रकृति और पुरुषों के अन्य समूहों के साथ उसकी बातचीत को प्रभावित करती हैं। पहाड़ियों, पहाड़ों और नदियों आदि की प्राकृतिक बाधाएँ उसे एक भौगोलिक एकता और अपनत्व के विचार को पोषित करती हैं। वह अपने परिवेश के अनुसार अपने रहने की आदतों और सोचने के तरीके को विकसित करता है। उत्तर में हिमवान तो शेष तीन ओर समुद्रतटीय रूपी सुपरिभाषित प्राकृतिक बाधाएँ हैं। यह भारतवासियों को एकत्व की भावना देता है। भारतीय इसे अपनी मातृभूमि मानते हैं।

राजनीतिक रूप से भारत में हमेशा से कई राज्य रहे हैं, लेकिन उनकी सामाजिक और सांस्कृतिक साँचा-ढाँचा मोटे तौर पर एक जैसी रही है।

संस्कृत भाषा सबसे सम्मानित भाषा रही है, या तो वर्तमान स्थानीय भाषाओं उसी से विकास हुआ अथवा उसी से प्रभावित रही हैं।

धर्मशास्त्र जैसे विधि-विषयक-पुस्तकों के आधार पर राज्यों का प्रशासन और शासन किया जाता था।

पूजा-स्थल और तीर्थ-स्थल सम्पूर्ण भारतीय उप-महाद्वीप में पाये जाते हैं।

एक विचारधारा के अनुसार भारतीय इतिहास का निर्माण क्रिया-प्रतिक्रिया द्वारा हुआ है या यूँ कहें यह केंद्रीकरण और विकेन्द्रीकरण की शक्तियों द्वारा निर्मित हुई हैं। इसे इस तरह भी कह सकते हैं कि यहाँ पर एकीकरण और विघटन की शक्तियाँ सदैव सक्रिय रही हैं। प्रत्येक शासक के समक्ष चक्रवर्ती शासक बनने का आदर्श रहता था। प्राचीन भारत में दो बार ( मौर्यकाल और गुप्तकाल ) चक्रवर्तित्व की अवधारणा चरितार्थ हुई थी।

साम्राज्यों का उत्थान-पतन होता रहा परन्तु सामाजिक-सांस्कृतिक एकत्व की अजस्र धारा निरंतर प्रवाहमान रही। चोल साम्राज्य के अतिरिक्त किसी अन्य भारतीय शासक ने प्राकृतिक सीमाओं से परे साम्राज्य की स्थापना नहीं की।

भारतीय ज्ञात विश्व के अन्य भागों में गये। दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों में भारतीय सभ्यता और संस्कृति का विशेष प्रभाव पड़ा और आज भी इसका प्रभाव प्रत्यक्ष है।

यहाँ पर प्राचीनकाल से ही यूनानी, शक, पह्लव, कुषाण, हूण आदि आक्रांता रूप में आये परन्तु यहीं के होकर रह गये और यहीं की सभ्यता-संस्कृति में समाहित हो गये।

पर्यावरणीय चेतना

मानव सभ्यता और संस्कृति के विकास में पर्यावरण मुख्य कारक रहा है। हड़प्पा सभ्यता हो या वैदिक सभ्यता अथवा उसके बाद का समय उसका जनजीवन भौतिक पर्यावरण से प्रभावित होता रहा। मानव प्रकृति से सहयोग करता, संघर्षरत रहता और उससे प्रेरित भी होता रहा। प्राकृतिक शक्तियों से वह विस्मित होता और अपने को असहाय पाकर उसकी पूजा भी करता। प्रकृति से उसे औषधि मिले तो उसका संरक्षण किया। नदियों और भूमि की उर्वरा शक्ति को माता मान पूजा भी करता था। उपयोगी पशुओं को पालता और उनका संरक्षण करता। यह मात्र भारत में ही नहीं हुआ बल्कि मिश्र जैसी सभ्यताओं में भी नदी को आइरिस नाम से पूजा जाता था।

हड़प्पा सभ्यता में वृक्षपूजा, पशुपूजा आदि के संकेत मिलते हैं। कालान्तर में बहुत सारे तत्व हिन्दू धर्म में अपना लिए गये।

ऋग्वेद के नदी सूक्त में सरस्वती नदी को ‘नदीतमा’ कहा गया है। गाय को ‘अध्न्या’ कहा गया है। पृथ्वी की माता के रूप में वंदना की गयी है ( नमो मात्रै पृथिव्यै )।

हम कालान्तरमें देखते हैं कि एक परायण हिन्दू सुबह की प्रार्थना में ‘सात नदियों’ की वंदना करता है। जिसमें से गंगा नदी प्रमुख है।

नीम, पीपल, वट, शमी, तुलसी, दूर्वा, आदि को पवित्र और देवताओं का वास मान पूजा की जाती है। इनमें से अनेक पौधों का औषधिय महत्व भी है। वर्तमान में हर एक हिन्दू परिवार के घर में तुलसी का पौधा अवश्य होता है। सुबह स्नान के बाद ताम्र पात्र से गृहस्थ उसे जल चढ़ाते हैं।

गौतम बुद्ध प्रथम व्यक्ति थे जिन्होंने गायों और पशुओं की सुरक्षा आवश्यकता पर बल दिया ( सुत्तनिपात )। वे पशुओं को अनन्दा और सुखदा कहकर संरक्षण की बात करते हैं।

कालान्तर में हाथी, व्याध्र, वृषभ, मयूर आदि विभिन्न हिन्दू देवी-देवताओं से सम्बद्ध हो गये।

 

हड़प्पा सभ्यता या सिन्धु घाटी सभ्यता

 

भारतवर्ष का नामकरण

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