बलभी विश्वविद्यालय

भूमिका 

बलभी विश्वविद्यालय ( वल्लभी विश्वविद्यालय ) की स्थापना गुप्तशासन के सैन्याधिकारी भट्टार्क ( मैत्रक वंश ) द्वारा की गयी थी। यह गुजरात के भावनगर जिले के ‘वल’ नामक स्थान पर स्थित था। यह हीनयान बौद्ध धर्म की शिक्षा का केंद्र था। इसका समयकाल ५वीं शताब्दी से १२वीं शताब्दी तक था। बलभी गुप्त शासन के पतन के बाद मैत्रकवंशी शासकों की राजधानी रहा।

हुएनसांग बलभी आया था और वह हर्षवर्धन के समकालीन मैत्रकवंशी शासक ध्रुवसेन को हर्षवर्धन का जामाता बताता है। साथ ही बलभी विश्वविद्यालय के सम्बन्ध में महत्वपूर्ण जानकारियाँ देता है। सातवीं शताब्दी के अंत में आये चीनी यात्री इत्सिंग ने इसकी तुलना नालंदा विश्वविद्यालय से की है।

इतिहास 

बुंदेलों के परम्परागत इतिहास से पता चलता है कि वल्लभीपुर की स्थापना कनकसेन ने की थी। कनकसेन को बुंदेल अनुश्रुतियाँ श्रीराम के पुत्र लव का वंशज बताती हैं। कनकसेन द्वारा इसकी स्थापना का समय १४४ ई॰ निश्चित किया गया है।

गुप्तकाल काल में स्थापित इस विश्वविद्यालय को मैत्रकवंशी शासकों ( ४८० – ७७५ ई॰ ) का उदारतापूर्वक दान मिलता रहा। गुजरात सदैव विदेशी व्यापारिक गतिविधियों के कारण समृद्ध क्षेत्र रहा है और यहाँ के व्यापारिक वर्गों से भी बलभी विश्वविद्यालय को पर्याप्त दान मिला करता था।

जैन धर्म की तृतीय परिषद ( सभा या संगीति ) का आयोजन बलभी में ४५३ ई॰ में हुआ था। इस सभा की अध्यक्षता देवऋद्धिगण ( क्षमाश्रवण ) द्वारा की गयी थी। इस सभा द्वारा निर्धारित जैन धर्म का स्वरूप आज तक यथावत है। जैन संगीति या सभा

जैन रचना ‘विविधतीर्थकल्प’ से पता चलता है कि बलभी नरेश शीलादित्य ने ‘रंजक’ नामक एक व्यापारी को अपमानित किया। रंजक ने अफगानिस्तान के अमीर ( हम्मीर ) को उकसाकर बलभी पर आक्रमण करा दिया। इस युद्ध में शीलादित्य मारा गया।

शिक्षा व्यवस्था 

बलभी विश्वविद्यालय तक्षशिला और नालंदा की परम्परा का ही शिक्षण केन्द्र था। इसकी प्रसिद्ध का कारण यहाँ का विश्वविद्यालय, जैन संगीति और व्यापारिक केन्द्र के रूप में थी। चीनी यात्री हुएनसांग और इत्सिंग यहाँ आये थे। इस विश्वविद्यालय की स्थापना का समय ४७० ई॰ ( गुप्तकाल ) मना जाता है। 

चीनी यात्री हुएनसांग बलभी विश्वविद्यालय के बारे में कई महत्वपूर्ण तथ्यों का उल्लेख करते हैं; जैसे –

  • यहाँ एक सौ बौद्ध विहार थे।
  • बलभी में लभभग ६,००० हीनयानी भिक्षु रहते थे।
  • इसकी परिधि लगभग छः मील के घेरे में थी।

बलभी उच्च शिक्षा केन्द्र था। यहाँ पर छात्र २ या ३ वर्षों पढ़कर प्रकाण्ड विद्वान बन जाते थे। यहाँ पर भारत के विभिन्न भागों से शिक्षार्जन हेतु छात्र आते थे।

  • चीनी यात्री इत्सिंग के अनुसार यहाँ विभिन्न क्षेत्रों और देशों से आकर विद्वान एकत्रित होते थे। ये विद्वान विभिन्न सिद्धांतों पर शास्त्रार्थ करके तथ्यों को प्रामाणित करते थे।
  • यहाँ पर बंगाल जैसे दूर-दराज क्षेत्रों से भी विद्यार्थी आते थे।
  • सोमदेव भट्ट कृत ‘कथासरित्सागर’ में उल्लेख आता है कि बलभी विश्वविद्यालय में अन्तर्वेदी तक से ब्राह्मण शिक्षार्जन के लिए आते थे। इसमें कहा गया है अन्तर्वेदी के ब्राह्मण वसुदत्त के पुत्र विष्णुदत्त १६ वर्ष की आयु का होने के बाद में विद्या ग्रहण करने के लिये वलभीपुर आया था। अन्तर्वेदी गंगा और यमुना के बीच के प्रदेश को कहते हैं। इसे ब्रह्मर्षि प्रदेश भी कहा जाता था।

“अनतर्वेद्याम भूतपूर्वं वसुदत्त इति द्विजः।

विष्णुदत्ताविधानाश्च पुत्रस्तस्योपपद्यत॥

स विष्णुदत्तोवयसा पूर्णशोडशवत्सरः।

गन्तुं प्रववृत्ते विद्याप्राप्तये वलभीपुरम्॥”

( कथासरित्सागर )

यद्यपि यह बौद्धधर्म के हीनयान सम्प्रदाय की शिक्षा का प्रमुख केन्द्र था, तथापि यह अपनी बौद्धिक स्वतंत्रता के लिए प्रसिद्ध था। यहाँ अन्य बौद्ध सम्प्रदाय के साथ-साथ ब्राह्मण शिक्षा और लौकिक विषयों की भी शिक्षा जाती थी। यहाँ न्याय, विधि, प्रशासन, अर्थशास्त्र और लेखा, वार्त्ता, चिकित्सा, साहित्य जैसे लौकिक विषयों की उच्च शिक्षा भी दी जाती थी।

इत्सिंग के अनुसार यहाँ के स्नातकों का बड़ा सम्मान था और उन्हें प्रशासनिक पदों पर नियुक्त किया जाता था।

यहाँ के आचार्यों में स्थिरमति और गुणमति के नाम मिलते हैं। मैत्रकवंशी शासक धरसेन-प्रथम के लेख से ज्ञात होता होता है कि उसने इन दोनों विद्वानों के लिए दो सुन्दर विहार बनवाये थे। बलभी में ही रहते हुए इन दोनों आचार्यों ने अपने प्रसिद्ध ग्रंथों की रचना की थी। बाद में ये दोनों नालंदा विश्वविद्यालय में गये थे। स्थिरमति बसुबंधु के प्रसिद्ध चार शिष्यों में से एक थे। स्थिरमति अभिधम्म ( अभिधर्म ) के विद्वान थे।

नालंदा विश्वविद्यालय के समान ही यहाँ पर भी तोरणद्वार पर विद्वानों के नाम श्वेताक्षरों में अंकित कराये जाते थे। सातवीं शताब्दी में तो बलभी विश्वविद्यालय नालंदा विश्वविद्यालय का प्रतिस्पर्धी था।

पतन

७१२ ई॰ में कासिम के नेतृत्व में सिंध के राजा दाहिर को हराकर वहाँ अरब सत्ता स्थापित की जा चुकी थी। इसे आधार बनाकर अरब भारत के विभिन्न क्षेत्रों पर आक्रमण करते रहते थे।

वातापी के चालुक्यवंशी शासक विक्रमादित्य-द्वितीय ( ७३३ – ७४७ ई॰ ) के समय गुजरात होते हुए अरबों ने दक्षिण पर आक्रमण किया। इसका उल्लेख उनके लाट क्षेत्र के सामन्त पुलकेशिन् के नौशारी दानपत्र ( ७३९ ई॰ ) में हुआ है। इसमें पुलकेशिन् ने अरबों को बुरी तरह पराजित करके खदेड़ दिया जिससे प्रसन्न होकर विक्रमादित्य-द्वितीय ने उसे ‘अवनिजनाश्रय’ की उपाधि दी थी।

परन्तु इस आक्रमण में अरबों ने बलभी नगर और विश्वविद्यालय को भीषण क्षति पहुँचायी। जिससे वह उबर नहीं पाया। यद्यपि यह शिक्षा केन्द्र १२वीं शताब्दी तक चलता रहा परन्तु उसका गौरव जाता रहा।

 

 

प्राचीन भारतीय शिक्षा व्यवस्था कैसी थी ?

 

तक्षशिला विश्वविद्यालय

 

नालंदा विश्वविद्यालय

 

विक्रमशिला विश्वविद्यालय

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