प्राचीन भारत में ‘दास प्रथा’

परिचय

दास विधिक रूप से किसी अन्य व्यक्ति के स्वामित्व में होता है और अपने स्वामी के लिए काम करने के लिए बाध्य है। दास अपने निर्णय स्वयं नहीं ले सकता। दास होने की अवस्था ही ‘दास-प्रथा’ कहलाती है। अब तक जितनी संस्कृति और सभ्यताएँ हुई हैं उन सबमें यह प्रथा रही है। भारतीय सभ्यता भी इसका अपवाद नहीं है।

दासता की प्राचीनता और समापन

दास प्रथा की प्राचीनता के पुरातात्विक साक्ष्य ताम्रपाषाणकाल और हड़प्पा काल से भी मिलते हैं। तकनीकी रूप से ताम्रपाषाण संस्कृति को काँस्य संस्कृति ( हड़प्पा संस्कृति ) की पूर्ववर्ती मानी जाती है परन्तु भारतीय संदर्भ में यह ( ताम्रपाषाण संस्कृति ) हड़प्पा सभ्यता के साथ-साथ और बाद में भी पल्लवित होती रही। दूसरी ओर दासता के प्राचीनतम् लिखित साक्ष्य ऋग्वेद से मिलते हैं —

  • ताम्रपाषाणिक स्थल इनामगाँव ( पुणे, महाराष्ट्र ) से भी सामाजिक विभेद के साक्ष्य मिलते हैं।
  • सैंधव सभ्यता के हड़प्पा पुरास्थल के पश्चिमी गढ़ी से १ कमरे वाले मकान प्राप्त होते हैं जिससे विद्वानों ने यह मत व्यक्त किया है कि यहाँ दासता प्रचलित थी।
  • ऋग्वेद में दास, दस्यु तथा असुरों का उल्लेख आर्यों से भिन्न वर्ण के लिए किया गया है। ऋग्वेद में दास और दासियों का उल्लेख मिलता है।
    •  सुनीत कुमार चटर्जी के अनुसार ऋग्वेद में जिन दास-दस्युओं का उल्लेख हुआ है वे द्रविड़ भाषा-भाषी थे और हड़प्पा सभ्याता के निर्माता थे। यह निष्कर्ष सुनीत कुमार चटर्जी भाषा-विज्ञान के आधार पर देते हैं। परन्तु यह निष्कर्ष संदेहास्पद है।

“सम्पूर्ण भारतीय इतिहास में संगमकालीन के अतिरिक्त समाज में दासता सदैव प्रचलित रही है।”

  • सम्राट अशोक ने दासों और सेवकों के साथ अच्छा व्यवहार करने की राजाज्ञा जारी की थी ( ११वाँ शिला प्रज्ञापन)।
  • दास बाजार का स्थापना अलाउद्दीन खिलजी ने की थी।
  • फिरोज शाह तुगलक ने दास विक्रय पर रोक लगा थी।
  • लॉर्ड कार्नवालिस ने १७८९ ई॰ में दास प्रथा को रोका था।
  • चार्टर एक्ट, १८३३ के तहत दासों की दशा को सुधारने और अंततः इसके समाप्ति की बात कही गयी थी।
    • इसी अधिनियम के तहत लॉर्ड एलनबरो ने नियम – ५ द्वारा १८४३ ई॰ में दासता को समाप्त कर दिया।

दासों के प्रकार

कौटिल्य कृत अर्थशास्त्र ( मौर्यकाल ) में ९ प्रकार के दासों का उल्लेख मिलता है –

  • उदर-दास
  • दण्ड-प्रणीत दास
  • ध्वजाहृत दास
  • गृहे-जाते दास
  • दायागत दास
  • लब्ध दास
  • क्रीत दास
  • आत्म विक्रयी दास
  • अहितक दास

मनुस्मृति ( द्वितीय शताब्दी ई॰पू॰ ) में ७ प्रकार के दासों का उल्लेख मिलता है –

‘धव्जाहृतो भक्तदासो गृहजः क्रीतदत्त्रिमौ । पैतृको दण्डदासश्य सप्तैता दास योनयः ॥’

( मनुस्मृति )

  • ध्वजाहृत दास
  • भक्त दास
  • गृहज दास
  • क्रीत दास
  • दत्त्रिम दास
  • पैत्रिक दास
  • दण्ड दास

गुप्तकालीन स्मृतिकारों ( नारद व कात्यायन ) ने कुछ अन्य प्रकार के दासों का उल्लेख किया है।

पूर्व-मध्यकालीन स्मृतिकार विज्ञानेश्वर कृत मिताक्षरा ( याज्ञवल्क्य स्मृति पर भाष्य ) ने १५ प्रकार के दासों का उल्लेख किया है –

  • गृहजात दास
  • क्रीत दास
  • लब्ध दास
  • दायादुपगात दास
  • अनाकाल भृत दास
  • आहित दास
  • ऋण दास
  • युद्ध प्राप्त दास
  • पणेजित दास
  • उपागत दास
  • प्रवज्या वसित दास
  • कृत दास
  • भक्त दास
  • बड़वहृत दास
  • आत्म विक्रेता दास

चौथी-पाँचवीं शताब्दी ( गुप्तकाल ) से ही समाज में १५ प्रकार के दास मान्य हो गये थे।

ऋग्वैदिक दासों की विशेषताएँ

ऋग्वैदिक समाज में ‘दास’ और ‘दस्यु’ का उल्लेख मिलता है। वस्तुतः विदेशी विद्वानों ने इसका सरलीकृत व्याख्या दे दी कि आर्य बाहर से आये थे और उन्होंने भारत भूमि के मूल निवासियों को पराजित करके दास बना लिया। परन्तु यह बहुत ही छिछला विचार है। जैसे –

  • यदु और तुर्वश को पञ्चजन में गिना जाता था परन्तु इनको भी एक स्थान पर ‘दास’ कहा गया है।
  • ऋग्वैदिक नायक ‘दिवोदास’ और ‘सुदास’ जैसे नाम कम महत्व की नहीं है क्योंकि इनके तो नाम में ही ‘दास’ लगा लगा हुआ है।
  • भाषाशस्त्र की दृष्टि से कई दास नायकों के नाम अनार्य न होकर आर्य जैसे लगते हैं; यथा – शम्बर, शुग्र, तुग्र, वेतसु, चुमुरि, अर्बुद आदि।

दासों के बारे में कहा गया है कि वे अग्नि में हविर्दान नहीं करते थे, इंद्र-वरुण के पक्षपाती नहीं थे। ‘दस्यु’ अदेवयुः, अब्रह्मन्, अनासः ( चपटी नाक वाले ) और मृध्रवाचः ( कटुवाणी बोलने वाले ) थे। इस आधार पर दस्युओं को भी आर्यों से भिन्न बताया गया है।

परन्तु यहाँ यह उल्लेखनीय है कि ‘ऋग्वेद’ में दासों की तुलना में दस्युओं को आर्यों का बड़ा शत्रु बताया गया है। दस्यु हत्या का उल्लेख अपेक्षाकृत अधिक हुआ है। दस्युओं को तो अमानुष तक कहा गया है। दास्युओं के प्रति आर्यों के मन भय और घृणा का भाव पाया जाता था।

‘कुल मिलाकर दास और दस्यु भारत की आदिम जातियाँ ही नहीं अपितु आर्यों के भी वंशज हो सकते हैं जो विभिन्न कालखंडो में भारत आये और सांस्कृतिक भिन्नताएँ रखते थे।’ यहाँ मजे की बात यह है कि स्वदेशी विदेशी की बातें औपनिवेशिक दौर में शुरू हुई थीं वह आजादी के बाद भी बदस्तूर जारी है। इसका अबतक कोई पुख्ता साक्ष्य नहीं मिला फिरभी अकादमिक स्तर पर निरंतर यही चल रहा है।

ऋग्वेद में दासों की निम्न विशेषताओं का उल्लेख हुआ है —

  • अकर्मन् – वे वैदिक क्रियाओं का सम्पादन नहीं करते थे।
  • अदेवयुः – वे वैदिक देवताओं की पूजा नहीं करते थे।
  • अयज्वन् – वे वैदिक यज्ञ नहीं करते थे।
  • अब्रह्मन् – वे श्रद्धा और धार्मिक विश्वासों से हीन थे।
  • अन्यव्रत – वे वैदिकोत्तर व्रतों का अनुसरण करते थे।
  • मृद्धवाक् – वे अपरिचित भाषा बोलते थे।
  • शिश्नदेवा – वे लिङ्गपूजा करते थे।

स्पष्टतः ये अनार्यों की विशेषताएँ हैं। ऋग्वैदिक काल में आर्यों का अनार्यों से कड़ा संघर्ष होने का विवरण मिलता है। ऋग्वेद के अनुसार अनार्य चौड़े पाषाणयुक्त भवनों में रहते थे। आर्यों ने इन्द्र ( पुरन्दर ) के नेतृत्व में इन पुरों को नष्ट कर दिया और अनार्यों को पराजित कर दास बना लिया। पुरों को नष्ट करने के कारण ही इंद्र पुरन्दर कहलाये। इन्द्र ने दास वर्ण को गुहा से नीचे ढकेल दिया ( यो दासवर्णं अधरं गुहाकः )। अनार्यों को पराजित कर दास बना लिया गया।

उत्तर-वैदिककाल में दास-दासियाँ रखना सामाजिक कुलीनता का प्रतीक समझा जाता था। राजाओं, महाराजाओं व कुलीनों के यहाँ दास-दासियाँ सेवा कार्य किया करती थीं और इन्हें उपहार में दिया जाता था ( तैत्तिरीय संहिता, ऐतरेय ब्राह्मण, उपनिषद् साहित्य आदि )।

मौर्यकाल में दास प्रथा

विदेशी लेखकों के विचार —

  • चन्द्रगुप्त मौर्य की राजसभा में आये यूनानी राजदूत ‘मेगस्थनीज’ के अनुसार – ‘समस्त भारतवासी स्वतंत्र हैं। उनमें कोई भी दास नहीं है। भारतीय विदेशियों तक को दास नहीं बनाते, अपने देशवासियों की तो बात ही क्या है?’
  • डायोडोरस’ के अनुसार – ‘विधि के अनुसार उनमें से कोई भी किसी भी परिस्थिति में दास नहीं हो सकता।’
  • स्ट्रैबो’ ने मेगस्थनीज के विवरण के आधार पर लिखा कि, ‘भारतीयों ने किसी को अपनी सेवा में दास नहीं रखे। …क्योंकि उनके पास दास नहीं हैं, अतः उन्हें बच्चों की अधिक आवश्यकता होती है।’

परन्तु इन विदेशी विद्वानों के विचारों को अक्षरशः स्वीकार नहीं किया जा सकता है, क्योंकि —

  • मौर्यकाल से पूर्व ही वैदिक साहित्यों में दासों का उल्लेख मिलता है।
  • कम-से-कम बौद्धकाल से ही दासों को उत्पादक कार्यों में लगाने का विवरण पालि त्रिपिटकों में मिलता है।
  • स्वयं कौटिल्य ने ९ प्रकार के दासों का विवरण दिया है।
  • अशोक के शिलालेख दासत्व के अभिलेखीय साक्ष्य हैं। ( वृहद् शिला प्रज्ञापन सं॰ – ११ )

तो फिर विदेशी विद्वानों द्वारा भारत में दासता न होने की बात को कहने का क्या अर्थ हो सकता है?

  • इस सम्बन्ध में विद्वानों का मत है कि भारत में दासों के प्रति स्वामियों का व्यवहार यूनान और रोमन की अपेक्षा निर्मल और सद्भावनापूर्ण रहा हो जिससे कि ये विद्वान इसे भाँप न पाये पाये हो। अतः भारत में दासत्व के अनुपस्थिति की बात इन्होंने लिखी।
  • कौटिल्य लिखते हैं कि, ‘न त्वेवार्मस्य दासभावः।’ अर्थात् किसी भी परिस्थिति में आर्य के लिए दासता नहीं होगी।
  • सम्राट अशोक के शिला प्रज्ञापन संख्या – ११ में अभिलिखित है कि, ‘धर्म यह है कि दासों और सेवकों के साथ अच्छा व्यवहार किया जाय।’
  • इन सबको साथ मिलाकर पढ़ा जाय तो हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि, ‘स्वतंत्र लोगों को आजीवन दासता में परिणत करने की सीमाएँ थीं और दासों के साथ पश्चिमी सभ्यताओं की अपेक्षा मानवीय व्यवहार किया जाता था।’

मौर्यकालीन अर्थव्यवस्था में दासों की महत्वपूर्ण भूमिका थी।

  • पालि त्रिपिटकों की अपेक्षा अर्थशास्त्र में दासों का वर्णन विस्तार से मिलता है।
  • त्रिपिटकों में दासों के चार प्रकार बताये गये हैं।
  • जबकि कौटिल्य नौ प्रकार के दासों का उल्लेख करते हैं।
  • अर्थशास्त्र में तो तृतीय अध्याय ( विधि सम्बन्धी अध्याय ) के ‘दास कल्पः’ में दासत्व सम्बन्धी विधियों की चर्चा करके दास प्रथा को विधिक मान्यता दी है।
  • बौद्ध साहित्यों और अर्थशास्त्र के अनुशीलन से स्पष्ट होता है कि दास एक सम्पत्ति की भाँति थे।

ध्यातव्य है कि मौर्यकालीन साहित्यों ( बौद्ध, अर्थशास्त्र ) से ज्ञात होता है कि दासत्व सम्बन्धी जो परिभाषाएँ दी गयी हैं वे वैदिक परिभाषा से भिन्न हैं।

  • यहाँ पर आर्य व दास अन्तर उस तरह नहीं दिखायी देता जो वैदिककाल के विवरणों में मिलता है।
  • यहाँ पर सांस्कृतिक और नृजातीय ( cultural and ethnical ) अंतर को मान्यता नहीं दी गयी है।
  • यहाँ पर दास प्रथा केवल आर्थिक कारणों से सम्बंधित थी।

मौर्यकाल में सर्वप्रथम अखिल भारतीय साम्राज्य की स्थापना हुई जिसका प्रभाव प्रत्येक क्षेत्र पर पड़ा और दास प्रथा इसका अपवाद नहीं था।

  • अपहरण करके बलात् दास बनाना कम हो गया। दास सम्बन्धित नियम बनाये गये।
  • राजनीतिक एकता से आर्थिक एकीकरण को प्रोत्साहन मिला।
  • नगरों का उदय तेजी से होने लगा और व्यापारिक वर्ग का प्रभाव बढ़ने लगा। सेट्ठियों को बड़े पैमाने पर व्यापार और वाणिज्य के लिए दासों व सेवकों की आवश्यकता होती थी।
  • सेट्ठी भू-स्वामी भी होते थे। इन भूमियों पर दास काम करते थे या कभी-कभी किराये पर उठा दिया जाता था।
  • दासों से कृषि एक सामान्य बात बन गयी थी।
  • मौर्य शासन ने इसे समाप्त करने का प्रयास नहीं किया।

कलिंग युद्ध के समय अशोक ने १.५ लाख युद्धबंदी बनाकर निर्वासित किये। सम्भव है उन्हें कुछ उत्पादक कार्यों में नियोजित किया गया हो। जिससे कि गंगा घाटी की उत्पादक गतिविधियों का प्रसार सुदूर क़बायली क्षेत्रों में हुआ हो।

अर्थशास्त्र से भी ज्ञात होता है कि राजकीय भूमि पर कृषिकर्म हेतु, खादानों में, कारखानों में, सुरक्षा प्रबंधों में दासों व दासियों की नियुक्ति की जाती थी। दूसरे शब्दों में दासों को बड़े पैमाने पर उत्पादक कार्यों में नियोजित किया गया था।

अर्थशास्त्र में अहितक शब्द आता है।

  • कौटिल्य ने आजीवन दासों एवं किसी काल विशेष के लिए समझौते द्वारा उत्पन्न दासों में अंतर रखा है।
  • दास-प्रथा पर आधृत अन्य पुरातन समाजों की भाँति भारत में भी दासों के व्यक्तित्व एवं उसके श्रम का निपटारा करने में स्वामी को असीमित अधिकार प्राप्त थे। एक दास के रूप में वह व्यक्ति अपने स्वामी की सम्पत्ति होता है और वह सभ्य समाज का सदस्य नहीं हो सकता था।
  • फिरभी दूसरी ओर ऐसे लोग भी थे, जिनका दासत्व अस्थायी होता था और इन्हीं को अर्थशास्त्र में ‘अहितक’ कहा गया है।
  • अहितक दासों से कर्मकाण्डीय अशौच कृत्य नहीं कराये जाते थे। न तो इनका विक्रय किया जा सकता था और न ही इनको धारक बनाया जा सकता था। ये लोग क निश्चित समयोपरांत स्वतंत्र हो जाते थे। दासता का समय पूर्व होने पर ये स्वतः मुक्त हो जाते थे चाहे स्वामी चाहे या न चाहे।

कौटिल्य के अनुसार केवल बर्बर म्लेच्छ जोकि वर्ण व्यवस्था से बाहर और अनार्य थे वही स्थायी रूप से दास बनाये जा सकते थे। यहाँ यह उल्लेखनीय है कि, ‘शूद्र आर्य समाज का हिस्सा थे अतः उनका स्थायी दासत्व कौटिल्य वर्जित करते हैं।

निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि अर्थशास्त्र और अशोक के अभिलेखों से ज्ञात होता है कि राज्य दासों के स्तर को नियंत्रित करने और उनकी समस्याओं का स्पष्टीकरण करने का इच्छुक था।

गुप्तकाल में दास प्रथा

सभी शूद्र दास नहीं थे, परन्तु चूँकि दास-प्रथा प्रचलित थी, अतः यह निश्चित रूपेण कहा जा सकता है कि गुप्तकाल में कुछ शूद्र दास थे। महाभारत के शांतिपर्व में कहा गया है शूद्र की सृष्टि प्रजापति ने अन्य तीनों वर्गों के दास के रूप में की, इसीलिए उसे दास धर्म के पालन का उपदेश दिया गया है। नारदस्मृति में १५ प्रकार के दासों का उल्लेख मिलता है। नारद और वृहस्पति स्मृति में दासों को केवल अपवित्र कार्यों में लगाने की बात की गयी है।

मौर्यकाल की अपेक्षा अब दासों के सम्बन्ध में बदलाव देखने को मिलता है। इसकाल में दासों को उत्पादन कार्यों में नियोजित करने का प्रमाण नहीं मिलता है जबकि मौर्यकाल में इसके पर्याप्त प्रमाण उपलब्ध होते हैं। इस आधार पर हम कह सकते हैं कि पूर्वकाल की अपेक्षा अब दासों की दशा दयनीय थी।

याज्ञवल्क्य, नारद और कात्यायन स्मृतियों में कहा गया है कि, ‘दास अपने स्वामी के वर्ण के नीचे के वर्ण का होना चाहिए।’ कात्यायन स्मृति में कहा गया है कि, ‘दासत्व ब्राह्मणों के लिए नहीं हो सकती यहाँ तक कि ब्राह्मण ब्राह्मण का भी दास नहीं हो सकता है।’ यदि किसी आपत्ति के समय उसे ब्राह्मण का दास बनाना भी पड़ जाए तो वह वैदिक अध्ययन जैसे स्वच्छ कर्म को ही अपनाये। इस बात से यह निष्कर्ष निकलता है कि, दासता शूद्रों तक ही सीमित नहीं थी अपितु सभी वर्ण के लोग दास हो सकते थे।

महाभारत के अनुशासनपर्व में कहा है कि किसी मनुष्य को बेचना नहीं चाहिए। नारद और बृहस्पति स्मृति में स्वयं को बेचने वालों की निंदा की गयी है।

दासियों के अस्तित्व का पर्याप्त प्रमाण मिलता है। अमरकोश में ‘दासीसभम्’ ( दासियों का दल ) शब्द मिलता है। जैन साहित्यों से ज्ञात होता है कि आदिम जातियों से भी दासियाँ एवं चेरियाँ ली जाती थीं। यदि कोई दासी अपने स्वामी के संसर्ग से पुत्रवती हो जाती थी तो वह स्वतः मुक्ति की अधिकारिणी हो जाती थी।

गुप्तकाल में दासों की दशा सामान्यतः अपरिवर्तित रही। उन्हें पीटा जा सकता था और बेड़ियों में बाँधा जा सकता था।

साथ ही इस समय में अनेक ऐसे प्रमाण भी मिलते हैं जो दास प्रथा के कमजोर होने की ओर संकेत करते हैं। नारदस्मृति में ‘दासमुक्ति’ का विधान मिलता है। दास संगठन के प्रमाण भी प्राप्त होते हैं जिससे दास प्रथा को निश्चित रूप से शिथिल किया होगा। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अन्यान्य देशों की तरह भारतवर्ष में दासों के साथ अमानवीय व्यवहार ( दुर्व्यवहार ) नहीं किया जाता था इसीलिए विदेशी यात्री इसके अस्तित्व से अनभिज्ञ रहे।

प्रसिद्ध इतिहासकार प्रो॰ रामशरण शर्मा के अनुसार, ‘ऐसा लगता है कि वर्ण व्यवस्था कमजोर पड़ गयी थी और इस कारण दास-प्रथा थी शिथिल हुई। वर्ण-व्यवस्थानुसार शूद्र को दास बनना चाहिए परन्तु गुप्तकालीन पुराणानुसार वैश्य व शूद्र निहित वर्ण-धर्म का पालन नहीं करते थे अर्थात् वैश्य अन्य उपजाकर कर नहीं देते थे और शूद्र द्विजों की सेवा को तैयार नहीं थे। घोर वर्ण संकट की स्थिति उत्पन्न हो गयी थी।’ बँटवारे और बढ़ते भूमिदानों से भूमि छोटे-२ खंडों में विभाजित होती जा रही थी। अतः छोटे कृषि खेतों में स्थायी रूप से अधिक शूद्र, दास व मजदूर रखने की आवश्यकता नहीं होती थी। यह दास-प्रथा की शिथिलता का मुख्य कारण था।

इस काल में संकलित पुराणों, महाभारत, बौद्ध व जैन साहित्यों में ऐसे विवरण मिलते हैं जिनका संबंध तथाकथित कलियुग से किया जाता है अर्थात् भारतीय समाज में अवनति के पर्याप्त चिह्न दृष्टिगोचर हो रहे थे। इसको इतिहासकारों ने प्राचीनकाल से मध्ययुग की ओर संक्रमण के रूप में व्याख्यायित किया है। ऐसे में दास-प्रथा-आधृत उत्पादन-व्यवस्था में भी परिवर्तन आ रहे थे। जहाँ एक ओर ‘अंत्यों’ का ‘मध्यों’ में रूपांतरण हो रहा था वहीं दूसरी ओर ‘मध्यों’ की स्थिति ‘अंत्यों’ जैसी होती जा रही थी। ( यहाँ अंत्य का अर्थ अंत्यज, दास व वर्ण वर्ण व्यवस्था के निचले पायदान से है जबकि मध्य का अर्थ वैश्यों से है।) इस स्थिति परिवर्तन का मुख्य कारण था अर्थव्यवस्था ( व्यापार, वाणिज्य ) में आ रहे बदलाव। विष्णुपुराण के अनुसार वैश्य कृषि व व्यापार को त्यागकर शूद्रों के व्यवसायों अपनायेंगे और तुच्छ शिल्पी ( कारुकर्मोपजीविनः ) बन जायेंगे। कुल मिलाकर ईसा की प्रथम सहस्राब्दी के मध्य तक आते-आते दास-प्रथा के शिथिल होने की प्रवृत्ति प्रबल होती गयी। मनुस्मृति के टीकाकार भारुचि ( ≈ ६०० ई॰ ) दासों को सम्पत्ति विषयक अधिकारों पर चर्चा भी करते हैं।

यहाँ एक विचारणीय प्रश्न उठता है कि क्या इन स्वतंत्र किये गये दासों एवं दासों के रूपांतरण को मध्यकालीन यूरोप के कृषिदास के समान मान सकते है?

  • विष्णु धर्मोत्तर पुराण में इस बात के संकेत मिलते हैं कि ऐसे दासों को स्वामी व उनके बीच हुए वंशानुगत निर्भरता के बंधनों में बाँधा जा सकता था।
  • चंबा भूमि अनुदान ( १०वीं शताब्दी ) में दास, दासी और आश्रितहालिक का उल्लेख है। भूमि अनुदानों के सामान्य विवरणों से भी स्पष्ट होता है कि ‘आश्रित-हालिकों’ की गतिशीलता पर पर्याप्त प्रतिबंध आरोपित किये गये थे।
  • शहरीकरण का पतन, मुद्रा अर्थव्यवस्था का ह्रास, उत्पादन की सीमित ग्राम्य अर्थव्यवस्था जैसे परिवर्तन नवीन सामंतीय-उत्पादन व्यवस्था को बढ़ावा दे रहे थे। इससे कृषकों और दासों के शोषण की नवीन पद्धति का भी प्रचलन हो रहा था।
  • महासुपिन जातक के गद्यखंड में ( विंटननित्य के अनुसार जातकों के गद्य खंड को ५वीं-६ठवीं शताब्दी के लिए प्रयुक्त हो सकते हैं ) विवरण मिलता है –
    • ‘आने वाले दिनों में जगत् का पतन होगा … राजा अपनी अवश्यकतानुसार सभी देशवासियों से काम करवायेंगे … राजा अपनी प्रजा को उसी तरह पीस देंगे जैसे मिल में गन्ना पीसा जाता है …।’
    • कथन अतिशयोक्तिपूर्ण अवश्य है परन्तु इससे शासकवर्ग द्वारा कृषकों, शिल्पियों व दासों के दमन-शोषण की झलक तो मिलती ही है।
  • विष्टि ( बेगार ) की प्रवृत्ति न केवल राजा द्वारा कराया जाता था अपितु भूमिदान-लाभार्थी भी कराते थे।
  • मध्य एशिया के ग्राम्य समुदाय के आधुनिक शोधों से स्पष्ट हो ता है कि प्राचीन काल से मध्य काल में संक्रमण ‘दास-उत्पादन-प्रणाली’ के शिथिल होने पर उतना आधारित नहीं था जितना कि पहले के स्वतंत्र कृषकों की निर्भरता, शोषण एवं दमन पर जो कि उत्पादन का मुख्य कारण बनकर उभरा था। यद्यपि यह मत सभी जगह लागू नहीं होता। फिरभी मध्ययुग की एक विशिष्टता को उजागर करता है, जिसे कुछ सीमाओं के साथ भारतीय संदर्भ में भी देखा जा सकता है।

गुप्तोत्तर या पूर्व-मध्यकाल में दास प्रथा

पूर्व-मध्यकाल ( ६५० से १२०० ई॰ ) में दास प्रथा में वृद्धि हुई। अब न केवल शासक वर्ग व गृहस्थ दास रखते थे वरन् धार्मिक संस्थाओं ( बौद्ध मठ, वैष्णव-शैव-शाक्त मंदिर ) ने भी दास रखने शुरू कर दिये थे।

विज्ञानेश्वर कृति मिताक्षरा में नारदस्मृति में वर्णित १५ प्रकार के दासों का उल्लेख मिलता है। इनमें से ७ से ८ प्रकार के दासों का उल्लेख पूर्ववर्ती अर्थशास्त्र व तत्कालीन अभिलेखों में भी मिलता है। इनमें भी गृहज या उदर दास सर्व-साधारण थे।

लेखपद्धति के एक लेख में ५०४ विषलप्रिय में एक दासी की क्रय सम्बन्धित क्रयपत्र है जिसमें यह उल्लेख है कि इस क्रय की घोषणा सारे नगर में करायी गयी थी ( विषलप्रिय एक सिक्का था जिसे चाह्मान शासक विषलदेव के नाम पर चलाया गया था। )।

जैन ग्रंथ समराइच्छकहा और प्रबंधचिंतामणि दास व्यापार का उल्लेख मिलता है। दासों का निर्यात भी किया जाता था। वीरधवल के मंत्री तेजपाल ने नाविकों द्वारा मनुष्यों के अपहरण पर रोक लगायी थी। लेखपद्धति से ही ज्ञात होता है कि वस्तुओं के विनिमय में दासों का व्यापार समुद्री मार्ग से पाश्चिमी देशों को होता था। लेखपद्धति से ही राजस्थान और गुजरात में प्रचलित दास प्रथा की जानकारी मिलती है।

पुराणों से ज्ञात होता है कि दास-दासियों को दान में देने की प्रथा इस काल में पर्याप्त रूप से प्रचलित हो गयी। बौद्ध मठों और मंदिरों को दास दान के रूप में दिये जाते थे। इन दासों से मठों और मंदिरों की सफाई के साथ-साथ अनेक प्रकार की दैनिक परिचर्या करायी जाती थी।

बहुत से लोग ऋणमोचन के लिए स्वयं को ऋणदाता को बेच देते थे ( आत्मविक्रयी दास )। मनुस्मृति के टीकाकार मेधातिथि के अनुसार आत्मविक्रयी दास प्रथा अधिक प्रचलित थी। इस प्रथा की शास्त्र आलोचना करते हैं। फिरभी आत्मविक्रयी दास प्रथा देश, धर्म और राजा द्वारा बनाये गये नियम के अनुकूल थी। लेखपद्धति में ऋणमुक्ति हेतु एक कन्या के स्वविक्रय का उल्लेख मिलता है।

धर्मशास्त्रानुसार उच्च वर्ण का व्यक्ति अपने से निम्न वर्ण का दास नहीं बन सकता है। परन्तु इस नियम का व्यतिक्रम मिलता है।

पूर्व की भाँति इस समय भी दासों को गृहज कार्यों में निवेशित किया जाता था। दासों से निकृष्ट या अशौच कर्म भी कराये जाते थे; यथा – मलमूत्र की सफाई।

इस काल की रचनाओं में भृत्य और दास में बहुत कम भेद दिखता है यहाँ तक कि कोशों में इनमें कोई भेद ही नहीं माना गया है। भृत्य का अर्थ होता है वेतनभोगी सेवक। भटोत्पल ने दास एवं कर्मकार को समानार्थी माना है। परन्तु मेधातिथि और विज्ञानेश्वर ने परिचारक और दास में अंतर दिखाया है।

इस काल में दासों को कृषिकार्य में नियोजित करने के संकेत नहीं मिलते हैं। हालाँकि मठों और मंदिरों ने बड़ी संख्या में दासों को कृषिकर्म में लगाया था।

इसकाल के व्यवस्थाकारों ने दासों के जान-माल के सुरक्षोपाय के सम्बंध में कोई नियम नहीं प्रतिपादित किये जिससे उनकी दशा में और गिरावट आयी थी।

  • त्रिषष्टिशलाकाचरित में कहा गया है कि सामान्यतः दासों को खच्चर की तरह पीटना चाहिए, उनको भारी बोझा ढोना चाहिए और भूख-प्यास सहना चाहिए।
  • लेखपद्धति से ज्ञात होता है कि दासी क्रय के समय ही उनकी सम्मति ले ली जाती थी कि भागने, चोरी करने, मालिक की निंदा करने, स्वामी व उसके सम्बन्धियों की अवज्ञा करने पर स्वामी को उसे पीटने और बाँधने का अधिकार होगा। यदि दासी शारीरिक यातना से परेशान होकर आत्महत्या करे तो अगला जन्म नीच योनि में होगा। स्वामी की यातना से मृत्यु प्राप्त दासी का दोष स्वामी पर नहीं लगेगा और वह दोषमुक्त व दण्डमुक्त होगा।
  • इस तरह दास के जीवन पर स्वामी का पूर्ण अधिकार था। इस काल में दास-दासी के मुक्ति का कोई विधान नहीं मिलता है। अतिरिक्त परिश्रम या स्वामी की कृपा से भी मुक्ति की बात इसकाल में नहीं की गयी है।
  • लेखपद्धति में तो यह भी कहा गया है कि दासी के भाई या पिता भी धन देकर उसको मुक्त नहीं करा सकता है।

दास प्रथा से मुक्ति के विधान

प्राचीन व्यवस्थाकारों ने दास प्रथा की निंदा की है और उनके मुक्ति के विधान भी बनाये गये थे।

कौटिल्य और मनु के अनुसार आर्य दास नहीं बनाये जा सकते हैं बल्कि इस कार्य के लिए शूद्र वर्ण हैं।

प्रायः सभी व्यवस्थाकार सहमत हैं कि आर्थिक कारणों से दास बने व्यक्ति अपने स्वामी को मूल्य चुकाकर मुक्त हो सकते थे। जो व्यक्ति धन चुकाने में असमर्थ होते थे उन्हें एक निश्चित अवधि के बाद मुक्ति मिल सकती थी। ऐसी दशा में उनकी सेवा को ही मूल्य मान लिया जाता था। दासों को पृथक कमाई करने, सम्पत्ति रखने और पैतृक सम्पत्ति का उत्तराधिकारी होने का अधिकार प्राप्त था। इसका उपयोग वे अपनी मुक्ति के लिए कर सकते थे।

युद्ध बंदी को एक निश्चित समयावधि तक सेवा करने अथवा बंदी बनाये जाते समय उनके ऊपर किये गये व्यय का आधा अपने स्वामी को देकर स्वतंत्र होने का अधिकार प्राप्त था।

जो स्वामी दास से निष्क्रय मूल्य लेकर भी उसे स्वतंत्र नहीं करते उसके लिए अर्थशास्त्र दण्ड की व्यवस्था करता है।

स्वामी के संसर्ग से दासी यदि पुत्रवती हो जाये तो दासी और पुत्र दोनों दासत्व से मुक्त हो जाते थे।

बौद्ध ग्रंथ ‘दीघनिकाय’ में दास की मुक्ति के तीन उपाय बताये गये हैं –

  • दास द्वारा संन्यास ग्रहण करने पर,
  • धन देकर, और
  • स्वामी द्वारा स्वतंत्र किये जाने पर।

‘सोणनंद जातक’ के अनुसार यदि स्वामी संन्यास ग्रहण कर लें तो उसके सभी दास मुक्त हो जाते हैं।

नारद के अनुसार यदि दास अपने स्वामी की भारी विपत्ति से रक्षा करता है तो उस दास को स्वतंत्र होने का अधिकार मिल जाता था।

याज्ञवल्क्य धन देकर दासत्व से मुक्ति का विधान करते हैं।

नारद के अनुसार कुछ प्रकार के दासों; यथा – उपहार में प्राप्त, क्रय किये गये, उत्तराधिकार में मिले, स्वयं को बेचने वाले आदि दासों की मुक्ति के लिए उसके स्वामी की सम्मति आवश्यक थी।

कौटिल्य के अनुसार स्वामी के इच्छा के विरुद्ध, उसके घर से भागने वाला दासत्व से कभी मु्क्त नहीं हो सकता था।

दास-दासियों के कर्त्तव्य

लेखापद्धति में दासियों के कर्त्तव्यों का निरुपण मिलता है। इससे यह भी पता चलता है कि कभी-कभी दासियाँ स्वामियों के अत्याचारों से तंग होकर आत्महत्या तक कर लेती थीं।

दासों के अलावा कुलीन परिवारों में सेवक भी होते थे। सामान्य सेवक केवल शुद्ध कार्य करते थे जबकि दासों को निम्न कार्यों में नियोजित किया जाता था; यथा – झाड़ू लगाना, मैला साफई, स्वामी की व्यक्तिगत सेवा आदि।

मौर्यकाल में दासों को बड़े पैमाने पर उत्पादक कार्यों में नियोजित किया गया था परन्तु कालान्तर में यह प्रवृत्ति घटती गयी और पूर्व-मध्यकाल में इसके कोई साक्ष्य नहीं मिलते हैं। हालाँकि पूर्व-मध्यकाल में मठ और मंदिरों ने कृषि-कार्य में दासों को अवश्य लगाया था।

निष्कर्ष

यद्यपि प्राचीन व्यवस्थाकारों ने दास प्रथा की यत्र-तत्र आलोचना की और उनकी मुक्ति के व्यापक उपाय भी सुझाये हैं तथापि समाज में दास-प्रथा चलती रही।

भारत में वैदिककाल से लेकर पूर्व-मध्यकाल तक दास प्रथा तब तक विद्यमान रही जब तक की आधुनिक काल में चार्टर अधिनियम, १८३३ के अन्तर्गत लॉर्ड एलनबरो ने नियम – ५ के तहत १८४३ ई॰ में इसका अंत नहीं कर दिया। यहाँ यह उल्लेखनीय है कि संगमकाल में दास-प्रथा नहीं थी। कुछ विद्वानों के अनुसार हड़प्पा सभ्यता और उससे पूर्व भी ताम्रपाषाणकाल में भी दास-प्रथा विद्यमान थी।

भारतीय दास व्यवस्था यूनान और रोम जैसी अमानवीय नहीं थी। यह कहना उचित नहीं है कि यूनान व रोम में जो कार्य दासों ( हेलाटों – heylots ) द्वारा किया जाता था, वही कार्य भारत का शूद्र वर्ग करता था। भारतीय और यूनानी-रोमन दासों की जीवन पद्धति परस्पर भिन्न थी।

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