जैन दर्शन

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भूमिका

जैन दर्शन अनीश्वरवादी है परन्तु अनात्मवादी नहीं है अर्थात् जैन दर्शन में ईश्वर की मान्यता नहीं है जबकि आत्माएँ अनन्त हैं। महावीर कर्मवाद और पुनर्जन्म विश्वास रखते हैं।

जैन मत दार्शनिक दृष्टि से वस्तुतः ‘वस्तुवादी’ और ‘बहुसत्तावदी’ हैं। अर्थात् जितने प्रकार के द्रव्य हम देखते हैं वे सभी सत्य हैं। संसार में दो प्रकार के द्रव्य हैं – जीव और अजीव।

जैन मत सभी मतों के प्रति समादर का भाव रखता है। इस समादर भाव के मूल में स्याद्वाद ( अनेकांतवाद या सप्तभंगीय ) सिद्धान्त है। स्याद्वाद के अनुसार कोई भी मत निरपेक्ष रूप से सत्य नहीं हो सकता है। एक ही पदार्थ के विषय में अवस्था, दृष्टि, परिवेश आदि के आधार पर अलग-अलग मत हो सकते हैं।

जैन दर्शन में वेदान्तीयों और बौद्धों की तरह अज्ञान को बंधन का कारण माना गया हैं।

प्रमाण विचार

 ज्ञान और उसके भेद 

जीव का स्वरूप चैतन्य है। 

जैन मतानुसार प्रत्येक जीव का स्वरूप चैतन्य है। जीव या आत्मा की उपमा जैनियों ने सूर्य से की है। जिस प्रकार सूर्य का प्रकाश स्वयं और सूर्य को प्रकाशित करती है उसी तरह आत्मा ( चैतन्य ) स्वयं और वस्तु दोनों को प्रकाशित करता है। इस संदर्भ में जैनमत कहता है – ‘ज्ञानं स्वपरभासी।’ 

आगे व्याख्यायित करते हुए कहा गया कि जिस तरह सूर्य जब बदलों के आवरण में हो जाता है तो धूप नहीं दे पाता उसी तरह बंधन-युक्त आत्मा से ज्ञान-प्रकाश नहीं हो पाता है। जैसे बादल छंटनें से धूप खिलती उसी तरह बंधन के नाश होने से आत्मा के ज्ञान से स्वयं आत्मा और वस्तु दोनों प्रकाशित हो जाते हैं।

अनंत ज्ञान सभी जीवों में है परन्तु बंधनग्रस्त रहने से इसकी उपलब्धि उसे नहीं हो पाती है। ज्ञान की परिमितता ( finiteness ) कर्मजनित बाधाओं के कारण होती है। इन्हीं बाधाओं के कारण ज्ञान में कमी आ जाती है और जीव की सर्वज्ञेयता बाधित हो जाती है।

शरीर, मन और इंद्रिय कर्मों के कारण उत्पन्न होते हैं। इनके कारण ही आत्मा का स्वाभाविक असीम ज्ञान ससीम हो जाता है।

प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष ज्ञान-

जैन मत दो तरह का ज्ञान मानते हैं –

    • एक, प्रत्यक्ष ( अपरोक्ष ) : प्रत्यक्ष ज्ञान के दो भेद होते हैं –
      • व्यावहारिक प्रत्यक्ष ज्ञान
        • मति
        • श्रुत
      • पारमार्थिक प्रत्यक्ष ज्ञान : पारमार्थिक प्रत्यक्ष ज्ञान के भी तीन भेद किये गये हैं –
        • अवधि
        • मनःपर्याय
        • केवल
    • द्वितीय, अप्रत्यक्ष ( परोक्ष ) ज्ञान

परन्तु ये प्रत्यक्ष ज्ञान को भी अपेक्षाकृत ही प्रत्यक्ष मानते हैं क्योंकि इंद्रिय या मन से प्राप्त बाह्य या आभ्यंतरिक विषयों का ज्ञान अनुमान की अपेक्षा प्रत्यक्ष होता है फिरभी इसे पूर्णरूपेण प्रत्यक्ष नहीं माना जा सकता है क्योंकि यह इंद्रिय या मन से होता है।

इस व्यावहारिक अपरोक्ष ज्ञान के अलावा पारमार्थिक प्रत्यक्ष ज्ञान भी हो सकता है। इस पारमार्थिक प्रत्यक्ष ज्ञान की प्राप्ति कर्म-बंधन के नष्ट होने पर ही होती है। पारमार्थिक प्रत्यक्ष ज्ञान आत्मा और ज्ञेय वस्तुओं का साक्षात् सम्बंध होता है अर्थात् बिना इंद्रिय की सहायता से। जबतक कर्मजनित बाधाओं का नाश नहीं होता है तबतक पारमार्थिक प्रत्यक्ष ज्ञान की प्राप्ति नहीं होती है।

मति – वह ज्ञान जो मन और इंद्रियों द्वारा प्राप्त होता है। इसके अंतर्गत व्यावहारिक प्रत्यक्ष ज्ञान ( बाह्य ) और आभ्यंतरिक ( प्रत्यक्ष, स्मृति ), प्रत्यभिज्ञा, अनुमान आदि सभी आ जाते हैं।

जैनियों के अनुसार प्रत्यक्ष-ज्ञान की उत्पत्ति क्रमशः चार चरणों में होती है –

    • अवग्रह
    • ईहा
    • आवाय
    • धारण

जब हम कोई आवाज सुनते हैं तब यह अज्ञात होता है कि यह ध्वनि किसकी है। इसी को अवग्रह कहते हैं। अवग्रह में केवल विषय का ग्रहण होता है। जब मन में यह विचार आता है कि इस ध्वनि का स्रोत क्या है तब इस अवस्था को ईहा कहा गया है। जब ध्वनि के स्रोत का निश्चय ज्ञान प्राप्त हो जाता है तब इसको आवाय कहते हैं। इस निश्चित ज्ञान का मन में धारण करने की अवस्था धारण कहलाती है।

श्रुत – शब्द से प्राप्त ज्ञान को कहते हैं। इसके अंतर्गत आप्त-वचन और प्रामाणिक ग्रंथों से मिले ज्ञान आते हैं। इसके लिए इंद्रिय-ज्ञान का होना आवश्यक है। मति-ज्ञान श्रुत-ज्ञान के बाद आता है। तीर्थंकरों के उपदेश सर्वश्रेष्ठ श्रुत-ज्ञान हैं।

अवधि पारमार्थिक प्रत्यक्ष ज्ञान – जब व्यक्ति अपने कर्मों को अंशतः नष्ट कर देता है तो एक ऐसी क्षमता ( शक्ति ) मिलती है कि वह दूरस्थ, सूक्ष्म और अस्पष्ट वस्तुओं ( या पदार्थों ) को भी जान सकता है। इससे सीमित ज्ञान प्राप्त होता है इसलिए इसको ‘अवधि ज्ञान’ कहते हैं।

मनःपर्याय पारमार्थिक प्रत्यक्ष ज्ञान – जब व्यक्ति राग-द्वेषादिक मानसिक विकारों से मुक्ति पा लेता है तब वह अन्य लोगों के वर्तमान और भूत विचारों को जानने में सक्षम जाता है अर्थात् वह दूसरे के मन में प्रवेश करने में सक्षम जाता है। इसे ही ‘मनःपर्याय ज्ञान’ कहते हैं।

केवल ज्ञान – जब ज्ञान में बाधक सभी कर्म-बंधनों का पूर्णतया नाश हो जाता है तब अनंत ज्ञान की प्राप्ति होती है। इसे ही ‘केवल-ज्ञान’ कहते हैं। यह मुक्त जीवों को प्राप्त होता है।

“जैन मतानुसार मति-ज्ञान, श्रुत-ज्ञान और आवधि-ज्ञान में दोष की सम्भावना बनी रहती है परन्तु मनःपर्याय-ज्ञान और केवल-ज्ञान दोषरहित होते हैं।”

सामान्यतः जैन मत भी ये तीन प्रमाण मानता है ( प्रमाणानि प्रत्यक्षानुमानशब्दानि )।

  • प्रत्यक्ष।
  • अनुमान।
  • शब्द।

 चार्वाक मत का खंडन

चार्वाक एकमात्र प्रत्यक्ष को प्रमाण मानते हैं। वे अनुमान और शब्द प्रमाण नहीं मानते हैं। यदि चार्वाक से प्रश्न किया जाये कि केवल प्रत्यक्ष प्रमाण ही क्यों? तो चार्वाक दो तरह से उत्तर दे सकते हैं –

  • या तो चार्वाक मौन रहेंगे,
  • या फिर उत्तर देंगे कि प्रत्यक्ष प्रमाण सर्वथा मान्य हैं क्योंकि यह दोषमुक्त है।
    • यदि चार्वाक मौन रहे तो इसका अर्थ होगा कि इसके लिए उनके पास कोई युक्ति नहीं है। अतः उनका मत नहीं माना जा सकता है।
    • यदि चार्वाक ने कोई युक्ति दी तो इसका अर्थ होगा कि वह स्वयं अनुमान की सहायता ले रहे हैं।

प्रत्यक्ष प्रमाण के समर्थन हेतु चार्वाक की यह युक्ति कि प्रत्यक्ष प्रमाण निर्विवाद और दोषरहित होता है, अनुमान और शब्द पर भी लागू हो सकती है। इस तरह अनुमान और शब्द भी स्वीकारयोग्य हो जाते हैं। चार्वाक कह सकते हैं कि अनुमान और शब्द कभी-कभी दोषयुक्त भी हो सकते हैं। तो इसके प्रति-उत्तर में कहा जा सकता है कि प्रत्यक्ष प्रमाण भी कभी-कभी दोषयुक्त या भ्रमात्मक होता है। अतः प्रत्यक्ष, अनुमान और शब्द इन तीनों को प्रमाण मानना चाहिए जब वे दोषमुक्त हों। ज्ञान का उसके व्यावहारिक परिणामों के साथ सामंजस्य ( संवाद ) होना ही उसकी प्रामाणिकता है।

चार्वाक परलोक जैसे अप्रत्यक्ष विषयों के अस्तित्व को नहीं मानते हैं। यहाँ वे स्वयं प्रत्यक्ष की सीमा से परे चले जाते हैं। वस्तुओं के न दिखने से उसके अभाव का अनुमान करते हैं। फिर जब चार्वाक यह कहते हैं कि सभी प्रत्यक्ष प्रामाणिक हैं तो वे अनुमान की ही सहायता लेते हैं। क्योंकि यहाँ अतीत के प्रामाणिक प्रत्यक्षों के आधार पर ही भविष्य के प्रत्यक्षों के सम्बन्ध में अनुमान किया जाता है। जब चार्वाक अपने विपक्षियों से तर्क करते हैं तो उस समय भी विपक्षियों के शब्दों से उनके विचारों का अनुमान लगाते हैं। अन्यथा वे किसी वाद-विवाद में भाग नहीं ले सकते। इस तरह हम देखते हैं कि ‘प्रत्यक्ष ही एकमात्र प्रमाण है’ , यह मत युक्तिसंगत नहीं है।

जैन दर्शन का निर्णय या परामर्श ( Judgement ) सम्बंधित विचार

 स्याद्वाद

एक परामर्श से वस्तु के एक ही धर्म का ज्ञान या बोध होता है।

वस्तुओं के सम्बन्ध में हमारे जो भिन्न-भिन्न प्रकार के प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष ज्ञान है, उससे स्पष्ट है कि उनके अनेक धर्म होते हैं ( अनन्तधर्मकं वस्तु )। केवल-ज्ञान से वस्तुओं के द्वारा अनंत धर्मों का प्रत्यक्ष ज्ञान प्राप्त होता है, परन्तु सामान्य व्यक्ति किसी वस्तु के समय विशेष पर एक ही दृष्टि से देख पाता है। इसलिए सामान्य व्यक्ति उस वस्तु के एक ही धर्म का ज्ञान प्राप्त कर पाता है। वस्तु के इस ज्ञान को जैनियों ने ‘नय’ कहा है। इस आंशिक-ज्ञान के सम्बन्ध में हमारा जो परामर्श ( निर्णय ) होता है वह सभी सभी दृष्टियों से सत्य नहीं होता है। उसकी सत्यता उसके ‘नय’ पर निर्भर करती है। दूसरे शब्दों में जिस दृष्टि और विचार से किसी विषय का परामर्श किया जाता है, उसकी सत्यता उसी दृष्टि एवं उसी विचार पर निर्भर करती है। हमारा मतवैभिन्न तब होता है जब  हम एकदृष्टीय ज्ञान को सर्वथा सत्य मान बैठते हैं।

  • उदाहरण के लिए कुछ अंधे व्यक्तियों द्वारा एक हाथी का आकार सम्बन्धी ज्ञान। वे हाथी के जिस अंग को छूकर हाथी को जाने उसी को हाथी मान लेते हैं। जैसे हाथी के पाँव को छूने वाला हाथी को स्तम्भ तो पूँछ छूने वाला झाड़ू की तरह बतायेगा। प्रत्येक व्यक्ति हाथी को अलग-अलग बतायेगा परन्तु दृष्टि साम्य होने पर मतभेद की सम्भावना नहीं होती है।
सभी दर्शन अपनी-अपनी दृष्टि से सत्य हैं

भिन्न-भिन्न दर्शनों में मतवैभिन्न का कारण उनमें दृष्टि-साम्य का न होना है। अन्यान्य दर्शनों को यह भी सोचना चाहिये कि उनका मत उनकी दृष्टि विशेष पर निर्भर है और हो सकता है कि वह अन्य दृष्टकोण से अयुक्तिसंगत हो। जैसे – हाथी के सम्बन्ध में अंधे व्यक्तियों द्वारा अर्जित ज्ञान। उसी तरह अन्य दर्शन भी अपनी-अपनी दृष्टि से सही हैं।

‘स्यात्’ का प्रयोग

स्यात् का अर्थ है कदाचित् या शायद। इसीलिए जैनियों ने प्रत्येक नय से पूर्व स्यात् शब्द के प्रयोग का आग्रह किया है। इसका अर्थ यह है कि कि प्रसंग विशेष में वह ज्ञान सत्य है परन्तु अन्य दृष्टिकोण से असत्य भी हो सकता है।

  • उदाहरणार्थ यदि हम घर में घट देखते हैं तो हमको कहना चाहिए कि ‘स्यात् घड़ा है।’ इसका यह अर्थ है कि घड़े का अस्तित्व समय-विशेष, स्थान-विशेष और गुण-विशेष के आधार पर बताया गया है। स्यात् का प्रयोग कर देने से यह भ्रम नहीं होगा कि घड़ा सर्वव्यापी और नित्य है। इसी के साथ यह भी ज्ञात होता है कि किसी विशेष रंग और रूप का घड़ा काल-विशेष और स्थान-विशेष पर है। यदि हम केवल यह कहें कि ‘घड़ा है’ तो उससे भ्रांत ज्ञान हो सकता है।
स्याद्वाद का सिद्धान्त

जैनियों का यह मत स्याद्वाद कहलाता है। इसे अनेकान्तवाद या सप्तभंगीय सिद्धान्त भी कहते हैं। जनसामान्य किसी भी विषय में जो परामर्श या निर्णय करता है, वह एकपक्षीय या एकदेशीय होता है। दूसरे शब्दों में उस परामर्श का सत्य होना उस प्रसंग-विशेष में ही सही होता है।

स्याद्वाद सिद्धान्त से यह स्पष्ट है कि जैनियों की दृष्टि कितनी उदार है। जैन मत अन्य दार्शनिक मतों को भी सम्मान देते हैं। जैन दर्शन अन्य दर्शन की तरह हठी नहीं कि केवल वे जो कहते हैं वहीं सत्य है अन्य सभी मिथ्या। ऐसी ‘हठोक्तियों’ में एकांतवाद का दोष ( fallacy of exclusiveness particularity ) रहता है। इसी हठोक्तियों से बचने के लिए जैन मत ने स्याद्वाद का जो सिद्धान्त दिया वह उनके उदार दृष्टिकोण का परिचायक है।

 सप्तभंगीय नय

पाश्चात्य तर्कशास्त्र में परामर्श के प्रायः दो भेद किये गये हैं – एक, अस्तिवाचक और द्वितीय, नास्तिवाचक। परन्तु जैनमत ने इसके ७ भेद बताये हैं। परामर्श ( judgement) को जैनमत में ‘नय’ भी कहा गया है। जैन मत में प्रत्येक नय से पूर्व ‘स्यात्’ शब्द का प्रयोग करते हैं। इसके द्वारा जैनियों ने यह स्पष्ट किया कि कोई भी नय एकांत या निरपेक्ष रूप से सत्य नहीं हो सकता है, बल्कि आपेक्षिक है।

ये सप्तभंगीय नय इस प्रकार हैं –

( १ ) स्यात् अस्ति ( स्यात् है ),

( २ ) स्यात् नास्ति ( स्यात् नहीं है ),

( ३ ) स्यात् अस्ति च नास्ति च ( स्यात् है और नहीं भी है ),

( ४ ) स्यात् अवक्तव्यम् ( स्यात् अवक्तव्य है ),

( ५ ) स्यात् अस्ति च अवक्तव्यम् च ( स्यात् है और अवक्तव्य भी है ),

( ६ ) स्यात् नास्ति च अवक्तव्यम् च ( स्यात् नहीं है और अवक्तव्य भी है ) और

( ७ ) स्यात् अस्ति च नास्ति च अवक्तव्यम् च ( स्यात् है, नहीं है, अवक्तव्य भी है )।

  • यहाँ यह उल्लेखनीय है कि शेष तीन नय या परामर्श प्रथम, द्वितीय और तृतीय के साथ क्रमशः चौथे नय को जोड़ने से प्राप्त होते हैं —
    • पाँचवा नय ( परामर्श ) = प्रथम नय + चौथा नय
    • छठवाँ नय ( परामर्श ) = द्वितीय नय + चौथा नय
    • सातवाँ नय ( परामर्श ) = तृतीय नय + चौथा नय
  • प्रथम, द्वितीय और तृतीय परामर्श के बाद जो चौथा नय जोड़ा जाता है यह क्रमिक रूप से लेना क्रमार्पण है, न कि सहार्पण ( युगपत् )। इन विरोधी परामर्शों को साथ ( युगपत् ) लेने पर प्रत्येक बार चौथा परामर्श ( अवक्तव्य / अवर्णनीय ) पुनः आ जाता है। परन्तु क्रमिक रूप से लेने पर तीन नय होते हैं।

स्यात् अस्ति ( स्यात् है ) : 

हम घड़े का उदाहरण लेते हैं। ‘स्यात् घटः अस्ति’ अर्थात् स्यात् ( कदाचित् ) घड़ा है। स्यात् से घड़े के स्थान, काल, रंग आदि का संकेत मिलता है। स्यात् घड़ा काला है – ऐसा कहने पर यह ज्ञात होता है कि मटका हर समय काले रंग का नहीं होता है, अपितु समय और परिस्थिति विशेष पर रंग काला होता है। इससे यह भी ज्ञात होता है कि घड़े का काला रंग एक विशेष प्रकार का है।

स्यात् नास्ति ( स्यात् नहीं है ) :

घड़े के सम्बन्ध में नास्तिबोधक परामर्श इस तरह होता है – ‘स्यात् काले रंग का घड़ा इस कोठरी में नहीं है।’ इसका अर्थ यह नहीं है कि कमरे में कोई मटका नहीं है या नहीं रह सकता है। यहाँ स्यात् शब्द इस बात का द्योतक है कि जिस घड़े के बारे में परामर्श हुआ है वह कमरे में नहीं है। दूसरे शब्दों में एक विशेष रंग-रूप का घड़ा समय विशेष पर कमरे में नहीं है।

स्यात् अस्ति च नास्ति च ( स्यात् है और नहीं भी है ) :

घड़ा कभी काले रंग का हो सकता है और कभी दूसरे रंग का भी हो सकता है। ऐसे नय को व्यक्त करने के लिए ‘मिश्र वाक्य’ अथवा ‘संयुक्त परामर्श’ का प्रयोग होता है। जैसे – घड़ा काला है और लाल भी नहीं है। यह तीसरा नय या परामर्श है। इसमें किसी वस्तु के अस्तित्व और अनस्तित्व का एक साथ बोध होता है।

स्यात् अवक्तव्यम् ( स्यात् अवक्तव्य है ) :

अधपका घड़ा काले रंग और पका घड़ा लाल रंग का होता है। अब यदि यह प्रश्न किया जाये कि क्या घड़े का रंग सभी समय और अवस्थाओं में क्या होगा? तो इस सम्बन्ध में यह कहा जायेगा कि घड़े के रंग के विषय में हम कुछ नहीं कह सकते हैं। इसलिए जिस परामर्श में परस्पर विरोधी गुणों के सम्बन्ध में युगपत् या एकसाथ विचार करना है उसका यथार्थ रूप ‘स्यात् अवक्तव्य है’ होता है। यह सप्तभंगीय सिद्धान्त में चौथे स्थान पर आता है। दार्शनिक दृष्टिकोण से स्याद्वाद का ‘चौथा’ परामर्श बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि :—

( १ ) भिन्न-भिन्न अवस्थाओं या दृष्टिकोण से वस्तुओं का अलग-अलग या क्रमिक वर्णन हो सकता है। अतः अलग-अलग या क्रमिक वर्णन न करके हम यदि परस्पर विपरीत धर्मों के द्वारा किसी वस्तु का हम युगपत् ( साथ-साथ ) वर्णन न करना चाहे तो प्रयत्न असफल होगा और हमें अंततः कहना पड़ेगा कि अमुक वस्तु का वर्णन इस दृष्टि से अवक्तव्य है।

( २ ) तार्किक या दार्शनिक दृष्टि से प्रत्येक प्रश्न का उत्तर अस्ति या नास्तिसूचक उत्तर देना वांछनीय नहीं माना जाता है। बुद्धिमान लोगों को समझना चाहिए कि प्रत्येक प्रश्न के उत्तर नहीं दिये जा सकते हैं।

( ३ ) जैनियों ने तार्किक विरोध को एक दोष माना है। दूसरे शब्दों में वे यह समझते हैं कि परस्पर विरोधी धर्म एकसाथ किसी वस्तु के लिए प्रयुक्त नहीं हो सकते हैं।

स्यात् अस्ति च अवक्तव्यम् च ( स्यात् है और अवक्तव्य भी है ) :

किसी विशेष दृष्टिकोण से हम घड़े को काला कह सकते हैं। परन्तु यदि दृष्टिकोण अस्पष्ट हो तो मटके के रंग का वर्णन सम्भव नहीं है। अतः व्यापक दृष्टिकोण से घड़ा काला है और अव्यक्त भी। यही पंचम नय है।

स्यात् नास्ति च अवक्तव्यम् च ( स्यात् नहीं है और अवक्तव्य भी है ) :

यदि अँधेरे में हम देखे तो कमरे में घड़ा नहीं दिखेगा और हमारा उत्तर उस विशेष परिस्थिति व काल में नास्तिबोधक होगा परन्तु यह विश्वास के साथ नहीं कहा जा सकता है कि कमरे में मटके का सर्वथा अभाव है। ऐसे में यह कहा जायेगा कि स्यात् कमरे में घड़ा नहीं है और अव्यक्त भी है।

स्यात् अस्ति च नास्ति च अवक्तव्यम् च ( स्यात् है, नहीं है, अवक्तव्य भी है ) :

जैसे अंधे ने हाथी के पाँव के स्पर्श किये वह कहेगा कि हाथी खम्भे जैसा है दूसरे दृष्टिहीन ने पूँछ का अनुभव ले कहा कि हाथी खंभे जैसा नहीं है। दूसरे शब्दों में एक दृष्टि से हाथी खम्भे जैसा है दूसरे दृष्टि से खम्भे जैसा नहीं है इस तरह वर्णन अस्पष्ट और अवर्णनीय हो गया। इस स्थिति में हम कहेंगे कि स्यात् हाथी खम्भे जैसा है, नहीं है और अवक्तव्य ( अवर्णनीय ) है।

स्याद्वाद वस्तुवाद हैं 

वस्तुवाद का अर्थ दृष्यमान जगत् के सत्य और यथार्थ मानने से है। जैन यह नहीं मानते कि हमारे विचार-परामर्श मानसिक प्रत्ययमात्र हैं, बल्कि उनके अनुसार तो विचार या परामर्श के द्वारा बाह्य वस्तुओं के वास्तविक धर्मों को जाना जाता है। अतः उनके अनुसार कोई प्रत्यय तभी सत्य हो सकता है जब वह बाह्य वस्तु के धर्म को व्यक्त करे।

जैनमत एक प्रकार का सापेक्षवाद है; परन्तु यह विज्ञानवादी नहीं है, वरन् सापेक्षवादी है 

जैन स्याद्वाद की तुलना यदा-कदा पाश्चात्य सापेक्षवाद से किया जाता है। सापेक्षवाद दो तरह के होते हैं – एक, विज्ञानवादी और द्वितीय, वस्तुवादी। जैनियों का सापेक्षवाद ‘वस्तुवादी सापेक्षवाद’ के वर्ग में आता है। जैनियों के अनुसार यदि ज्ञान सापेक्ष है, फिरभी यह केवल मन पर निर्भर नहीं है बल्कि वस्तुओं के धर्मों पर भी निर्भर है।

जैन दर्शन संशयवाद नहीं है 

स्याद्वादी सिद्धान्त के कारण कुछ लोग जैनमत को भ्रमवश संशयवाद ( scepticism ) या अज्ञेयवाद ( Agnosticism ) समझने की भूल कर बैठते हैं। परन्तु यथार्थ में जैनमत संशयवाद का पर्याय नहीं है। स्यात् शब्द के प्रयोग से किसी वाक्य से उसकी असत्यता अथवा संदिग्धता का बोध नहीं कराया जाता है, बल्कि इसके सापेक्षता का संकेत मिलता है। परिस्थिति और विचार-प्रसंग के अनुसार परामर्श या नय अवश्य ही सत्य होता है, इसको दार्शनिक स्पष्ट रूप से स्वीकार करते हैं। अतः जैनमत के स्याद्वादी सिद्धान्त को संशयवाद नहीं समझना चाहिए।

तत्त्व-विचार

 सामान्य परिचय

वस्तु के दो प्रकार के धर्म होते हैं :

जैन मत कहता है कि प्रत्येक वस्तु के अनेक धर्म हैं। उनके अनुसार इसका अर्थ समझना आवश्यक है। प्रत्येक वस्तु के दो तरह के धर्म होते हैं –

  • एक, स्वपर्याय धर्म ( भावात्मक धर्म ) – वस्तु के स्वयं के रूप, स्थिति आदि धर्म।
  • द्वितीय, परपर्याय धर्म ( अभावात्मक धर्म ) – ऐसे धर्म जो अन्य वस्तुओं के साथ अलगाव ( पार्थक्य ) को दर्शाते हैं।

उदाहरण – मानव के आकार, रंग, रूप, गोत्र, कुल, जाति, व्यवसाय, जन्मस्थान, आयु आदि प्रथम प्रकार ( स्वपर्याय / भावात्मक धर्म ) के धर्म हैं। इसके अतिरिक्त कुछ अभावात्मक धर्म भी उस मनुष्य में हैं जो अन्य वस्तुओं से उनका भेद सूचित करते हैं। हमें यदि उस मनुष्य के सम्बन्ध में पूरा-पूरा ज्ञान प्राप्त करना है, तो हमें जानना होगा कि वह अन्य सभी वस्तुओं से किस प्रकार भिन्न है। हो सकता है कि किसी एक व्यक्ति विशेष के सम्बन्ध में ज्ञात करना पड़े कि वह चीनी, जापानी, ईसाई, धूर्त, स्वार्थी आदि नहीं है।

परपर्याय धर्मों की संख्या स्वपर्याय धर्मों से अधिक है, क्योंकि अन्य सभी वस्तुओं के जो भेद होते हैं वे ही अभावात्मक धर्म कहे जाते हैं।

काल के परिवर्तन से धर्मों में परिवर्तन 

इसी प्रकार यदि किसी वस्तु का विचार उसके स्वपर्याय और परपर्याय धर्मों के अनुसार हो तो इससे स्पष्ट है कि वह साधारण पदार्थ नहीं है, बल्कि अनंत है। परपर्याय धर्मों की संख्या बहुत अधिक होती है। इन धर्मों के साथ-साथ यदि काल का भी विचार किया जाये तब उसकी अनंतता और भी बढ़ जाती है क्योंकि कार्य-क्रम के अनुसार तो उसके धर्मों में परिवर्तन होता रहता है और उसमें नये-नये धर्मों की उत्पत्ति होती रहती है। इस सम्बन्ध में ‘अनन्तधर्मकं वस्तु’ बिल्कुल समीचीन उक्ति है।

केवलिन् ही वस्तु का पूर्ण ज्ञान प्राप्त कर सकता है

जैन दर्शन में कहा गया है कि यदि कोई व्यक्ति एक वस्तु को सभी दृष्टिकोण से जान लेता है तो वह सभी वस्तुओं को जान लेता है – ‘एको भावः सर्वथा येन दृष्टः सर्वो भावः सर्वथा तेन दृष्टः।’

केवल केवलिन् या सर्वज्ञ व्यक्ति ही किसी वस्तु का पूर्ण ज्ञान प्राप्त कर सकता है। व्यवहार के लिए तो वस्तु का आंशिक ज्ञान भी पर्याप्त होता है। लेकिन इससे यह नहीं समझना चाहिए कि किसी छोटी चीज के धर्म थोड़े से हैं और लौकिक ज्ञान द्वारा ही वस्तु का पूर्ण ज्ञान प्राप्त हो जाता है।

 द्रव्य विचार

द्रव्य के ‘गुण’ और ‘पर्याय’ ( गुणपर्यायवद् द्रव्यम् ) 

वस्तुओं के अनंत धर्म होते हैं। धर्म किसी धर्मी का होता है। साधारण वार्तालाप और दार्शनिक विमर्श में धर्म और धर्मी का भेद किया जाता है। जिसका धर्म होता है वह धर्मी कहलाता है और धर्मी जो लक्षण धारण करता है वह धर्मी कहलाता है। धर्मी को हम द्रव्य कहते हैं। प्रत्येक द्रव्य ( धर्मी ) के दो प्रकार के धर्म होते हैं –

  • स्वरूप या नित्य धर्म और
  • आगंतुक या परिवर्तनशील धर्म।

स्वरूप धर्म वे हैं जो द्रव्य में सदा विद्यमान रहते हैं। इन स्वरूप धर्मों की अनुपस्थित में द्रव्य का अस्तित्व ही सम्भव नहीं है। हम आत्मा का उदाहरण लेकर इसे समझते हैं। आत्मा का नित्य धर्म ‘चैतन्य’ है। आत्मा चैतन्य गुण का धारक है अतः वह धर्मी है।

आगंतुक धर्म द्रव्य में सदैव विद्यमान नहीं रहते हैं। इच्छा, संकल्प, सुख-दुःख ये आत्मा के परिवर्तनशील या आगंतुक धर्म हैं। इन्हीं आगंतुक धर्मों से द्रव्य का परिवर्तन होता है।

जैन दार्शनिक स्वरूप या नित्य धर्मों को ‘गुण’ कहते हैं और आगंतुक धर्मों को ‘पर्याय’ कहते हैं। गुण अपरिवर्तनशील और पर्याय परिवर्तनशील होते हैं। इस तरह द्रव्य को इस तरह परिभाषित किया गया है – ‘द्रव्य वह है जिसमें गुण और पर्याय हो।’ ( गुणपर्यायवद् द्रव्यम् )।

संसार नित्य है और अनित्य भी है 

यह संसार अलग-अलग तरह के द्रव्यों के संयोग का परिणाम है। द्रव्यों के गुण नित्य या अपरिवर्तनशील हैं और इस दृष्टिकोण से संसार नित्य है। परन्तु द्रव्य के पर्याय ( आगंतुक गुण ) बदलते रहते हैं अतः इस दृष्टि से संसार अनित्य एवं परिवर्तनशील है।

इस तरह जैन दर्शन में एक दृष्टि से जगत् नित्य तो दूसरी दृष्टि से अनित्य माना गया है। वे बौद्ध दर्शन के क्षणिकवाद को एकांगी या एकांतवादी मानते हैं। अद्वैतवेदांत में एकमात्र ब्रह्म को सत्य और नित्य माना गया है एवं इस विचार ( नित्यवाद ) को जैन एकांगी मानते हैं। इस तरह बौद्ध और वेदांत दोनों दर्शनों में एकांतवाद का दोष पाया जाता है।

वस्तुतः नित्यता एवं परिवर्तन दोनों ही सत्य है। यदि हम यह कहें कि जगत् नित्य है और परिवर्तनशील भी तो इसमें कोई विरोधाभास नहीं है। एक दृष्टि से संसार नित्य है जबकि दूसरी दृष्टि से परिवर्तनशील भी। स्याद्वाद सिद्धान्त के कारण इसमें विरोध की सम्भावना नहीं रह जाती है।

सत् के तीन लक्षण हैं – उत्पत्ति, स्थित और नाश 

द्रव्य सत्य है। उत्पत्ति, व्यय ( क्षय ) और ध्रौव्य ( नित्यता ) — ये ही सत् के लक्षण हैं ( उत्पत्ति-व्यय-ध्रौव्यलक्षणं सत् )। द्रव्य अपने गुण के कारण नित्य हैं क्योंकि गुण अपरिवर्तित रहते हैं। परिवर्तनशील पर्यायों की उत्पत्ति और विनाश होने के कारण इसमें उत्पत्ति व विनाश भी होता है। अतः द्रव्य में सत्ता के तीनों लक्षण विद्यमान होते हैं।

बौद्ध क्षणिकवाद का खंडन 

सत् या सत्ता के सम्बन्ध में जैन और बौद्धों में मतभेद है।

बौद्ध मतानुसार सत्ता वही है जो अर्थक्रियाकारी अर्थात् किसी कार्य का साधक हो। दूसरे शब्दों में कोई वस्तु तभी सत्य है जब उससे कोई कार्य सम्पन्न होता हो।

जैन इस मत को अयुक्तिसंगत मानते हैं, क्योंकि इसके अनुसार तो रस्सी से सर्प का भ्रम भी सत्य समझा जायेगा। रस्सी से सर्प का भ्रम होने से भी लोगों में डर की उत्पत्ति हो जाती है और वे दूर भाग जाते हैं। ऐसे दोषपूर्ण युक्तियों के द्वारा बौद्ध मत ‘क्षणिकवाद’ का प्रतिपादन करते हैं। इसलिए क्षणिकवाद कभी भी मान्य नहीं हो सकता है।

क्षणिकवाद के विरुद्ध जैनियों ने निम्न युक्तियाँ दीं हैं –

  • यदि सभी पदार्थ क्षणिक हैं, तब तो आत्मा भी क्षणिक है। ऐसी अवस्था में स्मृति, प्रत्यभिज्ञा आदि सम्भव नहीं हो सकती है। इसके साथ यह भी बोध नहीं हो सकता कि मैं कभी बालक था और आज बड़ा हो गया हूँ।
  • निर्वाण महत्वहीन हो जायेगा क्योंकि यदि कोई स्थायी जीव है ही नहीं तो फिर मोक्ष किसका हो सकता है?
  • यदि जीव क्षण-क्षण परिवर्तनशील है तो वह किसी आदर्श की पूर्ति के लिए क्यों प्रयत्न करेगा? क्योंकि वह स्वयं तो प्रयत्न करेगा किंतु क्षणभंगुर होने के कारण उसका फल वह स्वयं नहीं भोग सकेगा, बल्कि उसका भोक्ता अन्य जीव होगा। इस प्रकार धर्म का प्रयत्न असम्भव होगा।
  • परिणामतः धर्म-व्यवस्था भी नहीं रह सकेगी। कहीं कृतप्रणाश होगा तो कहीं अकृताभ्युपगम होगा। दूसरे शब्दों में कर्मों का फल तो नहीं मिल सकेगा एवं दूसरे के कर्मों का फल भोगना होगा।
  • बौद्ध-मतामुसार आत्मा कोई स्थायी सत्ता नहीं है, बल्कि क्षणस्थायी मानसिक अवस्थाओं का एक क्रम हैं। किन्तु क्षणिक अवस्थाओं के अस्तित्व मात्र से ही कोई क्रम नहीं बन सकता है। उदारणार्थ बिना धागे की माला नहीं बन सकती है। जब तक क्षणिक अवस्थाओं के अन्तर्गत कोई स्थायी सत्ता न हो तब तक वे क्रमबद्ध भी नहीं हो सकती हैं।
  • प्रत्यक्ष से या अनुमान से किसी भी ऐसी वस्तु का ज्ञान नहीं मिलता है जिसमें केवल परिवर्तन हो और स्थायित्व कुछ भी न रहे।

द्रव्य के प्रकार या भेद

६ मौलिक द्रव्य

संसार ६ द्रव्यों से मिलकर बना है। ये हैं –

  • जीव
  • पुद्गल
  • काल
  • आकाश
  • धर्म
  • अधर्म

ये द्रव्य विनाशरहित और शाश्वत हैं। इन द्रव्यों का गुण नित्य और शाश्वत हैं। साथ ही इनके पर्याय या आगंतुक गुण बदलते रहते हैं। हमें जो परिवर्तन दिखता है वह द्रव्यों के आगंतुक गुणों ( पर्याय ) के कारण है। अतः यह संसार नित्य, शाश्वत और परिवर्तनशील है।

जीव चेतन तत्व है जबकि अजीव अचेतन जड़ तत्व है। यहाँ जीव उपनिषदीय सार्वभौम आत्मा से भिन्न है। जैन धर्म में यह जीव / आत्मा अनन्त हैं और कण- कण में व्याप्त हैं इसीलिए जैन अहिंसा पर अत्यधिक बल देते हैं।  चैतन्य आत्मा का स्वाभाविक गुण है।

हमें जो विनाश दिखता है वह मात्र इन द्रव्यों का परिवर्तन है। अतैव यह संसार नित्य और शाश्वत है परन्तु परिवर्तनशील है। इन्हीं द्रव्यों के विभिन्न संगठन और विघटन से विभिन्न वस्तुएँ अस्तित्व में आती हैं और परिवर्तित भी होती रहती हैं।

धर्म और अधर्म गति एवं स्थिति के सूचक हैं।

पुद्गल भौतिक तत्व है जिसका संयोग और विभाजन हो सकता है। इसकी सबसे छोटी इकाई अणु है। स्पर्श, रस, गंध और वर्ण पुद्गल के गुण हैं।

द्रव्य के वर्गीकरण 

द्रव्य के वर्गीकरण कई आधार पर किये गये हैं –

( १ ) जीव और अजीव के आधार पर :-

  • जीव या आत्मा ( soul )
  • अजीव ( non-soul )
    • धर्म ( medium of action )
    • अधर्म ( medium of rest )
    • आकाश ( space )
    • पुद्गल या भौतिक तत्व ( matter )
    • काल ( time )

( २ ) अस्तिकाय और अनस्तिकाय के आधार पर :-

  • अस्तिकाय
    • जीव
    • धर्म
    • अधर्म
    • आकाश
    • पुद्गल
  • अनस्तिकाय
    • काल

जीव का भी वर्गीकरण निम्न तरह से किया गया है :-

  • जीव
    • मुक्त
    • बद्ध या संसारी
      • स्थावर – स्थावर जीव गतिहीन और सबसे अपूर्ण जीव होते हैं। इनमें केवल एक इंद्रिय ( एकेंद्रिय ) होती है। इनमें स्पर्शेन्द्रिय पायी जाती है। अर्थात् इनको केवल स्पर्श-ज्ञान होता है। स्थावर जीव क्षिति, जल, पावक, वायु या वनस्पति रूप शरीरों में रहते हैं। अर्थात् इनके पाँच प्रकार हैं – पृथ्वीकायिक, जलकायिक, अग्निकायिक, वायुकायिक और वनस्पतिकायिक।
      • जंगम – जंगम जीवों को इंद्रिय के आधार पर क्रमशः दो, तीन, चार और पाँच इंद्रिय जीवों में बाँटा गया है।
        • द्वीन्द्रिय जीव – दो इंद्रिय वाले जीव; इनमें त्वचा और जिह्वा नामक दो इंद्रिय होती हैं। जैसे – सीप और घोंघा।
        • त्रीन्द्रिय जीव – तीन इंद्रिय वाले जीव; इनमें त्वचा, रसना और जिह्वा नामक तीन इंद्रिय होती हैं। जैसे – पिपीलिका ( चींटी ), दीमक आदि।
        • चतुरिन्द्रिय जीव – चार इंद्रिय वाले जीव; त्वचा, जिह्वा, नासिका और चक्षु नामक इंद्रिय। जैसे – भ्रमर, मक्षिका आदि।
        • पंचमेन्द्रिय जीव – पाँच इंद्रिय वाले जीव; इनमें त्वचा, जिह्वा, नासिका, चक्षु और कर्ण। जैसे – मनुष्य, पशु, पक्षी आदि।

 जीव ( आत्मा )

जीव और उसका ज्ञान भेद 

चेतन द्रव्य को जीव या आत्मा कहते हैं ( चेतनालक्षणो जीवः )। जीवों में चैतन्य सदैव विद्यमान रहता है परन्तु चेतना की मात्रा इनमें भिन्न-भिन्न होती है। चेतना के मात्रा-भेद के आधार पर जीवों में एक तारतम्य है जिसमें सिद्ध आत्माओं का स्थान शीर्ष पर हैं। सिद्ध वे हैं जो कर्मों पर विजय पा चुके हैं और पूर्ण ज्ञानी हैं। सबसे निचली पायदान पर एकेन्द्रिय जीव आते हैं। इन एकेन्द्रिय जीवों में चैतन्य न्यूनतम स्तर पर पाया जाता है। इनमें एकमात्र स्पर्श-ज्ञान विद्यमान रहता है। बीच के पायदान पर या मध्यम वर्ग में दो से पाँच इंद्रिय वाले जीव आते हैं ( कृमि-पिपीलिका-भ्रमर-मनुष्यादीनाम् एकैकवृद्धानि )। इस तरह इन्हें निम्न क्रम में रख सकते हैं –

  • शीर्ष स्थान – सिद्ध आत्माएँ।
  • मध्यम स्थान – दो से पाँच इंद्रिय वाले जीव।
  • निम्न स्थान – एकेन्द्रिय जीव।

जीव स्वयं प्रकाशमान एवं नित्य है और यह अन्य वस्तुओं को भी प्रकाशित करता है 

जीव ज्ञान प्राप्त करता है, कर्म करता है और सुख-दुःख का भोक्ता भी वही है। जीव स्वप्रकाशित है और अन्य वस्तुओं को भी प्रकाशित करता है। जीव ( आत्मा ) नित्य है, परन्तु इसकी अवस्थाएँ बदलती रहती हैं। यह शरीर से अलग है। जीव के अस्तित्व की अनुभूति आत्मानुभूति से प्रमाणित होती है।

जीव सम्पूर्ण शरीर में व्याप्त है 

संचित कर्मानुसार जीव जन्म-पुनर्जन्म के चक्र में पड़कर बार-बार शरीर धारण करता है। जैसे दीपक अपने चारों ओर प्रकाश फैलाता है उसी तरह जीव भी सम्पूर्ण शरीर को प्रकाशित करता है। जीव ( आत्मा ) आकारहीन होता है वह जिस शरीर में होता है उसी के अनुरूप हो जाता है। इस अर्थ में अमूर्त जीव अस्तिकाय माने जाते हैं। जीव सर्वव्यापी नहीं हैं बल्कि उसकी व्यापकता धारित शरीर तक ही सीमित होती है। इसको मात्र शरीरांतर्गत विषयों का ही प्रत्यक्ष-ज्ञान होता है। चैतन्य शरीर के बाहर नहीं वरन् इसके अंदर ही रहता है।

जीव का विस्तार कैसे हो सकता है?

पाश्चात्य दार्शनिक दृष्टिकोण से यह समझने में कठिनाई होती है कि जीव में चैतन्य ( counciousness ) और विस्तार ( extension ) दोनों कैसे हो सकते हैं?  डेकार्ते जैसे विचारकों के अनुसार चैतन्य और विस्तार परस्पर विरोधी गुण हैं। उनके अनुसार चैतन्य आत्मा का गुण है तो विस्तार जड़ पदार्थों का। आत्मा चेतन द्रव्य है और चेतना आकाशव्यापी या पुद्गलधारी नहीं हो सकती है।

दूसरी ओर जैन दार्शनिक आत्मा को जीव मानते हैं। सजीव शरीर के प्रत्येक भाग में हम देखते हैं कि चैतन्य या बोध होता है। इसलिए चैतन्य को आत्मा का स्वरूप-लक्षण मान लेने पर भी समूचे शरीर में उसका अस्तित्व मानना सर्वथा युक्तिसंगत है। दूसरे शब्दों में आत्मा का विस्तार ( व्यापक ) हो सकता है। अन्यान्य भारतीय दार्शनिक भी इसे मानते हैं।

जड़ द्रव्य और आत्मा के विस्तार में भेद है 

आत्मा की व्याप्ति का अर्थ यह नहीं है कि यह जड़ पदार्थों की भाँति किसी भी रिक्त स्थान को पूरा भर ले, बल्कि इसका अर्थ ये है कि शरीर के विभिन्न भागों के अनुभव के द्वारा यह उसमें विद्यमान रहता है। यदि एक स्थान पर जड़ पदार्थ है तो वहाँ दूसरा जड़ द्रव्य प्रवेश नहीं कर सकता है। दूसरी ओर जिस स्थान पर एक आत्मा है वहाँ दूसरी आत्मा का सन्निवेश भी हो सकता है। जैन दार्शनिकों के अनुसार जिस तरह एक स्थान पर दो दीपक आलोकित कर सकते हैं उसी तरह दो जीव एक ही स्थान पर विद्यमान हो सकते हैं।

आत्मा के अस्तित्व के विभिन्न प्रमाण 

जैन दार्शनिक, चार्वाक के आत्मा सम्बन्धी विचारों का खंडन करते हैं। प्रसिद्ध जैन दार्शनिक ‘गुणरत्न’ ने चार्वाक के संशयवाद की कड़ी आलोचना करते हैं और आत्मा के अस्तित्व को सिद्ध करने के लिए तरह तरह के प्रमाण देते हैं। वे कहते हैं कि ‘मैं सुखी हूँ’ इसी अनुभव से तो आत्मा के अस्तित्व का प्रत्यक्ष ज्ञान मुझे हो जाता है।

जब हम किसी द्रव्य के गुणों को देखते हैं तो हम कहते हैं कि हम उस द्रव्य को ही देख रहे हैं। गुलाब के रंग को देखते हुए हम कहते हैं कि गुलाब के फूल को ही देख रहे हैं। इसी प्रकार हम आत्मा के गुणों को देखकर ही आत्मा का प्रत्यक्ष अनुभव करते हैं। सुख, दुःख, स्मृति, संकल्प, शंका, ज्ञानादि के अनुभव होने से ही उनके ( आत्मा ) धर्मों का प्रत्यक्ष अनुभव हो जाता है।

आत्मा के अस्तित्व को अप्रत्यक्ष ढ़ंग से भी निम्नलिखित अनुमानों के द्वारा प्रमाणित किया जा सकता है। शरीर को इच्छानुसार परिचालित किया जा सकता है। इसका परिचालक कोई अवश्य होगा। वही परिचालक आत्मा है। इंद्रिय ( चक्षु, कर्ण आदि ) ज्ञान ग्राहक साधन हैं। इस ज्ञान का लाभ प्राप्त करने के लिए प्रयोजन-कर्त्ता की आवश्यकता होती है। वह प्रयोजन-कर्त्ता आत्मा है।

पुनश्च, शरीर की उत्पत्ति के लिए किसी निमित्त-कारण ( मूल कारण ) की आवश्यकता होती है क्योंकि जड़ तत्त्व तो उपादान-कारण ( साधन सामग्री ) मात्र हैं। वह निमित्त-कारण आत्मा है।

इस प्रकार कई युक्तियों के आत्मा के अस्तित्व प्रमाणित होता है।

चार्वाक के आत्मा सम्बन्धी विचार का खंडन 

चार्वाक आत्मा जैसे किसी अभौतिक ( अलौकिक ) तत्त्व को मान्यता नहीं देते हैं। उनके अनुसार चैतन्य गुण का आविर्भाव जड़-पदार्थों के विभिन्न प्रकार के समायोजन से होता है।

किन्तु हम कभी भी किसी स्थान पर चैतन्य को जड़ पदार्थ से उद्भूत होते हुए नहीं पाते हैं। अतः जब चैतन्य का प्रत्यक्ष होता ही नहीं है तो भूतों से चैतन्य का उद्भव कैसे मान सकते हैं? क्योंकि चार्वाक एकमात्र प्रत्यक्ष को ही प्रमाण मानते हैं।

यदि चैतन्य शरीर के कारण होता तो शरीर के साथ चैतन्य का नित्य साथ ( साहचर्य ) रहता। परन्तु शरीर के रहते हुए भी भी निद्रा, मूर्च्छा एवं मृत्यु की अवस्था में चैतन्य का अभाव क्यों रहता है?

दोनों में ( शरीर व आत्मा ) कारण-कार्य-सम्बन्ध रहने से एक की पुष्टि एवं क्षय से क्रमशः दूसरे की भी पुष्टि एवं क्षय होता है। परन्तु ऐसा अनुभव नहीं होता है। इसतरह हम देखते हैं कि शरीर और चैतन्य में कारण-कार्य सम्बन्ध स्थापित नहीं किया जा सकता है।

जड़ पदार्थ किसी निमित्त-कारण के बिना स्वयं किसी जीव का शरीर नहीं बन सकता है। जड़ तत्त्व तो उपादान मात्र हैं। उपादानों को निमित्त-कारण की आवश्यकता होती है और यह निमित्त-कारण ही तो आत्मा है।

’मैं शरीर हूँ’ , ‘मैं मोटा हूँ’ जैसी उक्तियों के द्वारा चार्वाक यह सिद्ध करते हैं कि शरीर ही आत्मा है। परन्तु इन वाक्यों का मुख्य अर्थ यहाँ लागू नहीं है, बल्कि यहाँ इसका गौण या लाक्षणिक अर्थ उपयुक्त है। यह ठीक है कि आत्मा स्वयं को शरीर मान बैठती है परन्तु इसका कारण शरीर से आत्मा का घनिष्ठ सम्बन्ध है न कि एकत्व।

चार्वाक के अनुसार आत्मा का अस्तित्व ही नहीं है। परन्तु तब तो शरीर आत्मा विहीन है – यह उक्ति ही अर्थहीन है। जिस वस्तु का निषेध किया जा रहा है उसका अन्यत्र अस्तित्व होता ही होता है। ( यन्निषिध्यते तत् सामान्येन विद्यते एव )।

मेरी आत्मा का कोई अस्तित्व नहीं है, यह बात उसी तरह दुर्बोध्य है कि जिस तरह कोई कहे कि ‘मेरी माँ वंध्या है।

 जड़ या अजीव तत्त्व

जीवों का निवास-स्थान यह संसार है। यह जगत् जड़-पदार्थों से बना हुआ है। कुछ जड़-तत्त्व के द्वारा ही जीव शरीर धारण करते हैं और कुछ बाह्य परिस्थिति का निर्माण करते हैं। जड़-द्रव्यों के अलावा और भी अन्यान्य पदार्थ हैं जिनके बिना उन द्रव्यों का संगठन नहीं हो सकता है। ये हैं – आकाश, काल, धर्म और अधर्म।

 जड़-तत्त्व या पुद्गल

जड़-द्रव्यों का संयोग एवं विभाग

जैन लोग जड़-तत्त्व को पुद्गल कहते हैं। व्युत्पत्ति के अनुसार पुद्गल के अर्थ है — “जिसका संयोग और विभाग हो सके।” ( पूरयन्ति गलन्ति च )। अर्थात् उन्हें जोड़कर एक बड़ा आकार दिया जा सकता है और तोड़कर छोटा भी किया जा सकता है। पुद्गल का सबसे छोटा भाग जिसके और भाग नहीं हो सकता है उसे ‘अणु’ कहते हैं। दो या अधिक अणुओं के संयोग से ‘संघात’ या ‘स्कंध’ बनता है। हमारे शरीर और अन्य जड़-द्रव्य अणुओं के संयोग से ही बने संघात हैं। मन, वचन और प्राण जड़-तत्त्वों से ही निर्मित हैं।

पुद्गल के गुण – स्पर्श, रस, गंध और वर्ण

पुद्गल के ४ गुण होते हैं — स्पर्श, रस, गंध और वर्ण। गुण अणुओं और संघातों में भी पाये जाते हैं। अन्य भारतीय दार्शनिकों का मत है कि शब्द भी एक मौलिक गुण है। परन्तु जैन इसे नहीं मानते हैं। उनके अनुसार उद्योत ( चंद्र-प्रकाश ), ताप, छाया, आतप, तम, बंध ( संयोग ), भेद, सूक्ष्मता, स्थूलता, संस्थान ( आकार ) आदि के समान शब्द भी पुद्गल के आगंतुक गुण है जोकि परिवर्तनों के कारण उत्पन्न होता है।

 आकाश

आकाश के कारण ही विस्तार सम्भव है 

आकाश के कारण ही सभी अस्तिकाय-द्रव्यों को कोई-न-कोई स्थान प्राप्त है। जीव, पुद्गल, धर्म और अधर्म आकाश में ही स्थित हैं। आकाश दृष्टिगोचर नहीं होता है। इसका अस्तित्व अनुमान के द्वारा सिद्ध होता है। द्रव्यों का कायिक विस्तार स्थान के कारण ही हो सकता है। यह स्थान ही आकाश है। यह भी सत्य है कि जिसका स्वाभाविक गुण विस्तार नहीं है उसे आकाश विस्तृत नहीं कर सकता, लेकिन जिसका वह स्वभाविक गुण है उससे विस्तार के लिए आकाश ही स्थान देता है।

बिना आकाश के अस्तिकाय-द्रव्यों की स्थिति असम्भव है

आकाश के बिना अस्तिकाय द्रव्यों का विस्तार सर्वथा असम्भव है। यह सही है कि अस्तिकाय-पदार्थों का स्वाभाविक धर्म ही है विस्तृत होना। लेकिन उसका विस्तृत होना बिना आकाश के सम्भव ही नहीं है। द्रव्य आकाश को व्याप्त करता है और आकाश द्रव्य के द्वारा व्याप्त होता है।

लोकाकाश और अलोकाकाश

जैन दार्शनिक आकाश के दो भेद मानते हैं – लोकाकाश और अलोकाकाश। लोकाकाश वह है जो जीवों और अन्य द्रव्यों का आवास स्थान है। अलोकाकाश उस आकाश को कहते हैं जो लोकाकाश से परे है।

काल

काल की आवश्यकता और प्रामाणिकता 

उमास्वामी नामक विद्वान के अनुसार द्रव्यों की वर्तना, परिणाम, क्रिया, नवीनता अथवा प्राचीनता काल के कारण ही होता है – ‘वर्तना-परिणामक्रियाः परत्वापरत्वे च कालस्य।’ 

काल अगोचर है अतः इसका अस्तित्व अनुमान से सिद्ध किया गया है।

‘वर्तना’ के लिए काल आवश्यक है क्योंकि भिन्न-भिन्न क्षणों में वर्तमान रहना ही वर्तना कहलाता है।

‘परिणाम’ अर्थात् अवस्थाओं का परिवर्तन काल के बिना असम्भव है। कोई फल कच्चा है या पका यह समय के अनुसार होता है। बिना काल परिवर्तन के एक साथ एक ही समय पर एक ही फल कच्चा और पका नहीं हो सकता है। अर्थात् फल की दोनों अवस्थाएँ एक ही समय पर साथ-साथ नहीं हो सकती हैं। बिना काल-परिवर्तन के एक ही वस्तु में दो परस्पर विरोधी गुण नहीं हो सकते हैं।

इसी तरह क्रिया या गति तभी सम्भव है जब कोई वस्तु पूर्वापर क्रम से भिन्न-भिन्न अवस्थाओं को धारण करती है। यह तभी सम्भव है जब काल का अस्तित्व हो।

प्राचीन और नवीन, पूर्व और पश्चात् के भेद भी काल के बिना असम्भव हैं।

ये युक्तियाँ काल के अस्तित्व को प्रमाणित करती हैं।

काल अस्तिकाय नहीं है 

काल अस्तिकाय द्रव्य नहीं है क्योंकि यह एक ‘अखण्ड द्रव्य’ है। समस्त संसार में विश्व में एक ही काल युगपत् ( एकसाथ ) है। हम देखते हैं कि जिस द्रव्य को काय है वह अपने काय के विभिन्न अंशों से आकाश के विभिन्न अंशों में वर्तमान रहता है। किंतु वर्तमान काल बिना अवयवों के ही समस्त विश्व में व्याप्त है।

परमार्थिक काल और व्यावहारिक काल

जैन दार्शनिक कभी-कभी काल के दो भेद करते हैं — पारमार्थिक काल और व्यावहारिक काल।

व्यावहारिक काल को ‘समय’ भी कहते हैं। वर्तना पारमार्थिक काल के कारण होती है। अन्यान्य परिवर्तन व्यावहारिक काल के कारण होते हैं। क्षण, मुहूर्त्त, प्रहर आदि में व्यावहारिक काल या समय ही विभाजित होता है। समय का प्रारम्भ और अंत होता है, परन्तु पारमार्थिक काल नित्य और निराकार है। पारमार्थिक काल को भिन्न-भिन्न उपाधियों से सीमित करने या विभक्त करने से दंड, दिन, मास आदि समय बनाता है।

गुणरत्न के अनुसार कुछ जैन दार्शनिक काल को भिन्न या स्वतंत्र द्रव्य नहीं मानते हैं, बल्कि अन्य का ही एक पर्याय ( mode ) मानते हैं।

धर्म और अधर्म

धर्म और अधर्म क्रमशः गति एवं स्थिति के कारण है

धर्म और अधर्म का अस्तित्व भी अनुमान द्वारा ही सिद्ध किया गया है। धर्म ‘गति’ का तो अधर्म ‘स्थिति’ का प्रमाण है।

मछली का जल में चलना केवल मछली के कारण ही सम्भव नहीं है बल्कि उसके लिए अनुकूल आधार जल देता है। इस प्रकार गति के लिए सहायक वस्तु की आवश्यकता होती है। अतः जीव या किसी जड़-द्रव्य की गति के लिए एक सहायक द्रव्य की आवश्यकता होती है जिसके कारण ही गति सम्भव हो सकती है। जैन मत में इसी को धर्म कहा गया है। यह ध्यान देने वाली बात है कि धर्म मात्र गतिशील द्रव्यों को गति देने में सहायक हो सकता है, स्थिर द्रव्यों को यह गति नहीं दे सकता है। मछली का तैरना पानी के कारण सम्भव हो पाता है, जल मछली को तैरने के लिए प्रेरित नहीं करता है।

धर्म एवं अधर्म निराकार और उदासीन कारण हैं

अधर्म द्रव्यों के स्थिर रहने में सहायक होते हैं परन्तु वह स्वयं उसे नहीं रोक सकता, बल्कि वह विश्राम में सहायक मात्र है। जिस तरह पेड़ की छाया पथिक के विश्राम में सहायक होती है, अथवा पृथ्वी द्रव्यों की स्थिति में सहायक होती है। इस तरह धर्म और अधर्म में परस्पर विरोध है। परन्तु दोनों में कई समानताएँ भी हैं। ये गति और स्थिति के उदासीन कारण हैं। ये क्रियाशील नहीं हैं। यहाँ धर्म एवं अधर्म का प्रयोग नैतिक या अनैतिक धार्मिक अर्थ में नहीं हुआ है, बल्कि एक विशेष पारस्परिक अर्थ में है — ‘धर्मादयः संज्ञा सामयिकाः।’

आकाश, काल, धर्म और अधर्म अप्रत्यक्ष साधन माने जा सकते हैं 

आकाश, काल, धर्म और अधर्म एक विशेष अर्थ में कारण माने जाते हैं। साधारणतः कारण के तीन मुख्य भेद हैं – कर्त्ता, कारण या साधन और उपादान। कुम्हार निमित्त-कारण ( कर्त्ता ) है, चाक है कारण और मिट्टी उपादान कारण है। आकाश, काल, धर्म और अधर्म साधनों के अंदर ही आते हैं, किंतु साधारण साधनों से कुछ भिन्न हैं।

साधारण साधनों की तरह ये प्रत्यक्ष ढ़ंग से सहायक नहीं होते हैं और न ये उनकी तरह क्रियाशील ही रहते हैं। इसलिए गुणरत्न इन्हें ‘क्रियाशील-कारण’ कहते हैं। जिस तरह कुंभ के लिए चाक की कील प्रत्यक्षरूप से सहायक नहीं होती है, उसी तरह आकाश, काल, धर्म और अधर्म भी प्रत्यक्ष रूप से सहायक नहीं

 जैन आचार और धर्म

संसार / सृष्टि

संसार अनेक चक्रों में बंटा हुआ है। प्रत्येक चक्र में २४ तीर्थंकर और ६३ शलाका पुरुष ( महान पुरुष ) निवास करते हैं। प्रत्येक चक्र की दो अवधियाँ हैं :-

  • उत्सर्पिणी ( विकास की अवधि )
  • अवसर्पिणी ( ह्रास की अवधि )

संसार नित्य, वास्तविक और परिवर्तनशील है। जो वस्तु है उसका न होना ( अभाव ) सम्भव नहीं है। सृष्टिकर्ता ईश्वर नहीं है। संसार के प्रलय की जैन दर्शन में कोई अवधारणा नहीं है।

बंधन

जीव स्वभावतः पूर्ण है, उसमें अनंत ज्ञान, वीर्य और आनंद है

जीव स्वभावतः पूर्ण और अनंत है। परन्तु शरीर धारण करते ही इसके समक्ष कई बाधाएँ आ जाती हैं। इन बाधाओं के दूर हो जाने पर जीव को अनंत ज्ञान, वीर्य, आनंद और पूर्णता की उपलब्धि होती है। जिस तरह से सूर्य मेघ और तुषार में छिपने से उसकी धूप धरती तक नहीं पहुँच पाती है परन्तु इन बाधाओं के हटने से धूप से धरती प्रकाशित हो उठती है। उसी तरह बाधाओं के हटते ही जीव अनंत ज्ञान और अंतर्निहित गुणों को उपलब्ध हो जाता है।

कर्म बंधन का कारण है 

ये बाधाएँ या बंधन क्या हैं और ये जीव के स्वाभाविक गुणों को किस तरह अभिभूत ( बाधित ) करती हैं? शरीर से जीव का बंधन होने से ही इसके स्वाभाविक गुण बाधित हो जाते हैं। शरीर पुद्गल ( भौतिक द्रव्य ) से बनता है। विशेष प्रकार के शरीर के लिए विशेष प्रकार के पुद्गल की आवश्यकता होती है एवं उसका विशेष प्रकार से रूपांतरण किया जाता है। जीव की अन्तर्निहित प्रवृत्तियों के द्वारा ही मानों शरीर का निर्माण होता है। दूसरे शब्दों में जीव अपने कर्मवश या संस्कारवश ही शरीर धारण करता है।

वासनाएँ पुद्गल को जीव की ओर आकर्षित करती है

पूर्व जन्मों के कर्मों के कारण अर्थात् पूर्व जन्म के विचार, वचन और कर्म के कारण जीव में वासनाओं का उद्भव होता है। यें  वासनाएँ तृप्त होने के लिए निरंतर प्रयत्नशील रहती हैं। इसका परिणाम यह होता है कि जीव अपनी ओर पुद्गल को आकर्षित करता है जिससे विशेष प्रकार का शरीर निर्मित होता है। इस तरह जीव अपने कर्मानुसार ही शरीर धारण करता है।

जीव शरीर का निमित्त-कारण है और पुद्गल इसका उपादान कारण है। शरीर को मात्र स्थूल शरीर नहीं समझना चाहिए, अपितु इंद्रिय, मन और प्राण का भी बोध होता है, जिसके कारण जीव के स्वाभाविक गुण अभिभूत ( दब ) हो जाते हैं।

शारीरिक विशेषताएँ कर्मजनित होती हैं 

जीव को जन्म के समय जो शरीर मिलता है वह यादृच्छिक या आकस्मिक नहीं होता है। व्यक्ति का वंश, कुल, परिवार या गोत्र आदि सभी कर्म द्वारा निश्चित होता है। शरीर से ही रंग, रूप, आकार, ज्ञानेंद्रिय और कर्मेन्द्रियों की संख्या और उनके विशेष धर्म कर्म द्वारा नियंत्रित होते हैं।

शरीर के कारण-रूप कर्मों एवं उनके सभी धर्मों का हम समष्टि और व्यष्टि की दृष्टि से विचार कर सकते हैं। समष्टि-दृष्टि से कर्म समस्त वासनाओं का समूह है, जिसका फल समस्त धर्म-विशिष्ट शरीर है। परन्तु व्यष्टि-दृष्टि से शरीर का विशेष धर्म कर्म-विशेष का फल है, इस तरह जैन मत के अनुसार कर्मों की संख्या अनेक हैं। जैन मत में कर्म का नामकरण उसके फल के अनुसार किया गया है। जैसे – जो कर्म यह निश्चित करता है कि उसका जन्म किस गोत्र में होगा उसे ‘गोत्र-कर्म’ कहा गया है। आयु निर्धारक कर्म ‘आयु-कर्म’ तो दुःख या सुख के निर्धारक कर्म ‘वेदनीय-कर्म’ कहा गया है।

क्रोध, मान, माया और लोभ हमारे कषाय ( मनोविकार या कुप्रवृत्तियाँ ) हैं

क्रोध, मान, माया, लोभ ये चार हमारी कुप्रवृत्तियाँ हैं जो हमें बंधन में डालती हैं। जैन मत में इन कुप्रवृत्तियों को ‘कषाय’ कहा गया है, क्योंकि ये पुद्गल को आकर्षित करती हैं।

कर्म-पुद्गल और उसका आस्रव

जीव की ओर किस तरह और कितने प्रकार के पुद्गल-कण आकर्षित होंगे, यह जीव के कर्म या वासना पर निर्भर करता है। ऐसे पुद्गल-कण को ‘कर्म-पुद्गल’ का नाम दिया गया है। यदा-कदा इसको कर्म भी कह देते हैं। जीव की ओर जो ‘कर्म-पुद्गल’ का प्रवाह होता है उसको ‘आस्रव’ कहा जाता है।

भाव-बंध और द्रव्य-बंध

जैन मतानुसार बंधन का एक विशेष धर्म होता है। कषायों के कारण कर्मानुसार जीव का पुद्गल से आक्रांत हो जाना ही बंधन है ( सकाषायत्वात् जीवः कर्मणो योग्यान् पुद्गलान् आदत्ते स बन्धः। )। दूषित मनोभाव ( कषाय ) बंधन का मूल कारण है और पुद्गल का आस्रव मनोभाव का एक परिणाम है। इसीलिए जैन मत में कहा गया है कि जीव का पतन या बंधन मानसिक प्रवृत्तियों पर निर्भर करता है।

जैन मत में बंधन के दो प्रकार बताये गये हैं –

  • भाव-बंध – मन में दूषित भावों का अस्तित्व ही भाव-बंध कहलाता है।
  • द्रव्य-बंध – जीव का पुद्गल से आक्रांत हो जाना द्रव्य-बंध कहलाता है।

जीव और पुद्गल परस्पर सम्मिश्रित हो जाते हैं 

बंधन की अवस्था में पुद्गल और जीव एक-दूसरे में प्रविष्ट ( समाहित ) हो जाते हैं। जीव का विस्तार सम्भव है। जीव शरीर का समव्यापी होता है। शरीर के प्रत्येक भाग में पुद्गल और चैतन्य विद्यमान रहते हैं। जीव और पुद्गल का सम्मिश्रण उसी प्रकार बताया गया है जैसे दूध और पानी व नरम लोहे में लोहे व आग का।

 मोक्ष या निर्वाण

पुद्गल का विनाश ही मोक्ष है 

इस संसार में आत्मा के अतिरिक्त कुछ भी असीम नहीं है। आत्मा सभी वस्तुओं में विद्यमान है। आत्मा अनंत है और सभी आत्माएँ परस्पर भिन्न भी हैं।

प्रत्येक जीव में दो तत्त्व सदैव विद्यमान रहते हैं —

  • जीव तत्त्व
  • जीव को घेरनेवाला भौतिक तत्त्व ( पुद्गल )

जीवन का परम् लक्ष्य जीव को भौतिक तत्त्व से मुक्त करना है जोकि उसमें विकार और भ्रम उत्पन्न करते हैं।

जीव में आत्मिक तत्त्व ‘सत्’ है और इसको आवृत्त करने वाला भौतिक तत्त्व ‘असत्’ है। यही असत् तत्त्व ज्ञानों अवरुद्ध करता है।

जीव और पुद्गल के संयोग को जैन मत में बंधन कहा है। अतः जीव का पुद्गल से अलग या वियोग होना ही मोक्ष है। जीव का पुद्गल से वियोग तभी हो सकता है जब नये पुद्गल का ‘आस्रव’ बंद हो जाये और जो जीव में पहले से प्रविष्ट है वह जीर्ण हो जाये। जब कर्मों का जीव की ओर आस्रव ( बहाव ) रुक जाता है उसे ‘संवर’ कहते हैं उसके बाद जीव में व्याप्त ( प्रविष्ट ) कर्म समाप्त होने लगते हैं इसको ‘निर्जरा’ कहा गया है।

अज्ञान ही कषायों ( कुप्रवृत्तियों ) का कारण है

जीव में पुद्गल का आस्रव जीव के अंतर्निहित कषायों ( मनोविकारों / कुप्रवृत्तियों ) के कारण होता है। इन काषायों का कारण अज्ञान है। दूसरे शब्दों में आत्मा और अन्य द्रव्यों का यथार्थ ज्ञान होने से ही हमारे मन में क्रोध, मान, माया और लोभ की उत्पत्ति होती है। अज्ञान का नाश ज्ञान-प्राप्ति से होती है। इसीलिए जैन मत में सम्यक्-ज्ञान या तत्त्व-ज्ञान को अधिक महत्त्व दिया गया है।

ज्ञान ही अज्ञान का विनाश करता है 

सम्यक्-ज्ञान की प्राप्ति तीर्थंकरों या अन्य मुक्त महात्माओं के उपदेशों के मनन से होती है। इनके उपदेश इसलिए लाभदायक होते हैं क्योंकि वे स्वयं मोक्ष को उपलब्ध होते हैं। उपदेशों के मनन से पहले उनका सारांश का ज्ञान होना आवश्यक है। इसके साथ ही उपदेष्टाओं के प्रति श्रद्धा का होना भी आवश्यक होता है।

मोक्ष के साधन : त्रिरत्न — सम्यक्-दर्शन, सम्यक्-ज्ञान और सम्यक्-चरित्र 

  • सम्यक्-दर्शन : जैन तीर्थंकरों एवं उनके उपदेशों में दृढ़ विश्वास ही सम्यक्-दर्शन या श्रद्धा है।
  • सम्यक्-ज्ञान : जैन मत और सिद्धान्तों का ज्ञान ही सम्यक्-ज्ञान है। सम्यक् ज्ञान के पाँच प्रकार हैं –
    • मति – इंद्रिय जनित ज्ञान,
    • श्रुति – सुनकर प्राप्त ज्ञान,
    • अवधि – कहीं रखी हुई किसी वस्तु का दिव्य अथवा अलौकिक ज्ञान,
    • मनःपर्याय – किसी अन्य व्यक्ति के मन की बात जान लेनेवाला ज्ञान और
    • कैवल्य ( पूर्ण ज्ञान ) – पूर्ण ज्ञानों केवल तीर्थंकरों को प्राप्त होता है।
  • सम्यक्-चरित्र – जो कुछ जाना जा चुका है और सही माना चुका है उसे अपने चरित्र में उतारना या उसी के अनुसार जीवन जीना सम्यक्-चरित्र है। जैन मत में इसके लिए पंच महाव्रत ( भिक्षुओं के लिए ) और पंच अणुव्रत ( गृहस्थों के लिए ) बताये गये हैं।

इन तीनों को जैन मत में ‘त्रिरत्न’ कहा गया है। इन त्रिरत्नों के पालन से द्विआयामी या द्विदिशीय प्रभाव होता है अर्थात् एक ओर कर्म का प्रवाह जीव की ओर रुक जाता है दो दूसरी ओर संचिक कर्मफल समाप्त होने लगता है। जब कर्मों का जीव की ओर बहाव रुक जाता है तो ‘संवर’ कहा गया है। जब कर्मों का बहाव जीव की ओर रुक जाता है तो जीवों के संचित कर्म समाप्त होने लगते हैं और इसको ‘निर्जरा’ कहा गया है। जब  सारे संचित कर्म का विनाश हो जाता है तब उसे मोक्ष प्राप्ति होती है। अतः “सम्यक्-दर्शन-ज्ञान-चरित्राणि मोक्ष मार्गः।”

‘इस तरह कर्म ( -फल ) का जीव से संयोग बंधन है, तो वियोग मुक्ति है।’

महावीर स्वामी ने मोक्ष प्राप्ति के लिए कठोर तपश्चर्या और कायाक्लेश का विधान किया है।

अनंत चतुष्ट्य

त्रिरत्नों के सम्यक् पालन से जब जीव को मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है तब मोक्षावस्था में उसे अनंत चतुष्ट्य की उपलब्धि होती है। ये अनंत चतुष्ट्य निम्न हैं –

  • अनंत ज्ञान,
  • अनंत दर्शन,
  • अनंत वीर्य और
  • अनंत सुख।

जैन-दर्शन अनीश्वरवादी है

जैन धर्म में ईश्वर की अवधारणा नहीं है। वे निम्न युक्तियों से इसे प्रमाणित करते हैं –

( १ ) ईश्वर के अस्तित्व की पुष्टि न तो प्रत्यक्ष से और न ही अनुमान से होती है

प्रत्यक्ष के द्वारा ईश्वर का ज्ञान नहीं होता है। उसका अस्तित्व युक्तियों के द्वारा अन्य दर्शनों में प्रमाणित करने का प्रयास किया गया है। न्याय-दर्शन में ईश्वर के अस्तित्व की सिद्धि के लिए निम्न तरह की युक्ति देते हैं –

  • प्रत्येक कार्य के लिए एक कर्त्ता की आवश्यकता है। जैसे गृह एक कार्य है अर्थात् एक निर्मित वस्तु है। उसको किसी कर्त्ता ने बनाया है, नहीं तो उसका अस्तित्व सम्भव नहीं हो सकता है। उसी तरह यह संसार एक कार्य है। अतः इस संसार का एक स्रष्टा या कर्त्ता है और वह है ईश्वर।
  • परन्तु यह युक्ति निर्दोष नहीं है, क्योंकि यह मान लिया गया है कि यह संसार भी एक कार्य है। इसके लिए क्या प्रमाण है कि संसार कार्य है? सामयव का अर्थ यदि यह हो कि इसके अवयव या अंश हैं तो आकाश को भी सामवय और कार्य मानना चाहिए, क्योंकि आकाश के विभिन्न अंश हैं। किंतु, नैयायिक तो आकाश को कार्य नहीं मानते, वरन् नित्य मानते हैं।
  • किसी कार्य के सम्बन्ध में यह भी देखा जाता है कि उसका निर्माता अपने शारीरिक अवयवों के द्वारा उपादानों से उसका निर्माण करता है। परन्तु ईश्वर तो अवयवहीन है। वह किस प्रकार उपादानों से किसी वस्तु का निर्माण कर सकता है?

( २ ) ईश्वर के जो गुण कल्पित किये गये हैं वे युक्तिपूर्ण नहीं हैं

अन्यान्य दर्शनों में ईश्वर के गुणों के सम्बन्ध में जो बातें बतायी गयी हैं वो पूर्णतया सदोष हैं। जैसे –  ईश्वर एक है, सर्वशक्तिमान है, नित्य और पूर्ण है। परन्तु यह सत्य नहीं है। हम प्रतिदिन देखते हैं कि घर, बर्तन आदि अनेक वस्तुएँ हैं जिनको ईश्वर नहीं बनाता।

ईश्वर को एक माना जाता है क्योंकि यदि अनेक ईश्वर हुए तो उनमें मतों और उद्देश्यों का संघर्ष हो जायेगा और परिणामतः संसार में सामंजस्य नहीं रह जायेगा। परन्तु हम देखते हैं कि संसार में सामंजस्य है। इसलिए यह सिद्ध होता है कि ईश्वर एक ही है।

लेकिन यह युक्ति ठीक नहीं है। क्या कई गृहशिल्पी साथ मिलकर प्रासाद ( घर ) नहीं बना लेते? चींटियाँ साथ मिलकर वल्मीक ( बिमौट ) नहीं बना लेतीं? मधुमक्खियाँ मिलकर मधुकोष नहीं बना लेतीं?

ईश्वर को नित्य-मुक्त व नित्यपूर्ण समझा जाता है किन्तु ‘नित्यमुक्त’ शब्द का कोई अर्थ नहीं है। मुक्ति की प्राप्ति बंधन का नाश होने पर ही हो सकती है। अतः ईश्वर को नित्यमुक्त कैसे माना जा सकता है?

जैन ईश्वर की नहीं, तीर्थंकरों की उपासना करते हैं

जैन मत में ईश्वर को सिरे से नकार दिया गया है, फिरभी वे सिद्धों की आराधना आवश्यक समझते हैं। ईश्वर के लिए जो जो गुण आवश्यक समझे जाते हैं, वे गुण तीर्थंकरों में ही पाये जाते हैं। इस तरह जैन मत में तीर्थंकर ही मानों ईश्वर हैं। मार्गदर्शन और अंतःप्रेरणा के लिए इन्हीं की पूजा की जाती है।

जैन मत में ‘पंच-परमेष्टि’ को माना जाता है और इनकी पूजा दैनिक कार्यक्रम का अंग है। ये पंच-परमेष्टि हैं –

  • अर्हत्,
  • सिद्ध,
  • आचार्य,
  • उपाध्याय और
  • साधु।

”णमो अरिहंताणं। णमो सिद्धाणमं। णमो अइरियाणमं।

णमो उवज्झाणं। णमो लोए सव्वसाहूणं॥”

( अर्थात् सभी अरिहंतों को प्रमाण। सिद्धों को प्रणाम। आचार्यों को प्रणाम। उपाध्यायों को प्रणाम। सभी साधुओं को प्रणाम। )

जैनियों में धार्मिक भावना का अभाव नहीं है : जैन धर्म में स्वावलम्बन

जैन मत अनीश्वरवादी होते हुए भी जैनियों में न तो धर्मोत्साह कमी है न ही धार्मिक क्रियाओं की। तीर्थंकरों के सद्गुणों का निरंतर ध्यान करते रहने से वे इस बात का स्मरण करते हैं कि वे भी उनकी तरह सिद्ध और मुक्त हो सकते हैं। पूत-चरित्र तीर्थंकरों का बराबर चिंतन करने से वे अपने-आप को भी पवित्र करते हैं और मोक्ष-प्राप्ति हेतु अपने को सुदृढ़ बनाते हैं।

जैनियों के लिए पूजा-वंदना का उद्देश्य करुणा-प्राप्ति नहीं है। उन्हें तो कर्मवाद जैसी अलंघ्य व्यवस्था में विश्वास है जिसमें दूसरे के लिए करुणा का कोई स्थान नहीं है। पूर्व-जन्म के कर्मों का नाश, विचार, वचन और कर्मों के द्वारा ही हो सकता है। कल्याण की प्राप्ति अपने ही कर्मों से होती है। तीर्थंकर तो मार्गदर्शन के लिए केवल आदर्श का काम करते हैं। जैन-धर्म केवल उन पुरुषों के लिए है जो वीर और दृढ़-चित्त हैं।  इसका मूल मंत्र मानों स्वावलंबन है, अतः जैन-धर्म में मुक्त आत्मा को ‘जिन’ व ‘वीर’ कहा जाता है।

 

जैन धर्म के सिद्धांत या शिक्षाएँ

 

जैन धर्म का प्रचार

 

जैन धर्म के विभिन्न उप-सम्प्रद्राय

 

जैन तीर्थंकर और उनसे सम्बंधित स्थान

 

जैन धर्म की देन

 

बौद्ध और जैन धर्म क्या वैदिक धर्म का सुधारवादी रूप है?

 

महावीर स्वामी

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