चिकित्सा शास्त्र

चिकित्सा शास्त्र

भूमिका

चिकित्सा शास्त्र के क्षेत्र में प्राचीन भारतीयों की उपलब्धियाँ उल्लेखनीय रहीं हैं। इसका इतिहास वैदिक काल तक जाता है।

वैदिक काल में चिकित्सा शास्त्र का विकास

ऋग्वेद में ‘आश्विन कुमारों’ को कुशल वैद्य कहा गया है जो अपनी औषधियों से रोगों के निदान में निपुण थे। अथर्ववेद में आयुर्वेद के सिद्धान्त और व्यवहार सम्बन्धी बातें मिलती हैं। अथर्ववेद में ७०० से अधिक ऐसे श्लोक हैं, जो आयुर्वेद से सम्बन्धित हैं। रोग, उनके प्रतिकार और औषध सम्बंधी अनेक उपयोगी एवं वैज्ञानिक तथ्यों का विवरण इसमें दिया गया है। विविध प्रकार के ज्वरों, यक्ष्मा, अपची ( गण्डमाला या कण्ठमाला ), अतिसार, जलोदर जैसे रोगों के प्रकार और उनकी चिकित्सा का विधान प्रस्तुत किया गया है। प्रतीकार सम्बंधी वर्तमान शल्य क्रियाओं का भी यत्र-तत्र उल्लेख मिलता है।

‘विषस्य विषमौषधम्’ अर्थात् विष की दवा विष है का सिद्धान्त अथर्ववेद में मिलता है। इसी पद्धति पर आधुनिक होमियोपैथी चिकित्सा आधारित है जिसका मूल सिद्धान्त ‘समः समे शमयति’ है। इसी को लैटिन भाषा में ‘Similia Similibus Curantur’ कहते हैं। महाभारत में उल्लेख मिलता है कि भीम को दुर्योधन ने विषपान कराके गहरे जल में फेंक दिया और वह अचेतावस्था में नागलोक जा पहुँचा। नागलोक में सर्पों के काटने से भीम के शरीर का विष निष्प्रभावी हो गया।

बुद्ध काल में चिकित्सा का विकास

बुद्धकाल में तक्षशिला विश्वविद्यालय में वैद्यक भी पढ़ाया जाता था। इस काल में जीवक नामक चिकित्सक का उल्लेख मिलता है। वह मगध नरेश बिम्बिसार के पुत्र अभय को परित्यक्त अवस्था में मिला था। अभय ने उसे तक्षशिला भेजा जहाँ उसने ७ वर्षों तक रहकर औषधियों का आध्ययन करके वैद्यक का प्रसिद्ध विद्वान बन गया। उसका शुल्क १६०० कार्षापण था। बिम्बिसार ने उसे अपना राजवैद्य बनाया। जीवक ने अवन्ति नरेश चण्ड प्रद्योत और महात्मा बुद्ध की चिकित्सा की थी।

मौर्यकाल में चिकित्सा का विकास

अर्थशास्त्र से चिकित्सा शास्त्र की जानकारी मिलती है। इसमें साधारण वैद्यों, चीड़-फाड़ करने वाले भिषजों और शल्य क्रिया में प्रयुक्त होने वाले यन्त्रों, परिचारिकाओं, महिला चिकित्सकों आदि की जानकारी मिलती है। शव-परीक्षा भी किया जाता था। शवों को विकृत होने से बचाने के लिये तेल में डुबोकर रखा जाता था। अकाल मृत्यु के विभिन्न मामलों; यथा — फाँसी, विषपान आदि की जाँच कुशल चिकित्सकों द्वारा की जाती थी।

आत्रेय मुनि

ये तक्षशिला, गांधार के निवासी थे। महाभारत के अनुसार आत्रेय मुनि गांधार नरेश नागनजिता के निजी चिकित्सक थे।

आत्रेय के छः प्रसिद्ध शिष्य हुए — अग्निवेश, भेला, जतकर्ण, हर्षता, पराशर और क्षिप्रानी। इनमें से प्रत्येक ने आत्रेय शिक्षाओं के आधार पर आयुर्वेद की छः विद्यालयों की स्थापना और संहिता की रचना की।

आत्रेय संहिता में कई तरह के रोगों का वर्णन है; यथा — साध्य रोग, असाध्य रोग, तंत्र-मंत्र से ठीक होने वाले रोग और वह रोग जिनके ठीक होने की सम्भावना क्षीण होती है। ज्वर, अतिसार, पेचिश, क्षय, रक्तचाप आदि की विशेष चर्चा की गयी है। इस रचना में जल चिकित्सा का भी उल्लेख है।

आयुर्वेद में मुनि आत्रेय का वही स्थान है जो यूनानी चिकित्सा में हिपोक्रेटीज का।

चरक

चरक को कायचिकित्सा का प्रणेता माना गया है। वे कुषाण नरेश कनिष्क प्रथम के राजवैद्य थे। चरक कृति ‘चरक संहिता’ काय चिकित्सा का प्राचीनतम् ग्रंथ है और महर्षि आत्रेय के उपदेशों पर आधारित है। अल्बरुनी ने इसे औषधि शास्त्र का सर्वश्रेष्ठ ग्रंथ बताया है।

चरक संहिता में ८ खण्ड ( खण्ड को स्थान कहा गया है ) और १२० अध्याय हैं। इसके ८ खण्ड हैं :— सूत्र, निदान, विमान, शरीर, इन्द्रिय, चिकित्सा, कल्प और सिद्धि।

इसमें शरीर रचना, गर्भ स्थिति, शिशु का जन्म और विकास, कुष्ठ, मिरगी, ज्वर जैसे ८ रोग, मन के रोगों की चिकित्सा, भेदोपभेद आहार, पथ्यापथ्य, रुचिकर स्वास्थ्यवर्धक भोज्यों, औषधीय वनस्पतियों आदि का वर्णन किया गया है।

प्राचीन वनस्पति एवं रसायन के अध्ययन का भी यह एक उपयोगी ग्रंथ है।

चरक संहिता में चिकित्सकों के व्यावसायिक नियम दिये गये हैं वो अनुकरणीय हैं :—

“प्रातः उठने पर और सोने से पहले सभी प्राणियों …के कल्याण के लिए प्रार्थना करनी चाहिए।तुम्हें सच्चे हृदय से रोगी के स्वास्थ्य के लिये प्रयास करना चाहिए। अपने स्वयं के जीवन के मूल्य पर भी तुम अपने रोगी के साथ धोका न करो…यदि तुम्हें किसी रोगी के घर जाना पड़ेगा तुम्हें अपने वचन, मन, बुद्धि तथा इन्द्रियों को उसकी चिकित्सा के अतिरिक्त अन्यत्र कहीं नहीं लगाना चाहिए।”

चरक संहिता भारतीय चिकित्सा शास्त्र का विश्वकोश है। इसके द्वारा निर्देशित सिद्धान्तों के आधार पर ही कालान्तर में आयुर्विज्ञान का विकास हुआ।

सुश्रुत

सुश्रुत शल्य चिकित्सा के प्रणेता थे। उनकी कृति ‘सुश्रुत संहिता’ के उपदेष्टा धन्वंतरि हैं। इसमें विविध प्रकार की शल्य एवं छेदन क्रियाओं का अतिसूक्ष्म विवरण दिया गया है। मोतियाबिंद, पथरी जैसे कई रोगों के शल्योपचार बताये गये हैं। इसमें शव-विच्छेदन का वर्णन है। शल्य क्रिया में प्रयुक्त होने वाले लगभग १२१ उपकरणों का नाम दिया गया है जो अच्छे लोहे से बने थे। सुश्रुत ने सुइयों ( Injections ) और पट्टी बाँधने की विविध विधियों का उल्लेख करते हैं।

गुप्तकाल में चिकित्सा का विकास

दो प्रसिद्ध कृतियाँ — अष्टांगसंग्रह और अष्टांगहृदयसंहिता की रचना एक ही ( वाग्भट्ट ) नाम के दो लेखकों द्वारा की गयी थी।

पालकाप्य कृत ‘हस्त्यायुर्वेद’ की रचना हाथियों के रोग निदान के लिए की गयी थी। इसी तरह अश्व चिकित्सा के लिए शालिहोत्र ने ‘अश्वशास्त्र’ की रचना की थी।

भारतीय चिकित्सा के सिद्धान्त

आयुर्वेद का अर्थ है — “दीर्घायु का विज्ञान।”  

भारतीय चिकित्सा पद्धति तीन रसों — कफ, वात और पित्त के सिद्धान्तों पर आधृत है। इनके संतुलन से ही व्यक्ति स्वस्थ्य रहता है।

‘युक्ताहार विहारश्च’ अर्थात् आहार-विहार उपयुक्त होना चाहिए। स्वच्छ वायु और प्रकाश का महत्त्व समझा गया था। प्राचीन औषधकोश में पशु, वनस्पति और खनिज सभी सम्मिलित थे। छौलमुग्र वृक्ष का तेल कुष्ठ रोग की औषधि माना जाता था और यह आज भी इस रोग की चिकित्सा का आधार है।

सम्राट अशोक जैसे शासक मानव व पशुओं की चिकित्सा के लिए अलग-अलग व्यवस्था कराने में गौरव का अनुभव करते हैं।

चीनी यात्री फाह्यियान लिखता है कि धार्मिक संस्थाओं द्वारा औषधालय स्थापित करवाये जाते थे जहाँ निःशुल्क दवाइयाँ दी जाती थीं।

कालान्तर में शवों को छूने पर निषेध के कारण शरीर विज्ञान और जीव विज्ञानी समुचित विकास नहीं हो पाया फिरभी १८वीं शताब्दी तक भारतीय शल्य विज्ञान यूरोपीयों से अग्रणी रही क्योंकि भारतीयों ने प्रयोगाश्रित शल्य शास्त्र ( Emperical surgery ) का  विकास कर लिया था।

 

प्राचीन भारत में विज्ञान का विकास

 

प्राचीन भारत में गणित का विकास

 

ज्योतिष और खगोल विद्या

 

भारत में प्रौद्योगिकी का विकास

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