आश्रम व्यवस्था

भूमिका

आश्रम शब्द की व्युत्पत्ति ‘श्रम’ धातु से हुई है जिसका अर्थ है – ‘परिश्रम अथवा प्रयास करना।’ अतः आश्रम वह स्थान है जहाँ पर प्रयास किया जाये। ‘इस प्रकार आश्रम व्यवस्था से अभिप्राय एक ऐसी व्यवस्था से है जिसमें व्यक्ति की जीवनयात्रा में कुछ सोपान या चरण निर्धारित किये गये हैं, जहाँ वह एक निश्चित प्रकार का कर्म करता है।

भारतीय विचारधारा में व्यक्ति की आयु १०० वर्ष मानकर चार भागों में बाँटा गया है और इसे ‘आश्रम व्यवस्था’ कहा गया है।  मूलतः १०० वर्षीय जीवनयात्रा में आश्रम एक विश्राम स्थल का कार्य करते हैं जहाँ आगे की यात्रा के लिए तैयारी की जाती है। इस जीवनयात्रा का अंतिम लक्ष्य मोक्ष है। दूसरे शब्दों में ‘एक व्यक्ति के मोक्ष तक की यात्रा में आश्रम एक विश्राम की तरह आता था।’

प्रत्येक कर्म की एक अवधि होती है जिससे वह इस जीवन में प्रत्येक प्रकार के कार्य करता हुआ मनुष्य जीवन के अंतिम लक्ष्य ‘मोक्ष’ की प्राप्ति के योग्य बन सके। इस सम्बन्ध में महाभारत का उद्धरण समीचीन है –

  • ‘जीवन के चार आश्रम विकास की चार सीढ़ियाँ हैं, जिनसे यात्रियों मानव ऊपर चढ़ता हुआ ब्रह्म की प्राप्ति कर लेता है।’

आश्रम व्यवस्था : एक सामान्य परिचय और विश्लेषण

सैद्धान्तिक रूप से समाज के दो आधार स्तम्भ थे —एक, वर्ण व्यवस्था और द्वितीय, आश्रम व्यवस्था। वर्ण एवं आश्रम व्यवस्था परस्पर घनिष्ठ रूप से जुड़ी हुई थी इसीलिए इसको ‘वर्णाश्रम व्यवस्था’ व्यवस्था कहते हैं।

ए॰ एल॰ बाशम के अनुसार ‘आश्रम व्यवस्था समाज में वर्ण व्यवस्था के बाद अस्तित्व में आयी साथ ही अपेक्षाकृत कृत्रिम भी है।’ ( This was a later idea than that of class, and was evidently more artificial. )

जिस तरह एक आर्य समाज चार समूहों ( वर्ण व्यवस्था ) में बँटा था उसी तरह एक आर्य का जीवनकाल चार चारणों ( आश्रम व्यवस्था ) में बाँटा गया था। आश्रम व्यवस्था की चार अवस्थाएँ हैं –

  • ब्रह्मचर्य आश्रम,
  • गृहस्थ आश्रम,
  • वानप्रस्थ आश्रम और
  • संन्यास आश्रम।

आश्रम व्यवस्था मनुष्य के प्रशिक्षण ( nurture ) से सम्बद्ध है जोकि संसार की सामाजिक विचारधारा के सम्पूर्ण इतिहास में अद्वितीय है। प्राचीन भारतीय व्यवस्था में प्रत्येक मानव का जीवन एक प्रकार से प्रशिक्षण और आत्मानुशासन का माना गया है।

इस चार चरणीय आश्रम व्यवस्था की शुरुआत जन्म से नहीं बल्कि उपनयन संस्कार से होती थी। यज्ञोपवीत संस्कार से एक व्यक्ति की बाल्यावस्था पीछे छूट जाती थी और वह ‘ब्रह्मचर्य अवस्था’ में प्रवेश करता था। उपनयन संस्कार को द्वितीय जन्म ( द्विज ) कहा गया गया है।

जन्म से कोई आर्य नहीं होता था। जन्म से प्रत्येक व्यक्ति शूद्र होता था उपनयन संस्कार से वह द्विज बनता था। चारों आश्रमों का विधान केवल द्विज के लिए था। शूद्र और स्त्रियों लिए केवल गृहस्थाश्रम था। यद्यपि गर्भाधान संस्कार से ही वह अपने अस्तित्व में आने के समय से ही धार्मिक कृत्यों व लोगों से घिरा होता है। दूसरे शब्दों में बच्चे के जन्म से पूर्व ही धार्मिक संस्कार शुरू हो जाते थे। संस्कारों की सर्वमान्य संख्या १६ है जोकि गर्भाधान से लेकर अंत्येष्टि तक चलता था।

ब्रह्मचर्य आश्रम में वह गुरुकुल में ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए एक नियमित व संयमित जीवन व्यतीत करता था। यहाँ वह विद्यार्जन करता था। समावर्तन संस्कार के साथ ब्रह्मचर्य आश्रम की समाप्ति होती थी।

विवाह संस्कार से एक ब्रह्मचारी गृहस्थ जीवन में प्रवेश करता था। इस अवस्था में वह सामाजिक दायित्वों का निर्वहन करता था जिसमें वह तीन ऋणों से उऋण होता और पंचमहायज्ञों को करता था। जब वह अपने बच्चों के बच्चों को देख लेता तो वनगमन करता था।

वनगमन से उसके वानप्रस्थ आश्रम की शुरुआत होती थी। यहाँ वह कुटिया में रहता और ध्यान व तप से आध्यात्मिक उन्नति करता था।

सबसे अंत में संन्यास आश्रम आता था। इस अवस्था में वह आश्रम ( hermitage ) छोड़कर एक संन्यासी ( a homeless wanderer ) बन जाता था। इस अवस्था में उसके सभी सांसारिक बंधन पीछे रह जाते थे और मोक्ष एकमात्र साध्य होता था।

प्रत्येक आश्रम जीवन की एक अवस्था है जिसमें रहकर व्यक्ति एक निश्चित अवधि तक प्रशिक्षित होता है। चारों आश्रमों को ब्रह्मलोक तक पहुँचने के मार्ग में चार सोपान बताये गये गये हैं ( महाभारत )।

चतुष्पदी हि निःश्रेणी ब्रह्मण्ययेषा प्रतिष्ठता ।

एतां आरुह्य निःश्रेणीम् ब्रह्मलोके महीयते ॥

( शांतिपर्व, महाभारत )

आश्रम व्यवस्था की उत्पत्ति

आश्रम व्यवस्था की उत्पत्ति के सम्बन्ध में विद्वानों में मतभेद है।

रिजडेविड्स ( dialogues of the Buddha ) का विचार है कि आश्रम व्यवस्था का प्रचलन गौतम बुद्ध के बाद या त्रिपिटकों की रचना के बाद हुआ। परन्तु यह मत अस्वीकार्य है क्योंकि उत्तर-वैदिक कालीन वैदिक ग्रंथों में हमको आश्रमों का यत्र-तत्र उल्लेख प्राप्त करते हैं — यथा; ऐतरेय, तैत्तिरीय, शतपथ ब्राह्मणों आदि में।

आश्रम व्यवस्था की शुरुआत ‘उत्तर वैदिक काल’ में हो चुकी थी। इन चार आश्रमों में भी प्रथम तीन आश्रम ही उत्तर वैदिक काल में ज्ञात थे जबकि चौथा अर्थात् संन्यास आश्रम अज्ञात।

प्रथम तीन आश्रमों का उल्लेख सर्वप्रथम हमें ‘छान्दोग्य उपनिषद्’ में मिलता है। जबकि जाबालोपनिषद् में हमें सर्वप्रथम चारों आश्रमों का उल्लेख एकसाथ मिलता है।

ब्रह्मचर्याश्रमं समाप्य गृही भवेत् ।

गृही भूत्वा बनी भवेत् बनीभूत्वा प्रव्रजेत् ॥

( अर्थात् ब्रह्मचर्य आश्रम को समाप्त करके गृहस्थी हों, गृहस्थी होकर वानप्रस्थी हों और अंत में वानप्रस्थ के पश्चात् परिव्राजक हों। )

( जाबालोपनिषद् )

ऐसा लगता है कि आश्रमों की कल्पना उपनिषद् काल ( उत्तर वैदिक काल ) में की गयी और सूत्रकाल तक पूर्णतया प्रतिष्ठित हो गयी। स्मृतिकाल में आश्रमों के विधि-विधानों का निर्धारण किया गया।

प्राचीन भारतीय साहित्यों के अनुशीलन से ज्ञात होता है कि चारों आश्रमों का विधान एक साथ नहीं हुआ था। प्रारम्भ में मात्र दो आश्रम थे – ब्रह्मचर्य और गृहस्थ। तत्पश्चात् वानप्रस्थ और अंततोगत्वा संन्यास आश्रम का विधान किया गया।

गोविंद चंद्र पाण्डेय ( Studies in the origins of Buddhism ) का मत है कि संन्यास आश्रम का उद्भव निश्चित ही अवैदिक श्रमण विचारधारा के प्रभावस्वरूप हुई थी।

ए॰ एल॰ बाशम कृत ‘अद्भुत भारत’ ( Wonder that was India ) में भी कुछ इसी तरह का विचार मिलता है —

  • यह सम्भव है कि आश्रम व्यवस्था का विकास आंशिक रूप से गैर-रूढ़िवादी ( unorthodox ) सम्प्रदायों ( जैन व धर्म ) प्रभाव या प्रतिक्रिया स्वरूप हुआ हो। इन यतिवादी सम्प्रदायों के प्रभाव से बहुत सारे युवा गृहस्थ जीवन को त्यागकर या छोड़कर सीधे संन्यास चरण में प्रवेश करने लगे जिसके प्रतिक्रियास्वरूप आंशिक रूप से आश्रम व्यवस्था का विकास हुआ।

‘It is possible that the system of the ashram as was evolved partly as a counterblast to the unorthodox sects such as Buddhism and Jainism, which encouraged young men to take up asceticism and by-pass family life altogether, a practice which did not receive the approval of the orthodox, though in later times provision was made for it.’

( The Wonder that was India – A. L. Basham )

आश्रम व्यवस्था : आदर्श या व्यवहार

ए॰ एल॰ बाशम कृत ‘अद्भुत भारत’ ( Wonder that was India ) में कहा गया है कि, ‘This scheme, of course, represents the ideal rather than the real.’ ( अर्थात् आश्रम व्यवस्था निश्चित रूप से वास्तविकता की अपेक्षा आदर्शात्मक थी। )। इस सम्बन्ध में वे निम्न तर्क देते हैं —

  • बहुत से युवक प्रथम अवस्था ( ब्रह्मचर्य ) में आये बिना सीधे गृहस्थ जीवन में प्रवेश करते थे जबकि समाज का एक बड़ा वर्ग द्वितीय चरण से आगे के दो आश्रमों में प्रवेश ही नहीं करता था। अर्थात् वह वानप्रस्थ और संन्यास अवस्था तक जाता ही नहीं था।
  • प्राचीन भारत में बहुत सारे व्यक्ति गृहस्थ अवस्था को पूरा किये बिना अथवा छोड़कर वानप्रस्थी या संन्यासी बन जाते थे।
  • इस तरह आश्रम व्यवस्था की चारों चरणों की क्रमबद्ध शृंखला का पालन व्यावहारिक रूप से सम्पूर्ण रूप से नहीं होता था।
  • वास्तव में आश्रम व्यवस्था एक ही मानव जीवनकाल में विद्यार्जन, गृहस्थ जीवन और संन्यासावस्था जैसे पारस्परिक विरोधी प्रणालियों के समन्वय का एक सार्थक परन्तु ‘कृत्रिम प्रयास’ था।

दूसरी ओर प्राचीन भारतीय शास्त्रकारों ने इस बात पर बल दिया है कि इनका क्रमशः पालन किया जाना चाहिए। कौटिल्य कृत अर्थशास्त्र में कहा गया है कि —

  • राजा का यह कर्त्तव्य है कि वह प्रजा से वर्णाश्रम धर्म का पालन करवायें। इसके उल्लंघन से समाज में अव्यवस्था की स्थिति उत्पन्न होती है और संसार का नाश होता है। वर्णाश्रम नियमों के पालन से संसार की उन्नति होती है।

परन्तु यह ध्यान देने की बात है कि धर्मशास्त्रों में प्रतिपादित चतुराश्रम व्यवस्था के नियमों का पालन प्राचीन इतिहास के सभी कालखंडों में किया जाता रहा हो ऐसा नहीं है। ‘पूर्व-मध्यकाल’ तक आते-आते हम इसमें न्यूनाधिक परिवर्तन पाते हैं।

  • पुराण और विधि साहित्य यह विधान देते हैं कि कलियुग में दीर्घकाल तक ब्रह्मचर्य रहने और वानप्रस्थ में प्रवेश से बचना चाहिए।
  • बाल विवाह की बढ़ती प्रवृत्ति से भी ब्रह्मचर्य पालन करना कठिन होता गया।
  • शंकराचार्य और रामानुज दोनों इस बात का उल्लेख करते हैं कि साधनाभाव और अकिंचनता के कारण अधिकांश लोग आश्रम व्यवस्था का पालन नहीं कर पाते थे।
  • ऐसा विदित होता है कि प्राचीन काल के अंतिम चरण तक यह व्यवस्था कुछ विशेष कुलों तक सीमित होकर रह गयी थी।

आश्रम व्यवस्था और पुरुषार्थ

एक नैष्ठिक हिन्दू के जीवन में पुरुषार्थों का महत्वपूर्ण स्थान है।

  • इनकी संख्या चार है – धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। इन चारों का घनिष्ठ सम्बन्ध आश्रम व्यवस्था से है।
  • ब्रह्मचर्य आश्रम में धर्म, गृहस्थ में त्रिवर्ग, वानप्रस्थ में काम एवं मोक्ष जबकि संन्यास में मोक्ष साध्य होता है।
  • आश्रम व्यवस्था के मनोवैज्ञानिक-नैतिक आधार ( Psycho-moral bases ) पुरुषार्थ हैं जोकि आश्रमों के माध्यम से व्यक्ति को समाज के साथ सम्बन्ध कर उसकी व्यवस्था और संचालन में सहायता प्रदान करते हैं।
  • एक ओर जहाँ मनुष्य आश्रमों के माध्यम से जीवन में पुरुषार्थों के उपयोग करने का मनोवैज्ञानिक प्रशिक्षण प्राप्त करता है तो वहीं दूसरी ओर व्यवहार में वह समाज के प्रति तदनुसार व्यवहार करता हुआ जीवनयापन करता है।

आश्रमों का पुरुषार्थों से घनिष्ठ सम्बन्ध है :—

  • ब्रह्मचर्य आश्रम में धर्म का स्थान प्रमुख है। यहाँ पर धर्म की पूरी शिक्षा मिलती है। धर्म के द्वारा ब्रह्मचारी अर्थ और काम पर नियंत्रण रखते हुए जीवनयापन करता है। मोक्ष का महत्व भी वह इसी समय जान लेता है।
  • गृहस्थाश्रम में अर्थ और काम प्रधान साध्य होते हैं। यहाँ मनुष्य धर्मानुसार अर्थार्जन और काम का उपभोग करता है। धर्म, अर्थ एवं काम के उच्छृंखल उपभोग को रोकने में सहायक होता है। संक्षेप में इस आश्रम में व्यक्ति त्रिवर्ग ( धर्म, अर्थ और काम ) का एक साथ उपभोग करता है।
  • वानप्रस्थ आश्रम में धर्म और मोक्ष साध्य होते हैं। इन दोनों में भी धर्म का प्रथम स्थान होता है।
  • संन्यास आश्रम में मोक्ष एकमेव साध्य हो जाता है। धर्म, मोक्ष में विलीन हो जाता है।

आश्रम व्यवस्था और समाज

प्रत्येक आश्रम में व्यक्ति का समाज से सम्बंध अलग-अलग होता है। साथ ही समाज भी व्यक्ति के साथ उसके आश्रम के तदनुसार ही व्यवहार करता है —

  • ब्रह्मचर्य आश्रम में समाज व्यक्ति की देखभाल करता है।
  • गृहस्थ आश्रम में व्यक्ति ( गृहस्थ ) समाज की देखभाल करता है। इस आश्रम में व्यक्ति सामाजिक सम्पत्ति का न्यासी ( trustee ) बन जाता है। गृहस्थ आश्रम ही शेष तीन आश्रमों को आधार प्रधान करता है। इसीलिए इसको सभी आश्रमों का सिरमौर भी कहा गया है।
  • वानप्रस्थ आश्रम में व्यक्ति का सामाज के प्रति दायित्व समाप्त हो जाता है। परन्तु उसका परिवार और समाज से सम्बंध एक सलाहकार के रूप में बना रहता है।
  • संन्यास आश्रम में समाज के प्रति दायित्व बिल्कुल समाप्त हो जाता है।
  • वानप्रस्थ आश्रम में परिवार और समाज से उसका सम्बन्ध क्रमशः घटने लगता है और संन्यास आश्रम तक आते-आते बिल्कुल समाप्त हो जाता है।

आश्रम व्यवस्था का महत्व

भारतीय समाज धर्मपरायण रहा है। धर्म के दो स्वरूप होते हैं – व्यक्तिगत और सामाजिक। हिन्दू सामाजिक व्यवस्था में इन दोनों की प्राप्ति और साधना का सुन्दर समन्वय मिलता है।

  • व्यक्तिगत धर्म :
    • व्यक्तिगत धर्म वह है जिसके सम्यक् पालन से व्यक्ति मोक्ष या कैवल्य को उपलब्ध होता है। हमारे धर्म के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति के जीवन का चरम या अन्तिम लक्ष्य मोक्ष की प्राप्ति है।
    • मोक्ष की प्राप्ति के लिए व्यक्ति को धर्म का ज्ञान होना आवश्यक है और यह सम्यक् ज्ञान से प्राप्त होता है।
    • चार पुरुषार्थों में से धर्म प्रथम पुरुषार्थ है। इसके लिए ज्ञानार्जन आवश्यक है। इस ज्ञानार्जन के लिए ‘ब्रह्मचर्य आश्रम’ का विधान किया गया है।
    • ब्रह्मचर्य आश्रम में बालक उपनयन संस्कार के बाद प्रवेश करता है जहाँ वह समावर्तन संस्कार तक ब्रह्मचारी के रूप में रहता है।
    • ब्रह्मचारी का आशय है – ‘ब्रह्मचरति इति ब्रह्मचारी।’ अर्थात् ब्रह्म का का चरण या भक्षण करने वाला ब्रह्मचारी है। इसका लाक्षणिक अर्थ है – ‘ब्रह्मज्ञान का उपासक ब्रह्मचारी है।’
    • ब्रह्मचर्य = ब्रह्म + चर्य। ब्रह्म का अर्थ है – परमात्मा और चर्य का अर्थ है – विचरना, आचरण करना। अर्थात् ब्रह्म में विचरना या सदा उसी के ध्यान में निमग्न रहना ही ब्रह्मचर्य है।
    • अतः व्यक्ति को व्यक्तिगत धर्म की प्राप्ति के लिए ब्रह्मचारी और मुमुक्षु होना अनिवार्य है।
  • सामाजिक धर्म :
    • व्यक्ति समाज का अंग होता है। यदि सभी लोग व्यक्तिगत धर्म ही सम्भालते रहे तो सृष्टि का विकास रुक जायेगा। साथ ही व्यक्तिगत धर्म की पालना भी असम्भव हो जायेगी क्योंकि व्यक्तिगत धर्म के पालनार्थ साधन भी तो समाज ही उपलब्ध कराता है।
    • व्यक्ति मात्र अपने व्यक्तिगत धर्म में लगा रहे और वह सामाजिक कर्त्तव्यों और दायित्वों को तिलांजलि दे दे जबकि उसके व्यक्तिगत धर्म के साधन भी समाज से ही आते हैं, यह सर्वथा स्वार्थी होना और अनुचित है। यह उसी तरह है कि हम कुँए से पानी तो पियें परन्तु उसकी देखरेख में कोई योगदान न दें।
    • इन्हीं सामाजिक उत्तरदायित्वों के पालनार्थ ‘समाज धर्म’ की व्यवस्था की गयी है।
    • सामाजिक धर्म के दो भाग हैं –
      • प्रथम, व्यक्ति के ऊपर ऋण होते हैं जिनसे वह समाज में रहकर उऋण होता है।
      • द्वितीय, स्वयं की इच्छा पूर्ति करे।
    • इन त्रिऋणों और पंचयज्ञों के लिए धन की आवश्यकता होती है। अतः समाज का प्रथम अंग है – अर्थ
    • समाज धर्म का दूसरा अंग है – स्वयं की इच्छा पूर्ति। इस स्वेच्छा में ‘यौन इच्छा’ का प्रथम स्थान है। इस इच्छा की पूर्ति न होने पर व्यक्ति अपने व्यक्तिगत धर्म से किसी भी समय विमुख हो सकता है।
    • इस तरह समाज का द्वितीय अंग है – काम
    • यहाँ यह उल्लेखनीय है कि इस सामाजिक दायित्व के पालनार्थ जीवनयात्रा के जिस अवस्था का निर्धारण किया गया है वह ‘गृहस्थ आश्रम’ है। जीवन के इस सोपान में व्यक्ति धर्म के अनुसार अर्थोपार्जन और कामेच्छा की पूर्ति करता है।

यहाँ ध्यान देने वाली बात है कि –

  • प्रथम आश्रम में व्यक्ति के लिए धर्म प्रमुख है। साथ ही वह यहीं पर अर्थ, काम और मोक्ष महत्त्व और ज्ञान भी प्राप्त कर लेता है। यहाँ व्यक्ति जो ज्ञान प्राप्त करता है उसका प्रयोग वह आजीवन करता है।
  • ज्ञानप्राप्ति के बाद वह सामाजिक दायित्वों के निर्वहन के लिए गृहस्थ आश्रम में प्रवेश करता है।
  • सामाजिक दायित्वों के निर्वहन के पश्चात् वह व्यक्तिगत धर्म के पालनार्थ क्रमशः वानप्रस्थ और संन्यास आश्रम में प्रवेश करता है।
  • इस तरह हिन्दू धर्म में मनुष्य जीवन का उद्देश्य – धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष ( चार पुरुषार्थ ) की प्राप्ति है।

जिस तरह हिन्दू धर्म ने मनुष्य के जीवन में चार लक्ष्यों ( चार पुरुषार्थों ) का निर्धारण किया है, उसी तरह उसके जीवन में इन चार लक्ष्यों प्राप्ति के लिए जीवन यात्रा के चार सोपानों की व्यवस्था की है। व्यक्ति के जीवन को १०० वर्ष का मानकर चार भागों में विभाजित किया गया है इसे ही आश्रम व्यवस्था कहा गया है। इस आश्रम विशेष के लिए लक्ष्य विशेष का निर्धारण भी किया गया है।

अतः ‘चतुराश्रम व्यवस्था के द्वारा प्रवृत्ति और निवृत्ति के आदर्शों का सुन्दर समन्वय स्थापित होता है।’

चार आश्रम और उनके कर्त्तव्य

व्यक्ति की आयु १०० वर्ष मानकर प्रत्येक आश्रम के लिए २५ – २५ वर्ष का समय निर्धारित किया गया है :—

  • ब्रह्मचर्य आश्रम – २५ वर्ष तक।
  • गृहस्थ आश्रम – २५ से ५० वर्ष तक।
  • वानप्रस्थ आश्रम – ५० से ७५ वर्ष तक।
  • संन्यास आश्रम – ७५ से १०० वर्ष तक।
ब्रह्मचर्य आश्रम
  • ब्रह्मचर्य आश्रम का समय प्रायः २५ वर्ष की आयु तक होती थी।
  • इस आश्रम की शुरुआत उपनयन संस्कार जबकि समाप्ति समावर्तन संस्कार से होती थी।
  • ब्रह्मचर्याश्रम में धर्म प्रमुख होता था। फिरभी यहीं पर वह अन्य तीन पुरुषार्थों का ज्ञान भी प्राप्त कर लेता था।
गृहस्थ आश्रम
  • इस आश्रम का समय २५ से ५० वर्ष तक निर्धारित किया गया था।
  • गृहस्थ आश्रम की शुरुआत विवाह संस्कार से होती थी।
  • इसमें वह अपने समाजिक दायित्वों का निर्वहन करता था।
  • इसी आश्रम में वह तीनों ऋणों से उऋण होता और पाँच महायज्ञ करता था।
  • गृहस्थाश्रम में अर्थ और काम प्रमुख साध्य होते थे जो कि धर्म द्वारा विनियमित होते थे। इस तरह यहाँ पर त्रिवर्ग का पालन होता था।
वानप्रस्थ आश्रम
  • वानप्रस्थाश्रम का समय ५० से ७५ वर्ष के मध्य निर्धारित किया गया था।
  • जब व्यक्ति अपने पुत्र के पुत्रों का मुख देख ले और अपने सभी सामाजिक दायित्वों का निर्वहन कर लें तब उसे वनगमन करना चाहिए।
  • इस आश्रम में वह कुटिया में रहकर ध्यान व तप से आध्यात्मिक उन्नति करता था।
  • व्यक्ति का परिवार और समाज से सम्पर्क बना रहता था।
  • धर्म और मोक्ष साध्य होते थे। यद्यपि धर्म का प्रमुख स्थान होता था।
संन्यास आश्रम
  • संन्यासाश्रम की अवधि ७५ से १०० वर्ष निर्धारित की गयी थी।
  • जब वानप्रस्थी निरंतर अभ्यास द्वारा निर्लिप्त और वीतराग हो जाये तो वह संन्यास आश्रम में प्रयाण करता था।
  • अब वह आश्रम ( कुटिया ) को छोड़कर एक संन्यासी ( a homeless wonderer ) बन जाता था।
  • एक संन्यासी के सभी सांसारिक बंधन पीछे रह जाते थे।
  • परिवार और समाज से सम्बंध टूट जाते थे।
  • मोक्ष एकमात्र साध्य होता था। मोक्ष में धर्म विलीन हो जाता था।

ब्रह्मचर्य आश्रम

इसका अर्थ है – ‘ब्रह्म के मार्ग पर चलना।’ यह विद्यार्जन का समय होता है। इसकी शुरुआत ‘उपनयन संस्कार’ से और समाप्ति ‘समावर्तन संस्कार’ से होती है। समावर्तन संस्कार से विद्यार्थी स्नातक हो जाता है और गृहस्थाश्रम में प्रवेश के योग्य भी।

‘उपनयन संस्कार’ के अवसर पर बालक का यज्ञोपवीत ( जनेऊ धारण ) संस्कार होता था। जनेऊ में ३ धागे होते थे जो सत्, रजस् और तमस् के प्रतीक होते हैं।

बौधायन धर्मसूत्र के अनुसार :

  • ब्राह्मण बालक का उपनयन संस्कार ८ वर्ष की अवस्था में ‘गायत्री मंत्र’ द्वारा ‘वसंत ऋतु’ में किया जाता था।
  • क्षत्रिय बालक का उपनयन संस्कार ११ वर्ष की अवस्था में ‘त्रिष्टुक मंत्र’ द्वारा ‘ग्रीष्म ऋतु’ में किया जाता था।
  • वैश्य बालक का उपनयन संस्कार १२ वर्ष की अवस्था में ‘जगती मंत्र’ द्वारा ‘शरद ऋतु’ में किया जाता था।
    • जगती मंत्र सर्वाधिक लोकप्रिय मंत्र था।

बालक अपने वर्ण के अनुसार शिक्षा ग्रहण करता था :

  • ब्राह्मण बालक – वेद, वेदांग आदि।
  • क्षत्रिय बालक – धर्म शिक्षा, धनुर्वेद आदि।
  • वैश्य बालक – धर्म शिक्षा, अथर्वेवेद आदि।

बालक गुरु के समीप रहकर अध्ययन करता था वहाँ उसकी दिनचर्या अत्यंत कठोर, नियमित, संयमित और पवित्र होती थी।

प्रत्येक विद्यार्थी को जनेऊ, मेखला और दण्ड धारण करना होता था। वर्णानुसार मेखला धारण के प्रकार का निर्धारण किया गया था —

  • ब्राह्मण मूँज की मेखला धारण करते थे।
  • क्षत्रिय लौहयुक्त मूँज की मेखला धारण करते थे।
  • वैश्य ऊन की मेखला धारण करते थे।

विद्यार्थी या ब्रह्मचारी के विहित कर्म —

  • एक विद्यार्थी के विहित कर्म थे –
    • गुरुसेवा,
    • भिक्षावृत्ति से निर्वाह,
    • सूर्योदय पूर्व उठना,
    • तीन बार स्नान,
    • प्रातः व संध्या वंदन,
    • दो बार भोजन करना आदिक पालनार्थ नियम विद्यार्थियों के लिए थे।
  • भिक्षावृत्ति का उद्देश्य विद्यार्थी में नम्रता का भाव जागृति करना था।
  • प्रत्येक गृहस्थ से यह अपेक्षित था कि वह द्वार पर आये ब्रह्मचारी को रीते हाथ न लौटाये।
  • अर्थशास्त्र में ब्रह्मचरी के कर्त्तव्य इस तरह बताये गये हैं –

‘ब्रह्मचारिणस्वाध्यायोऽग्निकार्याभिषेकौ भैक्षव्रतत्वमाचार्ये प्राणान्तिकी वृत्तिस्तदभावे गुरुपुत्रे सब्रह्मचा- रिणि वा।’

( अर्थशास्त्र )

( अर्थात् ब्रह्मचारी के कर्त्तव्य वेदाध्ययन, अग्नि अभिषेक, भिक्षाटन, आचार्य के अभाव में गुरुपुत्र या  ज्येष्ठ ब्रह्मचारी की सेवा करना है। )

विद्यार्थी या ब्रह्मचारी के लिए निषिद्ध कर्म —

  • साथ ही कुछ निषिद्ध कृत्य भी थे –  यथा;
    • नृत्य-गान से दूरी।
    • सुगंधित द्रव्य का निषेध।
    • स्त्री का अवलोकन, स्पर्श और चिंतन का निषेध।
    • छात्र सदाचार और सच्चरित्रता का पालन करते हुए साधनायुक्त जीवन जीता था।

ब्रह्मचारी दो तरह के होते थे —

  • उपकुर्वाण – ये ब्रह्मचर्य आश्रम समाप्त होने पर गृहस्थ आश्रम में प्रवेश करते थे, ये सामर्थ्य के अनुसार गुरु दक्षिणा देते तथा गुरु आज्ञा लेकर गृहस्थाश्रम में पदार्पण करते थे।
  • नैष्ठिक या अन्तेवासी – जीवनपर्यन्त ब्रह्मचारी रहते हुए गुरु के पास रहकर अध्ययन करते थे। समावर्तन के समय तक व्यक्ति २५ वर्ष की आयु पूरी कर चुका होता था। सामान्यतः ब्रह्मचर्य आश्रम में रहने की अवधि १२ वर्ष तक मानी जाती थी।
    • नैष्ठिक / अन्तेवासी के सम्बन्ध में ‘मनुस्मृति’ में कहा गया है कि ऐसे व्यक्ति ब्रह्मलोक को जाते हैं। वहीं ‘याज्ञवल्क्य स्मृति’ के अनुसार ऐसे व्यक्ति का पुनर्जन्म नहीं होता है।

छात्राएँ भी दो प्रकार की होती थीं —

  • जो कन्याएँ आजीवन गुरुकुल में रहकर शिक्षा ग्रहण करती थीं उन्हें ब्रह्मवादिनी कहा गया है।
  • जो कन्याएँ विवाह पूर्व तक शिक्षार्जन करती थीं उनको सद्योवधू कहा गया है।

जो बालक समावर्तन संस्कार के बिना ही अध्ययन बीच में ही छोड़कर गुरुकुल से चला जाता था उसे खटवारूढ़ कहा गया है।

ब्रह्मचर्य आश्रम के समापन का संस्कार –

  • विद्यार्जन की समाप्ति के बाद ब्रह्मचारी स्नान करता था। यह उसके अध्ययन के समापन का प्रतीक था। अब वह ‘स्नातक’ बन जाता था। इसके बाद वह अगले आश्रम ( गृहस्थ ) में प्रवेश के योग्य बन जाता था।
  • ब्रह्मचर्य से गृहस्थ आश्रम में प्रवेश के लिए ‘समावर्तन संस्कार’ किया जाता था।
  • सामान्यतः वह समावर्तन संस्कार के समय २५ वर्ष की आयु पूरी कर चुका होता था।
  • ब्रह्मचर्य आश्रम में प्रायः विद्यार्थी १३ वर्ष तक रहता था।
  • उपनिषदों और संहिता ग्रंथों में हमें अनेक ऐसे व्यक्तियों के नाम मिलते हैं जो दीर्घकाल तक गुरुकुल में रहकर वेदों का अध्ययन किया करते थे।

ब्रह्मचर्य आश्रम का महत्व –

‘यदिदं ब्राह्मणो रूपं ब्रह्मचर्य मिदं स्मृतम् ।

परं तत् सर्वधर्मेभ्यस्तेन यान्ति परां गतिम् ॥

( शांतिपर्व, महाभारत )

( अर्थात् ब्रह्मचारी का जीवन सभी धर्मों में श्रेष्ठ और आदरणीय होता है जिसका अनुसरणकर्त्ता परमपद को प्राप्त करता है। )

गृहस्थाश्रम

समावर्तन संस्कार से ब्रह्मचर्य आश्रम की समाप्ति और विवाह संस्कार से गृहस्थाश्रम की शुरुआत होती थी। इसकी अवधि २५ से ५० वर्ष तक निर्धारित की गयी थी। गृहस्थ आश्रम को सभी आश्रमों का सिरमौर कहा गया है क्योंकि यह सभी वर्णों के लिए था।

वायु पुराण में कहा गया है कि – ‘व्यक्ति अपने अनुकूल गुण, कर्म और स्वभाव वाली स्त्री के साथ यज्ञ करे, अतिथि सेवा करे, ऋषियों एवं पितरों की पूजा करे और संतानोपत्ति करे।’ संक्षेप में गृहस्थ का यही धर्म है। अतः व्यक्ति को सबसे पहले एक प्रियदर्शिनी और प्रियवादिनी स्त्री से विवाह करना चाहिए। इस विवाह का लक्ष्य संतान प्राप्ति ( पितृ ऋण से मुक्ति ) है।

इसमें मनुष्य त्रिवर्ग ( धर्म, अर्थ और काम ) का एक साथ उपयोग करते हुए मोक्ष प्राप्ति के योग्य बनता था।

इसी आश्रम में व्यक्ति अपने सामाजिक दायित्वों का निर्वहन करता था :

  • कौटिल्य कृत अर्थशास्त्र( १ ) में एक गृहस्थ के निम्न कर्त्तव्य बताये गए हैं –
    • स्वधर्मानुकूल जीविकोपार्जन करना।
    • विधिपूर्वक विवाह करना।
    • स्वपत्नी से ही सम्पर्क रखना।
    • देवों, पितरों, भृत्यों इत्यादि को खिलाने के बाद शेष अन्न का ग्रहण करना।

’गृहस्थ स्वकर्माजीवतुल्यैरसमानर्षिभिर्वौवाह्यमृतुगामित्वं देवपितृअिथिभृत्येषु त्यागश्शेष भोजनं च।’( १ )

  • मनुस्मृति( २ ) में एक गृहस्थ के लिए १० धर्मों ( कर्त्तव्यों ) का विवरण मिलता है :
    • धैर्य ( धृति ),
    • क्षमा,
    • दम,
    • अस्तेय,
    • शौच,
    • इंद्रिय-निग्रह,
    • ज्ञान,
    • विद्या,
    • सत्य और
    • अक्रोध।

’धृतिः क्षमादमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रिय निग्रहः।

धीर्विद्या सत्यमक्रेधो दशकं धर्म लक्षणम्॥’( २ )

  • यथाशक्तिनुसार दान दान और अतिथि का सत्कार करना भी एक गृहस्थ के कर्त्तव्य बताये गये हैं।

गृहस्थाश्रम में वह विभिन्न संस्कारों को सम्पन्न करता था जो जन्म से मृत्यु तक चलते थे। विवाह संस्कार से गृहस्थाश्रम में पदार्पण के पश्चात वह अन्य संस्कारों को सम्पन्न करता था।

  • गृहस्थाश्रम में व्यक्ति को ‘तीन ऋणों’ से उऋण होना होता है। ऐसा माना जाता है कि एक हिन्दू के जन्म से ही उसपर तीन ऋण होते हैं जिनसे उऋण होना आवश्यक है। इन तीन ऋणों में ‘मातृ ऋण’ शामिल नहीं है। ये त्रिऋण हैं —
    • देव ऋण – यज्ञों द्वारा देवताओं के प्रति कृतज्ञता ( यथाशक्ति )।
    • ऋषि ऋण – विधिपूर्वक वेदों का अध्ययन।
    • पितृ ऋण – धर्मानुसार सन्तानोत्पत्ति। उल्लेखनीय है कि यहाँ सन्तानोत्पत्ति का अर्थ पुत्र से है।
  • गृहस्थाश्रम में ही वह ‘पञ्चमहायज्ञों’ का अनुष्ठान करता था —
    • ब्रह्म यज्ञ – वेद अध्ययन द्वारा प्राचीन ऋषियों के प्रति कृतज्ञता।
    • पितृ यज्ञ – मृत पितरों की शान्ति हेतु तर्पण, श्राद्ध आदि।
    • देव यज्ञ – देवताओं का पूजन, बलि, घृत आदि का अग्नि में हवन द्वारा।
    • भूत यज्ञ – समस्त प्राणियों ( चराचर ) को बलि, सभी दिशाओं में रखकर, विनाशकारी भूत-प्रेतों की संतुष्टि हेतु।
      • इसका मूल है – ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः।’
    • मनुष्य यज्ञ – नृ यज्ञ अथवा अतिथि यज्ञ।
      • अतिथि की सेवा-सत्कार को एक गृहस्थ का परम कर्त्तव्य बताया गया है।
      • भारतीय संस्कृति का भाव है – ‘अतिथि देवों भव।’ ( तैत्तिरीय उपनिषद् )
      • अतिथि न केवल गृहस्थ का भोजन ग्रहण करता है, अपितु उसके पापों का भी भक्षण करता है। ( अथर्वेवेद )
      • अतिथि प्रिय हो या अप्रिय उसका आदर-सत्कार करनेवाला व्यक्ति स्वर्गलोकभागी होता है। ( बौद्धायन )

गृहस्थ आश्रम का महत्व –

  • इस प्रकार त्रि-ऋण तथा पञ्च-महायज्ञ व्यक्ति को लौकिक और अलौकिक सुख प्रदान करने वाले थे। इसके माध्यम से व्यक्ति की वैयक्तिक उन्नति तो होती ही थी, साथ ही साथ वह समाज के प्रति अपने कर्त्तव्यों का भी निर्वहन धर्मपूर्वक करता था।
  • गृहस्थाश्रम में व्यक्ति धर्मसंगत आचरण करते हुए अर्थोपार्जन एवं काम का उपभोग करता था।
  • मानवजीवन के विविध उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए गृहस्थाश्रम ही कर्म-भूमि थी। यह साधना किसी अन्य आश्रम में सम्भव नहीं थी।
  • वस्तुतः गृहस्थ आश्रम सामाजिक कर्त्तव्य के पालन की दृष्टि से सर्वोत्तम था। वस्तुतः इसे सभी आश्रमों का सिरमौर इसलिए कहा गया है क्योंकि यह सभी वर्णों के लिए था और सभी सामाजिक दायित्व भी इसी में निभाये जाते थे। साथ ही यह अन्य आश्रमों को आधार प्रदान करता था।
    • यहाँ यह उल्लेखनीय है कि गृहस्थाश्रम की सर्वश्रेष्ठता का यह कतई अर्थ नहीं है कि अन्य तीन आश्रमों का महत्व कमतर था।
    • प्रत्येक आश्रम का अपना महत्व था। उदाहरणार्थ ब्रह्मचर्य आश्रम ज्ञान प्राप्ति के लिए तो संन्यास आश्रम मोक्ष की दृष्टि से महत्वपूर्ण था।
    • वस्तुतः गृहस्थ आश्रम सामाजिक कर्त्तव्य पालनार्थ सर्वोत्तम था।
  • शास्त्रों का मत है कि यदि व्यक्ति तीनों ऋणों से उऋण होकर पुरुषार्थों का शास्त्रानुसार पालन करे तो मोक्ष प्राप्त कर सकता था।
  • मनुस्मृति इसके महत्त्व पर प्रकाश कुछ इस तरह डालती है :
    • जिस प्रकार सभी जीव वायु के सहारे जीवित रहते हैं उसी तरह सभी आश्रम गृहस्थ आश्रम के सहारे जीवन प्राप्त करते हैं।( ३ )
    • गृहस्थाश्रम तीनों आश्रमों का भारवाहक होने का कारण श्रेष्ठ है।( ४ )
    • जिस तरह सभी छोटी-बड़ी नदियाँ सागर में आश्रय पाती हैं उसी प्रकार सभी आश्रम गृहस्थाश्रम में सहारा पाते हैं।( ५ )

’यथा वायुं समाश्रित्य वर्तन्ते सर्वजन्तवः।

तथा गृहस्थमाश्रित्व वर्तन्ते सर्व आश्रमाः॥’( ३ )

×××

’गृहस्थ उच्यते श्रेष्ठः स त्रिनेतान् बिभर्ति हि।’( ४ )

×××

’यथा नदी नदः सर्वे, सागरों यान्ति संस्थितिम्।

तथैवाश्रमाः सर्वे गृह्स्थे यान्ति संस्थितिम्॥’( ५ )

  • इसी तरह पुराणों और महाभारत में भी गृहस्थ आश्रम की प्रशंसा की गयी है।
  • जो लोग गृहस्थ आश्रम का त्यागकर संन्यास ग्रहण कर लेते हैं, उनकी प्राचीन ग्रंथों में निंदा की गयी है।

वानप्रस्थ आश्रम

वान का अर्थ है – वन या जंगल और प्रस्थ का अर्थ है – प्रस्थान। इस तरह जब व्यक्ति घर छोड़कर वनगमन करता तो वह वानप्रस्थी हो जाता था। हालाँकि उसके परिवार और समाज से सम्बंध बना रहता था। वानप्रस्थी को वैखानस भी कहते हैं। इसकी अवधि ५० से ७५ वर्ष तक निर्धारित की गयी है।

गृहस्थाश्रम के कर्त्तव्यों को भलीभाँति पूरा कर लेने के पश्चात मनुष्य वानप्रस्थ आश्रम में प्रवेश करता था।

मनुस्मृति के अनुसार — ‘जब मनुष्य के सिर के बाल सफेद होने लगे, उसके शरीर पर झुर्रियाँ पड़ जायें और वह पौत्रों का मुँह देख ले तब उसे वानप्रस्थ ग्रहण करना चाहिए।

वानप्रस्थ आश्रम का उद्देश्य – विद्या, तप की वृद्धि और शरीर की शुद्धि बताया गया है ( विद्या तपोवृद्धियथार्थशरीरस्यशुद्धये )।

इसमें धर्म ( मुख्य ) तथा मोक्ष साध्य होता था। इस अवस्था में वह परिवार तथा समाज का सलाहकार होता था। वह अपने कुल, गृह और ग्राम को त्यागकर वनगमन करता था।

वन में वह निवास करते हुए इंद्रियों पर नियंत्रण स्थापित करता था। उसके लिए विहित और निषिद्ध कर्म इस प्रकार थे :

  • वह केवल कंदमूल फल ग्रहण करता था। अत्यंत क्षुधित होने पर भी उसके लिए ग्रामोत्पन्न कंदमूल फल अग्राह्य थे।
  • मिष्ठान्न, मद्य और माँस का निषेध किया गया था।
  • वैखानस मृगचर्म या वृक्ष-छाल पहनता और पेड़ तले भूमि पर शयन करता था।
  • ब्रह्मचर्य का पालन करता था।
  • यहाँ पर भी वानप्रस्थी को पंचमहायज्ञों का अनुष्ठान, वैदिक साहित्यों का अध्ययन, तपस्या आदि करना होता था।
  • इस तरह उसे समस्त भौतिक सुखों का त्याग करते हुए अत्यंत कठोर और संयमित जीवनयापन करना होता था।
  • मनुस्मृति के अनुसार –

‘स्वाध्याये नित्य युक्तः स्याद्यान्तो मैत्रः समाहितः।

दाता नित्यमना दाता सर्वजीवानुकम्पकः॥’

( अर्थात् स्वाध्याय और ध्यान मुख्य साध्य थे। राग-द्वेष रहित सभी के प्रति मैत्री भाव रखना था। उसको दान ग्रहण करना मना था फिरभी उसे दानशील बना रहना था। )

  • महाभारत के शान्तिपर्व के अनुसार –

‘ब्रह्मचर्य क्षमा शौचं तस्य धर्मः सनातनः।

एवं स विगत प्राणे देवलोकों महीयते॥’

( अर्थात् ब्रह्मचर्य, क्षमा, शौच, वानप्रस्थी के सनातन धर्म होते हैं जिनका पालन करने से वह देवलोक की प्राप्ति करता है। )

इस प्रकार जीवनयापन करने से उसके शरीर की शुद्धि और आत्मा का उत्कर्ष होता था। वैखानस के लिए अध्ययन और ध्यान मुख्य साध्य थे। यहाँ व्यक्ति राग-द्वेष से रहित होकर सभी के प्रति मैत्री भाव रखता था। दान न लेते हुए भी उसे दानशील बना रहना पड़ता था।

इस तरह एक वैखानस की दिनचर्या अत्यंत कठोर होती थी। वह काया-क्लेश का जीवन व्यतीत करता हुआ धीरे-धीरे अपने चित्त को सांसारिक मोह से हटाता हुआ अंततोगत्वा अपने को पूर्णतया निर्लिप्त कर लेता था।

शास्त्रोक्ति विधि से इन नियमों का पालन करते हुए यदि व्यक्ति की मृत्यु हो जाती थी तब भी वह मोक्ष को प्राप्त होता था।

संन्यास आश्रम

संन्यासी को परिव्राजक, यति और भिक्षु भी कहते हैं। इसकी अवधि ७५ से १०० वर्ष तक निर्धारित किया गया है। वानप्रस्थ सफलतापूर्वक पार करने के बाद यदि वह जीवित बच जाता था तो इसमें प्रवेश करता था।

कुल्लूक भट्ट और विज्ञानेश्वर के अनुसार टीकाकारों ने व्यवस्था दी गयी कि व्यक्ति गृहस्थाश्रम से सीधे संन्यासाश्रम में प्रवेश कर सकता था।

कुछ विद्वानों के मत में संन्यासाश्रम की उत्पत्ति पर अवैदिक श्रमण विचारधारा का प्रभाव है। ( गोविंद चन्द्र पाण्डेय और ए॰ एल॰ बाशम )

इस आश्रम का मुख्य साध्य ‘मोक्ष’ प्राप्त करना था। धर्म का विलय इसी मोक्ष में हो जाता था।

संन्यासी का स्वादों से कोई प्रयोजन नहीं रहता है, इसीलिए भिक्षाटन में प्राप्त सभी सामग्री को एक में मिलाकर एक समय भोजन ग्रहण करता है।

संन्यासी का स्वयं के घर से सम्पर्क पूर्णरूपेण टूट जाता है, इसीलिए उसके घरवाले उसका पुतला जलाकर श्राद्ध कर्म भी कर देते हैं। संन्यासी की पूर्व पहचान लुप्त हो जाती है और वह अपना नाम भी परिवर्तित कर लेता है। एक संन्यासी निरंतर भ्रमणशील बना रहता है। परिवार व समाज से उसका लगाव नहीं होता है।

संन्यासी के विहित और निषिद्ध कार्य :

  • संन्यासी पूर्णतया निर्लिप्त होकर अपना मन ईश्वर / परमात्मा चिंतन में लगाता था।
  • वह अपने पास कुछ नहीं रखता था।
  • वह राग-द्वेष से विरत होकर एकाकी भ्रमण करता था।
  • निर्वाह के लिए दिन में एक बार भिक्षाटन करता था।
  • इंद्रियों पर कठोर नियंत्रण रखना, समभाव होना और काम-क्रोध-लोभादिक विकारों का परित्याग करता था।
  • उसे निरंतर भ्रमणशील रहना होता था अर्थात् एक स्थान पर स्थायी नहीं रहना था। वह नगर में ५ और ग्राम में १ रात्रि से अधिक नहीं निवास कर सकता था।
  • महाभारत के अनुसार संन्यासी के निम्न कर्म थे –

’यमेषु अहिंसा सत्यास्तेय ब्रह्मचर्यापरिग्रहाख्यायेषु चात शौच संतोष तपः स्वाध्यायेश्वर प्रणिधाना – ख्येषुनियमेषु स्वशास्त्रेति।’

( अर्थात् वह सत्य, अहिंसा, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, संतोष, पवित्रता, अपरिग्रह, तप, स्वाध्याय, ईश्वरध्यान करता था। )

इस तरह कठोर तपश्चर्या और काया-क्लेश करते हुए जीवन व्यतीत करने से संन्यासी के समस्त पाप नष्ट हो जाते थे और वह निर्मल हो परमपद मोक्ष को उपलब्ध होता था।

प्राचीन भारतीय समाज में संन्यासियों का बहुत सम्मान था। प्राचीन काल में यूनानी और पूर्व-मध्य काल व मध्यकाल के मुसलमान लेखक संन्यासियों के ज्ञान और साधना-शक्ति की प्रशंसा करते हैं। मकदूनियाई शासक स्वयं सिकंदर संन्यासियों से प्रभावित हुआ था।

‘संन्यासी प्रायः ब्राह्मण वर्ग से होते थे।’ महाभारत में संन्यासी को ब्राह्मण के पर्याय के रूप में प्रयुक्त किया गया है।

निष्कर्ष

आश्रम व्यवस्था व्यक्ति और समाज के सर्वांगीण विकास के लिए थी। व्यक्ति के भौतिक और आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग इन आश्रमों द्वारा प्रशस्त होता है जहाँ प्राप्त प्रशिक्षण के आधार पर व्यक्ति अपने जीवन में आचरण करता था।

आश्रम मानव जीवन की पाठशालाएँ हैं। आश्रमों के माध्यम से व्यक्ति अपने सामाजिक कर्त्तव्यों के विषय में जानकारी प्राप्त करता था और व्यावहारिक जीवन में तदनुसार आचरण करता था। पुरुषार्थों का संतुलित और नियंत्रित उपभोग करते हुए वह समाज का उपयोगी सदस्य बन जाता था।

इस तरह आश्रम व्यवस्था हिन्दू धर्म के सिद्धान्त, पुरुषार्थों पर आधारित हैं। इन आश्रमों की व्यवस्था से व्यक्ति को व्यक्तिगत और सामाजिक दोनों प्रकार की उन्नति के अवसर उपलब्ध होते थे।

आश्रम व्यवस्था न तो प्रवृति में आकंठ डूबने का समर्थक है न ही निवृत्ति पथ पर सरपट दौड़ने का हिमायती। यहाँ पर इन दोनों ही प्रवृत्तियों का सुन्दर सामंजस्य देखने को मिलता है। हिन्दू जीवन पद्धति की यह अपनी व्यवस्था है जो अन्यत्र दुष्प्राप्य है।

 

प्राचीन भारत में ‘दास प्रथा’

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