धर्म और दर्शन

भक्ति आन्दोलन

भक्ति आन्दोलन का उद्भव भूमिका ऐतिहासिक दृष्टि से भक्ति-आन्दोलन के विकास को ‘दो चरणों’ में विभक्त किया जा सकता है। प्रथम चरण के अन्तर्गत दक्षिण भारत में भक्ति के आरम्भिक प्रादुर्भाव से लेकर १३वीं शताब्दी तक के काल को रखा जा सकता है दूसरे चरण में १३वीं से १६वीं शताब्दी तक के काल को रख …

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वल्लभाचार्य का शुद्धाद्वैतावाद

वल्लभाचार्य का शुद्धाद्वैतावाद परिचय शंकर के अद्वैतवाद का भक्ति-मार्ग पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा। भक्ति के लिए आराधक ( भक्त ) और आराध्य में द्वैत आवश्यक है जबकि शंकर के अनुसार पारमार्थिक दृष्टि से दोनों एक ही हैं। शंकर व्यावहारिक स्तर पर भक्ति को स्वीकार करते हैं परन्तु ज्ञान-मार्ग के सहायक के रूप में। शंकर का …

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रामानुजाचार्य का विशिष्टाद्वैतवाद

रामानुजाचार्य का विशिष्टाद्वैतवाद परिचय शंकर के अद्वैतवाद का भक्ति-मार्ग पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा। भक्ति के लिए आराधक ( भक्त ) और आराध्य में द्वैत आवश्यक है जबकि शंकर के अनुसार पारमार्थिक दृष्टि से दोनों एक ही हैं। शंकर व्यावहारिक स्तर पर भक्ति को स्वीकार करते हैं परन्तु ज्ञान-मार्ग के सहायक के रूप में। शंकर का …

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शंकराचार्य और उनका दर्शन

शंकराचार्य और उनका दर्शन परिचय भारतीय दर्शन में जिस तत्त्व चिंतन की शुरुआत ऋग्वैदिक काल से हुई थी वह उपनिषदों में अपने पूर्णता को प्राप्त हुई। उपनिषद्, गीता और ब्रह्मसूत्र प्रस्थानत्रयी कहलाते हैं। इनकी व्याख्या हर दार्शनिक अपनी-२ तरह से करता है। किसी को इसमें कर्म-मार्ग सूझती है तो किसी को भक्ति-मार्ग और किसी को …

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श्रीमद्भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता परिचय श्रीमद्भगवद्गीता या भगवद्गीता या गीता का भारतीय विचारधारा के इतिहास में लोकप्रियता की दृष्टि से सर्वाधिक महत्वपूर्ण स्थान है। यह हिन्दुओं का सबसे पवित्र और सम्मानित ग्रंथ है। यह महाभारत के छठवें पर्व अर्थात् भीष्मपर्व का भाग है। इसमें महाभारत युद्ध के समय कर्त्तव्यविमुख अर्जुन को भगवान श्रीकृष्ण द्वारा दिये गये उपदेशों का …

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वेदान्त दर्शन

वेदान्त दर्शन परिचय वेदान्त का शाब्दिक अर्थ है — वेद का अन्त। वेदों का ज्ञानमार्गी अंश ( उपनिषद ) वेदान्त कहा जाता है। उपनिषद्, गीता और ब्रह्मसूत्र इस दर्शन के आधार ग्रंथ हैं। इसके आधार पर वेदान्त की विभिन्न शाखाओं का विकास हुआ। सामान्यतः इसकी दो शाखायें मानी जाती हैं :— (१) अद्वैतवाद — इसमें …

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चार्वाक दर्शन या लोकायत दर्शन

भूमिका इसके संस्थापक वृहस्पति माने जाते हैं। चार्वाक दर्शन को लोकायत दर्शन भी कहते हैं। लोकायत का अर्थ है सामान्य लोगों से प्राप्त विचार। इसमें लोक के साथ गहरे लगाव को महत्व दिया गया है और परलोक में अविश्वास व्यक्त किया गया है। इसमें मोक्ष, आत्मा, परमात्मा को महत्वहीन बताया गया है। भारतीय जड़वाद का कोई …

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मीमांसा दर्शन

मीमांसा दर्शन परिचय वेदों के दो भाग हैं — कर्मकाण्ड और ज्ञानकाण्ड। ब्राह्मण ग्रंथों में वैदिक कर्मकाण्डों का वर्णन है जबकि उपनिषद् ज्ञानमार्ग से सम्बंधित हैं। मीमांसा को ‘पूर्व-मीमांसा’ भी कहा जाता है। इस दर्शन का उद्देश्य वैदिक कर्मकाण्डों की दार्शनिक महत्ता को प्रतिपादित करना है। यह मत वेदों को अपौरुषेय और नित्य मानता है। उपनिषद् ( वेदांत …

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वैशेषिक दर्शन

वैशेषिक दर्शन परिचय वैशेषिक दर्शन के प्रवर्तक महर्षि कणाद हैं। उनकी कृत ‘वैशेषिक-सूत्र’ इस दर्शन का मूल प्रामाणिक ग्रन्थ है। महर्षि कणाद के अन्य नाम हैं — कणभुक, उलूक और काश्यप। प्रशस्तपाद कृत ‘पदार्थधर्मसंग्रह’ वैशेषिक सूत्र पर टीका है। उदयन और श्रीधर इसके अन्य टीकाकार हैं। यह दर्शन ‘विशेष’ नामक पदार्थ पर बल देते हुए …

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न्याय दर्शन

न्याय दर्शन   परिचय न्याय दर्शन के प्रवर्तक ऋषि गौतम ( अक्षपाद ) हैं। इसका मूल ग्रंथ गौतमकृत ‘न्यायसूत्र’ है, जिसपर वात्स्यायन ने ‘न्यायभाष्य’ नामक टीका लिखी है। न्याय दर्शन से सम्बंधित कुछ अन्य दार्शनिक हैं — उद्योतकर, वाचस्पति, उदयन, जयन्त आदि।  इसका वैशेषिक दर्शन के साथ सम्बन्ध है, इसलिए इसे ‘न्याय-वैशेषिक’ भी कहते हैं।  न्याय …

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