सांस्कृतिक और ऐतिहासिक स्थल — ४

सांस्कृतिक और ऐतिहासिक स्थल — ४

 

सांस्कृतिक और ऐतिहासिक स्थल का मानचित्रण भाग - ४
सांस्कृतिक-ऐतिहासिक स्थल – ४

अजमेर ( अजयमेरु )

वर्तमान में अजमेर राजस्थान में स्थित एक सांस्कृतिक और प्रशासनिक स्थल है। इसकी स्थापना चाह्मान वंशी शासक ‘अजयराज’ ने की थी। इन्हीं के नाम पर इसका नाम अजयमेरु या अजमेर पड़ा है। यह सूफी संत ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती के दरगाह के लिए भी प्रसिद्ध है। यहीं पर विग्रहराज चतुर्थ ने एक संस्कृत विद्यालय बनवाया था और उसके स्वरचित नाटक हरिकेलि के कुछ अंश इस विद्यालय की दीवारों पर खुदे हैं। बाद में कुतुबुद्दीन ऐबक ने इसे ही ढाई दिन का झोपड़ा नामक मस्जिद में बदल दिया।

अजन्ता

महाराष्ट्र के औरंगाबाद जनपद में अजंता नामक पहाड़ी को काटकर ई॰पू॰ प्रथम शताब्दी से ७वीं शताब्दी के मध्य २९ बौद्ध गुफाओं का निर्माण कराया गया। यहाँ पर ६ गुफाओं ( ९, १०, १६, १७, १ और २ ) के चित्र ही अवशिष्ट हैं। ९वीं और १०वीं गुफा सबसे प्राचीन है। १६वीं और १७वीं गुफा गुप्तकालीन एवं कला की दृष्टि से सर्वोत्तम है। १ और २ गुफाओं का निर्माण ७वीं शताब्दी में कराया गया। यहाँ के भित्तिचित्र विश्व इतिहास सें तकनीक की दृष्टि से अद्वितीय है। राजकीय जुलूस ( ९वीं गुफा ), मरणासन्न राजकुमारी ( १६वीं गुफा ), माता-शिशु ( १७वीं गुफा ), पुलकेशिन् द्वितीय ( प्रथम गुफा ) फारसी दूत का स्वागत आदि उत्कृष्ट चित्र हैं।

अहमदनगर

महाराष्ट्र में स्थित एक जनपद है। बहमनी साम्राज्य के ध्वंसावशेषों पर ५ राज्यों की स्थापना हुई जिनमें से अहमदनगर की निजामशाही भी एक है। १४९० ई॰ में मलिक अहमद ने अहमदनगर को राजधानी बनाकर अहमदनगर के निजामशाही वंश की स्थापना की थी। यह चाँदबीबी और मलिक अंबर द्वारा मुगलों से संघर्ष के लिए प्रसिद्ध है। अंततः शाहजहाँ के समय ( १६३६ ई॰ ) में इसे मुगलों ने विजित कर लिया।

इनामगाँव

इनामगाँव महाराष्ट्र के पुणे जनपद में स्थित एक ताम्र-पाषाणियाँ स्थल है। इसको जोरवे संस्कृति के अंतर्गत रखा गया है। इस संस्कृति के लोग चाक पर मृद्भाण्ड बनाकर लाल रंग का लेप लगाकर उसपर काले रंग की चित्रकारी करते थे। इनामगाँव से नारी और वृषभ की मृण्मूर्तियाँ मिलती हैं जिनका धार्मिक महत्व था। यह स्थल लगभग नगरीकरण के करीब पहुँच गया था।

इन्द्रप्रस्थ

आधुनिक दिल्ली जिसे प्राचीनकाल में इन्द्रप्रस्थ कहा जाता था। महाभारतकाल में यह पाण्डवों की राजधानी थी। महाजनपदकाल में यह कुरु महाजनपद की राजधानी थी। बुद्धकाल में यहाँ का शासक कोरव्य था।

उज्जयिनी

उज्जयिनी म॰प्र॰ में क्षिप्रा नदी के तट पर स्थित है। इसके अन्य नाम हैं — विशाला, भोगवती, हिरण्यवती, पद्मावती, अवंतिका आदि। महाजनपदकाल में उज्जयिनी उत्तरी अवंति की राजधानी थी और दक्षिणी अवंति की महिष्मती। गुप्तकाल में उज्जयिनी को विशेष महत्व मिला। चन्द्रगुप्त द्वितीय विक्रमादित्य के समय यह मगध साम्राज्य की द्वितीय राजधानी बनी और उज्जयिनी की राजसभा में ही महाकवि कालिदास रहते थे। कालिदास ने महाकाल मंदिर का उल्लेख किया है। क्षिप्रा नदी के तट पर कुंभ मेला लगता है। हुएनसांग, वाणभट्ट और अलबेरुनी ने उज्जयिनी का उल्लेख किया है। १८वीं शताब्दी में जयपुर नरेश सवाई जयसिंह ने एक वेधशाला का निर्माण कराया था।

उरैयूर

उरैयूर तमिलनाडु में कावेरी नदी के थाले में तिरुचिरापल्ली के पास स्थित संगमकाल का प्रसिद्ध नगर था। यह संगमकाल में चोलों की पहली राजधानी थी। संगमकाल में यह कपास और सूती वस्त्रों लिए प्रसिद्ध था।

कन्हेरी

महाराष्ट्र के उत्तरी कोंकण क्षेत्र बोरिवली स्टेशन से कुछ दूरी पर स्थित है। कन्हेरी कृष्णगिरी का अपभ्रंश है। शक-सातवाहन युग में यहाँ चैत्य और विहारों का निर्माण हुआ। कन्हेरी से यज्ञश्री शातकर्णि ( १७४ – २०३ ई॰ ) का लेख मिला है।

कलिंग नगर

आधुनिक ओडिशा प्रांत का दक्षिणी भाग पर प्राचीनकाल में कलिंग बसा हुआ था।  उत्तरी भाग को उत्कल कहते थे। महाभारत में इसकी स्थिति गोदावरी नदी के उत्तर में स्थित था। अर्थशास्त्र में कलिंग की हाथियों को श्रेष्ठ बताया गया है। सम्राट अशोक ने २६१ ई॰पू॰ में विजित करके इसे दो भागों में बाँटा था — धौली ( तोसलि ) और जौगढ़ ( सामापा )। इस दोनों स्थलों से अशोक के बृहद् शिला प्रज्ञापन मिला है जिसमें ११, १२ और १३वें के स्थान पर दो पृथक कलिंग अभिलेख मिले हैं। प्रथम शताब्दी ई॰पू॰ में यहाँ चेदि वंशी नरेश खारवेल का शासन था। हाथीगुम्फा से खारवेल का अभिलेख मिला है। खारवेल ने उदयगिरि-खण्डगिरि में जैनियों के लिए गुफाओं का निर्माण कराया था।

कल्लाण ( कल्यान )

महाराष्ट्र के ठाणे जनपद में स्थित है। मौर्योत्तर काल ( शक-सातवाहन-कुषाणकाल ) में यह एक प्रमुख व्यापारिक और पत्तन नगर था। कल्याण सोपारा बंदरगाह की मंडी थी। इसका उल्लेख ‘पेरीप्लस ऑफ इरिथ्रियन सी’ में  है। १४वीं शताब्दी में इसपर तुर्कों ने अधिकार करके इसका नाम इस्लामाबाद रख दिया। १५३६ ई॰ में पुर्तगालियों ने इसपर अधिकार कर लिया। १६७४ ई॰ में शिवाजी ने अँग्रेजों को कल्याण में फ़ैक्ट्री खोलने की अनुमति दी थी।

कायथा

कायथा म॰प्र॰ के उज्जैन जनपद में चंबल की सहायक काली सिंध नदी के तट पर स्थित एक ताम्र-पाषाणियों स्थल है।

कावेरीपट्टनम्

तमिलनाडु के तंजौर जनपद में कावेरी नदी तट पर स्थित है। इसका अन्य नाम ‘पुहार’ है। संगमकाल में चोलों की प्रारम्भिक  राजधानी उरैयूर थी जबकि कावेरीपट्टनम् दूसरी राजधानी बनी।  संगमकाल में कावेरीपट्टनम् ( पुहार ) की स्थापना चोल नरेश करिकाल ( १९० ई॰ ) ने करायी थी। मौर्योत्तर काल में यह रोम के साथ व्यापार के कारण पर्याप्त सम्पन्न हो गया था।

किली-गुल-मोहम्मद

पाकिस्तान के क्वेटा घाटी में स्थित है। यह एक नवपाषाणकालीन और प्राक् हड़प्पा कालीन स्थल है। यहाँ पर लगभग ई॰पू॰ ४००० से आगे क्रमशः विकासशील ग्राम्य अर्थव्यवस्था का निरंतर अनुक्रम मिलता है।

कुण्डग्राम

बिहार प्रांत के वैशाली जनपद स्थित कुण्डग्राम में महावीर स्वामी का जन्म हुआ था। यहाँ पर महाजनपद काल में ज्ञातृक गणराज्य था। यह वज्जिसंघ में सम्मिलित ८ गणराज्यों में से एक था। ज्ञातृक गण के प्रमुख सिद्धार्थ और उनकी पत्नी त्रिशला के ही पुत्र महावीर स्वामी थे।

गुवाहाटी

गुवाहटी असम में ब्रह्मपुत्र नदी के तट पर है। प्राचीनकाल में यहाँ प्रग्ज्योतिषपुर था। महाभारतकाल में श्रीकृष्ण ने यहीं के शासक नरकासुर के पराजित किया था। महाभारत युद्ध में कौरवों की ओर से भाग लेने वाले भागदत्त यहीं से थे। यह क्षेत्र गुप्तों के प्रभावक्षेत्र में था। हर्षवर्धन के समय यहाँ का शासक भाष्करवर्मन् था। यहाँ पर कामाख्या देवी का मंदिर है।

चंडीगढ़

चंडीगढ़ संघ शासित प्रदेश के साथ-२ पंजाब और हरियाणा की राजधानी भी है। स्वतंत्र भारत के इस पहले योजनाबद्ध नगर के स्थापत्यकार ‘ले-कार्बुजियर’ थे।

चित्तौड़

चित्तौड़ को राजस्थान का गौरव है। चित्तौड़गढ की स्थापना ७वीं-८वीं शताब्दी में मेवाड़ नरेश बप्पारावल ने की थी। यह मेवाड़ राज्य की राजधानी थी। अलाउद्दीन खिलजी प्रथम सुल्तान था जिसने चित्तौड़गढ़ पर १३०२-१३०३ ई॰ में अधिकार कर लिया परन्तु यह पुनः स्वतंत्र हो गया। खानवा के युद्ध में राणा सांगा की पराजय हुई थी परन्तु बाबर मेवाड़ पर अधिकार कर नहीं पाया। अकबर ने १५६७ में इस पर अधिकार कर लिया। यह भूमि शाका और जौहर की भूमि है। राणा सांगा, महाराणा प्रताप और मीराबाई की भूमि है। स्वतंत्रता मशाल की भूमि है।

चित्रकूट

चित्रकूट उ॰प्र॰ का जनपद है और मध्य प्रदेश के सतना जनपद की सीमा से जुड़ा हुआ है। यह एक रामायणयुगीन स्थल है। भगवान राम ने अपने १४ वर्षीय वनवास में से ११ वर्ष यहीं पर बिताये थे। यहाँ पर मंदाकिनी नदी, कामदगिरि, सती अनसूया-अत्रि मुनि का आश्रम, स्फटिक शिला, भरतकूप आदि हैं।

जगन्नाथपुरी

ओडिशा के पुरी जनपद में जगन्नाथपुरी का मंदिर स्थित है। यहाँ के जगन्नाथपुरी मंदिर का निर्माण अनंतवर्मन चोडगंग ( १०७८ ई॰ ) ने करवाया था। यह हिन्दु धर्म के पवित्रतम् चार धामों में से एक है। यहाँ भगवान जगन्नाथ ( विष्णु ) को समर्पित मंदिर है। आदि शंकराचार्य पुरी में ही चार मठों में से एक गोवर्धन मठ की स्थापना की थी।

टेक्कलकोटा

कर्नाटक में स्थित टेक्कलकोटा एक नवपाषाणकालीन स्थल है।

टोपरा

टोपरा हरियाणा के अंबाला जनपद में स्थित है। यहाँ पर अशोक का एक स्तम्भ था जिसे फिरोजशाह तुगलक ( १३५१ – १३८८ ई॰ ) ने दिल्ली के फिरोजशाह कोटला में स्थापित कराया था। इस स्तम्भ पर अशोक के सातों लेख मिलते हैं जबकि अन्य पर केवल छः।

तिरुचिरापल्ली

तमिलनाडु में कावेरी नदी के तट पर स्थित है। यहाँ चोल, पाण्ड्य व विजयनगर शासकों ने शासन किया। आधुनिक काल में अँग्रेज-फ्रांसीसी युद्ध ( कर्नाटक युद्ध ) के समय तिरुचिरापल्ली का विशेष महत्व था। बाद में यह मद्रास प्रेसीडेंसी के अंतर्गत था।

देहरादून

देहरादून उत्तराखंड की अंतरिम राजधानी है। गैरसैण ( चमोली जनपद ) को उत्तराखंड की राजधानी में विकसित करने का प्रस्ताव है। देहरादून शिवालिक और हिमाचल श्रेणी के मध्य बसा एक संरचनात्मक घाटी है जिसे दून कहा जाता है।

धारा

धारा या धार म॰प्र॰ में स्थित है। परमार भोज १०१० – १०५५ ई॰ ) ने उज्जैन के स्थान पर धारा को अपनी राजधानी बनायी थी। भोज ने यहाँ एक संस्कृत विद्यालय स्थापित कराया और सरस्वती मंदिर बनवाया था। वह स्वयं विद्वान था और विद्वानों का संरक्षक भी। १३०५ ई॰ में महलकदेव को पराजित करके अलाउद्दीन ख़िलजी के सेनानायक ने मालवा पर अधिकार कर लिया था।

धौलावीरा ( धौलावीर )

धौलावीरा गुजरात के कच्छ जनपद के भचाऊ तहशील में स्थित एक सैंधव युगीन स्थल है। जहाँ अन्य सैंधव स्थल के नगर दो भागों में विभाजित थे वहीं इसका विभाजन तीन भागों — दुर्ग, मध्यम और निचला नगर, में किया गया है। यहाँ पर नगर नियोजन का त्रिविभाजन, जल संरक्षण व्यवस्था, पॉलिशदार प्रस्तर खण्ड, हड़प्पा के १० सबसे बड़े संकेताक्षर आदि प्रमुख अवशेष मिले हैं।

प्रयाग

गंगा, यमुना और गुप्त सरस्वती नदी के संगम पर तीर्थराज प्रयाग स्थित है। इसका पहला उल्लेख ऋग्वेद में मिलता है। रामायणकाल में यहाँ पर भारद्वाज आश्रम था। अक्षयवट यहीं पर स्थित है। यह कुम्भ स्नान के लिए प्रसिद्ध है। रामायणकाल, महाभारतकाल, बौद्धकाल और मौर्ययुग तक यहाँ कोई नगर नहीं था। गुप्तकाल से प्रयाग का महत्व बढ़ने लगा। प्रयाग में ही हर्षवर्धन महामोक्षपरिषद का आयोजन करते थे जिसमें से एक में हुएनसांग भी शामिल हुए थे। विष्णुपुराण में इसका तीर्थ के रूप में वर्णन है। पूर्व-मध्यकाल में यहाँ पर जलसमाधि लेकर प्रणान्त करने की उल्लेख मिलता है ( धंग, गांगेयदेव, रामपाल, उत्तरगुप्त शासक कुमारगुप्त आदि )।

मध्यकाल में अकबर ने यहाँ एक किला बनवाया और इसका नाम इलाहाबाद रखा। कौशाम्बी से अकबर के काल में अशोक स्तम्भ मंगाकर अकबर के क़िले में स्थापित करा दिया गया। इसी स्तम्भ पर समुद्रगुप्त का प्रयाग प्रशस्ति और जहाँगीर व बार्बर का अभिलेख भी है। मुगलकालीन खुशरोबाग यहीं पर है।

भरुकच्छ

गुजरात प्रांत के भरूच जनपद में नर्मदा नदी के मुहाने पर स्थित एक प्राचीन पत्तन है। इसके अन्य नाम हैं — भृगुकच्छ, भड़ौच, भृगुपुर, भृगुतीर्थ, बैरीगाजा, बार्गोसा आदि। महाजनपदकाल से ही इसका उल्लेख मिलने लगता है। पेरीप्लस ऑफ द इरिथ्रियन सी से ज्ञात होता है कि मौर्योत्तर काल में सोपारा और भरूच के मध्य व्यापारिक होड़ लगी रहती थी। क्षहरात वंशी शासक नहपान के जामाता उषावदत्त के नासिक गुहालेख से ज्ञात होता है कि उसने यात्रियों की सुविधा के लिए यहाँ पर आवास, कुँए, तालाब आदि निर्मित कराये थे। गुप्तकाल में भी यह प्रसिद्ध बंदरगाह था। हुएनसांग भी इसका उल्लेख करता है। हर्षवर्धन के समय यहाँ गुर्जर वंशी शासक दक्ष द्वितीय शासन करता था।

भुवनेश्वर

वर्तमान में यह ओडिशा प्रांत की राजधानी है। यहीं पर केशरी शासकों के शासनकाल ( ११वीं-१२वीं शताब्दी ) में नागर शैली में निर्मित लिंगराज मंदिर है। यहाँ के अन्य मंदिर हैं — परशुरामेश्वर, मुक्तेश्वर, सिद्धेश्वर, केदारेश्वर, ब्रह्मेश्वर, राजारानी मंदिर आदि।

मान्यखेत

कर्नाटक के गुलबर्गा जनपद में स्थित मान्यखेत ८वीं -१०वीं शताब्दी में राष्ट्रकूटों की राजधानी रही। इसके अन्य नाम मान्यखेत और मनिकर भी है।

मेहरगढ़

मेहरगढ़ पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत के कच्छी के मैदान में स्थित है। मेहरगढ़ भारतीय उप-महाद्वीप का प्राचीनतम् नवपाषाणकालीन स्थल है। यहाँ पर बसावट की शुरुआत लगभग ई॰पू॰ ७००० से होती है। मूल रूप से इसका सम्बन्ध दो कालखण्डों से है। पहले कालखण्ड में मृद्भाण्ड नहीं मिलते जबकि द्वितीय कालखण्ड से मृद्भाण्ड और ताँबे के उपयोग के साक्ष्य मिले हैं।

वाराणसी

उत्तर में वरुणा और दक्षिण में असी नदी से घिरी होने के कारण इसका नाम वाराणसी पड़ा। इसका उल्लेख सर्वप्रथम अथर्ववेद में मिलता है। महाजनपदकाल में यह काशी महाजनपद की राजधानी थी। बुद्धकाल की प्रमुख छः नगरियों में से एक थी। यह भारतीय उपमहाद्वीप की प्रचीनतम् नगरी में से है जहाँ लगातार बसावट २५०० वर्ष से है। यह प्रसिद्ध शैव नगरी है। हिन्दू धर्म की ७ मोक्षदायिनी नगरियों में से यह एक है।

श्रुध्न

मौर्योत्तर काल ( २०० ई॰पू॰ से ३०० ई॰ ) में श्रुध्न आंतरिक व्यापार का प्रमुख केन्द्र था। हस्तिनापुर और इंद्रप्रस्थ से निकटता होने के कारण काफी समृद्ध एवं सम्पन्न अवस्था था।

हैदराबाद

मुसी नदी तट पर स्थित हैदराबाद तेलंगाना की राजधानी है। हैदराबाद की स्थापना मुहम्मद कुली कुतुबशाह ने १५९१ ई॰ में की थी। १७२४ से १९४८ तक यह निजामशाही वंश की राजधानी रही। यहाँ की चारमीनार और सालारजंग की संग्रहालय प्रसिद्ध है।

 

सांस्कृतिक और ऐतिहासिक स्थल — १

 

सांस्कृतिक और ऐतिहासिक स्थल — २

 

सांस्कृतिक और ऐतिहासिक स्थल — ३

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