सांस्कृतिक और ऐतिहासिक स्थल — २

सांस्कृतिक-ऐतिहासिक स्थल भाग – २

 

सांस्कृतिक और ऐतिहासिक स्थल का मानचित्रण भाग - २
सांस्कृतिक-ऐतिहासिक स्थल – २

अफसढ़ ( अफसाढ़ )

अफसढ़ बिहार के गया जनपद में है। यहाँ से उत्तर गुप्त वंश के ८वें शासक आदित्यसेन का अभिलेख मिला है। इसमें परवर्ती गुप्त के प्रथम शासक कृष्णगुप्त से लेकर आदित्यसेन तक की वंशावली की जानकारी और इसमें उनके मौखरियों से सम्बंध की जानकारी मिलती है।

अहरौरा ( अहरार )

अहरौरा उ॰प्र॰ के मिर्जापुर जनपद में स्थित है। यहाँ से सम्राट अशोक का एक लघु शिलालेख मिला है। प्राचीनकाल में यहाँ से व्यापारिक केन्द्र भी था।

अहिच्छत्र

यह बरेली जनपद, उ॰प्र॰ का ‘रामनगर’ है। महाजनपदकाल में अहिच्छत्र उत्तरी पाँचाल की राजधानी थी। ‘चित्रित धूसर मृद्भाण्ड’ मिलने के कारण इसे ‘लौहकालीन स्थल’ माना जाता है। अशोक स्तूप के अवशेष यहाँ से मिलते हैं। मित्र, कुषाण, पाँचाल व अच्यु नामांकित सिक्कें यहाँ से मिलते हैं। एक गुप्तकालीन अभिलेख में इसे ‘अहिच्छत्र भुक्ति’ कहा गया है। समुद्रगुप्त के प्रयाग प्रशस्ति में उल्लिखित ‘अच्युत’ नामक राजा यहीं के थे।

अतरंजीखेड़ा

उ॰प्र॰ के एटा जनपद में यह काली नदी के तट पर स्थित है। अनुश्रुतियों में इस नगर का संस्थापक राजा ‘बेन’ को बताया गया है। यहाँ से ई॰पू॰ २१३० से ई॰पू॰ ६०० तक चार प्रमुख संस्कृतियों के प्रमाण मिलते हैं — गैरिक मृद्भाण्ड, काला-लाल मृद्भाण्ड, चित्रित धूसर मृद्भाण्ड और उत्तरी काली चमकीली मृद्भाण्ड संस्कृतियाँ। तृतीय संस्कृति अर्थात् चित्रित धूसर मृद्भाण्ड परम्परा से लौह उपकरण मिले हैं और इसका समय १००० ई॰पू॰ निर्धारित किया गया है। यहाँ से एक मंदिर का भी अवशेष मिला है जिसमें पाँच शिवलिंग हैं।

अनुराधापुर

श्रीलंका की प्राचीनकालीन राजधानी अनुराधापुर थी। अशोक के पुत्र महेन्द्र और पुत्री संघमित्रा बुद्ध के संदेश लेकर यहाँ तिस्स की राजसभा में पहुँचे थे।  द्रविड़ शासकों और श्रीलंका में घनिष्ठ सम्बन्ध रहे।  पल्ल्व नरेश नरसिंह वर्मन् प्रथम ने यहाँ के शासक हत्थदत्त के विरुद्ध मानवर्मा को नरेश बनने में सहायता की थी। चोलकाल में राजराज प्रथम ने यहाँ आक्रमण करके इसे नष्ट कर दिया था और पोलोन्नरुव ( जगन्नाथ मंडलम् ) को यहाँ की नयी रजधानी बनायी थी। राजेन्द्र प्रथम के समय सम्पूर्ण श्रीलंका चोलों के आधिपत्य में आ गया। कुलोतुंग के शासनकाल में ( १०७० – ११२० ई॰ ) विजयबाहु ने पुनः श्रीलंका को स्वतंत्र करा दिया।

अयोध्या

यरयू नदी अयोध्या के उत्तर में बहती है। इसका सर्वप्रथम उल्लेख ऋग्वेद में मिलता है। यह श्रीराम-जन्मभूमि के नाम से प्रसिद्ध है। रामायणकाल में यह कोसल की राजधानी थी। महाजनपदकाल में कोसल महाजनपद की राजधानी श्रावस्ती थी। बुद्धकाल में कोसल दो भागों में बंटा था जिसमें से उत्तरी कोसल की राजधानी श्रावस्ती जबकि दक्षिणी कोशल की राजधानी साकेत ( = अयोध्या ) थी। पुष्यमित्र शुंग के राज्यपाल धनदेव का यहाँ से अभिलेख मिलता है।

आलमगीरपुर

उ॰प्र॰ के मेरठ जनपद में यमुना की सहायक हिंडन नदी के तट पर स्थित आलमगीरपुर सैंधव सभ्यता का सबसे पूर्वी स्थल था।

कपिलवस्तु

नेपाल की तराई में स्थित ‘तिलौराकोट’ से इसकी पहचान की जाती है। कुछ विद्वान इसकी पहचान सिद्धार्थनगर के पिपरहवा से करते हैं। यह शाक्य गणराज्य की राज्यधानी थी। बुद्ध से सम्बंधित होने के कारण यह प्रसिद्ध है। अश्वघोष कृत सौन्दरानन्द से पता चलता है कि सांख्य दर्शन के प्रणेता महर्षि कपिल के नाम पर इसका नाम कपिलवस्तु पड़ा। सम्राट अशोक ने यहाँ की यात्रा की थी। फाहियान और हुएनसांग ने यहाँ की यात्रा की थी।

कर्ण-सुवर्ण

पश्चिम बंगाल का वर्तमान बर्धमान, मुर्शिदाबाद और वीरभूमि को मिलाकर कर्ण-सुवर्ण प्रांत बनता था। हर्षकाल में यहीं का शासक शशांक था।

काञ्चीपुरम्

तमिलनाडु के कोरोमंडल तट पर स्थित कांची की गणना सात मोक्षदायिनी नगरियों में की जाती है। समुद्रगुप्त ने अपने दक्षिणी अभियान में यहीं के शासक विष्णुगोप को पराजित किया था। यह पल्लव साम्राज्य की राजधानी थी। यह एक प्रसिद्ध शिक्षा केन्द्र भी था। यहाँ कदम्ब नरेश मयूरशर्मा और नालन्दा विश्वविद्यालय के कुलपति धर्मपाल ने यहाँ शिक्षा पायी थी। भारवि और दण्डी जैसे महाकवि यहीं से सम्बंधित हैं। हुएनसांग ने यहाँ की यात्रा की थी। यहाँ पर कैलाशनाथ मंदिर, बैकुंठ पेरुमाल मंदिर, मुक्तेश्वर मंदिर और मातंगेश्वर मंदिर हैं। १६वीं शताब्दी में यहाँ विजयनगर शासकों ने कई मंदिरों का निर्माण करवाया था।

कालीबंगन

राजस्थान के गंगानगर जनपद में घग्घर नदी पर स्थित यह सैंधव सभ्यता का नगर है। यहाँ से प्राक् हड़प्पा और हड़प्पा संस्कृति के अवशेष मिलते हैं। यहाँ से मिले अवशेषों में जुता हुआ खेत, दो फसलों की कृषि और हवनकुंड, भूकम्प के आने के साक्ष्य प्रमुख रूप से उल्लेखनीय हैं।

खजुराहो

मध्य प्रदेश के छतरपुर जनपद में स्थित खजुराहो चंदेल वंशी ( ९वीं से १२वीं शताब्दी ) शासकों द्वारा निर्मित करवाये गये लगभग २५ जैन व हिन्दू मंदिरों के लिए प्रसिद्ध है। यहीं पर नागर शैली में निर्मित ‘कंडारिया महादेव मंदिर’ है। यहाँ के मंदिरों पर उत्कीर्ण कुछ मूर्तियाँ अश्लील हैं ( तांत्रिक विचारधारा का प्रभाव )। खजुराहो के मंदिरों की दीवार पर चंदेल वंशी शासक गण्ड और यशोवर्मन् का उल्लेख मिलता है।

चम्पा

बिहार के भागलपुर जनपद में गंगा नदी के तट पर स्थित चम्पा अंग महाजनपद की राजधानी थी। यहाँ के शासक ब्रह्मदत्त को मगध नरेश बिम्बिसार ने पराजित करके अंग को मगध का हिस्सा बना लिया था। पुराणों में इसका नाम ‘मालिनी’ भी मिलता है। यहाँ के समृद्ध व्यापारियों ने हिन्द-चीन में जाकर चम्पा नामक उपनिवेश स्थापित किया था।

तंजौर ( तंजावुर )

प्रसिद्ध तंजौर तमिलनाडु के कावेरी डेल्टा में स्थित है। यह चोल साम्राज्य की राजधानी थी। राजराज प्रथम के शासनकाल में निर्मित बृहदीश्वर मंदिर द्रविड़ शैली का सर्वोत्कृष्ट उदाहरण यहीं पर स्थित है। यहाँ पर कुल मिलाकर ७५ से अधिक मंदिर हैं।

थानेश्वर

हरियाणा के कुरुक्षेत्र जनपद स्थित थानेश्वर के अन्य नाम स्थानेश्वर और स्थाण्वीश्वर भी मिलता है। हर्षवर्धन से पूर्व उनके पूर्वजों की यह राजधानी रही था। हर्षचरित से ज्ञात होता है कि घर-घर शिव की पूजा होती थी। हुएनसांग और अलबेरुनी भी थानेश्वर का उल्लेख करते हैं।

द्वारका

द्वारका गुजरात के सौराष्ट्र / काठियावाड़ के तट पर स्थित एक द्वीप है। श्रीकृष्ण ने मगध नरेश जरासंध के आक्रमणों से परेशान होकर द्वारका की स्थापना की थी। इसकी गणना ‘सात मोक्षदायिनी नगरों’ में होती है।

धौली

धौली ओडिशा के पुरी जनपद में स्थित है। यहाँ से अशोक के बृहद् शिला प्रज्ञापन मिलता है। इस शिला प्रज्ञापन में ११, १२ और १३वाँ शिला प्रज्ञापन के स्थान पर दो पृथक ‘कलिंग शिला प्रज्ञापन’ मिलते हैं। मौर्यकाल में इसका प्रशासनिक नाम ‘तोसलि’ मिलता है और यह कलिंग के उत्तरी भाग की राजधानी थी।

नागार्जुनकोंड

नागार्जुनकोंड गुंटूर जनपद, आंध्र प्रदेश में हैं। इसका प्रारंभिक नाम श्रीपर्वत ( महाभारत ) था। सातवाहन नरेश हाल ने विद्वान नागार्जुन के लिए विहार बनवाया और उनके नाम पर इसका नाम नागार्जुनकोंड पड़ा। कालान्तर में ईक्ष्वाकुओं की यह विजयपुरी नाम से राजधानी रही। ईक्ष्वाकुओं के शासनकाल में यहाँ कई स्तूप और विहार बनवाये गये। ईक्ष्वाकु रानियों ने स्तूपों व विहारों के लिए नवकर्म्मिक नामक अधिकारियों की नियुक्ति की गयी थी। इक्ष्वाकु शासक वीरपुरुषदत्त की रानी बपिसिरिनिका के अभिलेख से महाचैत्य के निर्माण पूर्ण होने की जानकारी मिलती है। महास्तूप से महात्मा बुद्ध का एक दन्तावशेष धातु-मंजूषा में सुरक्षित मिली है।

पुष्कलावती

पाकिस्तान के पेशावर जनपद में वर्तमान का चारसद्दा नामक स्थान ही है। इसकी स्थापना का श्रेय रामायणकालीन भरत के पुत्र पुष्कल ने की थी। महाजनपदकाल में पुष्कलावती पश्चिमी गंधार की राजधानी थी। सिकन्दर के आक्रमण के समय यहाँ के शासक अष्टक ( हस्ति ) युद्ध करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए थे। हुएनसांग इसे बौद्ध धर्म का केन्द्र बताता है।

पैठन ( प्रतिष्ठान )

पैठन महाराष्ट्र के औरंगाबाद जनपद के गोदावरी नदी तट पर स्थित है। सातवाहनकाल में यह एक प्रसिद्ध व्यापारिक केन्द्र था। बेरीगाजा से एक मार्ग पैठन होते हुए तगर तक जाता है।

प्राग्ज्योतिषपुर

असम के गुवाहाटी के समीप स्थित है। पौराणिक काल में यह कामरूप की राजघानी थी। महाभारत, रघुवंश में इसका उल्लेख है।  समुद्रगुप्त के प्रयाग प्रशस्ति में कामरूप नाम से इसका उल्लेख है। हर्षवर्धन के समय इस क्षेत्र का शासक भास्करवर्मन् थे जिनसे हुएनसांग भी मिले थे। यह क्षेत्र कामाख्या मंदिर के लिए भी प्रसिद्ध है।

ब्रह्मगिरि

ब्रह्मगिरी कर्नाटक के चित्त्लदुर्ग जनपद में स्थित है। यहाँ से तीन संस्कृतियों के अवशेष मिलते हैं — नवपाषाणकालीन, महापाषाणकालीन और इतिहासकालीन संस्कृतियाँ। यहाँ से अशोक का लघु शिलालेख मिला है और इसी से ज्ञात होता है कि मौर्यकालीन दक्षिणी प्रांत की राजधानी सुवर्णगिरी थी।

मदुरा ( मदुरै )

मदुरा तमिलनाडु में वैगई नदी तट पर स्थित है। इसके अन्य नाम दक्षिणी मधुरा या मथुरा और कदम्बवन भी मिलते हैं। यह भारतीय उपमहाद्वीप सबसे पुराने आवासित नगरों में से एक है ( लगभग २५०० वर्षों से )। अर्थशास्त्र में मदुरा का उल्लेख है। अधिकतर समय यह पाण्ड्यों की राजधानी रही है। तीनों संगम यहीं हुए। प्रसिद्ध मीनाक्षी मंदिर यहीं है। अलाउद्दीन खिलजी के सेनापति मलिक काफूर ने इस पर आक्रमण किया था। बाद में यह विजयनगर के आधिपत्य में आया तत्पश्चात् नायक राजवंश की राजधानी बनी।

माध्यमिका

राजस्थान के चित्तौड़गढ़ जनपद में नागरी नामक स्थान माध्यमिका है। पतंजलि कृति महाभाष्य में इस स्थान का उल्लेख आया है। इसमें कहा गया है कि पुष्यमित्र शुंग के शासनकाल में डेमेट्रियस ( शायद ) के नेतृत्व में यवनों ने माध्यमिका का घेरा डाला था। यहाँ से एक प्राचीन स्तूप और तोरण के अवशेष मिले हैं। एक सिक्के पर अंकित लेख के अनुसार यहाँ शिवि जनपद था।

लोथल

लोथल अहमदाबाद जनपद, गुजरात में भोगना नदी के तट पर स्थित सैंधव सभ्यता का स्थल है। यह एक पत्तन व्यापारिक नगर था। यहाँ से विश्व का प्राचीनतम् गोदीवाड़ा, फारस की खाड़ी प्रकार की मुहर आदि मिले हैं।

वातापी ( बादामी )

कर्नाटक के बागलकोट जनपद में स्थित है। इसकी स्थापना पुलकेशिन् प्रथम ( ५३६ – ५६६ ई॰ ) ने की और यह चालुक्य वंशी शासकों की राजधानी ७५७ ई॰ तक रही। यहाँ पर पाषाणों को काटकर ४ स्तम्भ युक्त मंडप बनाये गये जिनमें से ३ हिन्दू और १ जैन धर्म से सम्बंधित है। इसमें से एक वैष्णव गुहा में दो रिलीफ मूर्तियाँ — अनन्तशायी और नृसिंह मिलती है।

वेंगी

आन्ध्र प्रदेश के पश्चिमी गोदावरी जनपद में स्थित ‘पेड्डवेगी’ नामक स्थान लेंगी है। समुद्रगुप्त ने अपने दक्षिणी अभियान में जिन १२ शासकों को पराजित किया था उनमें से एक यहाँ का शासक हस्तिवर्मन् भी था। वातापी के चालुक्य पुलकेशिन् द्वितीय ने इसे जीतकर अपने अनुज विष्णुवर्धन को यहाँ का उपराजा नियुक्त किया जिसमें लेंगी के पूर्वी चालुक्य वंश की नींव डाली। कालान्तर में लेंगी को लेकर कल्याणी के चालुक्यों और चोलों में दीर्घकालिक संघर्ष चला। १०७० ई॰ में वेंगी राज्य का विलय चोल साम्राज्य में हो गया।

वैशाली

बिहार के वैशाली जनपद में बसाढ़ नामक स्थान से इसकी पहचान की जाती है। रामायण में इसे विशाला कहा गया है। महाजनपदकाल में गंगा के उत्तर में वज्जि संघ स्थित था। वज्जि संघ में शामिल ८ गणतांत्रिक कुलों में से लिच्छवि गणतंत्र राजधानी वैशाली थी। वैशाली गणतंत्र के प्रमुख चेटक थे की बहन त्रिशला महावीर की माता थीं और कन्या छलना / चेलना का विवाह मगध नरेश बिम्बिसार से किया था। बुद्ध की शिष्या आम्रपाली वैशाली की प्रसिद्ध नगरवधू ने बौद्ध संघ को आम्रवाटिका का दान दिया। लिच्छिवियों ने बुद्ध के लिए महावन में कुट्टागारशाला का निर्माण कराया था। अजातशत्रु ने अपने मंत्री वस्सकार के द्वारा भेद नीति का प्रयोग करके वैशाली को जीत लिया था। शिशुनाग के समय वैशाली मगध साम्राज्य की राजधानी बनी। कालाशोक के समय में वैशाली में ही द्वितीय बौद्ध संगीति ( ३८३ ई॰पू॰ ) हुई थी। गुप्तकाल में चन्द्रगुप्त प्रथम ने लिच्छवि राजकुमारी कुमारदेवी से विवाह करके द्वितीय मगध साम्राज्य की नींव रखी थी। फाह्यियान और हुएनसांग दोनों इसका उल्लेख करते हैं। राजा विशालगढ़ का टीला यहीं पर है।

सारनाथ

सारनाथ उ॰प्र॰ के वाराणसी जनपद में है। इसका अन्य नाम मृगदाव और ऋषिपत्तन भी मिलता है। गौतम बुद्ध ने यहीं पर घर्मचक्रप्रवर्तन किया था। काशी के श्रेष्ठी नंदी ने बुद्ध के लिए यहाँ एक विहार बनवाया था। सम्राट अशोक ने यहाँ की यात्री की और स्तूप बनवाया व सिंहशीर्ष स्तम्भ स्थापित करवाया। सम्प्रति सिंहशीर्ष भारतीय गणतंत्र ता राजचिह्न है। गुप्तकाल में यहाँ धमेख स्तूप का निर्माण हुआ। यहाँ से गुप्तकालीन बुद्ध प्रतिमा मिलती है। फाह्यियान और हुएनसांग दोनों ने यहाँ की यात्री थी। यहाँ पर प्राचीन शिव मंदिर और जैन मंदिर भी है।

साँची

साँची मध्य प्रदेश के रायसेन जनपद में स्थित है। यहाँ पर तीन स्तूप — एक महास्तूप और दो छोटे, मिलते हैं। महास्तूप का निर्माण अशोक ने करवाया था। महास्तूप में महात्मा बुद्ध के जबकि द्वितीय में अशोककालीन धर्म प्रचारकों और तृतीय में बुद्ध के शिष्य — सारिपुत्र व मोदग्ल्यायन के धातु अवशेष सुरक्षित हैं। महास्तूप का निर्माण अशोक ने करवाया था। यहाँ से अशोक का लघु शिलालेख मिला है जिसमें वह संघभेद को रोकने की राजाज्ञा जारी करता है। मौर्योत्तर काल में भी यहाँ निर्माण काल चलता रहा।

 

सांस्कृतिक और ऐतिहासिक स्थल — १

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