वैदिक धर्म

आमुख 

वैदिक काल को दो भागों में बाँटा गया है :- ऋग्वैदिक / पूर्व-वैदिक काल और उत्तर-वैदिक काल। पूर्व वैदिक धर्म और उत्तर वैदिक धर्म में निरन्तरता के साथ स्वाभाविक परिवर्तन भी दिखता है।

ऋग्वैदिक काल में धार्मिक दशा

भूमिका

आर्यों के घुमंतू जीवन में उनका सर्वाधिक सामना प्रकृति की विभिन्न शक्तियों से होता था। अतः उन्होंने इन प्राकृतिक शक्तियों का मानवीकरण करके पूजा करनी शुरू कर दी। इस प्रकार बहुदेववाद की शुरुआत हुई। परन्तु वैदिक आर्य जिसकी स्तुति करते थे उसे ही सर्वश्रेष्ठ मान लेते थे। इसे ही मैक्समूलर ने ‘हेनोथीज्म’ या ‘कैथेनोथीज्म’ कहा है।

देवताओं का वर्गीकरण 

यास्क के निरुक्त में ३३ देवताओं को तीन भागों में बाँटा गया है —

  • पृथ्वी के देवता – अग्नि, सोम, पृथ्वी, बृहस्पति, आरण्यानी आदि।
  • अंतरिक्ष के देवता – इन्द्र, प्रजापति, रुद्र, वायु, अदिति आदि।
  • द्युस्थान ( आकाश ) के देवता – वरुण, मित्र, सूर्य, सवितृ, आदित्य, अश्विन, पूषन, द्यौस, विष्णु, उषा आदि।

प्रमुख देवता

इंद्र

इंद्र पूर्व-वैदिक काल का सबसे प्रसिद्ध देवता था। इन्हें सर्वाधिक २५० सूक्त समर्पित हैं जोकि ऋग्वेद का लगभग १/४ भाग है। यह मुख्यतः ‘वर्षा व झंझावात’ का देवता था। इसे ‘युद्धनेता’ के रूप में प्रस्तुत किया गया है।

इनके अन्य नाम हैं –

  • पुरन्दर ( किलों को नष्ट करने वाला ),
  • वृत्तहन् / वृत्तासुरहंता ( वृत्तासुर का वध करने के कारण ),
  • सोमापा ( सोमरस का अधिक पान करने वाला ),
  • पुरभिद् ( बादलों को भेदने वाला ),
  • मधवान् / मधवा ( अत्यधिक दान करने वाला ),
  • रथेष्ट ( सक्षम रथ योद्धा ),
  • शतक्रति ( एक सौ शक्तियों का स्वामी ),
  • सूत्रात्मक ( एक अच्छा रक्षक ) आदि।

अग्नि

अग्नि पूर्व-ऋग्वैदिक काल दूसरे प्रमुख देवता थे। इनकी प्रशंसा में २०० सूक्त कहें गये हैं जोकि ऋग्वेद की ऋचाओं का लगभग १/५ है। ऋग्वेद की प्रथम ऋचा ही अग्नि को समर्पित है और प्रत्येक मण्डल की शुरुआत भी इन्हीं की स्तुति से शुरू होती है। यह मानव और देव के मध्य मध्यस्थ था क्योंकि यज्ञों द्वारा आहुतियाँ देवों को इसी के माध्यम से पहुँचती थीं। यह एकमात्र ऐसा देवता था जोकि तीनों श्रेणियों ( पृथ्वी, आकाश और अंतरिक्ष ) में था।

अग्नि का उपयोग यज्ञ, दैनिक उपयोग ( भोजन बनाने में, शीत से बचने में, प्रकाश करने में, हिंस्र पशुओं से बचने में आदि ), दाहसंस्कार आदि में किया जाता था।

वरुण

वरुण पूर्व-ऋग्वैदिक काल का तीसरा प्रमुख देवता था। यह ‘जल एवं ऋत्’ का नियामक देवता था। ऋत् का प्रमुख होने के कारण इसे ‘ऋतस्य गोपा’ कहा गया है।

‘ऋत्’ वे भौतिक और नैतिक नियम हैं जिनसे संसार संचालित होता है। इसीलिए इसका उल्लंघन होने पर वरुण अपराधियों को दण्डित करता था। वरुण को ‘हजार स्तंभों के महल’ में निवास करते हुए दिखाया गया है। इसकी तुलना ईरानी देवता ‘अहुरमज्दा’ से की जाती है।

सोम

सोम, अग्नि के बाद पृथ्वी का दूसरा प्रमुख देवता था। यह देवताओं का प्रमुख पेय था। सोम में देवत्व का आरोपण किया गया है। यह ‘आनन्द और प्रफुल्लता’ का देवता था। यह पश्चिमी हिमालय की ‘मूजवंत श्रेणी’ से मिलता था। ऋग्वेद का पूरा ९वाँ मण्डल इसी देवता को समर्पित है।

अन्य प्रमुख देवता

  • सवितृ — जब सूर्य पूरी तरह चमकने लगता तो इसे सवितृ / सविता कहा जाता था। ऋग्वेद के तृतीय मण्डल का गायत्री मंत्र इसे ही समर्पित है।
  • द्यौस — आकाश को ही द्यौस कहा गया है। यह आर्यों का सबसे प्राचीन देवता था जो उनके लिए पितातुल्य था।
  • विष्णु — इन्हें ही आकाश को स्थिर करने का श्रेय है।
  • मित्र — यह उगते हुए सूर्य का प्रतीक था। इसकी समता ईरानी देव मिथ्र से की जाती है। इसे हजार स्तंभों वाले महल में निवास करते हुए दिखाया गया है।
  • सूर्य — ऋग्वेद में इन्हें विश्व का रक्षक ओर अच्छे-बुरे कर्मों का द्रष्टा कहा गया है। इनका सिंहासन रिक्त रहता है और इनके रथ को घोड़ों द्वारा खींचते हुए दिखाया गया है।
  • अश्विन् — यह सुबह और शाम के जुड़वा तारे हैं जो आर्यों के चिकित्सक देव हैं। इन्होंने आर्यों के पैर जोड़े और उनकी टूटी नौका की मरम्मत की ( भुज्यु की नौका ) थी। च्यवन ऋषि को इन्होंने ही यौवन प्रदान किया था।
  • पूषन् — यह वनस्पतियों और पशुओं का देवता था। इसके रथ को बकरों द्वारा खींचते हुए दिखाया गया है।
  • रुद्र — ऋग्वेद में इसके क्रोधी स्वभाव का वर्णन है और इसे ३ सूक्त समर्पित हैं। इन्हें शिव का प्रारम्भिक रूप माना गया है।
  • वायु — हवा का देवता।
  • पर्जन्य — वर्षा और नदी का देवता।
  • मरुत् — आँधी का देवता।
  • आपान् — सृष्टि करने वाला देवता।
  • बृहस्पति — यज्ञ का देवता।

देवियाँ 

ऋग्वैदिक मंडल में देवियों की संख्या और महत्व दोनों अपेक्षाकृत कम है। यद्यपि सिंधु नदी, अरण्यानी, वाग्देवी आदि की स्तुति की गयी गयी है। प्रमुख देवियाँ थीं : ऊषा ( प्रभात की देवी ), अदिति ( देवताओं की माता ), पृथ्वी, रात्रि, आरण्यानी, पिशान ( वनस्पतियों की देवी ), इला ( आहुति की देवी ), पुरामधि ( उर्वरता की देवी ) आदि। ‘उर्वशी’ सबसे प्रसिद्ध वैदिक अप्सरा थी।

उपासना विधि

आर्यों की उपासना की विधि थी स्तुति पाठ द्वारा देवताओं का आह्वान करना। यज्ञ में आहुतियाँ ( दूध, शाक, जौ, मांस आदि ) दी जाती थी। कभी-कभी पशु बलि भी दी जाती थी। पशुओं की बलि दिये जाने से पूर्व उसे यज्ञ के पास बने यूप ( स्तम्भ ) में बाँधा जाता था।

धार्मिक उद्देश्य 

आर्यों की उपासना का मुख्य उद्देश्य लौकिक था अर्थात् वे इसी जीवन में धन-धान्य, संतति, पशुधन आदि प्राप्त करना चाहते थे। अभी तक पुनर्जन्म की कल्पना साकार नहीं हुई थी। पुनर्जन्म का सर्वप्रथम उल्लेख शतपथ ब्राह्मण और उपनिषदों में मिलता है।

हिरण्यगर्भ 

अप्रकेत एवं सर्वव्यापी जल से हिरण्यगर्भ निकला और जल में लहरें उत्पन्न हुईं, फिर जीव-जगत् की उत्पत्ति हुई। विश्वकर्मा को समर्पित इस सूक्त में कहा गया है कि आद्य-जीवाणु ( हिरण्यगर्भ ) जल से उत्पन्न हुआ और उस हिरण्यगर्भ से विश्वकर्मा का उद्भव हुआ जो ( उस परब्रह्म परमात्मा की ) प्रथम कृति है और वह ही इस जगत् का कर्ता-धर्ता है।

ऋत् 

ऋग्वेद में कहा गया है कि सृष्टि के आदि में सबसे पहले ऋत् उत्पन्न हुआ था – “ऋतं च सत्यं चाभीद्धात् तपसोऽध्यजायत।” ऋत् विश्व की व्यवस्था का नियामक है। देवता ऋत् के स्वरूप हैं अथवा उसी से उत्पन्न हुए हैं और अपनी दैवी शक्तियों द्वारा ऋत् की रक्षा करते हैं। सोम ऋत् द्वारा उत्पन्न और वर्धित होता है, सूर्य ऋत् का विस्तार करते हैं और नदियाँ इसी ऋत् का वहन करती हैं। इस तरह ऋत् का अर्थ है  — “विश्वव्यापी भौतिक और नैतिक व्यवस्था।”

देवताओं के गुण 

देवताओं की उत्पत्ति तो मानी गयी है परन्तु वे अमर और सर्वव्यापी थे। देवताओं की मानव रूप में कल्पना की गयी है। हालाँकि, कुछ को पशुरूप में भी कल्पित किया गया है; जैसे – द्यौस को वृषभ रूप में और सूर्य को तेज घोड़े के रूप में। देवताओं में मानवोचित दुर्बलताएँ नहीं थी। तेज, बल, स्वत्व और सत्य देवताओं के गुण बताये गये हैं। सामान्यतः देवता कल्याणकारी होते थे परन्तु रुद्र और मरुत् जैसे क्रोधी व अहितकारी देवता भी थे।

बहुदेववाद से एकेश्वरवाद 

शुरुआत में यह प्रवृत्ति दिखती है कि आर्यों ने जिस देवता की स्तुति की उसे ही सर्वोच्च मान लिया। इसी प्रवृत्ति को मैक्समूलर हेनोथीज्म या कैथेनोथीज्म कहते हैं। कालांतर में ऋग्वैदिक आर्यों ने स्वयं प्रश्न उठाया कि, ‘कस्मै देवाय हविषा विधेम’ । इस क्रम में देवताओं की संख्या कम होने लगी; जैसे- आकाश व पृथ्वी मिलकर ‘द्यावापृथ्वी’ हो गये, मित्रं व वरुण ‘मित्र-वरुण’ और ऊषा व रात्रि मिलकर ‘ऊषा-रात्रि’ हो गये। मरुतों, अश्विन्, व आदित्य की एक श्रेणी बन गयी। परन्तु यह क्रम रुका नहीं। ऋषियों को तो परम तत्व तक की यात्रा करनी थी और यह जाकर ऋग्वेद के १०वें मण्डल के नासदीय सूक्त में पहली बार अखिल ब्रह्म की कल्पना में साकार हुई :-

“एकम् सद् विप्राः बहुधा बदन्ति।
अग्निं यमं मातारिश्वानमाहुः॥”

सर्वेश्वरवाद और एकत्ववाद

ऋग्वेद में परमतत्व सम्बंधी विचार दो रूपों में मिलते हैं :—

  • सर्वेश्वरवाद ( Pantheism ) – इसका विवेचन ऋग्वेद के १०वें मण्डल के नासदीय सूक्त में है। इसमें कहा गया है कि सृष्टि के आदि में एक ही परमतत्व था। उसी से सृष्टिकर्ता की उत्पत्ति हुई। वही सम्पूर्ण सृष्टि में व्याप्त है।
  • एकत्ववाद ( Monism ) – इसका विवेचन ऋग्वेद के १०वें मण्डल के पुरुष सूक्त में मिलता है। इसमें बताया गया है कि सृष्टि का मूल तत्व विराट् पुरुष है। वह विश्व में व्याप्त होते हुए भी उससे कुछ अंशों में परे है।

 

उत्तर-वैदिक काल में धार्मिक दशा

उत्तर-वैदिक काल में आर्यों के जीवन में स्थिरता आने से धार्मिक क्रिया-कलापों में भी परिवर्तन आया; यथा – देवताओं की महत्ता में परिवर्तन, आराधना के तरीक़े में परिवर्तन, धार्मिक उद्देश्यों में परिवर्तन आदि।

देवताओं के महत्व में परिवर्तन 

उत्तर-वैदिक काल में देवताओं की महत्ता में परिवर्तन हुए। इस काल में उन देवताओं का महत्व बढ़ा जो सृजन और निर्माण के देवता थे। सृजन और निर्माण के देवता इस काल में प्रजापति थे। पूर्ववर्ती निर्माण के देवता हिरण्यगर्भ और विश्वकर्मा इसी देवता में समाहित हो गये। प्रजापति को मत्स्य और वाराह के रूप में भी देखा गया।

प्रजापति के उपरांत विष्णु की महत्ता थी जोकि प्रजापालक थे।

इस काल में रुद्र की महत्ता में विशेष वृद्धि हुई। ऋग्वैदिक क्रोधी रुद्र में कोमल स्वभाव भी शामिल हो गया। रुद्र को शिव, महादेव, हर, भीम, ईशान, गिरीश, कृत्तिवाश, पशुपति आदि नामों से जाना जाने लगा।

पूषन् की स्थिति में गिरावट आयी क्योंकि पूर्व में जहाँ वे वनस्पति और पशुओं के देवता थे वहीं अब केवल शूद्रों के देवता रह गये।

वरुण देव अब मात्र जल के देवता रह गये।

इन्द्र के महत्व में भी गिरावट आयी और वे अब सर्वोच्च देवता नहीं रहे।

आराधना की रीति

पुरोहितवाद

उत्तर-वैदिक काल में आराधना की रीति भारी परिवर्तन दृष्टिगोचर होता है। स्तुति पाठ तो चलता रहा परन्तु अब याज्ञिक कर्मकाण्डों पर अधिक बल दिया जाने लगा। यहाँ तक की प्रत्येक वेद के अपने-अपने पृथक पुरोहित हो गये; यथा –

  • ऋग्वेद के लिए ‘होतृ’ पुरोहित और यह यज्ञकुण्ड में अग्नि का आघान कर वैदिक मंत्रों द्वारा देवताओं का आह्वान करते थे।
  • यजुर्वेद के लिए ‘अध्वर्य’ पुरोहित और यह याज्ञिक कर्मकाण्डों से जुड़ा था।
  • सामवेद के लिए ‘उद्गातृ / उद्गाता’ पुरोहित और यह यज्ञों समय ऋचाओं का गायन करते थे।
  • अथर्ववेद के लिए ‘ब्रह्म’ पुरोहित और याज्ञिक कार्य इसीके निदेशन में होता था। इसे ऋत्विज भी कहते हैं। इस तरह कह सकते हैं कि ब्रह्म / ऋत्विज के निदेशन में अध्वर्य यज्ञ के कार्य सम्पन्न करता था।

यज्ञीय कर्मकाण्ड 

इस काल में यज्ञों के अनेक रुप प्रचलित हो गये जिन्हें तीन भाग में बाँट सकते थे :—

  • दैनिक या गृहकर्माणि यज्ञ – इसको जन्म, विवाह, मृत्यु आदि अवसरों पर किया जाता था। इसमें पञ्च यज्ञ, संस्कार आदि प्रमुख थे।
  • विशेष अवसरों या त्योहार पर किये जाने वाले यज्ञ; यथा – दर्श यज्ञ, अग्नहोतृ यज्ञ, सौत्रामणि यज्ञ, पूर्णमास यज्ञ, चातुर्मास यज्ञ आदि।
  • वे यज्ञ जो जटिल और खर्चीले होते थे और इसमें राजा के साथ प्रजा भी सम्मिलित होती थी। इस श्रेणी सोमयज्ञ, अग्निष्टोम यज्ञ, अश्वमेघ यज्ञ, वाजपेय यज्ञ, राजसूय यज्ञ आदि शामिल थे।

प्रचलित यज्ञ

कुछ प्रमुख यज्ञों का वर्णन निम्न है :—

  • राजसूय यज्ञ – यह राजा के राज्याभिषेक से सम्बंधित था इसमें इन्द्र और वरुण का अभिषेक किया जाता था। इस यज्ञ को सम्पादित करनेवाले पुरोहित को कभी-कभी २,४०,००० गायें दान में दी जाती थीं।
  • अश्वमेघ यज्ञ – यह सर्वाधिक प्रसिद्ध यज्ञ था जोकि राज्य विस्तार से सम्बंधित था। इसके अंत में सर्वाधिक पशुओं की बलि दी जाती थी।
  • वाजपेय यज्ञ – यह यज्ञ राजा अपनी शक्ति प्रदर्शन के लिए करता था। यह एक प्रकार से रथदौड़ थी जिसमें राजा का रथ सबसे आगे होता था। इस यज्ञ में सोमरस का पान होता था।
  • सोमयज्ञ / अग्निष्टोम यज्ञ – इस यज्ञों सोम की आहुति दी जाती थी।
  • सौत्रामणि यज्ञ – सौत्रामणि शब्द की उत्पत्ति सूत्रामन ( एक अच्छा रक्षक ) शब्द से हुई है, जोकि इन्द्र की उपाधि थी। इस यज्ञ में सुरा की आहुति दी जाती थी।
  • पुरुषमेध यज्ञ – इस यज्ञ में सर्वाधिक २५ यूपों ( यज्ञ स्तम्भों ) का निर्माण किया जाता था। यज्ञों अंत में एक पुरुष की बलि दी जाती थी।
  • अग्निहोतृ यज्ञ – यह यज्ञ प्रातः और सायं अग्नि देव को प्रसन्न करने के लिए किया जाता था। इस यज्ञ को पाप-नाशक और स्वर्ग की ओर ले जानेवाला बताया गया है।
  • दर्श यज्ञ – यह यज्ञ अमावस्या को किया जाता था। इसके प्रधान देव इन्द्र और अग्नि थे।
  • पूर्णमास यज्ञ – यह पूर्णिमा को सम्पन्न होता था। इसके प्रमुख देवता अग्नि और सोम सोम थे।
  • चातुर्मास यज्ञ – प्रत्येक चार-चार माह पर जब ऋतु बदलती थी तब यह यज्ञ किया जाता था। इसमें अग्नि, सोम, पूषन, सविता आदि देवताओं को आहुतियाँ दी जाती थीं।
  • पञ्चपशु यज्ञ – इसमें ५ पशुओं की बलि दी जाती थी। इसमें भेड़, बकरा, घोड़ा, वृषभ के साथ एक मनुष्य भी होता था।

धार्मिक उद्देश्य 

उत्तर वैदिक काल में धार्मिक उद्देश्यों में परिवर्तन आया। जहाँ पूर्ववैदिक काल में लौकिक सुखों के लिए आराधना की जाती थी वहीं इस काल में पारलौकिक उद्देश्यों का महत्व बढ़ने लगा। शतपथ ब्राह्मण में सर्वप्रथम पुनर्जन्म का सिद्धांत मिलता है।

प्रतिक्रिया

इन याज्ञिक कर्मकाण्डों में पशुधन को अत्यधिक हानि हो रही थी। बदलते परिवेश में कृषि के लिए पशुओं के संरक्षकों आवश्यकता बढ़ती गयी। ये कर्मकाण्ड अनावश्यक और खर्चीले भी थे। अतः उत्तर-वैदिक काल के अन्त में हमें उपनिषदीय प्रतिक्रिया देखने को मिलती है।

‘मुण्डकोपनिषद’ में कहा गया है कि, ‘यज्ञ टूटी हुई नौका के समान हैं जिसके द्वारा जीवन-रूपी भवसागर पार नहीं किया जा सकता है।’ उपनिषदों में ज्ञान और दर्शन का उपदेश दिया गया है और इसकी चरम परिणति ६ठवीं शताब्दी ई० पू० के धार्मिक आंदोलनों में हुई जिसमें बौद्ध और जैन धर्म सर्वप्रमुख रहे।

पौराणिक धर्म

महाकाव्य युगीन धार्मिक दशा

 

 

 

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