रामानुजाचार्य का विशिष्टाद्वैतवाद

रामानुजाचार्य का विशिष्टाद्वैतवाद

परिचय

शंकर के अद्वैतवाद का भक्ति-मार्ग पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा। भक्ति के लिए आराधक ( भक्त ) और आराध्य में द्वैत आवश्यक है जबकि शंकर के अनुसार पारमार्थिक दृष्टि से दोनों एक ही हैं। शंकर व्यावहारिक स्तर पर भक्ति को स्वीकार करते हैं परन्तु ज्ञान-मार्ग के सहायक के रूप में। शंकर का स्पष्ट मत है कि भक्ति से परमसत्ता का ज्ञान नहीं हो सकता है और न ही उसकी उपलब्धि। मोक्षावस्था में तो सम्पूर्ण अद्वैत है अतः वहाँ भक्ति के लिए कोई स्थान नहीं है।

प्रतिक्रियास्वरूप अनेक वैष्णव आचार्यों का आविर्भाव हुआ जिन्होंने शंकर के मत को चुनौती दी इसमें प्रमुख हैं — रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, बल्लभाचार्य आदि। रामानुज का विशिष्टाद्वैतवाद शंकर के अद्वैतवाद के विरुद्ध पहली ठोस प्रतिक्रिया थी। 

 

रामानुज का सामान्य परिचय

जन्म – १०१७ ई०

मृत्यु – ११३७ ई०

जन्मस्थान – श्रीपेरुम्बुन्दर, तमिलनाडु

पिता – केशव

गुरू – यामुनाचार्य

प्रमुख कृति – श्रीभाष्य, वेदार्थ संग्रह

रामानुज का जन्म काञ्ची के पास श्रीपेरुम्बुन्दर में हुआ और मृत्यु श्रीरंगम में। ये वैष्णव आचार्य थे। इनके जन्म के कुछ ही दिन बाद इनके पिता की मृत्यु हो गयी। इनको महात्मा नाम्बि ने “ॐ नमों नारायणाय” अष्टाक्षरी मन्त्र दिया। काञ्ची के यादवप्रकाश से इन्होंने वेदान्त की शिक्षा ली। कुछ समयोपरान्त इनका यादवप्रकाश से मतभेद हो गया और इन्होंने वैष्णव आचार्य यामुनाचार्य की शिष्यता ग्रहण कर ली। इन्होंने ब्रह्मसूत्र पर श्रीभाष्य नामक भाष्य लिखा। वेदान्तसार, वेदान्तदीप, वेदान्त संग्रह, गीताभाष्य आदि इनके अन्य प्रमुख ग्रंथ हैं।

तत्कालीन चोल शासक ने इन्हें उत्पीड़ित किया था क्योंकि चोलों का राजधर्म ‘शैव’ था। कुछ विद्वान इस शासक की पहचान अधिराजेन्द्र से करते हैं।

 

विशिष्टाद्वैतवाद

विशिष्ट-अद्वैतवाद भी एक प्रकार से अद्वैतवाद ही है क्योंकि क्योंकि उपनिषदों पर आधृत होने के कारण यह लगभग अनिवार्य हो जाता है कि अन्तिम रूप से एक ही परमसत्ता को स्वीकार किया जाये। रामानुज ने अन्तिम सत्ता को एक ही मानते हुए उसके भीतर विशेष प्रकार के द्वैत की स्थापना की है अतः इनका दर्शन विशिष्ट-अद्वैतवाद कहलाया।

 

रामानुज ने तीन प्रकार के भेद की बात की है :— सजातीय, विजातीय और स्वगत् भेद।

  • सजातीय भेद – एक ही वर्ग की दो वस्तुओं के मध्य का भेद; यथा — मनुष्य का मनुष्य से भेद।
  • विजातीय भेद – दो भिन्न वर्गों के मध्य की वस्तुओं का भेद; यथा — मनुष्य और गाय का भेद।
  • स्वगत् भेद – एक ही वस्तु में उसके एक अंश से दूसरे अंश का भेद; यथा — मनुष्य हाथ और पैर का भेद।

 

शंकर ने इन तीनों भेदों का खण्डन किया है क्योंकि न कोई सत्ता ब्रह्म के समान है, न भिन्न और न ही उसके भीतर किसी अंश-अंशी का भेद है।

 

रामानुज ने सजातीय और विजातीय भेद का तो खण्डन करते हैं परन्तु वे स्वगत् भेद को स्वीकार करते हैं। ईश्वर अंशी है जबकि चित् और अचित् उसके अंश हैं। ईश्वर विशेष्य जबकि चित् और अचित् उसके विशेषण हैं।

रामानुजानुसार चित् और अचित् ईश्वर के अंश हैं और उनकी वास्तविक सत्ता है। ये ब्रह्म या ईश्वर के आभास या विवर्त नहीं हैं। उनकी सत्ता नित्य और वास्तविक है। अतः जीव भी सत्य है और जगत् भी सत्य है।

 

शंकर के अनुसार ब्रह्म निर्गुण और वास्तविक ( पारमार्थिक ) है, जबकि ईश्वर सगुण और व्यावहारिक सत्ता है। अतः शंकर के मत से सगुण ईश्वर पारमार्थिक सत्ता नहीं है।

रामानुज ने स्पष्ट कहा कि ईश्वर और ब्रह्म में अभेद है एवं वह सगुण ही है। सत्, चित् और आनन्द उसके गुण हैं अर्थात् वह सच्चिदानन्द है।

 

रामानुज के अनुसार मोक्ष लिए भक्ति अनिवार्य है और ज्ञान उनके सहायक के रूप में है। भक्त को ईश्वर पर पूर्ण निर्भरता से भक्ति करनी चाहिए ताकि वह ईश्वर का अनुग्रह प्राप्त कर सके।

 

मोक्षावस्था में भी जीव और ईश्वर का द्वैत बना रहता है। रामानुज मोक्ष की ‘सायुज्य’ धारणा को स्वीकार करते हैं। इसमें जीव को ईश्वर के ज्ञान और आनन्द का पूर्ण अनुभव होता है, परन्तु उसकी ( जीव ) सत्ता बनी रहती है।

 

रामानुज की एक सीमा यह थी कि उन्होंने भक्ति को केवल उच्च वर्ग के लिए सीमित कर दिया। निम्न वर्ग के लिए उन्होंने ‘प्रपत्तिमार्ग’ की स्थापना की।

 

रामानुज की परम्परा में लगभग दो शताब्दी बाद रामानन्द का आविर्भाव हुआ जिनके माध्यम से भक्ति दक्षिण से उत्तर आयी –

“भक्ति द्राविड़ उपजी, लाये रामानन्द।

परगट किया कबीर ने, सप्तद्वीप नव खण्ड॥”

कबीर ने रामानन्द से ही राम का नाम प्राप्त किया परन्तु जहाँ रामानन्द के राम सगुण थे वहीं कबीर के राम निर्गुण थे। रामानन्द की ही परम्परा में आगे चलकर गोस्वामी तुलसीदास का आविर्भाव हुआ, जिन्होंने सगुण राम की भक्ति की।

 

वेदान्त दर्शन

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