महायान की शाखाएँ

महायान की शाखाएँ

 

माध्यमिक ( शून्यवाद ) सम्प्रदाय

इस मत के प्रवर्तक नागार्जुन हैं। नागार्जुन ने ‘माध्यमिककारिका’ की रचना की। इसे सापेक्षवाद भी कहा जाता है, जिसके अनुसार प्रत्येक वस्तु किसी न किसी कारण से उत्पन्न हुई है और वह पर-निर्भर है। नागार्जुन ने ‘प्रतीत्यसमुत्पाद’ को ही शून्यता कहा है। इस मत में महात्मा बुद्ध द्वारा प्रतिपादित ‘मध्यम-मार्ग’ को विकसित किया गया है।

शून्यवाद के अनुसार परम तत्व को बुद्धि अथवा विचारों के द्वारा नहीं समझा जा सकता है। उसका स्वरूप सर्वथा अवर्णनीय है। सामान्यतः किसी वस्तु के ज्ञान के सम्बन्ध में चार प्रकार होते हैं :— 

  1. वस्तु का अस्तित्व है।
  2. वस्तु का अस्तित्व नहीं है।
  3. वस्तु का अस्तित्व है भी और नहीं भी है।
  4. वस्तु का अस्तित्व न तो है और न नहीं ही है।

किसी पारमार्थिक या परमतत्व का ज्ञान उपर्युक्त चारों कोटियों से रहित है और इस कारण वह शून्य है।

न सन् नासन् सदसन्न चाप्यनुभयात्मकम्।

चतुष्कोटिविनिर्मुक्तं तत्वं माध्यमिक विदुः॥

                                                                 ( माध्यमिक कारिका )

अतः वर्णनातीत तत्व ही शून्यता है। 

इस प्रकार शून्यवाद का अर्थ विनाशवाद ( Nihilism ) नहीं है, अपितु यह परम तत्व अथवा पारमार्थिक सत्ता को तर्क एवं बुद्धि की सीमा से परे मानता है। 

शून्यता दो प्रकार की है — अस्तित्व शून्यता और विचार शून्यता।

अस्तित्व शून्यता का अर्थ है कि संसार की सभी वस्तुएँ कार्य-कारण के नियम से बँधी हुई है।

अप्रतीत्य-समुत्पन्नोधर्मः कश्चिन्नविद्यते।

विचार-शून्यता का अर्थ यह है कि हमारे विचारों में भी कोई स्थायी आन्तरिक सूत्र नहीं होता है और वे निरन्तर परिवर्तनशील होते हैं।

शून्यवादी दो प्रकार के सत्य स्वीकार करते हैं :—

  1. संवृत्ति सत्य,
  2. पारमार्थिक सत्य।

संवृत्ति सत्य सांसारिक सत्य है जो साधारण मनुष्यों के लिए है। यह बुद्धि द्वारा समझा जा सकता है। परमार्थिक सत्य से तात्पर्य परम सत्य से है जो तर्क और बुद्धि से परे है। संवृत्ति सत्य पारमार्थिक सत्य की प्राप्ति का साधन मात्र हैं। यह अन्ततोगत्वा मिथ्या है। इसका आवरण हटने पर ही परम सत्य की प्राप्ति होती है। ‘जो इन दोनों सत्यों का भेद समझता है वही बुद्ध की गूढ़ शिक्षाओं को समझ सकता है।’

द्वे सत्ये समुपाश्रित्य बुद्धानां धर्मदेशना। लोकसंवृत्ति सत्यं च, सत्यं च परमार्थतः।

येऽनयोर्न विजानन्ति भेदं परं तात्विकम्। ते कदापि न जानन्ति गम्भीरं बुद्धशासनम्॥

                                                                                     ( माध्यमिक कारिका )

 

शून्यवाद का लक्ष्य शून्य दृष्टि की प्राप्ति है जिसे प्रज्ञा या अलौकिक ज्ञान भी कहते हैं। यह समाधि द्वारा सम्भव है। समाधि में छः पारमिताएँ है — दान, शील, शान्ति, वीर्य, ध्यान और प्रज्ञा का बोध एवं अभ्यास। इन्हीं छः प्रज्ञाओं के अभ्यास एवं पालन से साधक को शून्यदृष्टि प्राप्त होती है। 

शून्यदृष्टि की प्राप्ति से दुःखों का विनाश हो जाता है और निर्वाण की प्राप्ति होती है। यह अवस्था वर्णनातीत है। माध्यमिक कारिका में नागार्जुन इस विषय में कहते हैं :—

“जो अज्ञात है, जिसकी प्राप्ति नई नहीं है, जिसका विनाश नहीं है, जो उत्पन्न भी नहीं है, उसी का नाम निर्वाण है।”

शून्यवाद ने बुद्ध के उपदेशों को विकसित किया। बुद्ध ने स्वयं मध्यम मार्ग का उपदेश दिया था और निर्वाण को वर्णनातीत बताया था।

नागार्जुन के अतिरिक्त अन्य शून्यवाद विद्वान — चन्द्रकीर्ति, शान्तिदेव, आर्यदेव, शान्तिरक्षित आदि।

 

विज्ञानवाद ( योगाचार ) सम्प्रदाय 

इसकी स्थापना मैत्रेय ( मैत्रेयनाथ ) ने तृतीय शताब्दी ईसवी में की थी। असंग और वसुबन्धु ने इसका विकास किया। वसुबन्धु विरचित ‘वज्रछेदिका’ में विज्ञानवाद का विकास दिखाया गया है।

यह मत ‘चित्त’ और ‘विज्ञान’ की ही एकमात्र सत्ता स्वीकार करता है आतः इसे विज्ञानवाद कहा गया है। ‘योग’ और ‘आचार’ पर विशेष बल देने के कारण इसको योगाचार भी कहते हैं।

इस मत में चित्त ( मन ) या विज्ञान के अतिरिक्त संसार में किसी अन्य सत्ता की स्वीकृति नहीं है। समस्त दृश्यमान बाह्य पदार्थ चित्त के विज्ञान मात्र हैं। जिन पदार्थों को हम बाहर समझते हैं वे वास्तव में हमारे मन के भीतर ही हैं। इस सम्बन्ध में स्वप्न का उदाहरण दिया गया है। जैसे हम स्वप्नावस्था में वस्तुओं को बाहरी मानते हैं परन्तु वास्तविकता में वे होती हमारे मन के भीतर ही हैं। उसी तरह बाह्य प्रतीत होने वाले पदार्थ विज्ञान मात्र हैं। अतः विज्ञान भिन्न किसी अन्य वस्तु का अस्तित्व नहीं है।

इस मत में चित्त को आलय विज्ञान कहा गया है अर्थात् वह सभी प्रकार के विज्ञानों का आलय ( निवास / गृह ) है। चित्त में सभी ज्ञान बीज रूप में निवास करते हैं।

योगाचार द्वारा आलय विज्ञान को वंश में करके विषय ज्ञान की उत्पत्ति को रोका जा सकता है। जब इस अवस्था का प्राप्तकर्ता व्यक्ति निर्वाण को प्राप्त करता है। इसके विपरीत होने पर व्यक्ति की सांसारिक वस्तुओं के प्रति आसक्ति बढ़ती जाती है और वह भवबंधन से मुक्त नहीं हो पाता है।

आलय विज्ञान अन्य दर्शनों की आत्मा से सादृश्य रखता है परन्तु भेद यह है कि जहाँ आत्मा नित्य है वहीं आलय विज्ञान परिवर्तनशील चित्तवृत्तियों का प्रवाह मात्र है।

शून्यवाद की तरह विज्ञानवादों भी बाह्य वस्तुओं के प्रति अनस्तित्व का विचार है। परन्तु विज्ञानवादी चित्त की सत्ता को स्वाकृत करते हैं क्योंकि ऐसा न मानने पर कोई विचार प्रतिपादित नहीं किया जा सकता है। इस मतानुसार केवल चित्त की ही प्रवृत्ति और निवृत्ति होती है; यही उत्पन्न होता है और इसी का निरोध भी होता ता है।

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