भारत और रोम सम्बन्ध

भारत और रोम सम्बन्ध

भूमिका

मौर्योत्तर काल में ‘भारत और रोम सम्बन्ध’ एक प्रमुख घटना के रूप में उभरकर आती है। इसी समय भारतीय उपमहाद्वीप में ‘कुषाण-शक-सातवाहनों’ के साम्राज्य का उदय हुआ। सुदूर दक्षिण में ‘संगम युग’ के राज्य प्रकाश में आये। पश्चिम में इसी समय शक्तिशाली ‘रोमन साम्राज्य’ का आविर्भाव हुआ।

भारत और रोम के मध्य ‘पार्थियाई साम्राज्य’ तो पूर्व में ‘चीनी साम्राज्य’ था। इन सभी के मध्य व्यापारिक और कूटनीतिक सम्बन्ध थे। गुप्तकाल के उदय से पूर्व के इस कालखंड को मौर्योत्तर काल कहते हैं।

मौर्योत्तर काल

‘पोम्पई नगर’ की खुदाई में भारतीय शैली में निर्मित हाथीदाँत से निर्मित यक्षिणी एक मूर्ति प्राप्त हुई है।

यह व्यापार आगस्टस, टाइबेरियम एवं नीरो के समय में जारी रहा।

भारत-रोम सम्बन्ध की दृष्टि से आगस्टस काल ( २७ – १४ ई०पू॰ ) सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। उसके स्वर्ण सिक्के सबसे अधिक संख्या में प्राप्त हुए हैं।

यह व्यापार भारत के पक्ष में था।

सहायक कारक

व्यापार में सहायक कई कारक थे।

कई साक्ष्यों से तत्कालीन व्यापारिक सम्बन्धों और भौगोलिक परिस्थितियों की जानकारी मिलती है।

इस काल के व्यापार-वाणिज्य को बढ़ाने में बड़े साम्राज्यों की स्थापना, शिल्प उद्योग, श्रेणी व्यवस्था, सिक्के, नगर, बंदरगाह शामिल थे।

इसके अतिरिक्त नयी खोजों व पुस्तकों ने इस व्यापार-वाणिज्य को बढ़ाने में भूमिका निभायी।

  • हिप्पोलस नामक यूनानी नाविक ने ४८ ई० में मानसूनी हवाओं की खोज की। इन मानसूनी हवाओं की सहायता से अरब सागर को पार करना आसान हो गया।
  • प्लिनी द्वारा लातिनी भाषा में लिखी गयी नेचुरल हिस्ट्री ( ७७ ई० )। प्लिनी ने इसमें भारत-रोम के व्यापार का वर्णन किया है और रोमनों की अपव्ययिता पर आक्रोश व्यक्त किया है। इसी में कहा गया है कि भारत को इस व्यापार से ५५ करोड़ सेस्टर्स की वार्षिक आय होती थी।
  • पेरीप्लस ऑफ द एरीथ्रियन सी, इसकी रचना एक अज्ञात यूनानी लेखक द्वारा यूनानी भाषा में की गयी थी ( ८० – ११५ ई० )। इस पुस्तक में लगभग २४ भारतीय बंदरगाहों का उल्लेख है। पूर्वी तट पर स्थित पत्तन कोलची, कमरा, पोदुका, मशलिया आदि। पश्चिमी तट पर स्थित पत्तन नौरा, मुशिरी, तोण्डी, नेल्सिन्डा, मुजिरिस, बकरे, बलीता, कोमिरी आदि।
  • टॉलमी की ज्योग्राफ्री, यूनानी भाषा में ( १५० ई०)। इस पुस्तक में पहली बार मानचित्रों का प्रयोग किया गया।

व्यापार की प्रकृति

उत्तरी भारत का पश्चिमी देशों से व्यापार स्थल मार्ग से होता था। यह वाणिज्य मुख्यतया ‘परिवहन व्यापार’ ( Transit trade ) जैसे था।

दक्षिणी भारत का अन्य देशों से व्यापार जल मार्ग से होता था और यह मुख्यतः ‘सीमान्त व्यापार’ ( Terminal trade ) प्रकृति का था।

दूतमण्डल

आगस्टस के काल में भारत के राजदूत रोम जाया करते थे। ऐसे ४ दूतमण्डलों का उल्लेख वरमिंगटन ने किया है :—

  • उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र से
  • भरूच / काठियावड़ क्षेत्र से
  • दो दूतमण्डल दक्षिण से — एक, चेर राज्य से और दूसरा पाड्य राज्य से

आगस्टस ने इन दूतमण्डलों में से एक से टर्रक्को, स्पेन ( २६ – २५ ई०पू॰ ) में और दूसरे का समोस ( २१ ई०पू॰ ) में मिला था।

ज्ञात होता है कि पाण्ड्य राज्य से गये दूतमण्डल में मार्ग की कठिनाइयों के कारण मात्र तीन लोग ही रोमन राज्य पहुँच पाये थे। इनमें से एक भुजाहीन व्यक्ति जोकि पैर से तीर-कमान चलाता था, सर्प, कछुआ आदि ले गये थे।

टोर्जन ( १०७ ई० ), हेडियन ( ११७ – ११८ ई० ) ने भी भारतीय दूतमण्डलों का स्वागत किया था।

व्यापार के विभिन्न पक्ष

मार्क अन्तोनी से जस्टिनियन काल तक ( ३० ई०पू॰ से ५५० ई० तक ) भारत रोम सम्बन्ध सर्वाधिक महत्वपूर्ण रहा था। ट्रोजन ( ११६ ई० ) ने एक बार यह इच्छा व्यक्त की थी कि, ‘यदि मैं युवान होता तो भारत जाने वाले जहाज़ में कूदकर बैठ जाता।’ 

विद्वान सैवेल ने दक्षिणी भारत से प्राप्त सिक्कों के अध्ययन से यह निष्कर्ष प्रस्तुत किया है कि भारत और रोम के बीच व्यापार का चरमोत्कर्ष आगस्टस से लेकर नीरो तक का शासनकाल था ( २७ ई०पू॰ से ६५ ई० तक )। परन्तु वरमिंगटन ने असहमति व्यक्त करते हुए कहा है कि यह व्यापार नीरो के बाद भी अबाध रूप से चलता रहा।

भारत-रोम का व्यापार हमेशा भारतीय पक्ष में रहा।  इसकी पुष्टि चिन-शु इतिवृत्तियों, डायोन क्राइस्टोम, पेरीप्लस ऑफ द इरिथ्रियन सी, प्लिनी आदि से होती है। रोमन नरेश टाइबेरियम ने धन बहिर्गमन की शिकायत सीनेट से की थी।

उत्तरी भारत और रोम का व्यापार मुख्यतया अप्रत्यक्ष था। तक्षशिला एक तरह से संग्रह स्थल था जहाँ से व्यापारी पश्चिमी देशों को जाया करते थे।

पर्थिया से रोम के संघर्ष से चीनी व्यापार सीधे रोमन साम्राज्य से नहीं हो पाता था।

इसी काल में कुषाणों ने भारत के पश्चिमोत्तर और मध्य एशिया में एक विशाल साम्राज्य की स्थापना की।

कुषाणों ने मध्य एशिया से गुजरने वाले रेशम मार्ग पर अधिकार करके व्यापार के सुचारु संचालन में प्रमुख भूमिका निभायी।

सूदूर दक्षिणी संगमकालीन राज्यों से अबतक सिक्कों की ६८ निधियाँ प्राप्त हो चुकी हैं। जिनमें रोमन स्वर्ण व रजत मुद्राएँ सम्मिलित हैं।

सातवाहन शासकों गौतमीपुत्र, यज्ञश्री आदि के सीसे के सिक्कों पर दो मस्तूलों वालों पोतों का अंकन है। साथ ही रोमन सिक्कों पर भी ऐसा अंकन है जिससे समुद्री व्यापार का साक्ष्य माना जाता है।

संगम साहित्य में कोर्कई, पुहार, बंदर, शालियूर आदिक पत्तनों का उल्लेख मिलता है जहाँ पर रोमन व्यापारियों के कार्यालय और गोदाम थे।

कोर्कई से लोग समुद्र में मोती खोजने के लिए गोते लगाते थे। इनमें से कुछेक पत्तनों पर यवन व्यापारियों की बस्तियाँ थीं।

तमिल देशों में आगस्टस, नीरो, टाइबेरियम आदि के स्वर्ण सिक्के मिले हैं।

अरिकामेडु पुरास्थल की खुदायी से भारत-रोम सम्बन्धों पर प्रकाश पड़ता है। यहाँ पर रोमन बस्ती थी।  यहाँ से रंगाई के हौज, रोमन दीप के टुकड़े, काँच के कटोरे, मनके, रत्न, पात्र, गोदाम आदि मिलते हैं। एक मनके के ऊपर आगस्टस का चित्र पाया गया है।

पश्चिमोत्तर में तक्षशिला से रोमन उत्पत्ति के मनके, रत्न, धातु पात्र, काँच के कटोरे, धूपदानों आदि प्राप्त होते हैं।

गुप्तकाल

एस॰ के॰ मैती और रामशरण शर्मा का मत है कि गुप्तकाल में भारत-रोम व्यापारिक सम्बन्धों में गिरावट आयी।

  • इस संदर्भ में वे कुमारगुप्त शासनकालीन मन्दसोर अभिलेख ( ५वीं शताब्दी ) का उद्धरण देते हैं।
  • साथ ही फाह्यान कहता है कि दैनिक आर्थिक क्रिया-कलाप जनसाधारण अदला-बदली और कौड़ियों के माध्यम से करते थे।

३६४ ई॰ में रोमन साम्राज्य दो भागों में बंट गया अगले १०० वर्ष उसके लिए कठिनाई से भरे रहे।

  • हुणों के उनपर लगातार आक्रमण होते रहे जिससे व्यापार पर असर पड़ा।
  • स्कंदगुप्त के शासनकाल में हुणों ने भारत पर पहली बार आक्रमण किया। उसके बाद वे लगातार आक्रमण करते रहे।
  • ५५० ई० के आसपास गुप्त साम्राज्य का पतन हो गया। इन सबका व्यापार पर असर पड़ा।

यद्यपि विद्वान इसके विपरीत भी विचार रखते हैं।

  • साक्ष्यों द्वारा वे कहते हैं कि गुप्तों के १६ स्वर्ण ढेर प्राप्त हुए है जिनमें सबसे बड़ा ढेर बयाना से मिला है।
  • गुप्तों ने स्वर्ण के सर्वाधिक सिक्के जारी किये।
  • जिस रेशम तक आर्लियन के समय ( १६१ – १८० ई० ) में मात्र कुलीनों की पहुँच थी वह जूलियनकाल ( ३६१ – ३६३ ई० ) में सर्वजनसुलभ हो गयी।
  • हुण आक्रांता एलरिक  रोमन साम्राज्य से फिरौती के रूप में काली मिर्च और रेशम की माँग की थी ( ४०८ ई० )।
  • यह बढ़ते व्यापार का द्योतक था।

रोम के पतनोपरान्त कान्स्टेनटाइन ने ३३० ई० में कान्स्टैनटिनोपुल को केन्द्र बनाकर शासन किया जिसे बैजेन्टियम भी कहा जाता है।

  • चिकित्सा प्रबंधों और जस्टिनियन लॉ डाइजेस्ट से भारतीय वस्तुओं की पर्याप्त सूची मिलती है।
  • भारत के विभिन्न क्षेत्रों से बैजेन्टियम सिक्के भी व्यापारिक सम्पर्कों को पुष्ट करते हैं।

कुमारस्वामी गुप्तकाल को पोतनिर्माण का महान काल मानते हैं। कुछ पोत तो ५०० यात्रियों को ले जाने में सक्षम होते थे।

गुप्तयुगीन जल मार्ग पश्चिम में भृगुकच्छ से शुरु होकर फारस और अरब के तटों से होता हुआ लाल सागर तक जाता था। वहाँ से व्यापारी रोम पहुँचते थे।

स्कन्दगुप्त के शासनकाल में हुणों का आक्रमण हुआ यद्यपि वे हरा दिये गये परन्तु अब गुप्त साम्राज्य का पतन शुरू हो गया और ५५० ई० के आसपास इसका पूर्णतया पतन हो गया।

गुप्तोत्तर काल

६०६ ई० में हर्षवर्धन का उदय हुआ परन्तु यह काल आर्थिक दृष्टि से पतनावस्था का समय था।

समाज अब धीरे-२ कृषिमूलक होता जा रहा था।

इस काल में मुद्राओं का घोर अभाव था।

हर्षवर्धन के शासनकाल में ही हुएनसांग नामक चीनी यात्री आया। उसके अनुसार पश्चिमोत्तर में कपिशा मुख्य व्यापारिक केन्द्र था।

पूर्व-मध्यकाल

भारतीय जलयान पूर्व-मध्यकाल ( ६५० – १२०० ई०) में अरब, फारस और मिश्र तक जाते थे।

हेमचन्द्र के अनुसार अरब से अश्वों का आयात होता था और फारस से रंग।

इब्न-खुर्ददबा भारत से निर्यातित वस्तुओं की सूची दी है उसमें सम्मिलित हैं — बेंत, बाँस, शीशा, कालीमिर्च, बिल्लौर, मोती, हाथीदाँत, मखमल के कपड़े, नारिकेल, कबाब चीनी, जायफल, लवँग, कर्पूर, चंदन आदि।

इस काल को दो भागों में बाँटा गया है — एक, ६५० से १००० ई० और द्वितीय, १००० से १२०० ई० का समय।

इस काल के प्रथम काल में व्यापार और वाणिज्य का ह्रास हुआ।

  • इस समय तक रोमन साम्राज्य का पतन हो चुका था और इसी काल में इस्लाम का उदय हुआ।
  • इस्लाम के उदय से स्थली मार्ग से होने वाला व्यापार बाधित हुआ।
  • इस कालखण्ड में स्वर्ण मुद्राएँ नहीं मिलती हैं और रजत् व ताम्र के सिक्कों को भी बहुत कम ढलवाया गया।
  • नगरों का पतन हुआ और व्यापारी ग्रामीणोन्मुख हुए।

दूसरे कालखण्ड में व्यापार-वाणिज्य में सुधार हुआ।

  • क्योंकि इस समय कुछ बड़े राज्यों की स्थापना हुई
  • साथ ही पश्चिमी एशिया में मुस्लिम साम्राज्यों ने भी शान्ति और सुव्यवस्था स्थापित किया।
  • इस समय की सिक्के और मुहर बड़ी संख्या में ढलवायी गयीं।

दक्षिण भारत में चालुक्य, पल्लव, पाण्ड्य, और चोल राजवंशों का उदय हुआ।

  • आबूजैद फारस की खाड़ी के पूर्वी तट पर स्थित ‘सिरफ’ का उल्लेख करता है जहाँ पर भारतीय व्यापारी बड़ी संख्या में पहुँचते थे और वहाँ अरब व्यापारियों से व्यापार विनिमय करते थे।
  • दक्कन में राष्ट्रकूटों ने अरब व्यापारियों को सुख-सुविधायें प्रदान की और उन्हें मस्जिदों के निर्माण की अनुमति दी थी।
  • दक्षिण भारत के इस काल के प्रसिद्ध पत्तन थे — खम्भात, भरूच, सोमनाथ, कोलम् आदि।

व्यापारिक मार्ग

व्यापारिक मार्ग :—

  • पहला मार्ग, सिन्धु नदी मुहाने से शुरू होकर समुद्रतटीय से होता हुआ फारस की खाड़ी से होता हुआ दजला और फरात नदी तक जाता था।
  • दूसरा मार्ग अरब देशों के तटवर्ती क्षेत्रों से होता हुआ लाल सागर को पार करके यूनान और मिश्र तक जाता था।
  • तीसरा मार्ग हिन्दुकुश के दर्रों ( खैबर, गोमल, बोलन )  करके बल्ख एवं ईरान होते हुए अन्तियोक तक जाता था।

भारतीय व्यापारियों ने अधिकांशतः जलमार्गों का ही अनुसरण किया था।

भारत और रोम सम्बन्ध ( प्राचीन व्यापारिक मार्ग )
प्राचीन व्यापारिक मार्ग

भारत और रोम सम्बन्ध का प्रभाव

रोम और भारत के सम्बन्ध से दोनों परस्पर लाभान्वित हुए। इसे हम सांस्कृतिक और आर्थिक रूप से देख सकते हैं।

रेशम और गरम मसालों  का भारत और रोम के मध्य व्यापार में सर्वाधिक महत्त्व था।

भारत से रोम को निर्यातित वस्तुएँ — मोती, शंख, चंदन, इत्र, हाथी दाँत निर्मित वस्तुएँ, जटामासी, जवाहरात आदि।

भारत में रोम से आयातित वस्तुएँ — रत्न, मनके, मदिरा पात्र ( एम्फोरे ), ओपदार अरेटाइन मृद्भांड, दीप, काँच की वस्तुएँ, सोने और चाँदी के सिक्के, कांस्य पात्र और मूर्तियाँ आदि।

दक्षिण भारत पर इस व्यापार का आर्थिक प्रभाव स्पष्ट दिखता है।

उत्तर भारत में यह प्रभाव अपेक्षाकृत सांस्कृतिक अधिक था।

  • भारतीय लोककथाएँ और आख्यायिकाएँ पश्चिम में गयीं।
  • एलियन, स्ट्रैबो, प्लिनी, टॉलमी आदि ने भारत के विषय में लिखा।
  • गांधार कला का जन्म कुषाणों के संरक्षकों इसका स्पष्ट प्रमाण है।
  • भारतीय देवता द्यौस और रोमन देव जूपिटर में समता है।
  • रोमन दार्शनिक सिसरो भारतीय दर्शन से प्रभावित हुए।
  • बौद्ध धर्म का ईसाई धर्म पर प्रभाव दिखता है; जैसे — दया, करुणा, भाईचारा, समता आदि।
  • ईसाई चर्च की वास्तुकला पर बौद्ध चैत्यगृहों का प्रभाव पड़ा; जैसे — नेव – मण्डप, आइल – प्रदक्षिणापथ, एप्स – गर्भगृह आदि।
  • शब्दों का विनिमय; यथा — शर्करा — सकैरम ( Sacharum ), कर्पूर – कैम्फर आदि।
  • भारतीय ज्योतिष का ‘रोमक सिद्धान्त’ स्पष्ट रूप से रोम विचारों से प्रभावित है।
  • कुषाण शासकों ने रोमन प्रभाव स्वरूप मृत राजाओं की स्मृति में देवकुल बनवाये।
  • गुप्त शासकों के स्वर्ण सिक्कों ( दीनार ) की तौल रोमन सिक्कों ( डेनेरियस ) सदृश है। दीनार की उत्पत्ति भी लैटिन डेनेरियस से मानी जाती है।

 

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