भाब्रू या बैराठ या विराटनगर

 

भूमिका

भाब्रू या बैराठ का प्राचीन नाम विराटनगर मिलता है। यह राजस्थान प्रान्त के जयपुर जनपद में बाणगंगा नदी के तट पर स्थित है। बाणगंगा नदी बैराठ की पहाड़ियों से निकलती है। यह गंभीर नदी की सहायक और यमुना की उपसहायक नदी है। यहीं पर बैराठ सभ्यता पुष्पित-पल्लवित हुई थी।

यहाँ ( भाब्रू या बैराठ ) से प्रस्तरयुगीन, ताम्रपाषाणकालीन, लौहयुगीन संस्कृति के अवशेष मिले है। महाजनपदकाल काल में यह ( विराटनगर ) ‘मत्स्य महाजनपद’ की राजधानी थी।

ऐतिहासिक काल में यहाँ से मौर्यकालीन, मौर्योत्तरकालीन, गुप्तकालीन और मध्य काल ( विशेषकर मुगलकाल ) के अवशेष मिलते हैं।

महाभारत में जिस विराटनगर का विवरण मिलता है वो यही है। यहीं पर पाण्डवों ने द्रौपदी के साथ एक वर्ष का अज्ञातवास बिताया था।

यहाँ पर पहाड़ी को स्थानीय भाषा में डूँगरी कहा जाता है; जैसे – बीजक या बीजन की डूँगरी, भीम की डूँगरी, महादेव डूँगरी, गणेश या मोती की डूँगरी।

भाब्रू या बैराठ
भाब्रू या बैराठ

संक्षिप्त विवरण : भाब्रू या बैराठ

  • बैराठ सभ्यता पर उत्खनन कार्य सन् १९३६-३७ ई० में दयाराम साहनी और नीलरत्न बनर्जी और कैलाशनाथ दीक्षित द्वारा सन् १९६२-६३ ई० में कराया गया।
  • बैराठ सभ्यता में बीजक की पहाड़ी, भीमजी की डूंगरी और महादेव की डूंगरी का उत्खनन कराया गया है।
  • यहाँ से ३६ सिक्के मिलते हैं :-
    • ८ पञ्चमार्क चाँदी का सिक्के
    • २८ इण्डो-ग्रीक और यूनानी राजाओं के सिक्के; इसमें से १६ सिक्के यूनानी शासक मिनाण्डर की हैं
  • उत्तर भारत के चमकीले मृद्भाण्ड वाली संस्कृति का प्रतिनिधित्व करने प्राचीन स्थानों में से एक स्थल यह ( बैराठ ) भी है।
  • सन् १८३७ ई० में अँग्रेज अधिकारी कैप्टन बर्ट ने भाब्रू शिलालेख की खोज की। वर्तमान में भाब्रू-बैराठ शिलालेख बंगाल एशियाटिक सोसाइटी, कोलकाता में सुरक्षित है।
    • इस अभिलेख में बौद्ध त्रिरत्न का उल्लेख है जो यह सिद्ध करता है कि सम्राट अशोक बौद्ध धर्मानुयायी थे।
  • सन् १९९९ ई० में बीजक की पहाड़ी से अशोककालीन बौद्ध स्तूप, मठ और मन्दिर के अवशेषों के प्रमाण मिले। यह हीनयान सम्प्रदाय से सम्बन्धित हैं।
  • बैराठ सभ्यता एक ग्रामीण संस्कृति थी। यहाँ से पाषाणकालीन हथियारों के निर्माण का एक कारखाना था।
  • भवन निर्माण में यहाँ पर मिट्टी की बनायी गयी ईंटों का प्रयोग देखने को मिलता है।
  • यहाँ से मौर्यों के बाद शुंग व कुषाणकालीन अवशेष मिलते है।
  • बैराठ में लौह तीर व भाले मिले हैं।
  • विद्वानों का यह मत है कि बैराठ सभ्यता हूण शासक मिहिरकुल का आक्रमण से नष्ट हो गयी।
  • हर्षवर्धन के समय लगभग ६३४ ई० में ह्वेनसांग विराटनगर आया था। उसने यहाँ पर बौद्ध मठों की संख्या ८ बतायी है।
  • बैराठ सभ्यता में ‘शंख लिपि’ के प्रमाण मिले हैं।
  • यहाँ पर मुगलकालीन टकसाल होने का प्रमाण है क्योंकि यहाँ पर ढाले गये सिक्कों पर ‘बैराठ’ अंकित है।
  • इस सभ्यता से बनेड़ी, ब्रह्मकुण्ड और जीणगोर की पहाड़ियों से वृषभ, हिरण और वनस्पतियों के चित्रण मिलते हैं।

विराट या बैराठ सभ्यता

बैराठ ही प्राचीन विराटनगर है। यहाँ का प्रथम उत्खनन दयाराम साहनी की देखरेख में १९३६-३७ ई० करायी गयी थी। दूसरा उत्खनन १९६२-६३ ई० में नीलरत्न बनर्जी और कैलाशनाथ दीक्षित के निर्देशन में हुआ।

पर्वतीय कंदराओं, वन्यजीवों से समृद्ध यह भूप्रदेश ( बैराठ ) प्रागैतिहासिक काल से ही मानव निवास के लिए आकर्षक केन्द्र रहा है।

यहाँ से प्रागैतिहासिक हथियार निर्माण करखाने का साक्ष्य मिला है।

बैराठ से मिले शैलचित्र पाषाणकाल की विशेषता है। गुहाओं में, चट्टानों पर ‘शिकार करते मनुष्य के दृश्य’ चित्रित किये गये हैं। इसलिए बैराठ को ‘प्राचीनकाल की चित्रशाला’ भी कहा गया है। ये चित्र बीजक, भीम, गणेश डूँगरी की शैलाश्रयों से मिलते हैं।

ताम्रपाषाणकाल के मृद्भाण्डों का निर्माण चाक पर किया जाता था। ये मृद्भाण्ड ‘आकर कलर पात्र परम्परा’ से सम्बन्धित है। इन पात्रों को हाथ से छूने पर गेरुआ ( गैरिक ) या सिन्दूरी रंग हाथ में लग जाता है। इन मृद्भाण्डों पर उकेरण विधि से अलंकरण किया जाता था। ये पात्र अन्य स्थलों पर भी मिलते हैं; जैसे –  जोधपरा ( जयपुर ), गणेश्वर ( सीकर )।

विद्वान आर०सी०अग्रवाल का मत है कि बैराठ के लोग तत्कालीन सैंधव नगरों को ताम्र उपकरण निर्यात करते थे।

बैराठ से उत्तरी काले चमकीले मृद्भाण्ड ( NBPW – Northern Black Polished Ware ) के अवशेष मिलते हैं। इन पात्रों का सम्बन्ध लौहकाल से है।

यहाँ से लौहयुगीन स्लेटी रंग से अलंकृत मृद्भाण्ड के अवशेष मिले हैं। ये पात्र समकालीन गंगा घाटी में प्रचलित पात्रों के समान थे।

महाभारत से सम्बंध

महाभारत में विराटनगर का जो उल्लेख मिलता है वह यही ( बैराठ ) है। पाण्डवों ने अपना एक वर्ष का अज्ञातवास विराटनगर में ही व्यतीत किया था।

बैराठ में एक छोटी पहाड़ी है जिसका नाम ‘भीमसेन की डूँगरी’ है। इसपर ‘भीमताल’ है। ऐसी लोक मान्यता है कि देवी द्रौपदी को प्यास लगने पर भीम ने चट्टान से पानी निकाला था।

ईंटों का प्रयोग

यह बात विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि बैराठ ( विराटनगर ) के चारों तरफ पत्थरों की कोई कमी नहीं है फिरभी यहाँ पर भवनों में मिट्टी के ईंटों का प्रयोग किया गया है।

ऐसा क्यों हुआ? पत्थर की उपलब्धता के बावजूद ईंटों का प्रयोग एक अनसुलझा प्रश्न है। हड़प्पा स्थलों पर ईंटों का प्रयोग तो समझ में आता है क्योंकि वहाँ प्रस्तर नहीं थे, परन्तु यहाँ क्यों? सम्भवतः सैन्धव सभ्यता के प्रभाव से ऐसा हो सकता है; परन्तु इस सम्बन्ध में निश्चित रूप से कुछ नहीं कहा जा सकता है।

मौर्यकालीन अवशेष

भाब्रू या बैराठ जिसका का कि नाम विराटनगर है, से अनेक मौर्यकालीन अवशेष मिले हैं।

बौद्ध अनुश्रुतियों के अनुसार सम्राट अशोक ने ८४,००० स्तूपों का निर्माण कराया था। सम्भवतः यहाँ के स्तूप का निर्माण भी अशोक ने ही करवाया हो। बैराठ के बीजक की डूँगरी ( पहाड़ी ) से चैत्य ( गोल बौद्ध मन्दिर ), बौद्ध स्तूप, बौद्ध मठ के अवशेष मिले हैं। इनका सम्बन्ध बौद्ध धर्म की हीनयान शाखा से है।

यहीं पर स्थित बीजक डूँगरी से मिले भाब्रू ( बैराठ ) लघु शिलालेख अशोक के बौद्ध धर्मानुयायी होने का पुरातात्विक साक्ष्य प्रस्तुत करता है। इस शिलालेख की खोज अँग्रेज अधिकारी कैप्टन बराक ने १८३७ ई० में की थी। सम्प्रति यह वर्तमान में कोलकाता के बंगाल एशियाटिक सोसाइटी में संरक्षित है। यह अभिलेख ब्राह्मी लिपि और प्राकृत भाषा में है।

मौर्योत्तरकाल

यहाँ से शुंग, कुषाण, गुप्तकालीन अवशेष मिलते हैं। गुप्तोत्तर काल में निरन्तर हूणों के आक्रमण से यह स्थल नष्टप्राय हो गया।

ग्रीक मुद्राएँ

बैराठ से कुल ३६ सिक्के मिले हैं। यह सूती कपड़े से बँधे एक मृद्भाण्ड में मिला है। इसका विवरण निम्न है :-

  • ८ आहत ( पंचमार्क ) मुद्राएँ।
  • २८ इण्डो-ग्रीक सिक्के।
    • इन २८ सिक्कों में से १६ मुद्राएँ यूनानी शासक मिनाण्डर की हैं। मिनाण्डर प्रथम शताब्दी ई० में शासन करता था। अतः इसे उसी समय का माना जाता है।
  • गुप्तोत्तर काल में हुणों के आक्रमण में यह नगर नष्ट हो गया। यह आक्रांता हूण शासक मिहिरकुल था।
  • प्रसिद्ध बौद्ध चीनी यात्री ह्नेनसांग ( हर्षवर्धन के समय ) ने यहाँ की यात्री थी ( लगभग ६३४ ई० )। उसने यहाँ की पतनावस्था के लिए हूण शासक मिहिरकुल को उत्तरदायी ठहराया है। ह्वेनसांग ने बैराठ के लिए ‘पारयात्र’ शब्द का प्रयोग किया है।

शंख लिपि

विद्वान सी०एल०कार्लाइल ने बैराठ के भीम की डूँगरी से शंख लिपि में उत्कीर्ण एक शिलालेख प्राप्त किया है।

शंख लिपि; ब्राह्मी लिपि को अत्यधिक अलंकृत करके गुप्त रूप से लिखा जाता था। दूसरे शब्दों में यह एक प्रकार से कूटलिपि या गुप्तलिपि या कूटलिपि है।

मुगलकाल से सम्बन्ध

  • बैराठ से मुगलकालीन एक सराय, मुगल छतरी के अवशेष मिले है। बादशाह अकबर अजमेर यात्रा के दौरान यहाँ पर रुका करते थे।
  • अकबर और आमेर के शासक भारमल की प्रथम भेंट बैराठ में ही हुई थी।
  • मुगलकालीन टकसाल के साक्ष्य भी यहाँ से मिलते हैं क्योंकि यहाँ पर ढाले गये सिक्कों पर ‘बैराठ’ अंकित है।

 

भाब्रू लघु शिलालेख

सांस्कृतिक और ऐतिहासिक स्थल — १

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