बाघ की गुफाएँ

भूमिका

बाघ की गुफाएँ और उनमें भित्तिचित्रों का निर्माण गुप्तकाल में किया गया। ये गुफाएँ संख्या में ९ हैं। अजन्ता की गुफा संख्या १६, १७ और १९ एवं बाघ की गुफाएँ समकालीन ( गुप्तकालीन ) हैं। जहाँ एक ओर अजन्ता के भित्तिचित्र धार्मिक विषयों पर आधृत हैं तो दूसरी ओर बाघ के भित्तिचित्रों का विषय मुख्यतया लौकिक जनजीवन है।

बाघ के भित्तिचित्रों से तत्कालीन वेशभूषा, केशसज्जा और अलंकार-प्रशाधनों आदि का ज्ञान मिलता है। इसलिए बाघ की गुफाओं का ऐतिहासिक महत्त्व बढ़ जाता है।

अजन्ता की गुफाओं व भित्तिचित्रों का निर्माणकाल द्वितीय शताब्दी ई०पू० से लेकर सातवीं शताब्दी ई० तक विस्तृत है। इस कारण से इनमें समानता न होकर एक प्रकार से विकासात्मक परिप्रेक्ष्य दृष्टिगोचर होता है जिसकी चरम उपलब्धि आकर गुप्तकालीन गुफा १६, १७ व १९ में फलीभूत होती है। दूसरी ओर बाघ की गुफाओं के निर्माण का समय गुप्तकाल में होने के कारण समानता अपेक्षाकृत अधिक है।

बाघ के भित्तिचित्रों में सबसे प्रसिद्ध है संगीत और नृत्य का दृश्य।

बाघ की गुफाएँ भी बौद्ध धर्म से सम्बंधित हैं। यहाँ पर भी चैत्य, स्तूप, विहार और सभागृहों का निर्माण किया गया है। कुछ भगवान बुद्ध की प्रतिमा के दृश्य भी हैं। परन्तु यह बात विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि अधिकांश चित्र धर्मनिरपेक्ष हैं; जैसे – नृत्यगान, भव्य राजकीय यात्रा, हाथियों की दौड़, विषादग्रस्त युवतियाँ इत्यादि।

बाघ की गुफाएँ : स्थिति

बाघ की गुफाएँ मध्य प्रदेश के धार जनपद में नर्मदा नदी की सहायक बाघिनी नदी ( बाग्मती नदी ) के बायें तट स्थित बाघ की पहाड़ी को काटकर बनाया गया है। पास में ही ‘बाघ’ नामक गाँव बसा हुआ है। सम्भवतः इसी कारण इन गुफाओं का नाम बाघ की गुफाएँ पड़ गया होगा।

यहीं पर ‘बाघेश्वरी देवी’ का प्राचीन मंदिर भी स्थित है। स्थानीय लोग इन गुफाओं को पंच-पाण्डु ( पाँच पाण्डव ) की गुफाओं के नाम से भी पुकारते हैं।

बाघ की गुफाएँ
बाघ की गुफाएँ : स्थिति

गुफाओं की खोज

बाघ की गुफाएँ सैकड़ों वर्षों तक अज्ञात रहीं। इन्हें प्रकाश में लाने का श्रेय ‘लेफ्टीनेन्ट डेंजरफील्ड’ को है। सन् १८१८ ई० में सर्वप्रथम इन गुफाओं का विवरण और परिचय ‘लेफ्टीनेन्ट डेंजरफील्ड’ ने मुम्बई से प्रकाशित होने वाले ‘साहित्यिक विनिमय संघ’ की पत्रिका के द्वितीय अंक में प्रकाशित करवाया था।

‘एरिक्सन’ ने इन गुफाओं के विषय में प्रकाशित लेख पर अपनी टिप्पणियाँ लिखीं। इसके पश्चात् ‘डॉ. इम्पे’ ने इन गुफाओं का विस्तृत विवरण प्रकाशित किया।

सन् १९०७ – ०८ ई० में ‘कर्नल सी० ई० ल्यूवर्ड’ ने इन गुफाओं को देखा और मुम्बई की ‘रॉयल ऐशियाटिक सोसायटी’ की पत्रिका में सन् १९०९ ई० में एक गवेषणात्मक ( exploratory ) निबन्ध लिखा।

सन् १९१० ई० में ‘श्री असित कुमार हाल्दार’ ने और १९२५ ई० में ‘श्री मुकुल चन्द डे’ ने भी बाघ गुफाओं पर अपने-अपने विस्तृत विवरण प्रकाशित किये।

उद्देश्य

बाघ की गुफाएँ बौद्ध धर्म की महायान सम्प्रदाय से सम्बंधित हैं। यह स्थल बौद्ध धर्म का मुख्य केंद्र रही हैं। बाघ की गुफाओं का निर्माण बौद्ध भिक्षुओं के आवास, बुद्ध उपदेशों के प्रवचन और श्रवण के उद्देश्य से बनायी गयी थीं।

सुरक्षा एवं अनुकृति

भारतीय पुरातत्त्व विभाग ने इन गुफाओं की समुचित सुरक्षा का प्रबंध किया है। इसके लिए इनमें कई खिड़कियों और द्वारों को बन्द कर दिया गया। गुफाओं की सफायी करायी गयी।

तत्पश्चात् इन चित्रों की अनुकृतियों को बनाने का कार्य देश के प्रसिद्ध कलाकारों को दिया गया। इन चित्रकारों में सम्मिलित थे –

  • नन्द लाल बसु
  • असित कुमार हाल्दार
  • सुरेन्द्र नाथ कर
  • ए० बी० भोंसले
  • बी० एन० आप्टे
  • एम० एस० भाण्ड
  • बी० बी० जगपत

इसके पश्चात् आरमीनियन प्रदेश के चित्रकार ‘सरकिस कचडोरियल’ ने भी बाघ के चित्रों की अनुकृतियाँ तैयार की।

भारतीय चित्रकला : वाचस्पति गैरोला

उपर्युक्त चित्रों की प्रतिलिपियाँ आज हम ‘ग्वालियर दुर्ग के गूजरी महल’ की एक बारहदरी में देख सकते हैं।

बाघ की गुफाएँ : रचनाकाल

बाघ की गुफाएँ गुप्तकाल के श्रेष्ठतम उदाहरणों में से एक हैं। यहाँ की चित्रणशैली अजन्ता शैली की आधार रूप है। बाघ गुफाओं के निर्माण सम्बन्धित अनेक विवाद हैं। इन गुफाओं का अलग-अलग रचनाकाल निश्चित करना एक कठिन कार्य है। यहाँ की चट्टानों का पत्थर मुलायमहोने के कारण इसपर लेख उत्कीर्ण नहीं किया जा सका होगा। मुलायम प्रस्तर होने के ही कारण यहाँ पर न तो प्रस्तर अलंकरण और न ही मूर्ति का निर्माण हो पाया होगा। अतः चित्रकला ही अभिव्यक्ति का सबसे उपयुक्त माध्यम रहा होगा।

चित्रित साक्ष्य भी दुर्भाग्यवश नष्ट हो गये हैं। मात्र ‘जुलूस के चित्र’ पर ‘क’ अक्षर हिरौंजी रंग में लिखा है। श्री एम० वी० गेरडे के मतानुसारप्राचीन लिपि में ‘क’ छठी-सातवीं शताब्दी के प्रसंग में आया है और उनके अनुसार यही बाघ की गुफाओं का समय माना गया है।

कला इतिहासकार ‘विन्सेंट स्मिथ’ ने इन गुफाओं की चित्रकारी का समय सन् ६२६ – ६२८ ई० बताया है और इसको अजन्ता की पहली एवं दूसरी गुफा के समकालीन बताया है।

कलाविद् ‘फर्ग्युसन’ और ‘बर्गेस’ ने इसका निर्माण काल ३५० – ४५० ई० अथवा ४५० – ५०० ई० निर्धारित करते हैं।

पुरातत्त्व विभाग की ओर से इन गुफाओं की सफायी और जीर्णोद्धार कराते समय दूसरी गुफा में ‘महाराज सुबन्धु’ का एक ताम्रपत्र मिला। इन ताम्रपत्र से गुफाओं के निर्माण का समय निश्चित हो जाता है। ताम्रपत्र पर उत्कीर्ण चौथी-पाँचवीं पंक्ति से यह ज्ञात होता है कि यह दान कलयन ( बाघ ) नामक विहार को दिया गया था। पूर्व में ये गुफाएँ ‘कलयन’ नाम से भी पुकारी जाती रही होंगी।

इतिहासकारों ने ‘महाराज सुबन्धु’ का समय ४१६ – ४६६ ई० के मध्य माना है। इस प्रकार ताम्रपत्र से यह ज्ञात होता है कि ये गुफाएँ ‘महाराज सुबन्धु’ के समय बनकर तैयार हो गयी होंगी। अतः बाघ की गुफाओं का निर्माणकाल चौथी-पाँचवीं शताब्दी माना जा सकता है।

बाघ की गुफाएँ : संख्या व नाम

बाघ गुफाओं की कुल संख्या नौ है। सभी नौ गुफाएँ विहार ( संघाराम ) हैं। इन गुफा चित्रों को द्वार के द्वारा एक-दूसरे से अलग किया गया है।

गुफाओं के नाम :-

  • प्रथम गुफा : ‘गृह गुफा’
  • दूसरी गुफा : ‘गुसाई गुफा’ अथवा ‘पंच पाण्डू की गुफा’
  • तीसरी : ‘हाथीखाना गुफा’
  • चौथी : ‘रंग महल’
  • पाँचवीं : ‘पाठशाला’
  • छठी, सातवीं, आठवीं और नवीं गुफाओं के मार्ग अवरुद्ध हैं। अतः इन चार गुफाओं के कोई नाम प्रचलित नहीं है।

गुफाओं के चित्र

बाघ की नौ गुफाओं में से सात गुफाओं के चित्र प्रायः पूर्ण रूप से नष्ट हो चुके हैं। केवल गुफा संख्या चार व पाँच में कुछ चित्र बचे हैं, वे भी अब क्षत-विक्षत अवस्था में ही हैं।

चौथी-पाँचवीं गुफाओं से मिला हुआ एक २०० फीट का बरामदा ( दालान ) है। दूसरे शब्दों में पाँचवीं-छठी गुफा का बरामदा मिला हुआ है। इस बरामदे की छत बीस खम्भों पर आधारित थी। इस छत के गिर जाने से १५ फीट चित्रित पैनल नष्ट हो गया। इसके अतिरिक्त दर्शकों ने भी इन गुफाओं की दीवारों पर लिख कर या नुकीली चीज से खुरच कर चित्रों को क्षति पहुँचायी है।

चौथी गुफा दायीं ओर और पाँचवीं गुफा बायीं ओर है। इसके बरामदे में चौथी गुफा के बाहर की पूरी दीवार तथा पाँचवीं गुफा के बाहर की दीवार के आरम्भ होने तक के स्थान पर चित्र सबसे सुरक्षित अवस्था में था। स्थान-स्थान पर केले के पौधों का अंकन किया हुआ था।

अब एक-एक गुफा के विस्तृत विवरण देखते हैं :—

प्रथम गुफा : गृह गुफा

बाघ की पहली गुफा को ‘गृह गुफा’ भी कहा जाता है। इस गुफा का निर्माण बौद्ध भिक्षुओं के निवास हेतु किया गया था। इस गुफा में कोई मूर्ति अथवा चित्र नहीं मिलता है।

दूसरी गुफा : गुसाई या पंच पाण्डू गुफा

बाघ की दूसरी गुफा को ‘गुसाई की गुफा’ और ‘पंच पाण्डू की गुफा’ के नाम से भी जानते हैं। यह गुफा पूर्ण रूप से चित्रित की गयी थी। गुफा की दीवारों पर मानव की आकृतियों वाले संयोजन और छत पर बेल-बूटों के आलेखनों के कुछ स्फुट एवं बिखरे संदर्भ थे।

यात्रियों और साधुओं के भोजन बनाने से धुएँ और चमगादड़ आदि के कारण साथ ही संरक्षण के प्रति उदासीनता के चलते सभी चित्र काल कलवित हो गये।

तीसरी गुफा : हाथीखाना

बाघ की तीसरी गुफा को ‘हाथीखाना’ के नाम से भी जानते हैं। तृतीय गुफा का केन्द्रीय कक्ष किसी समय बुद्ध और बोधिसत्वों के चित्रों से परिपूर्ण था। किन्तु अब इन चित्रों की केवल आभा ही शेष रह गयी है।

इस गुफा के छोटे-छोटे कक्षों में भी तल पर खड़ी भगवान बुद्ध की आकृतियाँ आभा मण्डलों के मध्य बैठी हुई थीं। एक आकृति के पैर, कमल, हाथों में दीप लिए उपासक की आकृति स्पष्ट होती है। द्वार के निकट भूमि का स्पर्श करती स्त्री भी अस्पष्ट स्थिति में दिखायी देती है।

चौथी गुफा : रंग महल

बाघ की चौथी गुफा को रंग महल ( Hall of Colours ) कहा जाता है। यह गुफा चैत्याकार है। इस गुहा में पद्मासीन बुद्ध मूर्तियाँ होने के कारण ऐसा लगता है कि यह चैत्य गुफा है और यह किसी समय चित्रों से सुसज्जित रही होगी।

इसी गुफा के बाहर बरामदे में ४५ फीट लम्बा, ६ फीट चौड़ा एक टुकड़ा शेष है, जिसपर आकर्षक चित्र मिलते हैं। यह चित्रित पैनल गुफा संख्या पाँच के द्वार तक विस्तृत है। इस टुकड़े पर छः दृश्य अंकित हैं।

पहला दृश्य

चौथी गुफा के पहले दृश्य का अधिकांश भाग इस गुफा के सम्मुख भाग में प्राप्त होती हैं। इन चित्रों का सिंहावलोकन नितान्त दक्षिणी छोर से, चौथी गुफा के द्वार से, आरम्भ करने पर द्वार के ऊपर दो दृश्य अंकित दृष्टिगोचर होते हैं।

पहला दृश्य ‘वियोग’ का है। यह पहला दृश्य राजभवन के खुले प्रांगण में बैठी हुई दो युवतियों का है। इसमें से वेशभूषा के आधार पर एक राजकुमारी लगती है जबकि दूसरी सेविका। इस दृश्य में स्त्रियाँ एक झरोखे के पास चित्र के मध्य बैठी हैं।

इनमें से एक महिला शोकाकुल हैं, जो दाहिने हाथ से पल्ले से अपना मुँह छिपाकर रो रही है। बायाँ हाथ किसी बात को अभिव्यक्त करने की मुद्रा में फैला हुआ है।

दूसरी महिला सहानुभूति में उसकी ओर उदास भाव से देखती हुई सांत्वना दे रही है।

छज्जे की छत पर नीचे कबूतरों का युगल जोड़ा बैठा हैं, जो किसी प्रणय प्रसंग स्वरूप अंकित किये गये लगते हैं।

दूसरा दृश्य

दूसरा दृश्य ‘मंत्रणा’ या ‘शास्त्रार्थ’ का है। इस दृश्य में चार भद्रपुरुष सुखासन मुद्रा में नीली तथा पीली गोल गद्दियों पर बैठे किसी गम्भीर वार्ता में निमग्न हैं। चारों पुरुषों ने धारीधार अधोवस्त्र धारण कर रखे हैं। वे गले और हाथों में आभूषण धारण किये हैं। बायीं ओर दो व्यक्तियों के सिर पर मुकुट है। इनमें से पहला कोई मंत्री एवं दूसरा राजपुरुष प्रतीत होता है। हस्तमुद्राओं से संकेत, नेत्रों से चितवन और रंगों का तालमेल बहुत ही सुन्दर है।

पृष्ठभूमि के चित्रण में उद्यान या वन का संकेत मिलता है। सम्भवतः यह किसी राजपुरुष द्वारा बौद्ध धर्म स्वीकार करने से सम्बन्धित घटना है।

तीसरा दृश्य

तृतीय दृश्य में देव पुरुषों को आकाश में विचरण है करते हुए दिखाया गया हैं। इस दृश्य में छः व्यक्तियों का समूह ( गन्धर्व और कुछ भिक्षु ) आकाश में विचरण करता हुआ दर्शाया गया है; जोकि एक प्रधान आकृति ( प्रमुख धर्माचार्य उपदेश देने की मुद्रा में ) के निकट होकर कुछ वार्तालाप कर रहे हैं। सभी आकृतियाँ मुंडित-सिर हैं।

चौथा दृश्य

तीसरे दृश्य के ठीक नीचे यह दृश्य है। इसमें पाँच गायिकाओं के चित्रों में केवल कमर तक का भाग ही शेष बचा है। केन्द्र वाली स्त्री के हाथ में वीणा सदृश वाद्य यंत्र है। सभी आकृतियों ने कमर पर कसी चोलियाँ पहन रखी हैं। बाल जूड़े में बंधे हैं। चित्र में अजन्ता की भाँति ईरानी नीला रंग भरा गया है।

पाँचवाँ दृश्य

पाँचवां दृश्य ‘नृत्यांगनाओं व वादिकाओं’ का है। इसके ‘दो समूह’ अंकित हैं।

प्रथम समूह में सात नृत्यांगनाएँ हैं जो कि एक आठवीं पुरुषाकृति के चारों ओर नृत्य कर रहीं हैं। पुरुष भी नृत्यरत मुद्रा में आकर्षक रूप से अंकित है। चित्रकार ने पूरे संयोजन में तल विभाजन को सूरजमुखी पुष्प के आधार पर संयोजित किया लगता है, और साथ ही प्रभाविता के सिद्धान्त का भी पालन किया है।

दूसरे समूह में नृत्यरत मुद्रा में खड़े पुरुष की आकृति को घेरे छः स्त्री गायिकाएँ मण्डलाकार रूप में खड़ी हैं। नर्तक के बाल कन्धों पर लहरा रहे हैं। वह चुस्त कुर्ता और पतला पायजामा पहने है। छः गायिकाओं में से एक मृदंग, दो छोटे मंजीरे और शेष तीन डंडे बजा रही हैं। इनकी वेशभूषा पहले वाले दल के समान ही है। यहाँ भी प्रभाविता युक्त वर्तुलाकार संयोजन किया गया है।

इस चक्राकार नृत्य को भारतीय परम्परा में ‘हल्लीसक’ कहते हैं। हल्लीसक नृत्य परम्परा की उत्पत्ति भागवान श्रीकृष्ण की ‘रासलीला’ ये माना गया है।

भारतीय संगीत का यह उल्लासपूर्ण नृत्य गुप्तकालीन सुखमय व आमोदपूर्ण जनजीवन का संकेत देता है।

छठा दृश्य

बाघ गुफाओं में उद्यान के दीवार की दूसरी ओर कम से कम सत्रह घुड़सवारों का एक दृश्य अंकित है। ये घुड़सवार पंक्तिबद्ध हैं और बायीं ओर जा रहे हैं। यह किसी राजा का दल या शोभायात्रा या जुलूस लगता है क्योंकि दृश्य में राजकीय चिह्न, अश्वों की गति और सवारों के एकसमान पहनावे हैं। अश्वों का अंकन में स्वाभाविकता है। अश्वों की उन्नत ग्रीवाओं तथा अश्वारोहियों की मुख-मुद्राओं से ऐसा प्रतीत होता कि ये किसी विजयोल्लास में तल्लीन अपने गन्तव्य की ओर जा रहे हैं।

सातवाँ दृश्य

सातवें दृश्य के पीछे हाथियों के जुलूस का दृश्य है, जिसमें छ: हाथी और तीन घुड़सवार हैं। हाथियों पर राजपरिवार के सदस्य बैठे हैं। घोड़ों पर सैनिक सवार हैं। यहाँ कलाकार ने हाथियों के विशालकाय तन-बदन को रेखीय गति से सौन्दर्य सम्पन्न दर्शाया है। इनके पीछे दो समुह महिलाओं के हैं, जिनकी मुद्राएँ बड़ी आकर्षक हैं। दोनों दृश्यों के बीच में दीवार चित्रित है। निकट ही नदी और वनवासियों की झोपड़ियाँ अंकित किया गया है।

आठवाँ दृश्य

आठवें दृश्य के उपरान्त एक द्वार है, जिसके दूसरी ओर दूसरा दृश्य है। हालाँकि यह दृश्य पूर्णरूप से नष्ट हो गया है। ‘डॉ० इम्पे’ ने जब यह गुफा देखी थी, तब सम्भवतः यह दृश्य सुरक्षित था। उनके वर्णन के अनुसार अगला दृश्य विशिष्ट और मनोरंजक है। इसको आकृतियाँ ठीक उल्टी दिशा में देख रही हैं। इनमें चार हाथी और तीन घोड़े हैं, जो अपने गन्तव्य पर पहुँचकर विश्राम कर रहे हैं।

महावत हाथियों के मस्तक पर भुजाएँ बाँधे आराम कर रहे हैं। एक हाथी की सूंड पर कपड़ा बँधा है। दो पुरुष आकृति पैदल चल रही हैं, जिनके हाथ में भाले व तलवार हैं और जिनका ध्यान सामने बने भवन पर केन्द्रित है।

आम्र के वृक्ष के नीचे नीला कपड़ा और जल पात्र के साथ-साथ धर्मचक्र चित्रित हैं। इसके समीप ही एक केले के वृक्ष के नीचे पालथी लगाये बुद्ध अपने एक शिष्य को उपदेश दे रहे हैं।

‘डॉ० इम्पे’ का कहना है कि यह आकृति बुद्ध की न होकर सामान्य पुरुष की आकृति हो सकती है, क्योंकि यह अन्य आकृतियों से मिलती-जुलती है।

अन्य दृश्य

अन्य चित्र भी इसी दीवार पर अंकित हैं, परन्तु वे अस्पष्ट हैं। लेकिन इनको गीला करने पर देखा जा सकता है। इसमें अंकुश लिये महावत एक हाथी पर बैठा है। एक अन्य पुरुष पीछे की ओर सो रहा है। दो हाथी तथा एक अश्व भी यहाँ अस्पष्ट दिखाई दे सकते हैं। दीवार का शेष भाग वृक्षों से अंकित था और इससे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि यहाँ सम्भवत: उद्यान या वाटिका होगा। अब इन दोनों आकृतियों तथा हाथियों के जुलूस के मध्य एक श्वेत द्वार चित्रित है, जिसमें सम्भवतः उद्यान का मार्ग दिखाया गया था।२

रॉयल एशिटिक सोसाइटी की पत्रिका ( वाल्यूम – २ ) : डॉ० इम्पे

चौथी गुफा के उत्तर की ओर कुछ चित्र अवशिष्ट हैं, जो अधिक स्पष्ट नहीं हैं। इस दृश्य में दो स्त्रियाँ शोकमग्न दिखायी गयी हैं, जिनके आगे एक बालक कनखियों से देख रहा है। फिर चार नर्तकियाँ और पुनः एक दौड़ता हुआ बालक अंकित है, जो पीछे मुड़ कर देख रहा है। तत्पश्चात् बुद्ध की विशालकाय आकृति है। एक स्त्री सम्भवतः बुद्ध से प्रार्थना कर रही है और पैरों के निकट एक बालक है। इनके अलावा नाग, किन्नर व मिथुन भी चित्रित हैं।

इसी गुफा के बायीं ओर के द्वार के ऊपर का चित्र बहुत क्षत्-विक्षत् अवस्था में है। इसमें अन्य चित्रों के समान आकृतियों की पंक्तियाँ ऊपर-नीचे चित्रित की गयी हैं। बायें किनारे पर बोधिसत्व की विशाल आकृति की रेखामात्र दिखायी देती है। इसके निकट एक गिटार जैसा वाद्य यंत्र बजाती तथा एक पालथी लगाये केवल दो आकृतियाँ ही शेष हैं। इसके दायीं ओर ऊपर की पंक्ति बोधिसत्व रोगियों का उपचार करते चित्रित हैं। एक दुर्बल व्यक्ति बैठा है, दूसरा भूमि पर लेटा है, तीसरा व्यक्ति चिकित्सक को कुछ समझा रहा है।

‘डॉ. इम्पे’ के उपर्युक्त वर्णन के बाद ये आकृतियाँ अब नष्ट हो चुकी हैं।

इसी गुफा के खम्भों की पिछली पंक्ति पर अनेक सुन्दर आलेखन चित्रित हैं, जिनमें से कुछ अब धुंधले रूप में दिखायी देते हैं।

पाँचवीं गुफा

पाँचवीं गुफा में अनेक चित्र हैं; जिसमें से बुद्ध का सुन्दर चित्र अवशेष मात्र रह गया है। इसी प्रकार इसके अन्दर की पाँचों भीतरी कोठरियाँ भी चित्रों से अलंकृत थीं। इन चित्रों की आकृतियाँ, भंगिमाएँ, अलंकरण जिनमें कमल की बेल, पुष्पों और पशु-पक्षियों के साथ-साथ छोटे-बड़े फल भी यथा-स्थान चित्रित हैं। इसकी शैली अजन्ता शैली के समान है।

बाघ की गुफाओं की छत, जिन पर न जाने कितने ही चित्र बने होंगे, प्रायः नष्ट हो गये हैं। कहीं उनका प्लास्टर गिर गया है, तो कहीं वे पूर्ण रूप से गिर गये हैं। ‘कार्ल खण्डालावाला’ ने ‘मुर्गी और उसके चूजों’ का एक चित्र प्रकाशित भी किया है।

बाघ की गुफाएँ : चित्रण विधान

बाघ गुफाओं की चट्टानें भुरभुरे बलुये पत्थर की हैं। ऐसी चट्टानें शीघ्र ही नष्ट हो जाती हैं।

जहाँ तक चित्रण तकनीकी का प्रश्न है दीवारों पर लेप नहीं लगाये जाते थे। चिकनी दीवारों ( भित्ति ) पर चूने की सफ़ेदी की जाती थी और सूखने पर उसपर चित्र बनाये जाते थे। दूसरे शब्दों में भित्ति पर चूने का पलस्तर चढ़ा कर ‘टेम्परा रंगों’ से चित्रण किया गया है।

चित्रण का विधान अजन्ता से मिलता-जुलता है। कुछ चित्रों में प्रयुक्त रंग सम्भवतः उसी क्षेत्र से प्राप्त किये गये हैं, जिन्हें पीसकर गोंद मिलाकर रंगों से भरा गया प्रतीत होता है। परन्तु जिस तरह काले रंग से अजन्ता के चित्रों में खुलाई की गयी है, उसका अभाव बाघ चित्रों में दिखायी देता है।

यहाँ पर पहले रेखांकन, फिर स्थानीय रंग को समतल रूप से भरकर गोलाई और उभार देने के लिये आसपास गहरे रंगों को प्रयुक्त किया गया है।

काले, सफेद तथा हिरौंजी रंगों से उत्तम आलेखन बने हैं। लाल, नीले और पीले विरोधी रंगों का भी प्रयोग हुआ है। इस तरह यहाँ रंगों की दो शैलियाँ हैं, जो सम्भवतः दो भिन्न-भिन्न कालक्रमों की परिचायक हैं।

बाघ गुफाओं की विशेषताएँ

( १ ) जीवन के विभिन्न पक्षों का चित्रण : बाघ की गुफाओं में केवल बौद्ध धर्म का ही चित्रण नहीं हुआ है, अपितु नृत्य, गायन, अश्वारोहण, गजारोहण आदि के साथ-साथ स्त्रियों की विभिन्न अवस्थाओं, जिनमें प्रेम, विषाद, विरह जैसे- मनोभावों का भी बखूबी अंकन हुआ है।

जीवन के उल्लास व आनन्द की जितनी अभिव्यक्ति बाघ के चित्रों में है उतनी अजन्ता में नहीं पायी जाती। आकृतियों के अंग-प्रत्यंग का अनुपात, मुद्राएँ तथा संयोजन सभी अत्यन्त परिपक्व शैली की परिचायक हैं।

द बाघ केव्स, इण्डिया सोसायटी; लंदन : जेम्स एच० कर्जन

( २ ) प्रकृति का अंकन : बाघ गुफाओं में प्रकृति का अंकन बड़ा ही अद्भुत और उल्लेखनीय है। आलेखनों में फूल-पत्ती, पशु-पक्षी सभी कुछ आकर्षक ढंग से बनाये गये हैं।

मोर व चकोर, कोकिल-कपोल और शुक-सरिया सदा से ही भारतीय कला एवं साहित्य में प्रेरणा व प्रेरक संदेश वाहक व सहयोगी रहे हैं। इनका चित्रण भी बाघ गुफा के आलेखनों एवं चित्रों में यथोचित स्थान पर किया गया है।

पुष्पगुच्छों, वल्लरियों, कमल, कमलदलों का सुन्दर रेखांकन किया गया है। लता-बन्धों, लताओं का झुकाव सुन्दर ढंग से किया गया है। इसके साथ ही बीच-बीच में पक्षियों को विविध रूप से अत्यन्त रोचक ढंग से चित्रित किया गया है।

पक्षी चित्रण मनुष्य की उल्लासमयी, विषादमयी, रहस्यमयी जैसी अनेकानेक मनःस्थितियों को अभिव्यक्त करती है। ये पक्षी चित्रण कहीं-कहीं पर भरतमुनि कृति ‘नाट्यशास्त्र’ के आधार पर हैं।

हाथी को भारतीय साहित्य व कला में माँ बाल्य सूचक माना गया है, जिन्हें बाघ के आलेखनों में यथोचित स्थान मिला है।

बैल धरती की स्मृति का सूचक है।

इसीलिये पशुओं के चित्रण में बाघ के कलाकारों का दृष्टिकोण लोकमंगल की ओर अधिक रहा। इस प्रकार बाघ गुफाओं की कला ‘मध्यदेशीय कला शैली’ के चरम उत्कर्ष का दिग्दर्शन कराती है।

बाघ की कला को देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि मानो सम्पूर्ण प्रकृति, पशु-पक्षी को गोद में लिये कला के माध्यम से मुखरित हो उठी हो।

अतः संक्षेप में कहें तो बाघ के चित्रकला की निम्न विशेषताएँ हैं – प्रकृति की चित्रण, पशु-पक्षियों का चित्रण, जन-जीवन के विभिन्न पहलुओं का दृश्यांकन, नारी सौन्दर्य का चित्रण इत्यादि।

अजन्ता एवं बाघ : चित्रों की तुलना

१ – बाघ गुफा के सभी चित्र एक साथ एक ही समय बने हुए प्रतीत होते हैं, जबकि अजन्ता के चित्र लगभग ८०० वर्षों के दौरान बनाये गये विधि है। इसीलिए बाघ के चित्रों में अपेक्षाकृत शैलीगत समानता है तो अजन्ता के चित्रों में असमानता अधिक है।

२ – बाघ के बरामदे के चित्रों की उपलब्धि विशेष बात है, जबकि अजन्ता के बरामदे ध्वस्त हो चुके हैं।

३ – बाघ के चित्रों में जीवन के विभिन्न पक्षों का चित्रण हुआ है, जिनमें राजसी जीवन एवं उल्लासपूर्ण जीवन प्रमुख है। दूसरी ओर अजन्ता के चित्रों का आधार प्रायः बुद्ध धर्म है। यद्यपि दोनों स्थान बौद्ध धर्म से सम्बन्धित है परन्तु बाघ को चित्र लौकिक व धर्मनिरपेक्ष अधिक है जबकि अजन्ता के चित्र पारलौकिक व धार्मिक अधिक हैं।

४ – बाघ और अजन्ता दोनों में छतों तथा दीवारों पर कमल, मुरियों के बड़े ही सुन्दर अलंकरण बने हैं। इनमें पशु-पक्षी, पुष्प-लताओं का समावेश है। शुक, सारिका, कलहंस, मयूर, कोकिल, सारस, चकोर, गाय, वृयभ आदि सभी पशु-पक्षियों का अंकन शोभनों के साथ चित्रित किया गया है।

५ – बाघ और अजन्ता दोनों में ही नारी के आध्यात्मिक एवं शारीरिक सौन्दर्य को बखूबी दृयांकित किया गया है।

६ – बाघ में रेखा, रूप, रंग, संयोजन, भित्तिचित्रण की प्रक्रिया, वर्तनी और भावों की अभिव्यक्ति आदि सभी कुछ अजन्ता के चित्रों जैसा है।

निष्कर्ष

बाघ के चित्रों के अनुशीलन से तत्कालीन मध्य भारतीय समाज के जनजीवन का आभास मिलता है। यहाँ के चित्रों में अजन्ता की अपेक्षा व्यापकता अधिक है। बाघ के चित्र अजन्ता की तरह केवल धार्मिक ही नहीं हैं वरन् मानवोचित भावों; यथा – शान्ति, करुणा, सान्त्वना, हर्ष, विषाद आदि भावों को भी अभिव्यक्ति प्रदान करते हैं।

‘बाघ के चित्र जीवन की दैनन्दिन घटनाओं से लिये गये हैं। परन्तु वे जीवन की सच्ची घटनाओं को ही चित्रित नहीं करते वरन् उन अव्यक्त भावों को स्पष्ट कर देते हैं जिनको प्रकट करना उच्च कला का लक्ष्य है।

The Bagh Caves : Sir John Marshall

अजन्ता और बाघ की चित्रकला शैली ‘मध्यदेशीय कला शैली’ के सर्वोत्तम उदाहरण हैं। ये कला परम्परा भारतीय सीमा का अतिक्रमण करके मध्य एशिया, चीन, कोरिया, जापान, दक्षिण-पूर्व एशिया, श्रीलंका आदि स्थानों पर पहुँचीं और बौद्ध जगत् में कलात्मक गतिविधियों की प्रेरणा बनकर व्याप्त हो गयीं।

अजन्ता की गुफाएँ ( Ajanta Caves )

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