गौतम बुद्ध और महावीर स्वामी : तुलना

गौतम बुद्ध और महावीर स्वामी : तुलना

समानता

दोनों अनीश्वरवादी हैं।

दोनों ने वैदिक कर्मकाण्डों और वेदों की अपौरुषेयता के विरोधी हैं।

अहिंसा और सदाचार पर दोनों ने बल दिया है।

बुद्ध और महावीर दोनों ने कर्मवाद, पुनर्जन्म एवं मोक्ष में विश्वास करते थे।

दोनों विचारकों ने अपने-२ मतों के प्रचार के लिए भिक्षु संघों की स्थापना की थी।

दोनों के विषय में यह कहा गया है कि प्रथम वे ब्राह्मण परिवार में जन्म लेने वाले थे परन्तु बाद में इन्द्र ने गर्भ को क्षत्रिय परिवार में स्थानान्तरित कर दिया।

इसी तरह जन्म के समय ज्योतिषियों ने भविष्यवाणी की थी कि वे या तो महान् सम्राट बनेंगें अथवा महान् संत।

 

असमानता

गौतम बुद्ध ने मध्यम मार्ग का उपदेश दिया। वे मोक्ष के लिए अति सुख और अति काया-क्लेश दोनों के विरोधी थे। दूसरी ओर महावीर ने कठिन तप और काया-क्लेश को अनिवार्य बताया। यहाँ तक की मोक्ष के लिए उपवास ( संलेखना / संथारा ) द्वारा शरीर का त्याग आवश्यक बताया।

बौद्ध धर्म अनात्मवादी है जबकि जैन मत में आत्मा अनंत संख्या में है।

बौद्ध मत में संसार अनित्य है जबकि जैन धर्म में यह शाश्वत और नित्य है।

बौद्धमत इच्छा द्वारा किये गये कार्य को कर्म फल माना गया है। जैन धर्म में कर्म एक भौतिक तत्व है।

बौद्ध मत में मोक्ष इसी जीवन में सम्भव है। स्वयं बुद्ध का जीवन इसका प्रमाण है। महावीर ने निर्वाण के लिए देह-त्याग को अनिवार्य बताया है।

महावीर ने बुद्ध की अपेक्षा ‘अहिंसा’ और ‘अपरिग्रह’ पर अधिक बल दिया है। यहाँ तक की इस संदर्भ में महावीर के विचार अव्यावहारिकता की सीमा तक पहुँच जाते हैं। इसका कारण यह है कि महावीर के अनुसार आत्मा संसार के कण-कण में व्याप्त है।

महावीर ने भिक्षुओं को नग्न रहने का उपदेश दिया जबकि बुद्ध इसके विरोधी थे और उन्होंने भिक्षुओं को यथोचित वस्त्र धारण करने का निर्देश दिया था।

जाति-पाँति जैसी सामाजिक कुरीतियों का बुद्ध ने जितने कठोर शब्दों में निन्दा की उतनी महावीर ने नहीं की है। सामाजिक विषयों में महावीर के विचार ब्राह्मणों से बहुत कुछ मिलते-जुलते थे।

 

गौतम बुद्ध

महावीर स्वामी

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