एरण्डपल्ल ( Erandpalla )

भूमिका

एरण्डपल्ल ( Erandpalla or Erandapalla ) की पहचान आंध्र प्रदेश के विशाखापट्टनम् जनपद में स्थित इसी नाम के स्थान से की गयी है।

एरण्डपल्ल ( Erandpalla )
एरण्डपल्ल

एरण्डपल्ल – पहचान और विवाद

इतिहासकार फ्लीट ( J.F. Fleet ) ने एरण्डपल्ल का समीकरण खानदेश के एरण्डोल ( erandol ) नामक स्थान से किया है। के० एन० दीक्षित और वाई० आर० गुप्ते फ्लीट के इस मत से सहमत हैं।

फ्लीट के मत का विरोध —

  • जी० रामदास ने फ्लीट के मत का विरोध इस आधार पर किया है कि स्वामीदत्त के राज्य कोट्टूर के बाद वर्णित एरण्डपल्ल पश्चिमी तट पर इतनी दूर कैसे हो सकता? यह कलिंग और पिष्टपुर राज्य के आसपास रहा होगा।
  • एरण्डपल्ली का उल्लेख कलिंग के देवेन्द्रवर्मन के सिद्धान्तम् प्लेटों में मिलता है।
  • आर० डी० बनर्जी   कलिंग के तीन प्रमुखों में एरण्डपल्ल के दमन को मानते हैं जिन्होंने अपने राज्य से होकर जाते समय समुद्रगुप्त के विजयी अभियान के मार्ग को बाधित किया होगा।
  • सबसे प्रमुख बात तो यह है कि समुद्रगुप्त का दक्षिणापथ अभियान पूर्वी समुद्री तट के किनारे किनारे होते हुए था और वे उसी मार्ग से वापस भी लौटे थे। दक्कन और पश्चिम समुद्र की ओर शक्तिशाली वाकाटक साम्राज्य स्थित था। जिसका कि उल्लेख प्रयाग प्रशस्ति में नहीं मिलता है। यदि समुद्रगुप्त पूर्वी समुद्र से होते हुए दक्षिण गये होते और पश्चिमी समुद्र के किनारे होते हुए वापस आते तो निश्चित रूप से उनका वाकाटकों से युद्ध होता। परन्तु प्रशस्ति में इसका कहीं भी उल्लेख नहीं मिलता है। अतः एरण्डोल का पश्चिमी तट पर स्थित होने की बात गलत है।

डुब्रेउल ( Dubreuil ) और के० जी० शंकर इसकी पहचान ओडिशा में शिकाकोल ( Chicacole ) के निकट एरण्डपल्ली ( Erandpalli ) से की है।

डुब्रेउल के मत का खण्डन —

  • जी० रामदास ने डबरुइल के पहचान का भी खण्डन किया है। उनका कहना है कि चिकाकोले ( Chicacole ) कलिंग में स्थित है जो स्पष्टरूप से स्वामीदत्त द्वारा शासित क्षेत्र था।
  • अतः एरण्डपल्ल की पहचान विजागपट्टम् जनपद ( Vizagpatam district ) के तालुका या एलोर तालुका में एण्डापल्ली ( Endapalli ) गाँव से करनी चाहिए।
  • परन्तु यदि हम यह मान लें कि स्वामीदत्त अकेले कोट्टूर के राजा थे और पूरे कलिंग के नहीं तब एरण्डपल्ल की पहचान चिकाकोल से की जा सकती है।

एक अन्य विचारणीय तथ्य यह है कि ‘पल्ला’ शब्द ‘पल्ली’ का दूषित रूप है जिसका अर्थ है एक निवास स्थान और एरण्ड ( अरंड ) का अर्थ हैं – रेंड़ का तेल, जिससे तेल निकाला जाता है। अतः ऐसा प्रतीत होता है कि इस क्षेत्र में एरंड के पौधों की भरमार थी इसी के नाम पर इस स्थान का नाम ‘एरण्डपल्ली’ पड़ा होगा। जो बाद में ‘एरण्डपल्ल’ हो गया होगा।

सम्प्रति एरण्डपल्ल स्थान की पहचान जनपद विशाखापट्टनम् ( प्राचीन नाम विजिगापट्टम् ) आंध्र प्रदेश में स्थित इसी नाम के स्थान के साथ किया गया है। पहले कुछ विद्वानों ने पूर्व खानदेश स्थित एरण्डोल को ही एरण्डपल्ल मान बैठे थे परन्तु यह मत अब अग्राह्य है।

अतः इस स्थान की पहचान आन्ध्रप्रदेश के विशाखापट्टनम् जनपद में स्थित इसी नाम के स्थान से की गयी है।

एरण्डपल्ल का ऐतिहासिक विवरण

गुप्त सम्राट समुद्रगुप्त के प्रयाग प्रशस्ति में दक्षिण के राज्यों की सूची में एरण्डपल्ल का उल्लेख आता है। यहाँ के तत्कालीन शासक ‘दमन’ थे। अपने दक्षिण के दिग्विजय अभियान में समुद्रगुप्त ने दमन को पराजित करके अपनी सार्वभौम सत्ता स्वीकार करवायी थी।

एरण्डपल्ल और समुद्रगुप्त

दक्षिणापथ के राज्यों का उल्लेख प्रयाग प्रशस्ति के १९वीं और २०वीं पंक्ति में किया गया है :-

१९ – कौसलकमहेन्द्र-माह (।) कान्तारकव्याघ्रराज-कौरालकमण्टराज-पैष्ठपुरक महेन्द्रिरि-कौट्टूरकस्वामिदत्त एरण्डपल्लकदमन-काञ्चेय-कविष्णुगोपाव-मुक्तक—

२० – नीलराज-वैङ्गेयक हस्तिवर्मपालक्ककोग्रेसेन-देवराष्ट्रक कुबेर-कौस्थलपुरक-धनञ्जय-प्रभृति-सर्व्वदक्षिणापथराजग्रहण-मोक्षानुग्रहजनित-प्रतापोन्मि-श्रमाहा-भाग्यस्ये

समुद्रगुप्त का प्रयाग प्रशस्ति, हरिषेण।

अर्थात् “कौशल का महेन्द्र, महाकान्तार का व्याघ्रराज, कौरल का मण्टराज, पिष्टपुर का महेन्द्रगिरि, कोट्टूर का स्वामीदत्त, एरण्डपल्ल का दमन, काँची का विष्णुगोप, आवमुक्त का नीलराज, लेंगी का हस्तिवर्मन, पालक्क का उग्रसेन, देवराष्ट्र का कुबेर, कुस्थलपुर का धनञ्जय आदि सभी दक्षिणापथ के शासकों को ग्रहण ( बंदी ) करके मुक्त करने का अनुग्रह से उत्पन्न प्रताप से युक्त सौभाग्यवान था” ( वह, अर्थात् समुद्रगुप्त )।

 

इसमें दक्षिणापथ के कुल १२ राज्यों का उल्लेख मिलता है। समुद्रगुप्त का उसके दक्षिणापथ के दिग्विजयी अभियान में जिन १२ राजाओं से सामना हुआ उनके साथ ‘ग्रहणमोक्षानुग्रह’ नीति का पालन किया —

  • ग्रहण अर्थात् शत्रु शासक पर अधिकार;
  • मोक्ष अर्थात् शत्रु को मुक्त करना और
  • अनुग्रह अर्थात् राज्य को लौटाकर शत्रु दया करना।

 

इन्हीं १२ दक्षिणी राज्यों में से एरण्डपल्ल भी एक राज्य था और इसके शासक ‘दमन’ थे। जिसका उल्लेख प्रयाग प्रशस्ति के १९वें पंक्ति में मिलता है – ‘एरण्डपल्लकदमन’

 

१ – जर्नल ऑफ द रॉयल एशियाटिक सोसायटी ऑफ ग्रेट ब्रिटेन एण्ड आयरलैण्ड, लंदन; १८९८ ई०।

२ – उड़ीसा का इतिहास; आर० डी० बनर्जी।

 

 

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