भारतीय धर्म और दर्शन में ईश्वर की अवधारणा या ईश्वर-विचार ( The concept of God in Indian Religion and Philosophy )

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परिचय

भारतीय दर्शन पर धर्म की अमिट छाप है इसलिए ईश्वर का महत्वपूर्ण स्थान है। सामान्यतः ईश्वर में विश्वास को धर्म कहा जाता है। धर्म-प्रभावित भारतीय दर्शन में ईश्वर की चर्चा पर्याप्त रूप से मिलती है। चाहे वे ईश्वरवादी दर्शन हों या अनीश्वरवादी अपनी-अपनी बातों को प्रमाणित करने हेतु वे अनेकानेक युक्तियों का प्रयोग करते हैं।

भारतीय मनीषियों के अनुसार धर्म और दर्शन परमतत्त्व की खोज के साधन हैं। ईश्वर के सम्बन्ध में विचार करने से पूर्व धर्म और दर्शन के सम्बन्ध पर विचार करना आवश्यक है।

धर्म और दर्शन का सम्बन्ध

धर्म का उद्भव मनुष्य के आध्यात्मिक पिपासा को शांत करने के उद्देश्य से हुआ है। मानव स्वयं को अपूर्ण, संकीर्ण व अभावग्रस्त पाता था, साथ ही दुःखी व भयग्रस्त रहता था। इन सभी के समाधान के रूप में उसने धर्म का आश्रय लिया। अभाव और अपूर्णता का निदान भौतिक संसाधनों से नहीं हो सकता इसलिये मानव ने आध्यात्मिकता की राह चुनी और कुछ मूल्यों का आविष्कार करके उनको अपनी दिनचर्या में शामिल करके अंतःकरण को तुष्ट करना शुरू कर दिया। यही मूल्य शनैः शनैः रूढ़ होकर धर्माचरण बनते गये जिनमें समयानुकूल सुधार और परिष्कार किये जाते रहे हैं।

इन धर्माचरण के तहत शारीरिक-मानसिक शुद्धि, कर्मकाण्ड, तत्त्व चिंतन आदि आते हैं।

धर्म शब्द की व्युत्पत्ति ‘धृ’ धातु से हुई है। इस सम्बन्ध में कहा गया है – ‘धारणपोषणयोः’ अर्थात् धारण और पोषण करना। दूसरे शब्दों में जिस तत्त्व से पदार्थ का अस्तित्त्व है वही उस पदार्थ का धर्म है।

‘Tagore and Radha Krishanan point out that the concept of Dharma literally stands for a sort of a bringing out the most and the essential nature of the object. It is in this the capacity to produce heat, is said to be the dharma of fire and that waterness is said to be the dharma of water.’

Contemporary Indian Philosophy-Basant Kumar Lal

अर्थात् जिस तरह वस्तु या पदार्थ का गुण-धर्म होता है उसी तरह मनुष्य का भी गुण-धर्म होता है। किसी वस्तु या पदार्थ या मनुष्य के अस्तित्व का आधार धर्म है, बिना धर्म के अस्तित्व की कल्पना सम्भव नहीं है।

धारणात् धर्म इत्याहुः धर्मो धारयति प्रजा।

यः स्यात्धारणसंयुक्तः स धर्म इति निश्चयः॥’

अर्थात् जो धारण करता है, एकत्र करता है, अलगाव को दूर करता है उसे धर्म कहते हैं। ऐसा धर्म प्रजा को धारण करता है। जिसमें प्रजा को एकसूत्रता में बाँध देने की क्षमता है वह निश्चय ही धर्म है।

महाभारत 

दर्शन शब्द की व्युत्पत्ति ‘दृश्’ धातु में ‘ल्युट्’ ( अन ) प्रत्यय लगाने से हुई है। दृश् का अर्थ होता है – देखना या जिसके द्वारा देखा जाय। यहाँ प्रश्न उठता है क्या देखा जाय? उत्तर है – ‘दृश्यते यथार्थ तत्त्वमनेन’ अर्थात् जिसके द्वारा यथार्थ तत्त्व की अनुभूति हो वही दर्शन है। या ‘ज्ञायते आत्मतत्त्वं येन तद्दर्शनम्’ अर्थात् जिसके द्वारा मूलतत्त्व का बोध हो उसे दर्शन कहते हैं। या ‘दृश्यते अनेन इति दर्शनम्’  अर्थात् जो देखा या जाना जाय वह दर्शन है।

दर्शन से हमें सम्यक् दृष्टि मिलती है जिससे अज्ञान ( ignorance ) से मुक्ति मिलती है। अज्ञानता से मुक्ति प्राप्त होने पर मानव सांसारिक बंधनों या दुःखों से मुक्त होकर परमतत्त्व का साक्षात्कार कर लेता है और आवागमन के बंधन से मुक्ति ( liberation ) पा लेता है।

‘सम्यक्दर्शनसम्पन्नः कर्मभिर्ननिबध्यते।

दर्शनेनविहीनस्तुसंसारंप्रति गच्छति॥’

मनुस्मृति

उपर्युक्त विवेचन  यह स्पष्ट होता है कि धर्म और दर्शन दोनों का परम उद्देश्य मानव या जीव को सांसारिक दुःखों से मुक्ति दिलाकर परमतत्त्व से साक्षात्कार कराना है।

बी० के० लाल के शब्दों में — ‘It some how believes that life is full of suffering and that the aim of religion andphilosophy is to attain freedom from suffering.’

धर्म और दर्शन की पद्धतियाँ में अंतर है। दर्शन की पद्धति बौद्धिक है जबकि धर्म की पद्धति अंतर्बोध या विकास पर आधारित है।

रमाकान्त त्रिपाठी के शब्दों में –

While philosophy is based on reason, religion, depends on revelation the one demands clear perception, the other demands unconditional surrender and obedience.’

Spinoza in the light of the Vedanta.

दर्शन किसी विषय को तर्क-वितर्क के आधार पर जाँचता-परखता है जबकि धर्म श्रद्धा, विश्वास और आस्था पर आधारित है। दर्शन तर्कबुद्धि और विवेक की विषयवस्तु है जबकि धर्म आस्था और विश्वास की।

स्वामी विवेकानन्द ने इसको इस तरह कहा है –

Faith in ourselves, faith in God this is the secret of greatness.’

His call to the nation.

धर्म और दर्शन दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। ये दोनों एक ही परम-तत्त्व की ओर संकेत करते हैं।

संस्कृत-हिन्दी शब्दकोष में दर्शन का अर्थ यह बताया गया है – धार्मिक ज्ञान या शास्त्रोक्त सिद्धान्त।

संस्कृत-हिन्दी कोष – वामन शिवराम आप्टे।

भारतवर्ष में धर्म और दर्शन साथ-साथ गलबँहियाँ डालकर चलते हैं; यथा – जैन धर्म और जैन दर्शन, बौद्ध धर्म और बौद्ध दर्शन, वेदान्त दर्शन और वेदान्त धर्म।

भारतीय चिंतनधारा ( धर्म और दर्शन ) के केंद्र में परमतत्त्व / ईश्वर है। ईशावास्योपनिषद् के अनुसार ‘ईशावास्यामिदं सर्वं यत्किंचजगत्या जगत्’ अर्थात् समस्त संसार में जो कुछ भी है, सर्वत्र ईश्वर व्याप्त है।

भारतीय दर्शन का प्रस्थान बिन्दु वेद है

भारतीय धर्म और दर्शन का मूल स्रोत वेद है। भारतीय सभ्यता और संस्कृति का अलिखित इतिहास प्रागैतिहासिक काल से ही शुरू होता है जबकि लिखित इतिहास वेदों से प्रारम्भ होता है। वेदों में ही धर्म व दर्शन बीजरूप से मिलता है।

भारतीय मतानुसार वेद अपौरुषेय, अनादि और अनित्य हैं। ऋग्वेद के पुरुषसूक्त में लिखा गया है कि – ‘ऋचः सामानिजज्ञिरे’ अर्थात् विराट पुरुष से वेद की उत्पत्ति हुई है। ईश्वर सम्बन्धी विचार वेदों में सूत्रात्मक रूप में विद्यमान हैं।

ऋग्वेद में अनेकेश्वरवाद, एकेश्वरवाद, त्रयेश्वरवाद, एकवाद इत्यादि सिद्धान्तों का किसी न किसी रूप में उल्लेख मिलता है।

अनेकेश्वरवाद – ऋग्वेद में अनेक देवी-देवताओं की स्तुति की गयी है; यथा – इंद्र, वरुण, अग्नि, ऊषा, अरण्यायनी इत्यादि। इसी को बहुदेववाद या अनेकेश्वरवाद कहा गया है। वैदिक आर्यों ने विभिन्न प्राकृतिक शक्तियों का मानवीकरण करके उनकी पूजा की। इंद्र, वरुण, सूर्य, अग्नि, नदी, ऊषा, अरण्यानी इत्यादि सभी प्राकृतिक शक्तियों के प्रतीक हैं। इसलिए इसे प्राकृतिक अनेकेश्वरवाद ( Naturalistic Polytheism ) भी कहा गया है।

त्रयेश्वरवाद – अनेक देवताओं से अव्यवस्था होती थी अतः इनकों तीन वर्गों में व्यवस्थित किया गया।

  • पृथ्वी के देवता – पृथ्वी, अग्नि, सोम आदि।
  • अन्तरिक्ष के देवता – इन्द्र, रुद्र, प्रजापति आदि।
  • द्युलोक ( आकाश ) के देवता – वरुण, सूर्य, पूषन्, विष्णु आदि।

एकेश्वरवाद – ऋग्वेद के अनुसार भिन्न-भिन्न देवता एक ही परमतत्त्व / ईश्वर के विभिन्न नाम और रूप हैं — ‘यो देवानां नामधा एक एव तं सम्प्रश्नं भुवना यंत्यन्या।’ एकेश्वरवाद का अर्थ है कि ईश्वर ही परम सत्ता ( Ultimate Reality ) है एवं वह एक है। ईश्वर जगत् में व्याप्त है और उससे परे भी है। एक ही ईश्वर विभिन्न देवी-देवताओं के रूप में अभिव्यक्त होता है।

सहस्रशीर्षा पुरुषः साहस्राक्षः सहस्रपात्।

स भूमिं सर्वस्वपृत्तवात्यतिष्ठद्दशाड्गुलम्॥

पुरुषसूक्त-ऋग्वेद।

यहाँ पर ईश्वर को पुरुष कहा गया है। ‘पुरुष के सहस्र मस्तक हैं, सहस्र आँख हैं और सहस्र पैर हैं। वह समस्त पृथ्वी में व्याप्त है एवं उससे दस अंगुल परे भी है।’

एकवाद – एकेश्वरवाद कालान्तर में एकवाद में विकसित हुआ। इस सिद्धान्त में ईश्वर को निर्गुण माना गया है। उसको ब्रह्म कहा गया है। वही सर्वोच्च सत्ता है। ‘एकम् सद् विप्रः बहुधा बदन्ति।’ ( ऋग्वेद )

बहुदेववाद से एकेश्वरवाद

ऋग्वैदिक आर्यों के घुमंतू जीवन में उनका सर्वाधिक सामना प्रकृति की विभिन्न शक्तियों से होता था। अतः उन्होंने इन प्राकृतिक शक्तियों का मानवीकरण कर पूजा करनी शुरू कर दी। इस तरह बहुदेववाद की शुरुआत हुई।

प्रारम्भ में यह प्रवृत्ति दिखती है कि आर्यों ने जिस देवता की स्तुति की उसे ही सर्वोच्च मान लिया। इस प्रवृत्ति को मैक्समूलर हेनोथीज्म ( Henotheism ) या कैथेनोथीज्म ( Kathenotheism ) कहते हैं। इसे ‘अवसरवादी ऐकेश्वरवाद’ भी कहा जा सकता है।

कालांतर में ऋग्वैदिक आर्यों ने स्वयं यह प्रश्न उठाया कि, ‘कस्मै देवाय हविषा विधेम’ अर्थात् किस देवता के लिए हवि का विधान किया जाय?

इस जिज्ञासा में देवताओं की संख्या कम होने लगी; जैसे-

  • आकाश व पृथ्वी मिलकर ‘द्यावापृथ्वी’ हो गये;
  • मित्र व वरुण ‘मित्र-वरुण’;
  • ऊषा व रात्रि मिलकर ‘ऊषा-रात्रि’ हो गये और
  • मरुतों, अश्विन्, व आदित्य की एक श्रेणी बन गयी।

परन्तु यह क्रम रुका नहीं। ऋषियों को तो परमतत्त्व तक की यात्रा करनी थी। बहुदेववाद ( Polytheism ) से ऐकेश्वरवाद की यह यात्रा जाकर ऋग्वेद के १०वें मण्डल के नासदीय सूक्त में पहली बार अखिल ब्रह्म की कल्पना में साकार हुई :-

“एकम् सद् विप्राः बहुधा बदन्ति।
अग्निं यमं मातारिश्वानमाहुः॥”

( अर्थात् सत् या परमतत्त्व एक है जिसे ज्ञानीजन अग्नि, यम, मातरिश्वा इत्यादि नामों से जानते हैं। )

सर्वेश्वरवाद और एकत्ववाद

ऋग्वेद में परमतत्व सम्बंधी विचार दो रूपों में मिलते हैं :—

  • सर्वेश्वरवाद ( Pantheism ) – इसका विवेचन ऋग्वेद के १०वें मण्डल के नासदीय-सूक्त में मिलता है। इसके अनुसार सृष्टि के आदि में एक ही परमतत्त्व था। उससे सृष्टिकर्ता की उत्पत्ति हुई। वही सम्पूर्ण सृष्टि में व्याप्त है।
  • एकत्ववाद ( Monism ) – इसका विवेचन ऋग्वेद के १०वें मण्डल के पुरुष-सूक्त में मिलता है। इसमें कहा गया है कि सृष्टि का मूल तत्व विराट् पुरुष है। वह विश्व में व्याप्त होते हुए भी उससे कुछ अंशों में परे है।

वैदिककाल के उत्तरवर्ती समय अर्थात् उत्तर-वैदिककाल विशेषकर उपनिषदों में भारतीय चिंतन का सर्वोच्च स्तर देखने को मिलता है। यहाँ पर ईश्वर का स्थान गौण हो जाता है और उसका स्थान पर ब्रह्म को परमतत्त्व के रूप में स्वीकार किया गया है। वैदिक देवता जो कि ऋग्वैदिक काल के अंतिम समय में विलीन होना शुरू हुए थे वे एक-एक करके पृष्ठभूमि में चले गये और यहाँ पर आत्मा व ब्रह्म उपनिषद् चिंतन का प्रमुख विषय हो गये।

देवताओं को ब्रह्म का प्रकाशवान रूप माना गया और वे अपनी सत्ता के लिए ब्रह्म पर निर्भर करते थे। ईश्वर का स्वतंत्र अस्तित्व जाता रहा। देवताओं को उपनिषद् चिंतकों ने द्वारपालों के रुप में चित्रित करके उनकी निर्भरता को स्पष्ट करता है।

उपनिषद् – यहाँ पर आत्मा, जगत् और ब्रह्म का बहुत ही सूक्ष्म विवेचना मिलती है। यहाँ पर ईश्वर के निर्गुण और सगुण दोनों रूपों की विवेचना मिलती है। यहाँ पर आत्मा और ब्रह्म को एक बताया गया है – ‘अयमात्मा ब्रह्म’ ( बृहदारण्यक उपनिषद )। आत्मा ( जीव ) और ब्रह्म का अभेद अद्वैत कहलाता है। जीवों की रक्षा करने वाले स्वरूप को सगुण ईश्वर कहा गया है। ‘नित्यो नित्यानाम् चेतनः चेतानाम्। एको बहूनां यो विद्धाति कामान्॥’ ( श्वेताश्वरोपनिषद् )। ऐसे सूत्र उपनिषदों में बहुतायत मिलते हैं। ऐसे ही विचारों के आधार पर विभिन्न दार्शनिक साम्प्रदायों का विकास हुआ।

उपनिषद् विचारधारा में ईश्वर के वस्तुनिष्ठ विचार का खंडन किया गया है; जिसमें उपासक और उपास्य के मध्य भेद वर्तमान रहता है। बृहदारण्यक उपनिषद् में यह कहा गया है कि जो व्यक्ति ईश्वर की उपासना यह सोचकर करते हैं कि वह ईश्वर से भिन्न है; वह ज्ञान से शून्य है। यद्यपि ईश्वरवाद, उपनिषद् की विचारधारा से संगति नहीं रखता है तथापि श्वेताश्वतर और कठ उपनिषदों में ईश्वरवाद की झलक मिलती है। यहाँ पर ईश्वर को मनुष्य से पृथक माना गया है और ईश्वर-भक्ति को मोक्ष का साधन माना गया है।

उपनिषदों में ब्रह्म के दो रूपों का वर्णन है :—

  • पर ब्रह्म ( Absolute ) : पर ब्रह्म असीम, निर्गुण और निष्प्रपञ्च है।
  • अपर ब्रह्म ( God ) : अपर ब्रह्म अर्थात् ईश्वर सीमित, सगुण और सप्रपञ्च है। ईश्वर को उपनिषदों में सबका प्रकाशक और कर्मों का अधिष्ठाता कहा गया है। वह स्वम्भू और जगत् का कारण है। माया ईश्वर की शक्ति है। वह विश्वव्यापी ( immanent ) और विश्वातीत ( transcendent ) दोनों माना गया है।

श्रीमद्भागवदगीता – यहाँ पर एक व्यक्तिपूर्ण सगुण ब्रह्म की आराधना पर बल दिया गया है। उसे पुरुषोत्तम कहा गया है। वह सर्वशक्तिशाली, सर्वज्ञ, दयालु, विराट और असीम है। वह सदैव भक्तों की पुकार सुनता है –

अनेकबाहूदरवक्त्रनेत्रं पश्यामि त्वां सर्वतोऽनन्तरूपम्।

नान्तं न मध्यं न पुनस्तवादिं पश्यामि विश्वेश्वर विश्वरूप॥’

गीता के अनुसार जब-जब धर्म की हानि होती है एवं अधर्म का उत्थान होता है, तब-तब ईश्वर अवतार लेकर अधर्मियों का नाश करके धर्म की स्थापना करते हैं –

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लनिर्भवति भारत।

अभ्युत्थानमधर्मस्य तादामानं सृजाम्यहम्॥

परित्राणाय् साधूनाम् विनाशाय च दुष्कृताम्।

धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे॥

श्रीमद्भागवदगीता में ईश्वरवाद और सर्वेश्वरवाद का संयोजन मिलता है। यहाँ ‘विश्व रूप दर्शन’ नामक अध्याय में सर्वेश्वरवाद का विचार मिलता है। यहाँ ईश्वर को अक्षर, परम-ज्ञानी, जगत् का परम निधान और सनातन पुरुष कहा गया है। वह जगत् में पूर्णतः व्याप्त है- जैसे; दूध में उज्ज्वलता व्याप्त है। यद्यपि गीता में सर्वेश्वरवाद मिलता है फिरभी गीता की मुख्य प्रवृत्ति ईश्वरवाद ही है। अतः ईश्वरवाद को गीता का केन्द्र बिन्दु माना गया है।

ईश्वर परम सत्य है। वह विश्व की नैतिक व्यवस्था को कायम करता है। जीवों को उनके कर्मानुसार वह सुख-दुःख प्रदान करता है। ईश्वर कर्मफल दाता है। वह सब का पिता, माता मित्र एवं स्वामी हैं। वह सुंदर भी हैं और भयानक भी।

गीता के कुछ श्लोकों में ईश्वर को विश्व में व्याप्त तो कुछ में विश्व से परे बताया गया है। गीता के अनुसार ईश्वर व्यक्तित्वपूर्ण है। यद्यपि ईश्वर व्यक्तित्व-पूर्ण है, तथापि वह असीम है। यहाँ पर ईश्वर के व्यक्तित्व एवं असीमिता के बीच समन्वय या संयोजन मिलता है।

ईश्वर उपासना का विषय है। भक्तों के प्रति ईश्वर विशेष कृपा रखता है। वह अपराधियों को क्षमा भी कर सकता है। गीता में स्पष्ट रूप से श्रीकृष्ण कहते हैं कि सभी धर्मों को त्याग कर मेरी शरण में आओ, मैं तुम्हें सभी पापों से मुक्त कर दूंगा। गीता अवतारवाद को सत्य मानती है। जब-जब संसार में धर्म की हानि होती है और अधर्म बढ़ जाता है तब-तब ईश्वर अवतार ले करके धर्म की स्थापना और अधर्म का विनाश करता है। अवतारवाद गीता की अनुपम देन है।

श्रीमद्भागवदगीता में ईश्वर को पुरुषोत्तम कहा गया है। ईश्वर परम-ब्रह्म है। वह प्रकृति और पुरुष दोनों से परे है। यहाँ पर परम-ब्रह्म के दो स्वरूपों का वर्णन मिलता है :—

  • एक, व्यक्त और
  • दूसरा, अव्यक्त।

गीता में इसे इस तरह कहा गया है। ‘प्रकृति मेरा स्वरूप है।’ ‘जीवात्मा मेरा ही सनातन अंग है।’ यहाँ पर ईश्वर के अव्यक्त रूप का इस प्रकार वर्णन इस तरह मिलता है।’ ‘यह परमात्मा अनादि, निर्गुण और अव्यक्त है, इसलिए शरीर में स्थित रहकर भी यह न तो वह कुछ करता है और न लिपायमान होता है।’

यद्यपि गीता में परमात्मा के दोनों स्वरूपों – व्यक्त और अव्यक्त का वर्णन मिलता है, फिर भी गीता में व्यक्त स्वरूप की अपेक्षा अव्यक्त स्वरूप को महत्त्वपूर्ण माना गया है। श्रीमद्भागवदगीता में श्रीकृष्ण स्पष्ट रूप से कहते हैं कि मेरा व्यक्त स्वरूप माया-युक्त है तथा अव्यक्त रूप जो इंद्रियों को अगोचर है, वही मेरा सत्य स्वरूप है। गीता में कहा गया है कि व्यक्त ब्रह्म की अपेक्षा अव्यक्त ब्रह्म श्रेष्ठ है। मेरा सच्चा स्वरूप सर्वव्यापी, अव्यक्त और नित्य है। उसको सिद्ध पुरुष पहचानते हैं।

श्रीमद्भागवदगीता के दार्शनिक विचारों के पश्चात वो समय आता है जब दर्शन का विकास विभिन्न दिशाओं में होता है। मोटे तौर पर भारतीय दर्शन को दो वर्गों में बाँटा जा सकता है —

  • आस्तिक – वे दर्शन जो वेद सम्मत हैं। इसके तहत षड्दर्शन आते हैं :
    • सांख्य दर्शन
    • योग दर्शन
    • न्याय दर्शन
    • वैशेषिक दर्शन
    • मीमांसा ( पूर्व-मीमांसा ) दर्शन
    • वेदांत ( उत्तर-मीमांसा ) दर्शन
  • नास्तिक – वे दर्शन जो वेद को प्रमाण नहीं मानते हैं। इसके तहत तीन दर्शन आते हैं :
    • चार्वाक दर्शन
    • बौद्ध दर्शन
    • जैन दर्शन

इस प्रकार भारतीय दर्शन का कुल नौ सम्प्रदायों में विकास हुआ है। इन सभी दार्शनिक मतों में ईश्वर के अस्तित्व या अनस्तित्व पर विचार किया गया है। जिसपर हम क्रमशः एक-एक करके विचार करते हैं।

नास्तिक दर्शनों में ईश्वर की अवधारणा

चार्वाक दर्शन में ईश्वर-विचार

चार्वाक के तत्त्व-विचार उनके प्रत्यक्ष प्रमाण पर अवलंबित हैं। उनके अनुसार प्रत्यक्ष ही एकमात्र प्रमाण है अतः चार्वाक मात्र उन्हीं वस्तुओं को मानते हैं जिनका प्रत्यक्ष ज्ञान होता है।

ईश्वर, आत्मा, स्वर्ग, जीवन का नित्य होना, अदृष्ट ( भाग्य ) आदि को चार्वाक सिरे से नकार देते हैं क्योंकि इनका कोई प्रत्यक्ष ज्ञान नहीं होता है।

हम केवल जड़-द्रव्यों का प्रत्यक्ष अनुभव करते हैं इस आधार पर चार्वाक कहते हैं कि ‘जड़ ही एकमात्र तत्त्व है।’ इस मत को जड़वाद कहते हैं।

वे ईश्वर को एक कपोल-कल्पना मानते हैं। वे ईश्वर के लिए निर्मम शब्दों का प्रयोग करते हैं। ईश्वर-प्रेम ( भक्ति ) या उससे डरना एक काल्पनिक या भ्रमात्मक तथ्य है।

चार्वाक के अनुसार बुद्धि, पौरुषहीन ब्राह्मणों ने स्वार्थसिद्धि के लिए ईश्वर की कल्पना की है।

‘अग्निहोत्रं त्रयो वेदा त्रिदण्डं भष्मगुंठमनम।

बुद्धिपौरुषहीनानां जीविकेति वृहस्पतिः॥’

सर्वदर्शन संग्रह

चार्वाक के अनुसार जगत् का निर्माण चार भूतों पृथ्वी, पानी, हवा और अग्नि के स्वतः संयोजन से हुआ है। चार्वाक दर्शन निरीश्वरवादी होने के कारण इसमें यज्ञ, तपस्या, प्रार्थना, बलि इत्यादि का कोई स्थान नहीं है। यहाँ पर स्वर्ग-नरक, पाप-पुण्य, धर्म-अधर्म इत्यादि की कोई मान्यता नहीं है।

इस तरह चार्वाक मत अनीश्वरवादी, अनात्मवादी और जड़वादी हैं।

चार्वाक दर्शन या लोकायत दर्शन

बौद्ध दर्शन में ईश्वर-विचार

सैद्धांतिक रूप से बौद्ध दर्शन अनीश्वरवादी है। बुद्ध ने अपने अनुयायियों को ईश्वर संबंधी विचार पर अनुत्साहित किया है। बुद्ध के अनुसार, ईश्वर प्रेम एक ऐसी रमणी से प्रेम है जिसका अस्तित्व है ही नहीं। उनके अनुसार ईश्वर को विश्व का कारण मानना भ्रम है। बुद्ध के दर्शन का सार प्रतीत्यसमुत्पाद है। उन्होंने अपने शिष्यों को ‘अपो दीपो भव’ का संदेश दिया।

बौद्ध दर्शन अनीश्वरवादी है। इस विचारधारा में जगत् का संचालन प्रतीत्समुत्पाद के द्वारा होता है। इस कार्य-कारण सिद्धान्त से सभी कुछ संचालित होते हैं। जगत् परिवर्तनशील और अनित्य है क्योंकि बुद्ध ने अनित्यवाद और क्षणिकवाद को स्वीकार किया है।

नित्य, अपरिवर्तनशील एवं असीम ईश्वर अनित्य, क्षणभंगुर, परिवर्तनशील और ससीम विश्व का स्रष्टा कैसे हो सकता है? जगत् का रचयिता और संचालक ईश्वर को नहीं माना जा सकता है।

यदि ईश्वर को जगत् का स्रष्टा माना जाये तो एक स्वाभाविक प्रश्न उठता है कि इस निरंतर परिवर्तनशील और नश्वर जगत् की रचना उसने क्यों की? इस प्रश्न का कोई संतोषजनक समाधान नहीं मिलता है।

सैद्धांतिक रूप से बौद्ध दर्शन में ईश्वर के अस्तित्व को नकारा गया। बुद्ध ईश्वर के विषय में मौन रहे। वे अपने अनुयायियों को ईश्वर पर आश्रित रहने की सलाह नहीं देते हैं। बुद्ध ने अपने अंतिम सम्बोधन में कहा कि ‘सभी संघातिक वस्तुओं का विनाश होता है। स्वयं की मुक्ति के लिए उत्साहपूर्वक प्रयास करो।’

व्यावहारिक रूप से ईश्वर के अस्तित्व पर विचार किया गया। कालांतर में बौद्ध दर्शन के दो मुख्य संप्रदायों का विकास हुआ —

  • एक; महायान
  • द्वितीय; हीनयान।

हीनयान बौद्ध दर्शन का शुद्ध रूप है जिसमें ईश्वर को नहीं माना गया है  अर्थात् अनीश्वरवादी है। जबकि महायान संप्रदाय में बुद्ध की ईश्वर मानकर उनकी प्रतिष्ठा की गई और वह लोकप्रिय हुआ।

बौद्ध दर्शन

जैन दर्शन में ईश्वर-विचार

जैन दर्शन अनीश्वरवादी है। जिस तरह ईश्वरवादियों ने ईश्वर के अस्तित्व को प्रमाणित करने के लिए अनेक युक्तियों का प्रयोग किया है। जैनियों ने उन युक्तियों की त्रुटियों ओर संकेत करते हुए ईश्वर जैसी सत्ता को नकारा है।

जैनियों ने स्पष्ट रूप से कहा है कि जगत् का स्रष्टा ईश्वर को मानना भ्रमात्मक है। ईश्वर को स्रष्टा मान लेने पर सृष्टि के प्रयोजन की समुचित व्याख्या नहीं हो पाती है। इस सम्बन्ध में यह तर्क सामने रखा गया कि —

  • चेतन प्राणी जो भी कर्म या कृत्य करता है वह स्वार्थ या करुणा की प्रेरणा से करता है।
  • जबकि ईश्वर स्वार्थ के वसीभूत होकर कोई भी कृत्य नहीं कर सकता है क्योंकि वह पूर्ण है।
  • दूसरी ओर वह करुणा से प्रेरित होकर भी जगत् निर्माण नहीं कर सकता है क्योंकि संसार से पूर्व करुणा का भाव उदित नहीं हो सकता है।
  • अतः ईश्वर जगत् का स्रष्टा नहीं हो सकता है।

यद्यपि जैनियों ने प्रत्यक्ष रूप से ईश्वर के अस्तित्व का निषेध किया है तथापि वे अप्रत्यक्ष रूप से ईश्वर पर विचार करते हैं। जैनियों ने तीर्थंकरों को ईश्वर सदृश माना है। तीर्थंकर मुक्त होते हैं। जैन दर्शन में पंच परमेष्टि को मान्यता दी गयी है जो इस प्रकार हैं —

  • अर्हत्
  • सिद्ध
  • आचार्य
  • उपाध्याय
  • साधु

जैन दर्शन अनीश्वरवादी है। ईश्वर का ज्ञान तो प्रत्यक्ष और न ही अनुमान से होता है। परन्तु जैन दर्शन में उपासना को अस्वीकार नहीं किया गया है। यहाँ पर पञ्च महाव्रत के पालन का अनुदेश दिया गया है। चूँकि यह मूल्यों को प्राथमिकता देती है इसलिए इसको धर्म की श्रेणी में रखा गया है। कहा जाता है कि धर्म के लिए ईश्वर की आवश्यकता होती है इसलिए अन्य मतों की भाँति यहाँ पर भी ईश्वर-विचार आ गया है। इस तरह जैन दर्शन और बौद्ध दर्शन के तत्त्व मीमांसा में मौलिक भेद है।

‘There are fundamental difference between the ontology of Jainism and that of Buddhism. Jainism believes in the eternal souls (Jiva) while Buddhism rejects them.’

J.P.Sinha – A History of Indian Philosophy.

जैन मत भले ही अनीश्वरवादी है परन्तु वह आत्मवादी है। यहाँ पर मुक्त आत्मा को ही ईश्वर कहा गया है।

‘The Jain as do not believe god as the creator of universe, infact each liberated soul is a god or parmatma’

Dr. Sohan Raj tated.

जैन मत में तीर्थंकरों को ही ईश्वर बना कर उपासना की जाने लगी। अतः कालान्तर में जैन मत ईश्वरवादी बन गया है।

जैन दर्शन

आस्तिक दर्शनों में ईश्वर की अवधारणा

न्याय दर्शन में ईश्वर-विचार

न्याय दर्शन ईश्वरवादी है। वह ईश्वर के अस्तित्व के प्रमाण के लिए विभिन्न युक्तियों का प्रयोग करता है। जैसे ;

  • कारणाश्रित तर्क ( casual proof ) : सृष्टि एक कार्य है और प्रत्येक कार्य का कोई न कोई कर्त्ता अवश्यमेव होना चाहिए। ईश्वर ही सृष्टि का वही चेतन कर्त्ता है। जैसे एक घड़े का निर्माता एक कुम्भकार होता है ठीक उसी तरह जगत् का निर्माण ईश्वर द्वारा होता है। अतः ईश्वर का अस्तित्व सिद्ध है। अर्थात् जगत् कार्य है और ईश्वर कारण।
  • नैतिक प्रमाण : प्रत्येक जीवात्मा अपने शुभ और अशुभ कर्मों से धर्म व अधर्म का अर्जन करते हैं। शुभ कर्मों से धर्म जबकि अशुभ कर्मों से अधर्म का संचय होता है। ईश्वर ही इस धर्म और अधर्म का अधिष्ठाता है। ईश्वर ही जीवात्मा को उनके शुभाशुभ कर्मानुसार फल ( सुख या दुःख ) को देता है। इस तरह नैतिक जगत् के नियंता स्वरूप ईश्वर की सत्ता है। ईश्वर के अस्तित्व के लिए यह ‘नैतिक प्रमाण’ है।
  • वेद एक प्रमाणिक रचना है : नैयायिकों ने वेदों को प्रमाण माना है क्योंकि वेद ईश्वर की रचना है। इस आधार पर भी ईश्वर का अस्तित्व प्रमाणित होता है।
  • वेद प्रमाण : वेद ईश्वर के अस्तित्व का कथन प्रमाणित करते हैं अतः वह अस्तित्वान है।

नैयायिकों ने ईश्वर पर पर्याप्त रूप से विचार किया है। ईश्वर संसार का स्रष्टा है। संसार का सृजन ईश्वर शून्य से नहीं करता है बल्कि इसका निर्माण वह नित्य परमाणुओं, दिक्, काल, आत्मा और मन से करता है।

यह ध्यातव्य है कि यद्यपि ईश्वर संसार की सृष्टि विभिन्न द्रव्यों से करता है तथापि उसकी शक्ति सीमित नहीं होती है। इन द्रव्यों के ईश्वर से वही सम्बन्ध है जो शरीर के साथ आत्मा का है।

इस तरह ईश्वर जगत् का स्रष्टा, संचालक ( पोषक ) और संहर्ता है। जब-जब जगत् में अनैतिकता और अधर्म व्याप्त हो जाता है तो वह जगत् का संहार कर देता है। इस तरह वह संसार के संहार के पीछे नैतिक और धार्मिक अनुशासन का मन्तव्य होता है।

ईश्वर कर्मफलदाता भी है। वह जीवात्माओं के शुभाशुभ कर्मों के अनुसार सुख-दुःख प्रदान करता है। कर्मों का फल प्रदान करके वह जीवात्माओं को कर्म हेतु प्रेरित करता है।

नैयायिकों का ईश्वर व्यक्तित्वपूर्ण है। उसमें ज्ञान, सत्ता और आनन्द निहित हैं।

वह दयालु भी है। ईश्वर-कृपा से जीवात्माओं को मोक्ष मिलता है। तत्त्व-ज्ञान के आधार पर जीवात्माएँ मोक्ष की कामना करती हैं।

नैयायिकों का ईश्वर अनन्त है। वह अनन्त गुणों से परिपूर्ण है। वह षडैश्वर्य सम्पन्न है –

  • आधिपत्य ( Majesty )
  • वीर्य ( Almighty )
  • यश ( All Glorious )
  • श्री ( Infinitely Beautiful )
  • ज्ञान ( Knowledge )
  • वैराग्य ( Detachment )

न्यायकुसुमांजलि में उदयनाचार्य लिखते हैं –

‘कार्ययोजन धृत्यादेः पदात् प्रत्ययतः।

श्रुतेः वाक्यात् संख्याविशेषाच्च साध्यो विश्वविद्व्ययः॥’

न्यायकुसुमांजलि।

न्याय दर्शन

वैशेषिक दर्शन में ईश्वर-विचार

वैशेषिक दर्शन ईश्वरवादी है। इस मत में ईश्वर को एक आत्मा माना गया है। वैशेषिकों के अनुसार आत्मा दो प्रकार की होती है :

  • जीवात्मा
  • परमात्मा

परमात्मा को ईश्वर कहा गया है। वह जगत् का स्रष्टा, पालक और संहर्ता है।

वैशेषिकों ने ईश्वर को महेश्वर कहा है। ईश्वर जगत् का निमित्त कारण है। ईश्वर नित्य परमाणुओं, दिक्, काल, आकाश, मन और आत्माओं से जगत् का सृजन करता है।

न्याय-वैशेषिक के दोनों के ईश्वर विषयक अवधारणा मिलते-जुलते हैं। इनके अनुसार ईश्वर एक है। वह नित्य, सर्वव्यापी, सर्वज्ञ, पूर्ण और षड्-ऐश्वर्य सम्पन्न है। वहीं धर्म-व्यवस्थापक, कर्मफलदाता और सुख-दुःख निर्णायक है।

वैशेषिक दर्शन

सांख्य दर्शन में ईश्वर-विचार

सांख्य दर्शन में ईश्वर की अवधारणा पर विवाद है। इसके सम्बन्ध में दो मत हैं —

  • ईश्वरवादी मत – इस वर्ग के विद्वान हैं – विज्ञानभिक्षु।
  • अनीश्वरवादी मत – इस वर्ग के विद्वान हैं – वाचस्पति मिश्र और अनिरुद्ध।

सांख्य दर्शन को ईश्वरवादी मानने वालों कुछ टीकाकारों जिसमें प्रमुख हैं, विज्ञानभिक्षु, यह तर्क देते हैं कि ईश्वर असिद्ध है। क्योंकि सांख्य में मात्र इतना कहा गया है कि ईश्वर के अस्तित्व का कोई प्रमाण नहीं है।

उनका कहना है कि सांख्य सूत्र में उल्लिखित ‘इश्वरसिद्धेः’ से ईश्वर का अस्तित्व असिद्ध नहीं होता है। इस आधार पर यह कहना कि सांख्य अनीश्वरवादी है ठीक नहीं है।

ईश्वरवादियों के अनुसार अचेतन प्रकृति को जगत् के सृजन को लिए गति और परिवर्तन करने के लिए संसर्ग की आवश्यकता होती है। प्रकृति में यह गति और परिवर्तन ईश्वर के संसर्ग से होता है जिससे प्रकृति की साम्यावस्था में विकृति होती है और जगत् का सृजन होता है।

दूसरे शब्दों में प्रकृति की सभी वस्तुएँ विकसित होती हैं। प्रकृति की वस्तुएँ अचेतन होती हैं और उसे गति देने के लिए ईश्वर के सानिध्य की आवश्यकता होती है। उनके अनुसार युक्ति और शास्त्र दोनों से ईश्वर की सिद्धि होती है।

परन्तु विज्ञानभिक्षु की उपर्युक्त व्याख्या अधिक मान्य नहीं है। अधिकतर सांख्य दर्शन के टीकाकारों ने सांख्य को निरीश्वरवादी ही माना है।

सांख्य दर्शन में ईश्वर के अस्तित्व के विरुध्द निम्न युक्तियाँ दी गयी हैं :

  • संसार कार्य-शृंखला है अतः जगत् का भी कारण अवश्य होना चाहिए। प्रश्न उठता है कि नित्य और अपरिणामी होने से ईश्वर का रूपांतरण जगत् में किस प्रकार हो सकता है? क्योंकि वह ( ईश्वर ) तो नित्य और अपरिवर्तनीय है। इसलिए ईश्वर को कारण नहीं माना जा सकता है। जगत् का कारण वही हो सकता है जो नित्य तो है, परन्तु परिवर्तनशील भी हो। प्रकृति जगत् का कारण है क्योंकि वह नित्य तो है ही, साथ ही परिवर्तनशील भी। दूसरे शब्दों में इसलिए जगत् का मूल कारण नित्य और परिणामी होना चाहिए। इस तरह सांख्य विचारक इस परिणाम पर पहुँचते हैं कि जगत् का मूल परिमाणी कारण प्रकृति है।
  • प्रकृति के संचालक और नियामक के रूप में भी ईश्वर सिद्ध नहीं होता है क्योंकि प्रकृति के संचालन एवं नियमन का कोई उद्देश्य होने से उसपर ( ईश्वर ) पर अपूर्णता का दोष लग जायेगा।
  • सांख्य मत में जीव को अमर माना गया है। ईश्वर की सत्ता स्वीकार करने पर जीवों की स्वतंत्रता और अमरता खण्डित हो जाती है।
  • जीवों को ईश्वरीय अंश नहीं माना जा सकता है, क्योंकि उसमें ईश्वर-शक्ति या ईश्वरीय गुणों का अभाव है। यदि जीव को ईश्वर से उत्पन्न माना जाय तो फिर उसका नश्वर होना सिद्ध होता है।
  • सांख्य मत में वेद को अपौरुषेय माना गया है परन्तु ध्यान देने वाली बात यह है कि यहाँ पर वेद को ईश्वरकृत नहीं माना गया है।
  • ईश्वर का ज्ञान प्रत्यक्ष, अनुमान, शब्द ( वेद ) से सिद्ध नहीं होता है।

फिरभी सांख्य दर्शन को अनीश्वरवादी ही माना जाता है।

सांख्य दर्शन

योग दर्शन में ईश्वर-विचार

श्रीमद्भागवदगीता में उल्लेख आता है – ‘सांख्ययोगौ पृथग्बालाः प्रवदन्ति न पंडिताः। अर्थात् सांख्य और योग समान दर्शन तंत्र हैं। योग दर्शन की तत्त्वमीमांसा सांख्य दर्शन के समान है बस उसमें ईश्वर को जोड़ दिया गया है। अतः जहाँ एक ओर सांख्य दर्शन निरीश्वर-सांख्य है वहीं योग दर्शन सेश्वर-सांख्य कहलाता है। दूसरे शब्दों में योग को ‘सेश्वर सांख्य’ भी कहा जाता है।

योग दर्शन में ईश्वरीय सत्ता की स्वीकृत है। उसके विषय में योगसूत्र में कथन है —

‘क्लेशकर्म विपाकाशयैः अपरामृष्टः पुरुषविशेषः ईश्वरः।’

अर्थात् ईश्वर वह पुरुष विशेष है जो क्लेश, कर्म, परिणाम, आशय ( संस्कार ) आदि से अप्रभावित रहता है।

ईश्वर नित्य, सर्वव्यापी, सर्वज्ञ और सर्वशक्तिमान है। वह सर्वविधि परिपूर्ण और अनन्त है। वह त्रिगुणातीत है। ईश्वर का प्रतीक “ओइम्” है। ईश्वर की भक्ति समाधि प्राप्ति करने का साधन है।

परन्तु यह उल्लेखनीय है कि ईश्वर कर्त्ता, धर्ता और संहर्ता नहीं है। उसका ( ईश्वर ) सैद्धान्तिक नहीं अपितु व्यावहारिक महत्त्व है। वह मात्र पुरुष विशेष है। वह मुक्तिदाता भी नहीं है। ईश्वर का कार्य मात्र साधन के मार्ग की बाधाओं को दूर करना है। उसका बंधन या मोक्ष से कोई सीधा सम्बन्ध भी नहीं है। मानव के जीवन का उद्देश्य ईश्वर से तादात्म्य स्थापित करना नहीं, अपितु पुरुष का प्रकृति से सम्बंध-विच्छेद करना है।

चित्तवृत्तियों का निरोध योग दर्शन का मुख्य लक्ष्य है और इसकी प्राप्ति ‘ईश्वर-प्राणिधान’ से सम्भव है। यहाँ ईश्वर के प्राणिधान का अर्थ है – ईश्वर-भक्ति। इसीलिए योग दर्शन में ईश्वर को ध्यान का मुख्य और सर्वश्रेष्ठ विषय कहा गया है। योग में ईश्वर-प्राणिधान को अत्यधिक महत्त्व देते हुए कहा गया है – ‘तस्य वाचकः प्रणवः।’ योगसूत्र ।

योग दर्शन के ईश्वर सम्बन्धी विचार नैयायिकों से मिलते-जुलते हैं। योग दर्शन में ईश्वर के अस्तित्व को प्रमाणित करने के लिए निम्नलिखित तर्क दिये गये हैं :

  • अविच्छिन्नता का नियम ( Law of continuity ) से ईश्वरीय सत्ता प्रमाणित होती है। ज्ञान के सम्बन्ध में छोटी-बड़ी मात्रा का भेद हैं और उसकी पराकाष्ठा भी होगी। ईश्वर ज्ञान का स्रोत है और उसकी पराकाष्ठा भी; अतः ईश्वर का अस्तित्व प्रमाणित होता है।
  • वेद प्रमाण – वेद ईश्वर का वर्णन करते हैं अतः शब्द प्रमाण द्वारा भी ईश्वर का अस्तित्व प्रमाणित होता है।
  • प्रकृति अचेतन है और यह साम्यावस्था में रहती है। इसको गति ईश्वर द्वारा प्रदान की जाती है जिससे इसकी साम्यावस्था भंग होती है और सृष्टि का विकास प्रारम्भ होता है। जगत् का उपादान कारण प्रकृति है जबकि जगत् का निष्क्रिय निमित्त कारण ईश्वर है। दूसरे शब्दों में योग दर्शन के अनुसार दो विपरीत सत्ताओं ( प्रकृति और पुरुष ) का संसर्ग या वियोग ईश्वर द्वारा ही हो सकता है। ईश्वर जगत् का निमित्त कारण है जबकि प्रकृति उपादान कारण है।
  • अतः ईश्वर का अस्तित्व सिद्ध होता है।

ईश्वर एक है। वह एक विशेष प्रकार का पुरुष है। वह पूर्ण, अनंत, सर्वव्यापी, सर्वशक्तिमान सर्वज्ञ और अंतर्यामी है। वह दयालुता, ऐश्वर्य, धर्म, ज्ञान इत्यादि गुणों का स्वामी होते हुए भी त्रिगुणातीत है।

योग दर्शन

मीमांसा दर्शन में ईश्वर-विचार

महर्षि जैमिनि ने ईश्वर का उल्लेख नहीं किया है जो कि अंतर्यामी व सर्वशक्तिमान गुणों से परिपूर्ण हो। न तो जगत् की सृष्टि के लिए और न ही कर्मफल देने के लिए ईश्वर की आवश्यकता मानी गयी है।

यहाँ पर कर्म पर अत्यधिक बल देने के कारण ईश्वर का स्थान गौण हो गया है। इस मत में ईश्वर को जगत् का स्रष्टा, पालक और संहर्ता नहीं माना गया है। जगत् की सृष्टि की व्याख्या बिना ईश्वर के की जा सकती है अतः ईश्वर के अस्तित्व की कोई आवश्यकता नहीं महसूस की गयी है।

वेदों को प्रमाण मानने के कारण यहाँ पर अनेक देवताओं का उल्लेख मिलता है। यहाँ देवताओं के गुण-धर्म की भी चर्चा नहीं हुई है। हालाँकि देवताओं को मात्र यज्ञ-बलि-ग्रहणकर्त्ता के रूप में मान्यता दी गयी है। देवताओं की केवल इतनी उपयोगिता है कि उनके नाम पर यज्ञ किये जाते हैं।

चूँकि मीमांसा में अनेक देवताओं को माना गया है, तो क्या इसके आधार पर मीमांसा दर्शन को अनेकेश्वरवादी ( polytheist ) कहा जा सकता है? इसका उत्तर है नहीं। इसको अनेकेश्वरवादी कहना भ्रांतिपूर्ण है, क्योंकि देवताओं का अस्तित्व केवल वैदिक मंत्रों में ही है। जगत् में उनका कोई महत्त्वपूर्ण कृत्य नहीं है। न तो देवता-आत्मा सम्बन्ध स्पष्ट है एवं न ही देवताओं के स्वतंत्र सत्ता की बात की गयी है। देवताओं को तो उपासना तक का विषय नहीं माना गया है। इनकी मात्र इतनी उपयोगिता है कि इनके नाम पर यज्ञादि किये जाते हैं।

इसलिए कुछ विद्वानों के मतानुसार मीमांसा के देवताओं को महाकाव्य के अमरपात्रों सदृश बताया है। वे एक तरह से आदर्श नायक कहे जा सकते हैं।

कुमारिल और प्रभाकर दोनों विद्वानों ने जगत् की सृष्टि, पालन और संहार के लिए ईश्वर की आवश्यकता ही नहीं महसूस करते हैं। वे ऐसी किसी सर्वशक्तिमान ईश्वर को मान्यता नहीं देते जो स्रष्टा, पालक एवं संहर्ता हो।

कुमारिल तो ईश्वर को वेद-निर्माता भी नहीं मानते हैं। वे कहते हैं कि यदि वेद को ईश्वर की कृति माना जाये तो वेद संदिग्ध हो जायेंगे। वेद तो अपौरुषेय, स्व-प्रकाश और स्व-प्रमाण हैं।

अतः मीमांसा निरीश्वरवादी है।

परन्तु कालान्तर में मीमांसा अनुयायियों ने ईश्वर को स्थान देते हुए उसे कर्मफलदाता और कर्म-संचालक मान लिया।

प्रो० मैक्समूलर ने मीमांसा दर्शन को निरीश्वरवादी कहने पर आपत्ति की है क्योंकि — मीमांसा ने ईश्वर के सृष्टि-कार्य के विरुद्ध आक्षेप किया है, लेकिन इस आधार पर यह मानना कि मीमांसा अनीश्वरवादी है, सही नहीं है। सृष्टि के अभाव में भी तो ईश्वर के अस्तित्व को माना जा सकता है। मीमांसा दर्शन वेदों पर आधृत है। वेद में ईश्वर के अस्तित्व का पूर्ण रूप से संकेत है। इसलिए मीमांसा को अनीश्वरवादी मानना असंतोषजनक है।

 ‘वेदों में विश्वास ही आस्तिकता है और मीमांसा वेद पर आधारित है और वेदों में इसका अखंड विश्वास है। वेद ईश्वर का अस्तित्व पूर्णतया स्वीकारकरते हैं, अतः मीमांसा को निश्चित रूप से ईश्वरवादी कहा जा सकता है।’

( The Six Systems of Indian Philosophy by F. Max Muller )।

मीमांसा दर्शन

वेदान्त दर्शन में ईश्वर-विचार

वेदान्त दर्शन में कई सम्प्रदायों का उदय हुआ। जिसमें से प्रमुख है :

  • शंकर का अद्वैतवाद,
  • रामानुजाचार्य का विशिष्टाद्वैतवाद और
  • बल्लभाचार्य का शुद्धाद्वैतवाद।

वेदान्त दर्शन

शंकर के अद्वैतवाद में ईश्वर-विचार

शंकराचार्य का दर्शन अद्वैतवाद कहलाता है। जिसके अंतर्गत परमार्थिक या वास्तविक स्तर पर सिर्फ एक ही सत्ता है अर्थात् ब्रह्म को स्वीकार किया गया।

अद्वैत वेदांत की मुख्य विशेषता इस प्रकार हैं :

  • निखिल सृष्टि में एकमात्र ब्रह्म ही सत्य है।
  • यह दृश्यमान जगत् माया का कार्य होने के कारण मिथ्या है।
  • जीव ( आत्मा ) तथा ब्रह्म में कोई भेद नहीं है।

“ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या जीवो ब्रह्मैव नापारः।”

आत्मा और ब्रह्म एक ही है। जगत में आत्माओं का वैविध्य प्रतीत होता है, किंतु यह वैविध्य वास्तविक नहीं है। विभिन्न आत्माएं ब्रह्म के प्रतिबिम्ब या आभासमात्र हैं।

शंकराचार्य के अनुसार सत्य के तीन स्तर हैं :

  • पारमार्थिक – पारमार्थिक स्तर पर केवल एक ही सत्ता है। वह है – ब्रह्म। ब्रह्म और आत्मा में अभेद है। यह सत्य का वास्तविक स्तर है। इसका खंडन नहीं हो सकता है अर्थात् इसका त्रिकाल में भी खंडन नहीं हो सकता है।
  • व्यावहारिक – व्यावहारिक स्तर पर तीन सत्ताएँ हैं —
    • ईश्वर – ईश्वर ब्रह्म का सगुण रूप है। वह माया में ब्रह्म का प्रतिबिम्ब है।मायोपहितं चैतन्यं ब्रह्म।’  ब्रह्म निर्विशेष है, जबकि ईश्वर सविशेष। शंकर ईश्वर को अपर-ब्रह्म कहते हैं और ब्रह्म को पर-ब्रह्म।
    • जीव – जीव ( आत्मा या ब्रह्म ) का अविद्या में प्रतिबिम्ब है, जोकि शरीर से युक्त होने के कारण अज्ञानतावश अपने मूल आत्म-स्वरूप को भूल जाता है। जब आत्मा अज्ञान/अविद्या के वशीभूत होकर स्वयं को शरीर से संबद्ध मानकर स्वयं को कर्त्ता और भोक्ता मान बैठता है तो जीव कहलाता है। दूसरे शब्दों में अविद्या या अज्ञानता बद्ध आत्मा ही जीव है।
    • जगत् – जगत् ब्रह्म का विवर्त मात्र है। ईसकी रचना ईश्वर माया के माध्यम से करता है।
  • प्रातिभासिक – प्रातिभासिक स्तर पर जगत् में होने वाले सामान्य भ्रम और स्वप्न आते हैं। यथा; रस्सी देखकर सर्प समझ लेना।

प्रातिभासिक सत्य का खंडन व्यावहारिक सत्य से होता है और व्यावहारिक सत्य का खण्डन पारमार्थिक सत्य से।

जिस रस्सी को भ्रमवश सर्प समझ बैठे थे वह भ्रम टूटने पर वास्तविक ज्ञान होते ही हम व्यावहारिक स्तर पर प्रवेश करते हैं और हमें यह ज्ञान हो जाता है कि यह रस्सी है, सर्प नहीं।

व्यावहारिक स्तर भी एक तरह से व्यापक प्रकार का भ्रम ही है। यह सत्य इसलिए लगता है क्योंकि इससे हमारा दैनंदिन क्रियाकलाप चलता है। परन्तु जो व्यक्ति अपनी साधना से इसका अतिक्रमण करके पारमार्थिक सत्य या ब्रह्म का साक्षात्कार कर लेता है वह यह ज्ञान पा लेता है कि वस्तुतः व्यावहारिक स्तर भी भ्रम ही है।

शंकर के अनुसार आत्मा और ब्रह्म मूलतः और तत्त्वतः एक ही हैं। शंकर ने एकमात्र ब्रह्म को ही सत्य माना है। आत्मा और ब्रह्म में अभेद है।

‘अयमात्मा ब्रह्म।’

छान्दोग्य उपनिषद्

अज्ञान के वसीभूत होकर आत्मा स्वयं का शरीर से तादात्म्य मानकर ब्रह्म और आत्मा का द्वैत मान बैठती है। यही बंधन है। जबकि वह शुद्ध, चैतन्य और प्रकाशस्वरूप है। वह ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय से परे निर्गुण और निरपेक्ष सत्ता है।

‘Atman is the same as Brahman. It is pure consciousness. It is the self, which is self luminous and which transcends the subject-object duality and the trinity of knower, known and knowledge, and all the categories of the intellect. It is the unqualified absolute.’

Chandradhar Sharma- A Critical History of Indian Philosophy.

दूसरे शब्दों में बंधन का कारण यह है कि आत्मा शरीर से बद्ध होने से अज्ञानतावश स्वयं के मूल ब्रह्म-स्वरूप को भूल गयी है। बंधन का कारण अज्ञान है।

मोक्ष प्राप्ति एकमात्र ज्ञान से होती है। जैसे ही आत्मा को ‘अहं ब्रह्मास्मि’ का बोध होता है उसे मोक्ष मिल जाता है। मोक्ष की अवस्था में पूर्णतः अद्वैत है।

ईश्वर को सिद्ध करने के लिए जितने भी परम्परागत तर्क दिये गये हैं, शंकर उनका खंडन करते हुए कहते हैं कि ईश्वर को तर्क से सिद्ध नहीं किया जा सकता है।

शंकर ईश्वर के अस्तित्व को श्रुति से प्रमाणित करते हैं।

ब्रह्म निर्गुण और निराकार है। ब्रह्म का माया में प्रतिबिम्ब ईश्वर है अर्थात् ईश्वर ‘मायोपहित ब्रह्म’ है।

ईश्वर माया के द्वारा जगत् की सृष्टि करता है। माया ईश्वर की शक्ति है। ईश्वर व्यक्तित्वपूर्ण है इसलिए उपासना का विषय बन जाता है। वह कर्म-नियम का अध्यक्ष है अतः कर्मानुसार पुरस्कृत और दण्डित करता है।

ईश्वर जगत् में व्याप्त भी है और उससे परे भी अर्थात् वह विश्वव्यापी है और विश्वातीत भी। शंकर के अनुसार ईश्वर ही वह सर्वोच्च सत्ता है जिसका ज्ञान हमें हो पाता है।

‘ईश्वर सर्वोच्च सत्ता या सर्वोच्च सत्य का स्तर नहीं है क्योंकि वह एकत्व बुद्धि-गम्य नहीं है।’

 ( S.N.Das – A History of Indian Philosophy )

इस तरह शंकराचार्य के यहाँ ब्रह्म के दो स्वरूप हो जाते हैं –

  • निर्गुण – यह निर्विकल्प, निराकार और अवर्णनीय है। इसकी व्याख्या निषेधात्मक रूप से ‘नेति नेति’ कहकर की जाती है। इसे शंकर ने परब्रह्म कहा है। यही पारमार्थिक सत्य का स्तर है।
  • सगुण – इसे शंकर ने ईश्वर और अपरब्रह्म कहा है। यह व्यावहारिक सत्य का स्तर है। यह व्यक्ति की धार्मिक भावनाओं को तुष्ट करता है। वह इस रूप में जगत् का स्रष्टा, पालक और संहर्ता है।
ईश्वर की अवधारणा : शंकराचार्य का दर्शन
ईश्वर, जीव और जगत् का ब्रह्म से सम्बंध

शंकराचार्य और उनका दर्शन

 

रामानुजाचार्य के विशिष्टाद्वैतवाद में ईश्वर-विचार

विशिष्ट-अद्वैतवाद भी एक प्रकार का अद्वैतवाद ही है। रामानुज ने अंतिम सत्ता एक ही मानते हुए उसके अन्दर ही द्वैत की स्थापना की है। अतः यह मत विशिष्टाद्वैत बन जाता है।

रामानुज के अनुसार तीन प्रकार के भेद होते हैं :

  • सजातीय
  • विजातीय
  • स्वगत्

शंकराचार्य ने तीनों प्रकार के भेदों का खंडन किया है। शंकर के अनुसार न तो कोई सत्ता ब्रह्म के समान है, न ही भिन्न और न ही उसके भीतर कोई अंश-अंशी का भेद है।

रामानुज ने तो सजातीय और विजातीय भेदों का खंडन किया परन्तु वे स्वगत् भेद को मानते हैं। उनके अनुसार ईश्वर अंशी है जबकि चित् व अचित् उसके अंश हैं। ईश्वर विशेष्य है जबकि चित् और अचित् उसके विशेषण।

रामानुज के अनुसार चित् और अचित् ईश्वर के अंश हैं और उनकी वास्तविक सत्ता है। वे ब्रह्म या ईश्वर के विवर्त या आभास नहीं हैं। उनकी सत्ता नित्य और वास्तविक है। अतः जीव भी सत्य है और जगत् भी।

शंकर ने ब्रह्म व ईश्वर में भेद किया है। एक पारमार्थिक सत्ता है तो दूसरी व्यावहारिक। एक निर्गुण है तो दूसरा सगुण। रामानुज ने इसके विपरीत स्पष्ट रूप से कहा कि ब्रह्म और ईश्वर में कोई भेद नहीं है और वह सगुण ही है। सत्, चित् और आनन्द उसके गुण हैं अर्थात् वह सच्चिदानन्द है।

शंकराचार्य ने मोक्ष की अवस्था में सम्पूर्ण अद्वैत माना है। अर्थात् यहाँ सारूप्य मुक्ति होती है। ब्रह्म और आत्मा इस अवस्था में एकमेव हो जाते हैं।

दूसरी ओर रामानुज ने सायुज्य मुक्ति की अवधारणा दी है। इसमें जीव ईश्वर का अंश बन तो जाता है परन्तु उसका पृथक अस्तित्व बना रहता है। इसके अनुसार जीव को ईश्वर के ज्ञान आनन्द का पूर्ण अनुभव होता है परन्तु उसकी सत्ता बनी रहती है।

शंकर ने मोक्ष लिए ज्ञान को आवश्यक बताया जबकि रामानुज ने भक्ति को। अर्थात् जहाँ एक ओर शंकराचार्य जहाँ मुक्ति के लिए ज्ञान को प्राथमिकता देते हैं और भक्ति को सहायक के रूप में स्वीकार करते हैं, वहीं दूसरी ओर रामानुज भक्ति को प्राथमिकता देते हैं एवं ज्ञान को मुक्ति के लिए सहायक के रूप में स्वीकार करते हैं।

रामानुज जोर देकर कहते हैं कि ईश्वर सगुण है। वे ब्रह्म और ईश्वर को पृथक नहीं मानते हैं। ईश्वर असीम गुणों का भण्डार, सर्वशक्तिमान और दयालु है। वहीं जगत् का स्रष्टा, पालक और संहर्ता है।

प्रलय की अवस्था में जब सभी भौतिक पदार्थों का नाश हो जाता है तब जीव ( चित् ) और प्रकृति ( अचित् ) बीजरूप में ब्रह्म में निहित रहते हैं। इस अवस्था को रामानुज ‘कारण ब्रह्म’ कहते हैं।

सृष्टि के समय ब्रह्म शरीर-युक्ति जीव और भौतिक तत्त्वों के रूप में व्यक्त होता है, इसको ‘कार्य ब्रह्म’ कहा गया है।

क्योंकि रामानुज ब्रह्म को सगुण मानते हैं और उसे उपासना का विषय घोषित करते हैं। ईश्वर भक्ति का विषय है। वह दयालु है। वह ज्ञान, शक्ति, ऐश्वर्य, तेज आदि गुणों से सम्पन्न है।

मोक्ष के लिए भक्ति अनिवार्य है। भक्ति से प्रसन्न हो ईश्वर की कृपा से मोक्ष प्राप्त होती है।

ईश्वर ( ब्रह्म ) एक है परन्तु वह स्वयं को भिन्न-भिन्न रूपों में प्रकट करता है।

रामानुज अवतारवाद के पोषक व समर्थक हैं।

रामानुज ईश्वर के पाँच रूप बताते हैं –

  • अंतर्यामी
  • नारायण
  • व्यूह
  • अवतार
  • अर्चावतार।
ईश्वर की अवधारणा: रामानुजाचार्य का दर्शन
मुक्ति या मोक्ष के प्रकार

रामानुजाचार्य का विशिष्टाद्वैतवाद

वल्लभाचार्य के शुद्धाद्वैतवाद में ईश्वर-विचार

शुद्ध-अद्वैतवाद भी एक प्रकार से अद्वैतवाद ही है। यहाँ पर शुद्ध शब्द का प्रयोग विशेषण के रूप में हुआ है।

इस सृष्टि सृजन तीन गुणों से हुई है –

  • सत्
  • चित्
  • आनन्द

इन्हीं तीन गुणों के आधार पर ईश्वर, जीव और जगत् की व्याख्या की गयी है :

  • ईश्वर = सच्चिदानन्द = सत् + चित् + आनन्द
  • जीव = सत् + चित्
  • जगत् = सत्

अर्थात् जिन गुणों से जीव और जगत् निर्मित हैं उसी से ईश्वर भी। अतः जिस तरह ईश्वर शुद्ध है उसी तरह जीव और जगत् भी सत् है, मिथ्या नहीं।

वल्लभाचार्य के अनुसार मोक्ष की प्राप्ति भक्ति से होती है। उन्होंने एक विशेष मार्ग की स्थापना की जिसे ‘पुष्टिमार्ग’ कहते हैं। अर्थात् ईश्वर के अनुग्रह से ही भक्ति प्राप्त होती है — ‘पोषणम् तदनुग्रह।’

वल्लभाचार्य का शुद्धाद्वैतावाद

भारतीय दर्शन में ईश्वर-विषयक अवधारणाएँ

भारतीय धर्म और दर्शन में ईश्वर से सम्बंधित निम्न अवधारणाएँ मिलती हैं :—

  • प्रकृतिवादी अवधारणा
  • निर्वैयक्तिक अवधारणा
  • व्यक्तिपूर्ण अवधारणा

प्रकृतिवादी अवधारणा

इस अवधारणा के अनुसार ईश्वर प्रकृति के विभिन्न रूपों का प्रत्यक्षीकरण है। मानव का प्रकृति के सौम्य और रौद्र रूप से दिन-प्रतिदिन सामना होता था। उसे तुष्ट करने के लिए मानव ने प्रकृति के विभिन्न रूपों को पूजने लगा। यह धारणा विश्व के सभी संस्कृतियों में मिलती है। भारतीय भी इसका अपवाद नहीं थे। वेदों में हमें इसका वर्णन मिलता है; जैसे –

  • इन्द्र – वर्षा व झंझावत का देवता
  • वरुण – जल और ऋत् का नियामक देवता
  • सूर्य – प्रकाश का देवता
  • अग्नि – यज्ञ का देवता
  • इसके अलावा नदी, वन, पृथ्वी इत्यादि का मानवीकरण करके वैदिक आर्य पूजा करते थे।

प्रकृतिवादी ईश्वरीय अवधारणा ‘अनेकेश्वरवादी’ होती है जिसके कारण यह अवधारणा निम्न प्रश्नों में उलझ जाती है :—

  • ईश्वर के अनेक होने से वह विभाजित हो जाता है अतः वह सर्वशक्तिमान नहीं रह पाता है।
  • वह सर्वव्यापी और सर्वज्ञ है इसकी व्याख्या नहीं हो पाती है।
  • कौन सर्वोच्च है?

ऋग्वैदिक आर्यों ने इसका समाधान ऐसे किया कि जब वे जिसकी पूजा करते उसे ही सर्वोच्च मान लेते थे। इसको पाश्चात्य विद्वानों ने यह कहा :—

  • मैक्समूलर ने इसको विकल्पेश्वरवाद ( Henotheism ) कहा।
  • ब्लूमफील्ड ने इसको अवसरवादी एकेश्वरवाद कहा।

परन्तु अगर हम ध्यान दें तो पायेंगे कि वैदिक आर्य स्वयं ही यह प्रश्न उठा रहे थे —‘कस्मै देवाय हविषा विधेम?’ और ऋग्वैदिक काल के अंतिम अवस्था में हमको एकेश्वरवाद की झलक मिलती है – ‘एकम् सद् विप्राः बहुधा वदन्ति।’ इस ऐकेश्वरवाद का पूर्ण विकास हमें उपनिषदों में मिलता है।

निर्वैयक्तिक अवधारणा

इस अवधारणा के अनुसार ईश्वर निर्वैयक्तिक है। उसपर गुणों का आरोपण नहीं किया जा सकता है।

यहाँ यह बात विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि ईश्वर गुणहीन नहीं है, बल्कि गुणों से उसकी व्याख्या नहीं हो सकती है, क्योंकि यदि हम उसपर गुणों का आरोपण करते हैं तो वह सीमित हो जायेगा।

इसीलिए कुछ ईश्वर की व्याख्या निर्गुण कहकर करते हैं। निर्गुण का अर्थ गुणहीन नहीं है वरन् हम सक्षम नहीं कि गुणों के माध्यम से ईश्वर की व्याख्या कर सकें।

उपनिषदों में हमें निर्वैयक्तिक या निर्गुण ईश्वर की ही व्याख्या मिलती है। जहाँ पर उसे ब्रह्म कहा गया है। आत्मा और ब्रह्म वे दो स्तम्भ हैं जिनपर उपनिषद् के विचार अवलम्बित हैं। एक जगह कहा गया है —

‘वृहन्तो हि अस्मिन् गुणा इति ब्रह्मा।’

अर्थात् ब्रह्म से तात्पर्य उस परम् सत्ता से जिसकी सत्ता और अनंत शक्ति पर जगत् के सभी पदार्थों का संचालन निर्भर है।

उपनिषदों विशेषकर बृहदारण्यक उपनिषद् में ब्रह्म का वर्णन निषेधात्मक रूप में मिलता है — ‘नेति नेति।’ इसका अर्थ है कि ‘ब्रह्म अनिर्वाच्य, अलक्षण और ज्ञानातीत है।’

शंकराचार्य के अद्वैत-वेदान्त में भी पारमार्थिक या अंतिम सत्य के रूप में ब्रह्म को निर्गुण बताया गया है। शंकर के अनुसार बुद्धि ब्रह्म का वर्णन नहीं कर सकती है। वह सजातीय, विजातीय और स्वगत् सभी भेदों से परे है। शंकर का ब्रह्म सभी भेदों से परे, निर्गुण, निर्विशेष सत्ता के साथ-साथ आनिर्वचनीय है। शंकर का ब्रह्म सत्, चित् व आनन्द है इसी को — ‘सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म’ कहा गया है। यहाँ सत् कहने का अर्थ यह है कि ब्रह्म असत् नहीं है।

आगे चलकर भक्तिकाल की संत परम्परा इसी पर अवलंबित है जिसके हस्ताक्षर कवि कबीरदास है – निर्गुण राम जपहु रे भाई।

व्यक्तिपूर्ण अवधारणा

व्यक्तिपूर्ण अवधारणा का अर्थ है ईश्वर की सगुण अवधारणा अर्थात् कुछ गुणों के माध्यम से ईश्वर की व्याख्या की जा सकती है।

चार्वाक, बौद्ध, जैन, सांख्य और मीमांसा दर्शन अनीश्वरवादी है।

न्याय, वैशेषिक, योग और वेदांत दर्शन ईश्वरवादी हैं। इसमें से भी शंकराचार्य के अद्वैत वेदांत में अंतिम सत्य के रूप में ( पारमार्थिक स्तर पर ) ब्रह्म निर्गुण है जबकि व्यावहारिक स्तर पर सगुण ईश्वर माना गया है।

रामानुज के विशिष्टाद्वैतवाद और बल्लभाचार्य के शुद्धाद्वैतवाद में ईश्वर की व्यक्तित्वपूर्ण अर्थात् सगुण ईश्वर की अवधारणा मिलती है। जिसमें क्रमशः श्रीराम और श्रीकृष्ण को ईश्वर माना गया है।

आगे चलकर इसी आधार पर भक्तिकाल में रामभक्ति के हस्ताक्षर कवि गोस्वामी तुलसीदास हुए तो श्रीकृष्ण भक्ति के हस्ताक्षर कवि महाकवि सूरदास हुए।

‘जेहि इमि गवाहिं वेद बुध, जाहि धरहि मुनि ध्यान।

सोइ दशरथ सुत भगत हित, कोसलिपति भगवान॥’

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