अमरावती – प्राचीन बौद्ध स्थल

परिचय

अमरावती शब्द का अर्थ है – स्वर्ग। इस नाम के कई स्थान हैं – एक, महाराष्ट्र का अमरावती जनपद है; द्वितीय, अभी हाल में विभाजित आंध्रप्रदेश की राजधानी का अमरावती नाम से नवनिर्माण चल रहा और तृतीय, प्राचीन अमरावती स्थल।

हम यहाँ पर प्राचीन अमरावती की बात कर रहे हैं।

अमरावती : प्राचीन बौद्ध धार्मिक स्थल
अमरावती

अमरावती का इतिहास

अमरावती वर्तमान आन्ध्रप्रदेश के गुन्टूर जनपद में कृष्णा नदी के तट पर स्थित थी। आन्ध्रप्रदेश के ‘अमराराम’ का प्रसिद्ध ‘शैव तीर्थ’ ही पूर्व में अमरावती नाम से विख्यात था। इसका एक नाम ‘अमरेश्वर’ भी मिलता है। इसी के समीप एक अन्य नगर ‘धान्यकटक’ ( धरणीकोट ) स्थित था जोकि सातवाहनकाल में प्रसिद्ध व्यापारिक मंडी थी।

यह सातवाहनों की राजधानी रह चुकी है। इसको सबसे पहले सातवाहन शासक शातकर्णि प्रथम ने अपनी राजधानी बनायी थी।

कई शताब्दियों के शासन के बाद सातवाहनों का जब पतन हो गया तब उनके ध्वंसावशेषों पर कई छोटे-छोटे राज्यों का उदय हुआ। उन्हीं में से एक थे — इक्ष्वाकु वंशी शासक। सातवाहनों के बाद अमरावती को केंद्र बनाकर इक्ष्वाकु वंशी शासकों ने शासन किया।

कालांतर में अमरावती का स्थान नागार्जुनकोण्डा ने ले लिया।

सातवाहन काल में अमरावती एक प्रसिद्ध सांस्कृतिक और आर्थिक केन्द्र के रूप में उभरा।

अमरावती एक आर्थिक केंद्र के रूप में

कृष्णा नदी के तट पर स्थित और कृष्णा व गोदावरी के उपजाऊ डेल्टा के कारण यह आर्थिक गतिविधियों का केंद्र भी सातवाहन काल में बनकर उभरा था। यहाँ पर कृष्णा नदी से होकर विदेशी व्यापारिक जलयान पहुँचते थे। सातवाहनों की राजधानी बनने, उपजाऊ भूपृष्ठप्रदेश, धार्मिक गतिविधियों का केंद्र और विदेशी व्यापार के कारण यह नगर पर्याप्त सम्पन्न बनकर उभरा था।

अमरावती एक धार्मिक केन्द्र के रूप में : बौद्ध स्तूप

बसावट से कोई १८ मील ( लगभग २९ किमी० ) दक्षिण में बौद्ध स्तूप के ध्वंसावशेष मिले हैं। विद्वानों मत है कि यहाँ पर एक स्तूप का निर्माण सम्राट अशोक ने कराया था क्योंकि अशोक-स्तम्भ का एक अवशेष यहाँ से मिला है। बौद्ध अनुश्रुतियों के अनुसार सम्राट अशोक ने ८४,००० बौद्ध स्तूपों का निर्माण कराया था, जिसमें से यह भी एक था।

सातवाहनों के समय यहाँ पर महास्तूप का निर्माण कराया गया जिसे महाचैत्य ( महाचेतिय ) कहा गया है।

सातवाहन नरेश वशिष्ठीपुत्र पुलुमावी ( शासनकाल लगभग १३० से १५९ ई० ) के समय इस स्तूप का पुनर्निर्माण या जीर्णोद्धार कराया गया और कलाकृतियों से अलंकृत भी किया गया। शायद इसी समय स्तूप के चारों ओर पाषाण की वेष्टिनी / वेदिका ( railing ) लगायी गयी।

स्तूप की वेदिका / वेष्टिनी ( Railing ) संगमरमर की बनी हुई थी। इसकें गुम्बद को भी संगमरमर से जड़ा दिया गया था।

दुर्भाग्य से यह स्तूप अपने मौलिक स्थान से नष्ट हो गया है। इसके अवशेष कोलकाता, चेन्नई और लन्दन के संग्रहालयों में सुरक्षित रखे गये हैं।

सबसे पहले पाश्चात्य विद्वान कर्नल मैकेंजी ने १७९७ ई० में इस स्तूप का पता लगाया था। कर्नल मैकेंजी ने यहाँ से मिले मूर्तियों और शिलापट्टों के रेखाचित्र बनाये। सन् १८४० ई० में इलियट ने इस स्थान की खुदायी करवायी जिसमें मूर्तियों सहित कई अवशेष प्राप्त हुए।

वेदिका को जातक कथाओं से अलंकृत किया गया था। इसपर महात्मा बुद्ध के जीवन से जुड़ी विभिन्न घटनाओं को अंकित किया गया था।

इस स्तूप का वास्तु और तक्षण सातवाहन कला का चरमोत्कर्ष को दर्शाता है।

इस विशाल बौद्ध स्तूप का निर्माण सातवाहन काल में ही किया गया था। यह स्तूप लगभग १३वीं शताब्दी तक बौद्ध यात्रियों के आकर्षण का केंद्र बना रहा था।

बौद्ध स्तूप : संक्षिप्त विवरण

अमरावती में मिले शिलाखण्डों पर अंकित लेखों इस स्तूप के सम्बन्ध में कुछ अनुमान लगाये जा सकते हैं –

  • स्तूप के चारों ओर वेदिका / वेष्टिनी ( railing ) पर्याप्त लम्बी थी। इस वेदिका में उष्णीश ( coping stones ), फुल्लों की उत्कीर्ण सूचियाँ ( cross bars ) और चार तोरण द्वार तथा स्तम्भ लगे हुए थे।
  • आयक प्रत्येक तोरण द्वारा ( archway ) के पीछे स्तूप के आधार से उद्भूत होता हुआ एक चबूतरा था जिसको ‘आयक’ ( आर्यक अर्थात् पूज्य ) नाम दिया गया था। इनपर पाँच आयक स्तम्भ लगाये गये थे। आयक के अगल-बगल सीढ़ियाँ निर्मित की गयी थी जिससे होकर प्रदक्षिणापथ तक जाया जाता था। ये आयक स्तम्भों को आधार देते थे। इनकी ऊँचायी स्तूप के आधार से कोई २० फीट ऊँची थी। आयक चबूतरों का निर्माण आंध्र-स्तूपों की आपनी विशेषता थी।
  • स्तम्भों से स्तूप अलंकृत लगते थे और सम्पूर्ण संरचना को मजबूत आधार प्रदान करते थे।
  • वेदिका, प्रदक्षिणापथ और अण्ड ( गुम्बद ) को संगमरमर की पट्टिकाओं से जड़ियाँ गया था।
  • अण्ड के शीर्ष पर एक मंजूषा थी जिसके शीर्ष पर लोहे का छत्र लगाया गया था।
  • विद्वानों का अनुमान है कि स्तूप पर्याप्त बड़ा था —
    • स्तूप के आधार का व्यास १६२ फीट था।
    • स्तूप की वेदिका का घेरा ८०० फीट था।
    • यहाँ पर ९-९ फीट के १३६ स्तम्भ और ३-३ फीट के ३४८ सूचियाँ लगायी गयी थीं।
    • इन सभी पर कलापूर्ण नक्काशियाँ की गयीं थीं।
  • शीर्ष पर छत्र-युक्त हर्मिका थी।
  • द्वार की वेदिका पर चार सिंहों की मूर्तियाँ बनायी गयी थी। दो शेर भीतरी भाग में आपने-सामने मुँह किये हुए बाहर की ओर मुँह किये हुए थे। स्तम्भों के दो सिंह सामने मुँह किये हुए उत्कीर्ण किये गये हैं।
  • स्तूप के हरेक अंग पर पर्याप्त कलापूर्ण अलंकरण किया गया था।
  • अपनी पूर्णता में यह स्तूप निश्चित रूप से ऊँचे धार्मिक आदर्शों एवं अति विकसित कलात्मक भावना का अभिव्यक्तिकरण था।
  • जिस तरह कुषाणों के संरक्षण में गंधार कला और मथुरा कला का विकास हुआ उसी प्रकार सातवाहनों के शासन में अमरावती कलाका विकास हुआ। जहाँ अन्य दो स्कुलों में एकाकी छवियों पर बल था वहीं अमरावती में गतिशील चित्र या आख्यानात्मक कला ( dynamic image or narrative arts ) बनायी गयी। अमरावती स्कूल में मूर्तियों को लम्बी, छरहरी और त्रिभंग मुद्रा में बनाया गया है।

अमरावती बौद्ध स्तूप की विकास यात्रा

इसका निर्माणकाल शताब्दियों तक होता रहा है इसलिए कला-मर्मज्ञों ने अमरावती के स्तूप का निर्माण को चार भिन्न-भिन्न चरणों में बाँटा है —

  • प्रथम अवस्था – ई०पू० २०० से ई०पू० १०० तक
    • प्रारम्भिक अवस्था में अर्धस्तम्भ, स्तम्भ शीर्ष बनाये गये।
    • इनपर भिन्न-भिन्न अलंकरण किये गये; जैसे – प्राणी और वनस्पति।
    • यहाँ यह ध्यान देनेवाली बात है कि बुद्ध के जीवन से जुड़ी घटनाओं का अंकन प्रतीकों के माध्यम से किया गया।
    • अभी तक बुद्ध की प्रतीकों का ही अंकन किया जाता था अतः इस कालखण्ड में बुद्ध की मूर्ति नहीं मिलती है।
  • द्वितीय अवस्था – ई०पू० १०० से १०० ई० तक
    • इस अवस्था में अलंकरण और शिल्पकारी पूर्ववर्ती काल की अपेक्षा भव्य हो गयी।
    • एक महत्त्वपूर्ण परिवर्तन यह हुआ कि अब बुद्ध की मूर्तियों की पूजा शुरू हो गयी थी अतः बुद्ध की मूर्ति और उनके प्रतीक दोनों मिलते हैं।
    • यहाँ के कुछ दृष्य अत्यंत सराहनीय हैं; जैसे – महाभिनिष्क्रमण, मार-विजय आदि।
  • तृतीय अवस्था – १५० से २५० ई० तक
    • इसी चरण में वशिष्ठीपुत्र पुलुमावी का शासनकाल ( लगभग १३० से १५९ ई० ) आ जाता है।
    • इस चरण में शिल्प और वास्तु की दृष्टि से स्तूप का पर्याप्त सम्वर्धन कराया गया।
    • स्तम्भों, सूचियों एवं उष्णीशों पर सुन्दर अलंकरण करवाये गये।
    • स्तम्भों के बाहरी बाजुओं पर बीच में बड़ा कमल, ऊपर अर्ध-कमल अंकित है जबकि मध्य भाग में बुद्ध के जीवन की विभिन्न घटनाएँ दिखायी गयी हैं।
    • छज्जे के अंदरूनी बाजू के स्तम्भ, सूची इत्यादि पर जातक कथाओं को अंकित किया गया है।
    • नलगिरि हाथी के दमन के दृश्य का अंकन एक सूची पर मिलता है जोकि बहुत प्रभावपूर्ण है।
    • धर्मचक्रप्रवर्तन, महाभिनिष्क्रमण जैसे बुद्ध के जीवन से जीवन घटनाओं और जातक कथाओं का अंकन यहाँ पर पर्याप्त रूप से इस चरण में किया गया है।
    • यह अवस्था सातवाहनकालीन कला के चर्मोत्कर्ष को सूचित करता है।
  • चतुर्थ अवस्था – तृतीय शताब्दी के अंत तक का समय
    • सातवाहनों के पतन के बाद निचली कृष्णा घाटी पर इक्ष्वाकु वंशी शासकों ने शासन किया।
    • इसी समय नागार्जुनकोण्डा में भी बौद्ध स्तूप का निर्माण कराया गया।
    • अमरावती स्तूप पर नागार्जुनकोण्डा कला का प्रभाव परिलक्षित होता है।
    • पूर्ण आकृतियुक्त शिलापट्टों को स्तूपों के चारों ओर लगा दिया गया।
    • पहले के शिलापट्टों को उखाड़कर और मूर्तियों को भी निकालकर पुनः व्यवस्थित करने का प्रयास किया गया।
    • शिल्पकला के स्तर में अवनति देखने को मिलता है।
    • मानव आकृतियों को लम्बी और छरहरी बनाया गया है।
    • इन मानवाकृतियों को सजाने में आभूषणों के अलंकरण का अतिरेक देखने को मिलता है।
    • गोल घेरों पर वनस्पतियों ( फूल-पत्तियों ) के अलंकरण से सजाया गया।
    • स्त्रियों और पुरुषों को झरोखों से झाँकते हुए दिखाया गया है।
    • कुल मिलाकर इस चरण के अलंकरण में पहले जैसी रमणीयता और सजीवता का अभाव परिलक्षित होता है।

उपसंहार

अमरावती के शिलाओं पर उत्कीर्ण कला से उस समय के जनजीवन की झाँकी मिलती है। यहाँ पर गरीब की कुटिया से लेकर भिक्षुओं के विहार और राजभवनों इत्यादि का सफलतापूर्वक अंकन मिलता है। बुद्धचरित एवं जातक-कथाओं का सटीक और विस्तृत अंकन अन्य किसी भारतीय स्तूप या चैत्यों पर नहीं मिलता है।

इस सम्बन्ध में कुछ विद्वानों के विचार उद्धृत करने योग्य हैं –

  • के० डी० वाजपेयी कृत ‘भारतीय कला का इतिहास’ — ‘अमरावती का महास्तूप वास्तुकला की एक उज्जवल कृति है। सुन्दरता के विविध आयामों का सुन्दर समन्वय इस महान कृति में देखने योग्य है।’
  • कुमारस्वामी कृत ‘History of Indian and Indonesian Art’ — वे यहाँ की शिल्पकला को भारतीय कला का अत्यंत ‘विलासी और अतिसुकुमार पुष्प’ बताते हैं।

सांस्कृतिक और ऐतिहासिक स्थल — १

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