बौद्ध संघ

बौद्ध संघ

बौद्ध धर्म में संघ का महत्वपूर्ण स्थान है। यह बौद्ध त्रिरत्नों ( बुद्ध, धम्म और संघ ) में शामिल है।

ऋषिपत्तन में अपना प्रथम उपदेश ( धर्मचक्रप्रवर्तन ) देने के बाद बुद्ध ने पाँच ब्राह्मण शिष्यों के साथ संघ की स्थापना की।

बौद्ध संघ से पहले ही जैन और आजीवक संघ विद्यमान थे।

 

संघ में प्रवेश की योग्यता

संघ में प्रवेश के लिए गृहस्थ जीवन का त्याग करना पड़ता था। प्रारम्भ में संघ के द्वार सभी के लिए खुले थे परन्तु शीघ्र ही बुद्ध को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक परिस्थितियों से समझौता करना पड़ा और संघ में प्रवेश के लिए कुछ लोगों के लिए निर्योग्यताएँ निर्धारित करनी पड़ीं। संघ में प्रवेश के लिए न्यूनतम् आयु १५ वर्ष निर्धारित की गयी। माता-पिता की अनुमति संघ में प्रवेशक के लिए अनिवार्य बना दिया गया। अल्पवयस्क, चोर, हत्यारे, राजा के सेवक, अस्वस्थ, शारीरिक विकलांग, ऋणग्रस्त, सैनिक और दासों का प्रवेश प्रतिबंधित कर दिया गया।

आनन्द के आग्रह पर बुद्ध ने स्त्रियों संघ में प्रवेश दिया किन्तु उन्होंने यह भी कहा कि, “ नारी प्रवेश से संघ चिरस्थायी नहीं हो पायेगा।”

 

संघ में प्रवेश की विधि

संघ में प्रवेश को उपसम्पदा कहा गया है। गृहस्थ जीवन का त्याग प्रव्रज्या कहलाता था। प्रव्रज्या ग्रहण करने वाले को श्रामणेर कहा गया है। श्रामणेर किसी आचार्य से शिक्षा ग्रहण कर लेने के बाद उपसम्पदा या भिक्षुपद के योग्य हो जाता था। इसके लिए उसे २० वर्ष की आयु का होना आवश्यक था। श्रामणेर को १० शिक्षापद ( १० शील ) का पालन करना होता था। शुरुआत में बुद्ध स्वयं प्रव्रज्या ग्रहण कराते थे, परन्तु संघ में प्रवेश की संख्या बढ़ने से यह अधिकार अन्य भिक्षुओं को भी दे दिया गया और वे भी उपसम्पदा दिलाने लगे।

बौद्ध धर्मानुयायी दो वर्गों में बंटे थे —

  1. भिक्षु और भिक्षुणी — यही संघ के सदस्य होते थे।
  2. उपासक और उपासिकाएँ — बौद्ध धर्म में आस्था रखने वाले गृहस्थ लोग।

 

संघ की कार्यप्रणाली

बौद्ध संघ का संगठन गणतांत्रिक प्रणाली पर आधृत थी।

संघ-सभा में प्रस्ताव को नात्ति या वृत्त कहा जाता था। प्रस्तुत प्रस्ताव के पाठ को अनुसावन कहते थे। प्रस्ताव को ३ बार पढ़ा जाता था। यदि कोई आपत्ति न हुई तो प्रस्ताव पारित माना जाता था। बहुमत से पारित प्रस्ताव को भूमिस्किम कहते थे।

यदि प्रस्ताव पर आपत्ति हुई तो मतदान की व्यवस्था थी। किसी भी प्रस्ताव पर मतभेद को अधिकरण कहते थे। मतभेद होने पर मत विभाजन की व्यवस्था थी। मतदान को छन्द कहा गया है। मतदान प्रत्यक्ष ( विवतक ) और अप्रत्यक्ष ( गुल्हक ) दोनों प्रकार से होता था। मतदान के लिए अलग-अलग रंग की शलाकायें प्रयुक्त होती थीं। शलाका वापस लेने वाले अधिकारी को शलाका-ग्राहक कहा जाता था।

सभा में बैठने की व्यवस्था करने वाला अधिकारी आसन प्रज्ञापक कहलाता था। सभा की कार्यवाही के लिए गणपूर्ति २० थी।

जब किसी विशेष अवसर पर सभी भिक्षु और भिक्षुणियाँ एकत्रित हो धर्मवार्ता करते थे तो उसे उपोसथ कहते थे।

 

संघ की जनजातीय विशेषताएँ

बुद्ध ने प्राचीन जनजातीय सिद्धान्तों को संघ में महत्व दिया :—

  • वर्गविहीन संघीय व्यवस्था,
  • सामाजिक समता और एकता,
  • भ्रातृत्व,
  • अपरिग्रह,
  • संघ में छोटे-बड़े का कोई भेद नहीं, कोई विशेषाधिकार वर्ग नहीं,
  • बुद्ध ने अपना कोई उत्तराधिकारी नियुक्त नहीं किया अपितु धर्म और विनय को ही शास्ता ( शासक ) माना आदि।

 

भिक्षु / भिक्षुणियों के दैनिक कार्य-कलाप

संघ में प्रवेश के बाद भिक्षु और भिक्षुणियों के लिए कुछ समय तक धर्म का अध्ययन अनिवार्य था। 

संघ में भिक्षु और भिक्षुणियों को कठोर नियम के अंतर्गत रहना होता था। वे कासाय ( गेरुआ ) वस्त्र पहनते थे। प्रातःकाल भिक्षाटन पर निकलते, दिन में धर्मप्रचार करते और सायंकाल संघ में लौटते थे।

ये लोग वर्षाकाल को छोड़कर अन्य समय धर्मोपदेश करते हुए भ्रमण करते थे।

समय-समय पर पातिमोक्ख विधि-निषेधों का पाठ भिक्षु / भिक्षुणियों की सभा में किया जाता था।

अपराधी भिक्षु / भिक्षुणी को दण्ड देने का भी विधान था।

 

संघ का महत्व

बौद्ध मत के प्रचार-प्रसार में संघ का विशेष योगदान है। यह त्रिरत्नों में से एक है। हर श्रद्धालु बौद्ध की प्रातःकालीन प्रार्थना में “बुद्धं शरणम् गच्छामि, धम्मं शरणम् गच्छामि और संघं शरणम् गच्छामि” शामिल होता है।

संघ के भिक्षु और भिक्षुणियों के आदर्शमय जीवन के कारण समाज में इसे आदरपूर्ण स्थान प्राप्त हूआ।

बुद्ध ने वज्जि संघ के विषय में कहा था कि, “संघ की एकता सुदृढ़ रहने और पारम्परिक नियमों का पालन होते रहने पर संघ का विनाश नहीं हो सकता है।”

बुद्ध ने जनजातीय जीवन मूल्यों को संघ में महत्व दिये। वर्ग-विहीन जनजातीय जीवन में सामाजिक एकता, आपसी भाईचारा और सम्पत्ति से अनासक्ति संघ के नियमों ( विनय ) में शामिल थे।

संघ में बड़े-छोटे का कोई विभेद नहीं था।

बुद्ध ने अपना कोई उत्तराधिकारी भी नियुक्त नहीं किया अपितु धर्म और विनय को शास्ता ( शासक ) माना।

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